शनिवार, 21 मार्च 2015

मोहम्मद इस्माईल खान की कहानी - लड्डू

6- लड्डू
ज लड्डू गुजर गया। सारा सन्ताप सारा दुःख समाप्त हो गया। घर के पिछवाड़े जानवर बान्धने के बाड़े में, सोनू-मोनू बैल आज अकेले बन्धे हैं। क्या पता लड्डू के जाने का गम इन्हें भी है या नही। लड्डू कई दिनों से उनके साथ यहीं खम्बे से बन्धा रहता था, रात और दिन, तो शायद इन्हें उससे कुछ हमदर्दी हो गई हो! पर जानवर तो जानवर होते है, उनमें संवेदना कहाँ ? संवेदना तो सिर्फ इन्सानों में होती है! सुख दुःख समझते हैं ये! हाँ दुःख समझते है ये! पर आज सोनू-मोनू उनके आगे पड़ी घांस नहीं खा रहे, उनके सुनहरी मुख पर काली कजरारी आँखें नम है। उनमें से कभी-कभी बूँद भी गिर जाती है।

हां मैंने अपनी मालकिन के लम्बे बिछोह के बाद घर की गैया को मालकिन के कन्धे पर मुँह डाले रोते देखा है। प्रेम की भाषा जानवर मनुष्यों से ज्यादा अच्छी तरह समझते है। वह जंजीर अपने लकड़ी के खम्बे के इर्द गिर्द चुपचाप पड़ी है, जिससे लड्डू बन्धा रहता था। भूख से जब कभी लड्डू बिलबिलाता, जाड़ो की सर्द रातों में जब उसे बहुत जाड़ा लगता या तेज बारिश से बाड़े में बनी ढाली चूने लगती और जंजीर से बन्धा लड्डू सारा भीग जाता तो चीखने लगता। आधी रात को लड्डू का चीखना घर वालों की नींद में खलल डालता तो फिर घर वाले उसके इस करूण क्रन्दन पर भी पाबन्दी लगा देते। उसके मुँह मे कपड़े का ढट्टा घुसेड़ कर मुँह बान्ध देते तो जंजीर उसकी वकील बन जाती। सारी रात और सारा दिन खनक-खनक कर शोर-मचाती, और घर वालों से मिन्नतें करती, कि लड्डू बहुत तकलीफ में है, उसके हाल पर दया करो।

पिछले कई सालों से वह लड्डू के दुःख दर्द से कराह रही थी। अपनी झन्कार से, अपने जिस्म की कड़ियों पर जुल्म कर-कर के वह लहुलुहान हो, संघर्ष कर रही थी, पर आज अपनी टूटी फूटी कड़ियों के साथ बेजान उस खम्बे के इर्द गिर्द पड़ी थी। लड्डू की चीखें और आर्तनाद बन्द होते ही उसने भी हार मान ली थी

शब्बो की मँगनी में मोहल्ले की सारी औरतें नजीरन के घर गई, तो सबने मिलकर पहले कुरआन पढ़ा फिर साबिरा हज्जानी ने थोड़ा दर्स दिया-खुदा का हुक्म है कि मासूम यतीमों  के माल की हिफाजत करो। उसमें खयानत न करो। जब वे बड़े हो जायें तब तक शफक्कत से उनकी परवरिश करो, फिर उनका माल उन्हें सौंप दो। ''यतीम और मजलूम का माल खाने वालों को अल्लाह आखरत में भी सजा देता है और दुनियाँ में भी''। दर्स खत्म कर हज्जानी गई कि ढोलक पर गाने की महफिल सज गई। देर रात तक बनड़ी गाई जाने लगी। मैं भी जिद करके माँ के साथ चला गया। घर के आगे बने मण्डप में औरतों के हुजूम में मैं भी जरा पीछे हट कर बैठ गया और ढोलक पर करीमन चाची की ऊँगलियों की थिरकन देखता रहा।

लच्छी खाला ने जब बिदाई गाई तो सब औरतें सुबकने लगी। सच में विछोह को लच्छी खाला की आवाज ने ऐसा सँवारा कि मेरे कोमल मन को भी अन्दर तक भेद गया। दर्द की खुशबू चारों और फैल गई। मुझे लड्डू की याद आ गई। लड्डू इसी घर का लड़का था। असल नाम उसका मुश्ताक था पर जरा मोटा था, ''गोल मटोल'' इसलिये सब उसे लड्डू पुकारते थे। स्वभाव का था भी लड्डू की तरह मीठा। पढ़ने में तेज और सब का दुलारा। हम साथ ही पढ़ते थे, पर कई दिनों से वह स्कूल से गायब था। उसे लोग भूलने भी लगे थे। मैं भी उसे भूल चुका था, पर आज उसी के घर आने पर ''पुरानी यादों का झोंका मुझे छू गया था और लड्डू मुझे याद आ गया था।

