सोमवार, 23 मार्च 2015

प्रमोद यादव का हास्य व्यंग्य - रंग की जंग

रंग की जंग / प्रमोद यादव

वैसे तो बहुत पुरानी है रंग की जंग.. त्वचा के गोरे और काले रंग पर चर्चा गाहे-बगाहे होती ही रहती है..कभी घर परिवार में तो कभी समाज में..कभी ग्राम सभा में तो कभी राज्य सभा में..पर शुक्र है हमारे देश में रंग की जंग अमरीका के श्वेत-अश्वेत जंग जैसी गंभीर नहीं..यहाँ इसे लेकर कोई मार-काट नहीं..कोई ज्यादा तू-तू-मैं-मैं नहीं... जो जिस रंग में है, उसी में सब संतुष्ट..ठीक अमीरी और गरीबी की तरह.. और कोई चारा भी तो नहीं सिवाय कुदरत की इस नेमत को स्वीकारने के... विदेशों में तो केवल गोरे -काले के वर्चस्व का झगडा- लफड़ा है,हमारे यहाँ तो इसके बीच का भी एक लफड़ा है-सांवले सलोने का..तीसरे जेंडर की तरह है ये सांवला रंग..लेकिन विदेशी इसे अमूमन काले में ही शुमार करते है..वैसे तो वे पूरे हिन्दुस्तान को काले में शुमार कर इसे “ कालों का देश” कहते हैं पर ये सरासर गलत है..हम कोई अफ़्रीकी देश थोड़े हैं जहाँ जित देखो तित काला.. हमारे यहाँ भी गोरे-गोरियों की गिनती कतई कमतर नहीं.. लड़के तो नहीं पर अमूमन सारी की सारी लड़कियाँ तो गोरी होती ही हैं..क्योंकि यहाँ तो लड़कियों को ही “गोरी” कहा जाता है..अब गोरी कोयल की तरह काली भी हो तब भी लोग तो यही कहते मिलेंगे - “देखो..गोरी जा रही है “ इतना सम्मान है हमारे देश में ब्लैक-ब्युटियों का ....

अब नेताजी ने गर काली-सांवली महिलाओं की तारीफ़ में कुछ कसीदे पढ़ भी दिए तो इतनी हाय-तौबा क्यों ? समझ नहीं आया...गोरियों की तारीफ़ तो हर कोई करता है ,उन्होंने विपक्ष की भूमिका का निर्वहन कर ब्लैक–ब्यूटी के फ़ेवर में कुछ कह दिया तो क्या बुरा किया ? सचमुच ही काला होना कोई बुरा नहीं ..बुरा होता तो क्यूँ नायिका ये गाना गाती- “ मोरा गोरा रंग लेई ले..मोहे श्याम रंग देई दे..” ठीक है, गोरे रंगवालों के प्रति विशेष आकर्षण और जुनून होता है.. हर कोई की पहली पसंद है गोरा रंग..हर माँ-बाप चाहता है कि उसके बच्चे विदेशियों की तरह एकदम ही सफ़ेद नहीं तो कम से कम बालीवुड के सितारों की तरह लाल-पीले पैदा हो..भले ही माँ-बाप कोयले की खान हों..प्रत्येक युवक की ख्वाहिश होती है कि उसे दुल्हन गोरी मिले और सुन्दर मिले भले ही युवक का मुंह पुराने कामेडियन सुन्दर की तरह हो और रंग केश्टो जैसा काला.. हरेक युवती की चाहत होती है कि पति उसे हैंडसम और डेशिंग मिले..युवतियां यहाँ रंग पर थोडा समझौता कर लेती है कि गोरा न भी हो तो सांवला भी चलेगा..और खूब पैसेवाला हो तो काला भी चलेगा ही नहीं बल्कि दौड़ेगा..मर्दों के विषय में इनके विचार थोड़े उच्च और सराहनीय है..कहती हैं कि मर्दों के रंग नहीं गुण-अवगुण ( अमीरी-गरीबी ) और दिल देखे जाते हैं.. एक गाना है न – “ दिल को देखो ..चेहरा (रंग) न देखो.. चेहरे ने लाखों को लूटा..” वैसे वे जानती हैं कि अनुपातिक दृष्टि से गोरे युवकों की तादाद बहुत कम है और हर किसी को गोरा वर मिलना संभव नहीं..लेकिन ऐसा लगता है कि पचास-साठ साल पहले गोरे युवकों की संख्या भी अच्छी खासी रही होगी तभी तो एक बहुत पुराने गीत में हिरोइन गुनगुनाती है- “ गोरे ..गोरे .. ओ बांके छोरे..कभी मेरी गली आया करो “

