सोमवार, 16 मार्च 2015

विनिता राहुरीकर की कहानी - कत्ल

कत्ल

बहुत दिन हो गये थे मनु से मिले हुए। कई दिनों से सोच रही थी उससे मिलने जाने का लेकिन सोचते रहने भर से तो जाना हो नहीं पाता। रोज ही कुछ न कुछ अडंगा आ जाता था। कभी बच्चों का स्कूल से आने का समय होता फिर उनकी फरमाईश शुरू हो जाती ये खाना है वो खाना है। दिन कब फुर्र हो जाता है पता ही नहीं चलता और फिर अगले दिन पर टल जाता था जाना। और आने वाला दिन फिर नयी व्यस्तताएँ लेकर आ जाता 

लेकिन आज तो ठान ही लिया था कि कुछ भी हो जाये मनु से मिलना ही है। सगी छोटी बहन है मेरी, आठ बरस छोटी, पैदा हुई थी तो मैं खुशी से बौरा गयी थी, इतनी गोरी गुलाबी रूई के फाहे सी नर्म नाजुक गुड़िया, मुझे तो जैसे प्यारा सा खिलौना मिल गया था। आज भी मनु को देखते ही वही स्नेह वही दुलार छाती में उमंग पड़ता है।

आज बच्चों को स्कूल भेज कर मैंने ड्रायवर को वापस बुलवा लिया था। मनु की मनपसंद कुछ चीजें मैंने एक दिन पहले ही बना ली थीं, फटाफट डब्बों में भरी। एक ही शहर में रहने के बाद भी आजकल की जीवनशैली के कारण दो बहनों का महीनों तक एक दूसरे से मिलना और आना-जाना नहीं हो पाता है।

ग्यारह बजे मैं घर से निकली। मनु को पहले ही फोन कर दिया था। साढ़े ग्यारह बजे गाड़ी मनु की शानदार कोठी के आगे जाकर रूकी। कार से झांककर एक नजर मैंने उस कोठी को देखा और मनु के भाग्य की सराहना की। यह कोठी मनु के ससुरजी ने बनवाई थी और मनु के पति मानव ने इसका आधुनिकीकरण करवाया था। शहर की दर्शनीय कोठियों में से एक थी यह। मनु के सुंदर भाग्य पर एक सुखी संतुष्ट मुस्कुराहट छा गयी मेरे चेहरे और मन पर।

ड्रायवर ने कार पोर्च में खड़ी कर दी। लपक कर मनु के दरबान ने दरवाजा खोला, दूसरे नौकर ने तुरंत हाथ से सामान लिया और मुझे ड्राइंगरूम तक पहुँचाकर सामान किचन में रख आया। तभी कमरे से मनु बाहर आयी। कितने दिन बाद देखा था उसे मैंने। उठकर स्नेह से गले लगा लिया मैंने। खुशी से दिल भर आया था, पर मनु की धड़कनें एकदम ठण्डी थीं, अपरिचित, औपचारिक।

मैं चौंक गयी, घर भर से भले वो उदासीन हो चली थी इन दिनों लेकिन मुझसे..

मुझसे वह हमेशा आत्मीय और अपनत्व भरी रही है। लेकिन आज हृदय को ऐसा क्यों लगा कि जिसे हृदय से लगाया था अभी वो मेरी हमेशा कि मनु नहीं है। मनु के चेहरे पर खिंची रेखाएँ भी आज नितांत अपरिचित सी लग रही थीं।

''बैठो दीदी! कैसी हो ? बच्चे कैसे हैं ?'' मनु ने जैसे एक जबरन ओढ़ी गयी मुस्कुराहट के साथ पूछा और तुरंत ही जैसे उसके बोझ से घबराकर उसे उतार भी फैंका।