मैंने माँ के कान में कुछ कहा तो माँ ने नजीरन से पूछा- मैं बच्चे को जरा पीछे पैशाब करा लाऊं। नजीरन ने कहा - हाँ हाँ पिछवाड़े आँगन में है पैखाना। मै जब अम्मा के साथ नजीरन का सारा घर पार कर पीछे आँगन में गया तो पन्द्रह वॉट की हल्की रोशनी में जानवरों के बाड़े से बैलों के गले में बन्धी घन्टियों की आवाज के बीच से आवाज आई-आपा सलाम ...................अरे ईसू...............

हमने नज़रें उठाकर देखा तो ढाली के खम्बे के साथ जंजीर से बन्धा लड्डू! बदन पर नाम मात्र के कपड़े, उलझे बड़े बाल, मूँछों की फूटती रेखें, काले पड़े चेहरे पर सफेद चमकते दांत। खम्बे के इर्द गिर्द गोबर और कीचड़ में खड़ा वों पहले मुस्कुराया फिर दयनीय सूरत बनाकर बोला-मुझे पागल समझते हैं आपा..............देखो मुझे बान्ध दिया........!

मेरी ओर यूँ देखने लगा कि मैं दौड़कर अभी उसे आजाद कर दूँगा। हम डरे सहमे वापस आ गये। माँ के पूछने पर नज़ीरन ने मुँह बनाते हुये कहा - मुँआ पागल हो गया है आपा ..................सारा घर तहस नहस कर डालता है। उसे बान्धकर ही रखना पड़ता है। यह कह कर वो फिर महफिल के गानों में मशगूल हो गई।

लड्डू जब छोटा था उसके माँ बाप गुजर गये। भाई भाभी के पास ही रहा। पर बाप की 'जायदाद' जो सिर्फ एक कच्चा मकान और चार बीघा जमीन थी, ने उसका जीना हराम कर दिया। बड़ा होकर अपना हक माँगेगा ये बात नजीरन को बेचैन रखती। उसके साथ ज्यादती होने लगी। अड़ोस पड़ोस ने जब नजीरन के मुँह में हाथ दिया तो उसने दूसरा रास्ता चुना। वह हर रात अपने शौहर के साथ लड्डू को भी एक गिलास दूध देने लगी। कुछ दिनों बाद 'दूध' ने अपना असर दिखाना शुरू किया। लड्डू बहकी - बहकी बातें करने लगा, फिर उसे पागलपन के दौरे उठने लगे। स्कूल छूट गया और अब वो जानवरों के साथ ढाली के खम्बे से बन्धा था। बढ़ते हुये पौधे की जड़ों में नज़ीरन ने छाछ डाल दी थी और ऐसे अनगिनत कमसिन पौधें के साथ लड्डू भी गुमनामी के पर्दे में जा छिपा था।

घने जंगल में हजारों पेड़ों के बीच नन्हें पौधे की जड़ों को दीमक खा जाती है, और कोई बचाने नहीं आता, उसी तरह दुनियाँ की भीड़ में लड्डू भी तिल-तिल कर मर गया, पर संवेदनहीन समाज जंगल के ठूठ पेड़ों की तरह खड़ा रहा! जड़ निष्ठुर और संवेदनहीन, जानवरों से भी बदतर। मोहल्ले वालों ने उनके घर का निजी मामला जान कर, कभी लड्डू की चीखों पर कान न धरा।

आज नज़ीरन के घर के सामने भीड़ है। नजीरन बेहाल दहाड़े मार - मार कर चीख रही है। शब्बों का दुल्हा सरकारी नौकरी में गबन कर जेल में है। शब्बों पहली ही डिलेवरी में बच्चे की मौत और जहर चढ़ जाने से पागल हो गई थी, आज उसकी मौत हो गई। किसी ने कहा-नजीरन पागल हो गई है।

मेरे कानों में साबिरा हज्जानी के शब्द गूँजे - यतीम और मजलूम का माल खाने वाले को अल्लाह आखरत में भी सज़ा देता है और दुनियाँ में भी।

     मोहम्मद इस्माईल खान
एफ-1 दिव्या होम्स् सी 4/30 सिविल लाईन
श्यामला हिल्स् भोपाल 462002                                                                  

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