रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

April 2015
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

image
प्रमोद भार्गव
दुनिया के नामचीन विशेषज्ञों व पर्यावरणविदों की मानें तो सभी भूकंप प्राकृतिक नहीं होते,बल्कि इन्हें विकराल बनाने में हमारा भी हाथ होता है। प्राकृतिक संसाधनों के अकूत दोहन से छोटे स्तर के भूकंपों की पृष्ठभूमि तैयार हाती है। भविष्य में इन्हीं भूकंपों की व्यापकता और विकरालता बढ़ जाती है। यही कारण है कि भूकंपों की आवृत्ति बढ़ रही है। पहले 13 साल में एक बार भूकंप आने की आशंका बनी रहती थी,लेकिन यह अब घटकर 4 साल हो गई है। अमेरिका में 1973 से 2008 के बीच प्रति वर्ष औसतन 21 भूकंप आए,वहीं 2009 से 2013 के बीच यह संख्या बढ़ कर 99 प्रति वर्ष हो गई। यही नहीं भूकंपीय विस्फोट के साथ निकलने वाली ऊर्जा भी अपेक्षाकृत ज्यादा शक्तिशाली हुई है। नेपाल में 25 अप्रैल 2015 को आए भूकंप से 20 थर्मोन्यूक्लियर हाइड्रोजन बमों के बराबर ऊर्जा निकली है। इनमें से प्रत्येक विस्फोट हिरोशिमा-नागाशाकी में गिराए गए परमाणु बम से भी कई गुना शक्तिशाली था। जाहिर है,धरती के गर्भ में अंगड़ाई ले रही भूकंपीय हलचलें महानगरीय आधुनिक विकास और आबादी के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती हैं ? वैसे हमारे यहां भूकंपीय दृष्टि से जो भयावह संवेदनशील क्षेत्र हैं,उनमें अनियंत्रित शहरीकरण और आबादी का घनत्व सबसे ज्यादा है। भारत की यही वह धरती है,जिसका 57 प्रतिशत हिस्सा उच्च भूकंपीय क्षेत्र में आता है। इसी पूरे क्षेत्र में 25 अप्रैल शनिवार को धरा डोल चुकी है। बावजूद सौ स्मार्ट सिटी बसाने के बहाने शहरी विकास को प्रोत्साहित किया जा रहा है


    एशिया के हिमालयी प्रायद्वीपीय इलाकों में बीते सौ वर्षों से धरती के खोल की विभिन्न दरारों में हलचल मची है। अमेरिका की प्रसिद्ध 'साइंस' पत्रिका ने कुछ वर्ष पहले भविष्यवाणी की थी कि हिमालयी क्षेत्र में एक भयानक भूकंप आना शेष है। यह भूकंप आया तो 5 करोड़ से भी ज्यादा लोग प्रभावित होंगे। इस त्रासदी में करीब 2 लाख लोग मारे भी जाएंगे ? हालांकि पत्रिका ने इस पुर्वानुमानित भूकंप के क्षेत्र,समय और तीव्रता सुनिश्चित नहीं किए हैं। लेकिन नेपाल के साथ भारत,चीन,बांग्लादेश,तिब्बत,भूटान,पाकिस्तान और अफगानिस्तान में एक साथ भूकंप के प्रकोप से डोली धरती ने एहसास करा दिया है कि वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी महज अटकल नहीं है। अमेरिका की भूगर्भीय संस्था यूएसजीएस ने माना है कि यह ताजा भूकंप भारतीय और अरेबियन परतों में हुए तीव्र घर्षण की वजह है। 81 साल के भीतर नेपाल में आया यह सबसे भयंकर भूकंप था। भूकंप का केंद्र काठमांडू से 40 मील दूर पश्चिम इलाके में लामजुंग था,जो कि ज्यादा जनसंख्या वाले क्षेत्र में आता है। नतीजतन मरने वालों की तादात 10 हजार तक पहुंच सकती है।