इस गीत के बाद से ही शायद गोरे बांके छोरों की संख्या में गिरावट आनी शुरू हो गयी और एक दिन ऐसा भी आया कि हंगामे की शक्ल में एक गाना जोरों से देश में गूँजने लगा - “ हम काले हैं तो क्या हुआ दिल वाले हैं..” लगा कि देश में कालों का राज आ गया.. सारे गोरे बालीवुड में बंद होकर रह गए..जिन दिनों यह गीत गूँजा मुझे भी बड़ी राहत मिली..मुझे ही क्या हर उस व्यक्ति को मिली होगी जो बरसों से महिलाओं से नजरें बचा छुप-छुपकर क्रीम..पावडर..स्नो.. फेयर एंड लवली लगा-लगा पगला गए..वैसे तो सारे सौंदर्य प्रसाधन महिलाओं के लिए होते हैं पर पुरुष वर्ग इसका ज्यादा इस्तेमाल करते हैं..अब तो हर प्रसाधन के आगे “एम” ( MEN) लिखकर बेचने का धंधा चालु हो गया है.. उत्पाद बनाने वाले भी बड़े उत्पाती होते हैं..शराब वही..बस बोतल नई ..लो..अब महिलाओं से लजाने की भी जरुरत नहीं....लेकिन महिलायें अच्छी तरह जानती हैं कि जब वे सालों चुपड़-चुपड़ कर गोरी नहीं हुई तो ये बुद्धू सावरे बलम भला कहाँ से गोरे होंगे ?..किसी क्रीम से अगर सचमुच ही गोरापन आता तो अफ़्रीकी लोग अब तक काले क्यों होते ? महिलायें सब जानती हैं फिर भी वे ये सौन्दर्याना मूर्खता करती ही रहती हैं क्योंकि दर्पण के आगे घंटो बैठने का इनमें जन्मजात “इरर” जो है..

मर्द के गोरे-काले होने का कोई खास लफड़ा नहीं..गोरे को तो लोग सीधे ही सराहते हैं पर काले को भी निराश नहीं करते..उनकी तारीफ़ सीधे भगवान् के साथ जोड़कर करते हैं, कहते हैं- कृष्ण भी काले थे...राम भगवान् भी सांवले थे.. ( अब तुम भी काले-सांवरे हो तो खुद को खुदा ही समझो )समझ नहीं आता कि जब सारे देवी-देवता दूध के माफिक गोरे-सफ़ेद थे तो ये ही दोनों पावरफुल देव काले-सांवले कैसे हो गए ? खैर..कुल मिलाकर लब्बो-लुआब ये कि काले रंग वाले गोरों से ज्यादा पावरफुल होते हैं..विज्ञान ने भी इस बात की पुष्टि की है ..गोरों को इन्फेक्शन जल्दी होता है बनिस्पत काले लोगों के..त्वचा कैंसर की संभावना गोरों को ज्यादा रहती है अपेक्षाकृत कालुओं के.. कहते हैं-काला रंग एकदम ही पक्का होता है ..इस पर और कोई दूजा रंग नहीं चढ़ता पर गौर वर्ण के मिनट-मिनट पर मैले होने की संभावना बनी रहती है..कुल मिलाकर गणित ये कि गोरे रंग वाले अच्छे तो श्याम रंग वाले उससे भी ज्यादा अच्छे ..और सांवले तो सबसे अच्छे..

अब गोरी और काली–सांवली लडकियों–महिलाओं की बात करें..गोरी गोरियां तो हर मामले में एकदम बिंदास होती है..बात चाहे प्यार-मुहब्बत की हो या शादी की.. हस्ती की हो या गृहस्थी की.. सब वक्त के साथ सही समय पर निपटा लेती है पर काली-सांवली गोरियों की गाड़ियाँ किसी बिगडी घडी की तरह अटक-अटक कर चलती हैं..कोई भी काम वक्त से नहीं होता..न प्यार न शादी.. न हस्ती न गृहस्थी..बड़ी ही शापित होती है ऐसी युवतियां..काले युवकों को तो लोग राम-कृष्ण से जोड़ चने के झाड में चढ़ा देते है पर इन्हें काली माँ से न जोड़कर ताड़का से जोड़ जैसे पहाड़ से पटक देते हैं..कदम-कदम पर ये इसी तरह के गलत कनेक्शन का शिकार होती रहती हैं..गिरती-पड़ती रहती हैं.. ये घर से निकलने तक से कतराती हैं.. वो तो भला हो आज के दौर का कि चेहरे पर दुपट्टा लपेट सरपट चलने का फैशन चला है..अब काली या सांवली होने की हीन भावना से वे निजात पा गई हैं..नकाब डालने के बाद उन्हें याद ही नहीं रहता कि वो गोरी है काली...फिर भी येन केन प्रकारेण गोरी होने की हसरत हर वक्त इनमें उबाल मारते रहती है ..कमाल का मनोविज्ञान है इंसान का..इधर काले-सांवले लोग गोरा होने क्रीम पावडर थोपते पगलाए रहता है और उधर पाश्चात्य देशों में गोरे-गोरियाँ समुन्दर किनारे औंधे पड़े जाते हैं ताकि धूप खाकर तनिक सांवले या काले हो जाएँ..मतलब कि काले अपने कालेपन से नाखुश..और गोरे अपने गोरेपन से नाखुश..तो फिर खुश कौन है भाई ? सही कहा आपने ...केवल वही जो न गोरे न काले.. केवल सांवले बेचारे..कुल मिलाकर यहाँ भी सांवलों को ही फुल मार्क्स..