''मैं ठीक हूँ मनु तू कैसी है ?'' मैंने उसकी आँखों में गहरे देखते हुए पूछा।

मेरे सवाल पर उसने बड़ी अजीब नजरों से मुझे देखा मानों मैंने कोई अनाधिकृत प्रश्न पूछ लिया हो और फिर उसने मुंह पर एक विवश व्यंग्य की ऐसी मुस्कुराहट उभरी कि मैंने घबराकर दूसरी और मुंह फेर लिया ''बिट्टू कहाँ है ? सो रही है क्या ?'' मैंने ड्राइंगरूम की दीवारों पर लगी महंगी युरोपियन पेंटिग्ंस को देखते हुए पूछा।

''हाँ। मैं चाय बनवाती हूँ तुम्हारे लिये।'' उठकर मनु रसोई की तरफ चली गयी। मैं उसे जाते देखती रही। मनु जैसे अपनेआप को जबरदस्ती धकेलकर ले जा रही थी। मन अचानक बोझिल सा हो गया। देर तक मैं उसी ओर देखती रही जहाँ से होकर मनु रसोईघर में गयी थी। कुछ ही देर में मनु वापस आकर बैठ गयी। हर बार उसके लिये जो भी लाती थी मनु बड़े चाव से खुश होकर खाती थी। मगर इस बार ना उसने पूछा ना अंदर रखे डिब्बों पर ध्यान नहीं दिया। एक अजीब पीड़ादायक मौन पसरा था हमारे बीच। यह मौन अगर दो अजनबियों के बीच हो तो सहज लगता है लेकिन अगर दो आत्मीयजनों के बीच पसर जाये तो असह्य हो जाता है।

नौकर शिष्टतापूर्वक चाय की ट्रे में चाय ले आया। चाय पीते हुए मैं ही खोद-खोद कर ईधर-उधर की बातें निकालती रही। मनु हाँ-हूँ में छोटा-मोटा जवाब दे देती। तभी अंदर से बिट्टू के रोने की आवाज आयी। मनु कमरे में चली गयी। मेरा मन एकदम से उदासी भरे पराएपन के बोध से घिरने लगा था। मैं यूँ ही ईधर-उधर नजरें घुमाने लगी। तभी साईड टेबल पर रखे एक सुरूचीपूर्ण निमंत्रण पर पर नजर पड़ी। मैं कौतुहलवश उसे उठाकर देखने लगी। फ्रांस के एक शहर की आर्ट गैलरी में किसी आर्टिस्ट की चित्रों की प्रदर्शनी का निमंत्रण था। आर्टिस्ट का नाम पढ़कर मैं चौंक गयी। मनु के अनमनेपन, उदासी का कारण स्पष्ट हो गया।

सुरभी बैनर्जी! यह सुरभी मनु के साथ ही पढ़ती थी यह भी चित्रकार थी लेकिन मनु इससे लाख दर्जे अच्छी चित्रकार थी। बचपन से ही मनु में विलक्षण प्रतिभा थी। उसके द्वारा खींची गयी साधारण रेखाएँ भी मानों कागज पर सजीव हो जाती थीं। वह तपस्या की भांति अपने कैनवास और रंगों में लीन रहती थी। ना जाने कितने मेडल और सर्टिफिकेट जमा कर लिये थे उसने। बी. ए. करने के बाद उसकी इच्छा थी फ्रांस के उस इंस्टीट्यूट से चित्रकला पढ़ने की जहां से मशहूर चित्रकारों एच. एस. रजा और अमृता शेरगिल ने पढ़ाई की थी। मनु हमेशा कहती थी -

''देखना दीदी विश्व में विख्यात चित्रकारों में एक नाम है अमृता शेरगिल का दूसरा नाम तुम्हारी मनु का होगा।