    दुनियाभर के भूकंप व भूगर्भीय बदलावों की विश्वसनीय जानकारी देने वाले यूएसजीएस का कहना है कि भारतीय व अरेबियन परतों के बीच होने वाली टक्कर का सबसे ज्यादा असर हिमालय पर्वतमाला में बसे क्षेत्रों में पड़ेगा। इसे दुनिया के सबसे सक्रिय भूगर्भीय गतिविधियों के तौर पर भी देखा जाता है। इन परतों के बीच लगातार घर्षण बढ़ रहा है। परिणामस्वरूप केदारनाथ में भूस्खलन,जम्मू-कश्मीर में बाढ़,नेपाल एवं भारत में भूकंप और तिब्बत में भूकंप,हिमपात व भूस्खलन की घटनाएं एक साथ देखने में आई हैं। तिब्बत के टिंगरी काउंटी के रॉग्जर कस्बों में 95 फीसदी से ज्यादा घर जमींदोज हो गए हैं। भारतीय और अरेबियन परतों की यह खतरनाक श्रृखंला जम्मू-कश्मीर से शुरू होकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, तिब्बत, नेपाल, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम व भूटान होती हुई अंडमान निकोबार द्वीप समूह तक फैली है। सक्रिय भूगर्भीय गतिविधियों के निरंतर चलते रहने के कारण ही हिमालय पर्वत श्रृखंला में कच्चे पहाड़ अस्तित्व में आए हैं।


    प्राकृतिक आपदाएं अब व्यापक विनाशकारी इसलिए साबित हो रही हैं,क्योंकि धरती के बढ़ते तापमान के कारण वायुमंडल भी परिवार्तित हो रहा है। अमेरिका व ब्रिटेन समेत यूरोपीय देशों में दो शताब्दियों के भीतर बढ़ी अमीरी इसकी प्रमुख वजहों में से एक है। औद्योगिक क्रांति और शहरीकरण इसी की उपज हैं। यह कथित क्रांति कुछ और नहीं प्राकृतिक संपदा का अंधाधुंध दोहन करके पृथ्वी को खोखला करने के ऐसे उपाय हैं,जो ब्रहाण्ड में फैले अवयवों में असंतुलन बढ़ा रहे है। नतीजतन जो कॉर्बन गैसें बेहद न्यूनतम मात्रा में बनती थीं,वे अधिकतम मात्रा में बनने लगीं और वायुमंडल में उनका इकतरफा दबाव बढ़ गया। फलतः धरती पर पड़ने वाली सूरज की गर्मी प्रत्यावर्तित होने की बजाय,धरती में ही समाने लगी,गोया धरती का तापमान बढ़ने लगा,जो जलवायु परिवर्तन का कारण बन रहा है। चूंकि प्रकृति अमीरी-गरीबी में भेद नहीं करती है,इसलिए इसकी कीमत गरीब देश,मसलन विकासशील देशों को भी चुकानी पड़ रही है।

हिमालय के हिमखंड पिघलकर समुद्र का जलस्तर बढ़ा रहे है। आशंका है कि दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले बांग्लादेश के कई भंखड समुद्र में जल-समाधि ले लेंगे। लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि नष्ट हो जाएगी। वर्षा चक्र प्रभावित होगा। नतीजतन जनता को बाढ़ और सूखा दोनों तरह के अभिशाप झेलने होंगे। इस साल भारत के बहुत बड़े भूभाग में यही हश्र देखने में आया है। हालांकि इस बद्तर स्थिति में कुदरत का यह करिश्मा भी देखने में आ सकता है कि कनाडा और रूस की हिमशिलाओं के नीचे दबी लाखों बीघा जमीन बाहर निकल आएगी। बावजूद विनाश की आंशकाएं कहीं ज्यादा हैं,लिहाजा बेहतर यह होगा कि इंद्रिय-सुख पहुंचाने वाली भोग-विलस की संस्कृति पर लगाम लगे ?


