बुधवार, 18 मार्च 2015

दीपक आचार्य की रिपोर्ट - यादगार साहित्य समारोह

बांसवाड़ा में यादगार साहित्य समारोह

मूर्धन्य साहित्यकारों डॉ. विमला भण्डारी, नंदलाल परशरमाणी एवं भरत शर्मा का अभिनंदन

साहित्यिक ग्रंथों पर विद्वजनों के पत्रवाचनों और परिचर्चा ने किया मुग्ध,

साहित्यकारों से सामाजिक चेतना में भागीदारी निभाने का आह्वान

डॉ. दीपक आचार्य

बांसवाड़ा/‘‘साहित्यकार मूलतः सामाजिक नवनिर्माण और बहुआयामी उत्थान का संवाहक है और हर युग में उसने यही काम किया है। मौजूदा परिप्रेक्ष्य में सामाजिक विषमताओं को दूर कर सर्वांगीण उत्थान में समर्पित भूमिका निभाना और चेतना जागृत कर सम सामयिक कल्याण धाराओं को तीव्रतर करना ही सबसे बड़ा फर्ज है। साहित्यकार होना तभी सार्थक है जबकि हम समाज के लिए जीने की भावना से काम करें और अपने साहित्य को लोकचेतना का सशक्त माध्यम बनाएं। ’’

यह आह्वान मशहूर साहित्यचिन्कों ने सुरभि साहित्य एवं कला परिषद की ओर से बांसवाड़ा की सिंधी धर्मशाला स्थित सिंधु सभागार में आयोजित साहित्य समारोह में रचनाकारों को संबोधित करते हुए किया 

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रचनाकार जगें, जगाएं

मशहूर कथाकार डॉ. विमला भण्डारी ने रचनाकारों ने निरन्तर और रोजाना कुछ न कुछ लिखने का क्रम बनाए रखने का आह्वान किया और कहा कि लेखन ही अक्षयकीर्ति प्रदाता है।

साहित्य सृजन में युवा आगे आएं

अध्यक्षीय उद्बोधन में जाने-माने साहित्य चिंतक भरतचन्द्र लेखन ने युवा साहित्यकारों से लेखन में आगे आने का आह्वान करते हुए कहा कि वर्तमान में सृजनधर्मियों के सामने मौजूद चुनौतियों का मिलजुल कर समाधान करें।

बाल साहित्य पर जोर

वयोवृद्ध उपन्यासकार नंदलाल परशरमाणी ने बाल साहित्य के क्षेत्र में रचनाकारों की भूमिका बढ़ाने का आग्रह किया।

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साहित्यिक ग्रंथों पर पत्रवाचन

समारोह में बांसवाड़ा के संस्था की ओर से सलूम्बर के वयोवृद्ध उपन्यासकार नन्दलाल परशरमाणी के उपन्यास ‘आँचल में अंबर’, जानी-मानी कथाकार डॉ. विमला भण्डारी के कहानी संग्रह ‘सिन्दूरी पल’ और बांसवाड़ा के व्यंग्य लेखक एवं कवि भरतचन्द्र शर्मा के काव्य संग्रह ‘सुनो पार्थ!’ पर क्रमशः डॉ. प्रभु शर्मा, भूपेन्द्र उपाध्याय तनिक एवं डॉ. आशा मेहता ने पत्रवाचन किया।

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लेखकों का अभिनंदन

तीनों ही लेखकों को परिषद की ओर से साहित्य के क्षेत्र में उनकी दीर्घकालीन एवं उल्लेखनीय सेवाओं के लिए श्रीफल भेंट कर तथा शॉल ओढ़ाकर अभिनंदन किया गया।

पुस्तकों पर परिचर्चा

तीनों जाने-माने लेखकों की पुस्तकों पर हुई परिचर्चा में प्रबुद्धजनों एवं साहित्यकारों ने पुस्तक के कथ्य एवं शिल्प, भावनाओं, साहित्य की विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट रचनाधर्मिता, पुस्तकों में वर्णित चेतनामूलक संदेशों आदि पर चर्चा की और उत्कृष्ट एवं प्रभावोत्पादक लेखन के लिए रचनाकारों की सराहना की।

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सिन्दूरी पल अनुपम कहानी संग्रह

वरिष्ठ साहित्यकार भूपेन्द्र उपाध्याय ‘तनिक’ ने मशहूर कथाकार डॉ. विमला भण्डारी के कहानी संग्रह ‘सिन्दूरी पल’ पर पत्रवाचन करते हुए नारी जीवन की संवेदना, उत्पीड़न, अन्तद्र्वन्द्व, सम सामयिक कटुता और विषमता को झेलती नारी आदि का जिक्र किया और कहा कि पुस्तक में यथार्थपरक कथा-व्यथा की विशेषता यह है कि इसमें पुरुष समाज के प्रति कोई रोष-आक्रोश या शिकायत व्यक्त नहीं है और इस दृष्टि से गहन अनुभूतियों और परिपक्व चिंतन के साथ संयत अभिव्यक्ति कहानीकार का कमाल ही है।