हम सब चित्रकला के क्षेत्र में उसके सुनहरे भविष्य को लेकर आश्वस्त थे। लेकिन नियति तो कुछ और ही चक्र रचाकर बैठी थी। मनु अत्यन्त सुंदर थी। हालांकि यह उसका दोष नहीं था मगर उम्र भर वह कहीं न कहीं इस बात की सजा भुगतती रही। हर समय पहरेदार की तरह माँ, मैं या कोई विश्वसनीय सहेली साथ रहती बी. ए. के द्वितीय वर्ष में ही पढ़ रही थी मनु की पास वाले मुहल्ले का एक अमीर आवारा लड़का बुरी तरह उसके पीछे पड़ गया था। मनु का घर से बाहर निकलना उसने दुभर कर दिया। मनु का सारा ध्यान अपने रंगों और कैनवास की दुनिया में डूबा हुआ था। वह उसकी परवाह भी नहीं करती थी लेकिन पिताजी बुरी तरह घबरा गये। मेरा भी विवाह हो चुका था। माँ अक्सर बीमार रहती थी मनु की रखवाली कौन करता। उसी समय दुर्भाग्य से मानव के पिताजी की नजर एक सामाजिक आयोजन में मनु पर पड़ गयी। उन्हें मनु पसंद आ गयी। सब दूर से दबाव में चलते पिताजी को मनु का भविष्य यहीं सुरक्षित नजर आया क्योंकि मानव का परिवार मात्र धनवान ही नहीं शहर में अत्यन्त प्रतिष्ठित भी था और सोचने समझने का मौका भी नहीं मिला मनु को और मात्र उन्नीस बरस की उम्र में वह मानव की पत्नी बनकर इस घर में आ गयी। मन के किसी कोने में यह आस लेकर कि अब वह स्वतंत्रता से निड़र होकर अपनी पढ़ाई पूरी कर पायेगी विदेश जा पायेगी। लेकिन छलना नियति के रंगों को कौन जान पाया है। मानव भले ही समाज का एक सुसभ्य प्रतिष्ठित नागरिक था लेकिन एक पति के तौर पर वह अत्यन्त शक्की, वासना लोलुप और औछी वृत्ती का निकला। वह मात्र मनु की देह की भक्ति करता था। उसे मनु के मन से उसकी इच्छाओं से कोई सरोकार नहीं था। मानव ने बाहर जाकर उसके पढ़ने पर प्रतिबंध लगा दिया, वह नहीं चाहता था कि मनु पराए पुरूषों के संपर्क में आए।

मनु ने मन मसोसकर जीवन से समझौता कर लिया। दो वर्ष पश्चात् मनु ने माँ बनना चाहा। उसे बच्चों से अत्यन्त प्रेम था। मगर मानव ने उसे माँ नहीं बनने दिया। वह इसे मनु के प्रति अपना गहरा प्यार कहता था मगर सभी जानते थे कि उसे ड़र था कि उसकी सुंदरता न खत्म हो जाये। वह मानव का प्यार नहीं दबी हुई वासना थी जो प्यार का दिखावटी आवरण ओढ़े थी कि गर्भावस्था के नौ महीने वह उसके शरीर से दूर कैसे रहे। दो तीन साल बाद मनु ने इस स्थिति से भी समझौता कर लिया और फिर अपना ध्यान पेंटिंग में लगा दिया। दो-ढ़ाई साल घर में ही वह लगातार मेहनत करती रही और उसने सबको चकित करने योग्य अत्यन्त सुंदर पेंटिग्ंस बनाई।

मनु ने उन पेंटिग्ंस के फोटो देश विदेश की आर्ट गैलरीज को मेल किए। सभी गैलरीज ने उसके चित्रों की सराहना करते हुए उसे प्रदर्शनी हेतु आमंत्रित किया। मनु अत्यन्त उत्साहित थी उसका नामी चित्रकार बनने का सपना जल्द ही पूरा होने वाला था। मगर चालाक व दूरंदेशी मानव उसके व्यस्त व सुनहरे भविष्य के संकेत भांप गया था और उसने ऐन वक्त पर मनु को माँ बना दिया। मनु अपने सुनहरे भविष्य के द्वार पर अपने ही हाथों से ताला लगाने को मजबूर हो गयी।