    भारत का 57 फीसदी भू-क्षेत्र धरती की कोख में अठखेलियां कर रही उच्च भूकंपीय तरंगों से प्रभावित है। इसे भारतीय मानक ब्यूरो ने 5 खतरनाक क्षेत्रों में बांटा है। यह विभाजन अंतरराष्ट्रीय मानक 1893 के मानदंडों के अनुसार किया गया है। क्षेत्र एक में पश्चिमी मध्य-प्रदेश,पूर्वी महाराष्ट्र,आंध्र प्रदेश,कर्नाटक और ओड़ीसा के भू-भाग आते हैं। इस क्षेत्र में सबसे कम भूकंप का खतरा है। दूसरे क्षेत्र में तमिलनाडू,राजस्थान,मध्यप्रदेश,पश्चिम बंगाल और हरियाणा हैं। यहां भूकंप की शंका बनी रहती है। तीसरे क्षेत्र में केरल,बिहार,पंजाब,महाराष्ट्र,पश्चिमी राजस्थान,पूर्वी गुजरात,उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के कुछ हिस्से शामिल हैं। इसमें भूकंप के झटके के आते रहते हैं। चौथे में मुबंई,दिल्ली जैसे महानगर,जम्मू-कश्मीर,हिमाचल प्रदेश,पश्चिमी गुजरात,उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों के साथ बिहार-नेपाल सीमा के इलाके शामिल हैं। यहां भूकंप का खतरा निरंतर है। यहां 8 की तीव्रता वाला भूकंप आ सकता है। इससे भी खतरनाक पांचवा ़क्षेत्र माना गया है। इसमें गुजरात का कच्छ व भुज क्षेत्र,उत्तराखंड का हिमालयी क्षेत्र और पूर्वोत्तर के सातों राज्य आते हैं। यहां भूकंप 9 की तीव्रता का आकर तबाही का आलम रच सकता है। .


हैरानी की बात यह है कि खतरनाक भूकंपीय क्षेत्रों की जानकारी हमारे पास है। बावजूद हम इन संवेदनशील क्षेत्रों में नगरों का विकास भूकंप-रोधी मानदण्डों के अनुरूप नहीं कर रहे हैं। भवन निर्माण तो छोड़िए,उत्तराखंड में टिहरी जैसे बड़े बांघ का निर्माण करके हमने खुद भविष्य की तबाही को न्यौता दिया है। हमारी बढ़ी व सधन घनत्व वाली बसाहटें भी उन संवेदनशील क्षेत्रों में हैं,जहां खतरनाक भूकंपों की आशकाएं सबसे ज्यादा हैं। इन बसाहटों में दिल्ली,मुबंई,कोलकत्ता समेत 38 महानगर हैं,जो भूकंप के मुहाने पर खड़े हैं। शहरीकरण से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र की जुलाई 2014 में आई रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली 2.5 करोड़ की आबादी के साथ 3.80 करोड़ अबादी वाले टोक्यो के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शहर बन गया है। 2030 तक दिल्ली की आबादी 3.60 करोड़  हो जाएगी। फिलहाल मुबंई में 2.10 करोड़ और कोलकात्ता में 1.5 करोड़ जनसंख्या है। जाहिर है,आबादी के दबाव से इन नगरों का भूकंप रोधी नियोजित बुनियादी विकास असंभव है। तय है,इन नगरों में यदि कालांतर में भूकंप आया तो उसकी भयावहता का अंदाजा लगाना मुश्किल है ? क्योंकि जापान तो आए दिन आने वाले भूकंपों से अभ्यस्त हो गया है।

