शुक्रवार, 20 मार्च 2015

दीपक आचार्य का आलेख - धरती का कर्ज चुकाएँ सम्बल दें अन्नदाता को

धरती का कर्ज चुकाएँ

सम्बल दें अन्नदाता को

- डॉ.दीपक आचार्य

941330607

dr.deepakaacharya@gmail.com

अन्न देने वाला अन्नदाता हम सभी के लिए जीवन की पहली प्राथमिकता में होना चाहिए और सदैव उसके लिए हमारी सोच बनी रहनी चाहिए।

अन्न हमारे जीवन का आधार है और उसे पैदा करने वाला अन्नदाता हमारे लिए धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि है। वो न हो तो हमारा अस्तित्व भी न हो।

लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि हम सभी अन्नदाता को उतना सम्मान, सम्बल और प्रोत्साहन नहीं दे पाए हैं जितना अपेक्षित था।

शहरीकरण और आधुनिक सभ्यताओं के सीमेंट-कंकरीट जंगल में भटकते हुए और आलीशान भवनों में रहते हुए हम खेती-बाड़ी के बारे मेें उतना भी सामान्य ज्ञान नहीं रखते जितना एक अनपढ़ आदमी रखता है।

हम सारे के सारे भोग पा रहे हैं, चटखारे ले लेकर सभी तरह के स्वाद लेने में कहीं पीछे नहीं रहते। हममें से काफी सारे लोग खाने के लिए ही जी रहे हैं।

जिस अन्न का स्वाद पाकर हम अपने शरीर को जिन्दा रखे हुए हैं उसका उत्पादन करने वाले अन्नदाता के प्रति हमारी जानकारी और सामान्य ज्ञान का अभाव है।

भयानक शहरीकरण के दौर से गुजरते हुए हमने अन्नदाता की ओर दृष्टि डालने की कभी फुर्सत नहीं पायी, न ही कोई जिज्ञासा ही प्रकट की है।

परंपरागत कृषि क्षेत्र के भरोसे ही भारत के अधिकांश लोगों की आजीविका का निर्वाह हो रहा है और ऎसे में हम सभी का फर्ज है कि देश के अन्नदाताओं  का ध्यान रखें।

उनके अभावों और समस्याओं को जानें तथा इनके निराकरण में हरसंभव भागीदारी निभाएं।

अन्नदाताओं के महत्त्व को स्वीकारें, उनका आदर करें और यह प्रयास करें कि हमारे किसान सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से मजबूत बनें।

देश का अन्नदाता जितना अधिक सक्षम और उन्नत होगा, उतने हम आत्मनिर्भर होंगे और उसी अनुपात में हमारा देश समृद्ध व सबल होगा।

दिन-रात कड़ी मेहनत, समर्पण और निष्ठा से हमारे कृषक जो कुछ कर रहे हैं उसका कोई सानी नहीं है।

हम लोग बौद्धिक गलियारों और फाईलों के जंगल में किस तरह काम करते हैं, हमारी क्या उपादेयता है और हम क्या कुछ कर रहे हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है।

असल में जो लोग खेतों में काम करते हैं, वे किस प्रकार गरीबी और विषमताओं में जीते हैं, यह सब हम नहीं जानते।

हम एकाध बार अपने कामों की तुलना किसी किसान से करके देख लें तो हमारी आत्मा साफ-साफ कह उठेगी कि हम कितने पानी में हैं, कितने परिश्रमी और कर्म के प्रति निष्ठावान हैं।

खेती-बाड़ी के मामले में विदेशों के प्रयोग हमारे यहां कितने सार्थक हो रहे हैं, यह हम सभी जानते हैं।

आज हमारी पहली जरूरत किसानों को सक्षम बनाने की है। हालांकि इस दिशा में चौतरफा प्रयास जारी हैं।    हाल ही हुई असामयिक बारिश और ओलावृष्टि ने हमारे अन्नदाताओं को सबसे ज्यादा परेशान कर दिया है, खड़ी फसलें धराशायी हो गई हैं, हर तरफ इतना अधिक नुकसान हुआ है कि कुूछ कहा नहीं जा सकता।

अन्नदाताओं पर आज संकट आन पड़ा है। इस मुश्किल घड़ी में हम सभी का पहला और अपरिहार्य फर्ज यही है कि हमारे अन्नदाताओं की पीड़ा को समझें, उनके अभावों को दूर करने में अपनी सहभागिता निभाएं ।

जो कुछ होना था हो गया, प्रकृति की मार झेल रहे किसानों का सामान्य जीवन किस प्रकार बहाल किया जाए, उस दिशा में सोचना और हरसंभव मदद करना आज की हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता में है और इससे हम मुँह नहीं मोड़ सकते।

खराबे का रोना रोने और किसी को भला-बुरा कहने से कुछ नहीं होने वाला। प्राकृतिक प्रकोप से घिरे अन्नदाताओं के लिए आज ईमानदारी से प्रयास करने की जरूरत है।

राज अपनी ओर से भरपूर प्रयासों में जुटा हुआ है, पूरी संवेदनशीलता दर्शाते हुए काफी सारी राहत भरी घोषणाएं भी की गई हैं, जिम्मेदार लोगों की दिन-रात भागदौड़ किसानों के घर-खेत-आँगन तक हो रही है।

पूरा का पूरा तंत्र अन्नदाताओं के द्वार पर है।

इन हालातों में हम सभी को चाहिए किसी को भी दोष दिए बगैर सकारात्मक चिंतन रखते हुए प्रभावितों को तात्कालिक मदद मुहैया कराने और उनकी सामान्य जिन्दगी बहाल करने की दिशा में खुद की भूमिकाएं तय करें और निष्काम भाव से आगे आएं।

बिना किसी प्रचार-प्रसार या भावी लाभ-हानि की भावना से अपने सामथ्र्य के अनुरूप मददगार बनें और अपने सम सामयिक फर्ज निभाएं।

आज अन्नदाता को हमारी सर्वाधिक जरूरत है, हमसे खूब अपेक्षाएं हैं।

अन्न का मान रखें, कृतघ्नता त्यागें और कृतज्ञता, मानवीय संवेदनशीलता तथा अपने फर्ज का स्मरण कर कोई देरी किए बिना वह सब करें जो कि अन्नदाता के हित में हो।

अन्नदाता को संबल प्रदान करें और उसे अभावों से मुक्त कराकर वापस तरक्की की मुख्य धारा में लाने की हरसंभव कोशिश करें।

अन्न का कर्ज चुकाने का इससे बड़ा कोई पुण्य अवसर नहीं हो सकता।

जो भूमिपुत्रों को संबल देता है, अन्नदाता के लिए आगे आता है उसके जीवन में मंगल ही मंगल होता है क्योंकि इससे मंगल ग्रह भी प्रसन्न होता है और धरती मैया भी।

जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान।

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