एक गहरी साँस भरकर मैंने कार्ड नीचे रख दिया। चार-पाँच महीने पहले मनु ने बताया था कि उसने अपनी पेंटिग्ंस सुरभी को दी थी कि वह मनु के नाम से विदेश की आर्ट गैलरीज में उन्हें प्रदर्शित कर दे। मनु अपने चेहरे से नहीं अपने काम से दुनिया में जानी जाना चाहती थी। उसी सुरभी की पैंतीस चित्रों की प्रदर्शनी है फ्रांस में। उसी शहर में जहां से मनु अपना नाम कमाना चाहती थी। मनु ने भी तो सुरभी को अपनी इतनी ही पेंटिग्ंस दी थी, उन्हीं में थोड़ा फेरबदल करके.....................। एक बार फिर विश्वास करने के जुर्म में वह छली गयी।

मनु के प्रति हुए इस अन्याय ने मरे मन में एक बेबस क्रोध भर दिया। आँखे भर आयीं। तभी बिट्टू को कंधे पर लेकर वह बाहर आयी। मेरे हाथ में पकड़े कार्ड पर उसकी नजर पड़ी। कसाई के छुरे तले अपने जीवन से पूरी तरह से निराश हो चुके पशु जैसा एक निरीह भाव उसके चेहरे पर तैर गया। मेरा मन तड़प गया।

''निराश नहीं होते मनु एक दिन तेरी भी इच्छा पूरी...............।'' मेरा वाक्य पूरा होने के पहले ही मनु बोल उठी।

''मेरी इच्छाएँ पूरी ही कब हुई हैं जीजी। जब मर गयीं तब आप लोगों ने उन्हीं इच्छाओं का अंतिम संस्कार न करने देकर उनकी लाश को जबरदस्ती कंधे पर लाद दिया कि ले अब ढो इन्हें, इनकी सडांध को अपनी नियति मानकर जीती रहो। मनु की आवाज में उलाहने का जरा सा भी भाव नहीं था मगर जो मरा हुआ भाव था वह बहुत भयानक था। उसके कंधे पर सिर रखकर सो रही बिट्टू को देखकर कलेजा मुँह को आ गया। बहुत देर तक 'इच्छाओं की लाश' और कंधे पर सोई बिट्टू को देखकर अपने आँसू रोकने का भरसक प्रयत्न करती रही मैं।

सच ही मनु की इच्छाओं की हत्या करने में उसका पति मानव ही नहीं हम सब भी बराबर के दोषी थे। हम सबने ही कहीं न कहीं मारा है उसे। किसी के भी मन में ईर्ष्या पैदा करने वाले छद्म सुख की आड़ में हमने उसे कैसा छला है, कैसे छल रहे हैं इसका ज्वलंत उदाहरण थी मनु। आकाश के विराट स्वरूप जैसा प्रशस्त व्यक्तित्व हो सकता था उसके अंदर के चित्रकार का लेकिन सबने मिलकर उसके मन के सारे रंग ही धो डाले। हममें से एक भी उसके संघर्ष में उसके साथ कभी खड़ा नहीं हो पाया।

मनु उस कार्ड को एकटक देखे जा रही थी। क्या था उसके चेहरे पर, मातृत्व भाव से उमगी एक माँ जो अपने कलेजे के टुकड़े को सीने में छुपा लेना चाहती है, जी भर कर अपनी आँख के तारे को प्यार करना चाहती है, उसमें अपना सारा सुख, सारी सार्थकता देखती है, या एक औरत जो उसी समय उसी बच्चे को अपना बच्चा न मान पा कर अपनी मरी हुई इच्छाओं की लाश मान बैठी है, और छटपटा रही है मुक्ति के लिये, उसमें अपनी हार देख रही है, देख रही है सारे रंगों का एक-एक कर खत्म होना। इन दोनों का ही संघर्ष इस समय मनु के चेहरे पर भयावह रूप से दिखाई दे रहा था। और एक माँ और औरत के इस संघर्ष में मैं मनु के अंतर्मन की गहन निःस्सहाय पीड़ा को देख रही थी। अपने बहते आँसू छुपाने के लिये मैंने चेहरा दूसरी ओर फेर लिया।

 

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  1. वाक्य संरचना में सुधार की जरूरत है। नारी सशक्तिकरण की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया गया है।

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