उपरोक्त रंगों पर कवियों ने भी काफी रंग बिखेरे हैं पर जैसा कि सर्वविदित है इन्हें मर्दों के रंग से कोई लेना-देना नहीं..मर्दों पर तो इन्हें कुछ लिखना भी नहीं.. इनके सारे गीत महिलाओं के लिए और महिलाओं को ही समर्पित होते हैं..कवियों ने चाँद पर हजारों गीत लिखे हैं.. मसलन- चाँद सी महबूबा हो मेरी तुम..कब ऐसा मैंने सोचा था.. चौदवीं का चाँद हो या आफताब हो..चाँद आहें भरेगा..लोग दिल थाम लेंगे..चाँद को क्या मालुम चाहता है उसको ये चकोर.. गोरे गोरे चाँद से मुख पर काली काली आँखें है..चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसा बाल..आदि आदि आदि.. इन सब गीतों में चाँद एक तरह से गोरेपन का ही प्रतीक है..मतलब कि गोरियों पर ही ज्यादा गीत लिखे गए..यह एक तरह से श्यामवर्णों वाली के साथ गंभीर पक्षपात है..भला हो अनजान साहब का जिन्होंने ऐसा बर्ताव नहीं किया और काले-गोरे दोनों को समभाव से देख दोनों की तारीफ़ एक ही गीत में कर दिया –

“ जिसकी बीबी गोरी उसका भी बड़ा नाम है..कमरे में बिठालो बिजली का क्या काम है...

..और..

जिसकी बीबी काली उसका भी बड़ा नाम है आँखों में बसा लो सूरमें का क्या काम है.. “

पर सांवली सुरतिया वाली का जिक्र इन्होने भी नहीं किया जबकि यही रंग भारत में और विश्व में बहुत सी महिलाओं का है जैसा कि नेताजी ने अपने बयान में कहा..और इस मुद्दे पर वे किसी के भी साथ चर्चा करने में उद्यत दिखे..महिलाओं के रंग-रूप पर टिपण्णी का जो विरोध जताया गया वो मेरे हिसाब से इसलिए कि “डायलाग’ शायद गलत श्रीमुख से “डेलिवर“ हो गया ..कोई “शाहजादे” जैसा जवान एम.पी. के श्रीमुख से डेलिवर होता तो शायद ज्यादा हो-हल्ला नहीं होता..पर बेचारे नेताजी भी क्या करें ? “ उमरिया ढल गई लेकिन अभी तक दिल जवां है “ वाली रौ में बह ये सब बोल गए..पर मानना पड़ेगा उनकी याददाश्त को कि काले के फेवर में उन्होंने एक बढ़िया ही गीत गुनगुनाया- “ मोरा गोरा रंग लेई ले..मोहे श्याम रंग देई दे..”

श्याम रंग और सांवले रंग में कोई ज्यादा फर्क नहीं..फिर भी मुझे तो बस सांवले रंग से ख़ासा लगाव है क्योंकि यही एक आदर्श रंग है..और राज की बात ये कि मैं जिस नाजनी से प्यार करता था..जिसे चाहता था वो न तो हीर की तरह गोरी थी न ही लैला की तरह काली..बस थी वो सुन्दर-सांवली..आज भी उसकी याद में ये पंक्तियाँ गुनगुनाता लेता हूँ-

“ जब भी देखता हूँ कोई सांवली सी सूरत

तुम्हारा ही अक्स उसमें नजर आता है..”

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प्रमोद यादव

गया नगर , दुर्ग , छत्तीसगढ़

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