तनिक ने पुस्तक की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि डॉ. विमला भण्डारी की कहानियां अतीत के आसमान में लहराती हुई वर्तमान रंगमंगच पर अठखेलियां करती सशक्त सामाजिक संवेदना और जागरण का संदेश देती हैं।

 

        ‘आँचल में अंबर’ ऎतिहासिक व्यथा कथा

जाने-माने भाषाविद् एवं साहित्य चिंतक डॉ. प्रभु शर्मा ने सलूम्बर के वयोवृद्ध साहित्यकार एवं सिंधी लेखक नंदलाल परशरमाणी के कृतित्व को हिन्दी एवं सिंधी भाषा में लिखी पुस्तकों पर चर्चा करते हुए भारत के विभाजन की त्रासदी पर केन्दि्रत उनके उपन्यास ‘आँचल में अंबर’ पर पत्रवाचन पेश किया।

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डॉ. शर्मा ने उनके उपन्यास को को तत्कालीन विभाजन की त्रासदी का बेबाक एवं खुला चित्रण बताया और कहा कि विभाजन की कटुता के साथ सिंधी समाज के संघर्ष के मध्य पारस्परिक सौहार्द की उत्कृष्ट प्रस्तुति है। इसके साथ ही उपन्यास में पग-पग पर सकारात्मक चिंतन,  विभिन्न सूक्तियों का प्रयोग, सहजता, सरलता और शब्दचित्रों की श्रृंखला हर पाठक को तत्युगीन हालातों का बिम्ब दर्शाने में सफल है। इस दृष्टि से उपन्यास विशिष्ट, पठनीय एवं संग्रहणीय है।

सुनो पार्थ अनुपम कृति

बांसवाड़ा के वरिष्ठ साहित्यकार भरतचन्द्र शर्मा की काव्यकृति ‘सुनो पार्थ!’ पर पत्रवाचन प्रस्तुत करते हुए डॉ. आशा मेहता ने कृति को हर दृष्टि से विलक्षण और संग्रहणीय बताया और कवि के काव्य सौंदर्य वैशिष्ट्य का बखान करते हुए कुछ रचनाओं के माध्यम से रस वैविध्य का सुन्दर प्रकटीकरण किया।

डॉ. आशा मेहता ने कहा कि  कृतिकार ने महाभारतकालीन पात्रों और पौराणिक प्रतीकों के माध्यम से वर्तमान काल की सामाजिक-राजनैतिक विसंगतियों, विद्रुपताओं और वैषम्य भरे माहौल पर जमकर कटाक्ष करते हुए सम सामयिक विडम्बनाओं को बेहतर शब्दचित्र दिए हैं।

शायर घनश्याम नूर का सम्मान

समारोह में माँ सरस्वती साहित्य परिषद की ओर से अध्यक्ष नरेन्द्र मदनावत, सचिव कमलेश कमल एवं भागवत कुन्दन ने साहित्य जगत की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए शायर एवं कवि घनश्याम नूर का साफा पहनाकर सम्मान किया।

समारोह की अध्यक्षता प्रसिद्ध व्यंग्य लेखक एवं कवि भरतचन्द्र शर्मा ने की जबकि सिंधी समाज के अध्यक्ष सुभाषचन्द्र छाबड़ा मुख्य अतिथि व डॉ. विमला भण्डारी, नंदलाल परशरमाणी विशिष्ट अतिथि थे।

आरंभ में सुरभि साहित्य एवं कला परिषद के संस्थापक अध्यक्ष घनश्याम नूर ने अतिथियों व संभागियों का स्वागत किया। संचालन जाने-माने मंच संचालक एवं साहित्यकार डॉ. दीपक द्विवेदी ने किया। आभार प्रदर्शन झूलेलाल सेवा समिति के संरक्षक हरेश लखानी ने किया। डॉ. विमला भण्डारी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर साहित्यकार मधु माहेश्वरी ने जानकारी दी।

समारोह का शुभारंभ अतिथियों द्वारा सरस्वती प्रतिमा पर पुष्पहार एवं दीप प्रज्वलन से किया। सरस्वती वंदना नरेन्द्र नंदन ने प्रस्तुत की।

परिचर्चा में हुआ मंथन

इस दौरान हुई परिचर्चा में मशहूर साहित्यकारों ने अपने विचार रखे। इनमें श्याम अश्याम, छगनलाल नागर, धनपतराय झा, ललित लहरी, डॉ. मधु उपाध्याय, सुमित्रा मेहता, डॉ. सरला पण्ड्या, शारदा पटेल, मोहनदास वैष्णव, नेमराज सहलोत, दीपक श्रीमाल, मृदुल पुरोहित, भंवर गर्ग, शांतिलाल पटेल, भावना वासुजा, भारती वाधवानी, गौरव वाधवानी, प्रिया वाधवानी आदि ने विचार व्यक्त किए।

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