इसलिए जब जापान के फृकिशियामा में 2011 में 8.5 तीव्रता वाला भूकंप आया था तो वहां बमुश्किल सौ लोगों की जानें गई थीं,जबकि भारत जैसी मानसिकता वाले नेपाल में 7.9 की तीव्रता का भूकंप आया तो 5000 से भी ज्यादा मौतें हो गईं। इसलिए अनियंत्रित शहरीकरण से भारत को खतरा इसलिए ज्यादा है,क्योंकि यहां किसी भी नगर की नगरीय योजना भूकंप-रोधी बुनियाद पर खड़ी ही नहीं की गई है ? जबकि दिल्ली,मुबंई और कोलकात्ता भूकंपीय ऊर्जा के मुहानों पर बसे हैं। लिहाजा समय रहते सचेत होने की जरूरत है। सरकार को सौ स्मार्ट शहर बसाने की बजाय,विकास की ऐसी नीति को क्रियान्वित करने की जरूरत है,जो गांव और छोटे कस्बों में रहते हुए लोगों को रोजगार,आवास,शिक्षा,स्वास्थ्य,विघुत संचार,और परिवहन सुविधाएं उपलब्ध कराएं। इससे एक साथ दो लक्ष्यों की पूर्ति होगी। ग्रामों से पलायन रूकेगा और शहर बेतरतीन विकास से बचेंगे और बाईदवे भूकंप का संकट आया भी तो जनहानि भी कम से कम होगी।


    भूकंप समुद्री,तूफान,चक्रवती हवाएं और जलवायु परिवर्तन का भय दिखाकर अकसर यह कहा जाता है कि कॉर्बन का उत्सर्जन कम करके पृथ्वी को बचालो,अन्यथा पृथ्वी नष्ट हो जाएगी। यहां गौरतलब है कि पृथ्वी करीब 450 करोड़ वर्ष पहले वजूद में आई,जबकि मनुष्य की उत्त्पत्ति दो लाख साल पहले अफ्रीका में हुई मानी जाती हैं। हमें ख्याल रखने की जरूरत है कि जब-जब प्राकृतिक आपदा के रूप में प्रलय आई है,तब-तब पृथ्वी का बाल भी बांका नहीं हुआ है ? महज कुछ क्षेत्रों में उसका स्वरूप परिवर्तन हुआ है। लेकिन बदलाव के इस संक्रमण काल में डाइनोसोर और मैमथ जैसे विशालकाय थलीय प्राणी जरूर हमेशा के लिए नष्ट हो गए ? गोया खंड-खंड आ रही प्रलय की इन चेतावनियों से मनुष्य को सावधान होने की जरूरत है।


प्रमोद भार्गव
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
   
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।

image

डॉ दीपक आचार्य

बस्तियों, महकमों और दुकानों के जंगलों में भटकते हुए हर तरफ और कुछ लगे न लगे, इनमें धर्मशालाओं की पक्की छाप जरूर दिखती है।

इन धर्मशालाओं में सब कुछ फ्री-स्टाईल ही है।

सारी की सारी मर्यादाएँ, संस्कार और संवेदनशीलताएं आस-पास के परिसरों या पार्कों में पार्किंग करती नज़र आती हैं।

और भीतर वह सब कुछ होता रहता है जो धर्मशालाओं की तासीर में होता है।

धर्मशालाओं से हमारी आसक्ति न पहले कभी रही है, न रहने वाली।

पर इतना जरूर है कि ये धर्मशालाएं हमारे लिए ही बनी हैं।

इनका साजो-सामान, हवाएं, परिसर, गंध और हर एक चीज पर हम अपना अधिकार मानते हैं तभी तो बिना किसी भय के उन्मुक्त होकर यूज करते हैं और यूज एण्ड थ्रो का नारा लगाते हुए उसे ठिकाने पहुंचा देते हैं।

धर्मशालाओं का अपना अनुशासन और समय तो होता है, इनमें आने और जाने वालों का न कोई समय है, न अनुशासन।

जिसकी जब मर्जी होती है, चला आता है, जब इच्छा होती है चुपचाप खिसक लेता है।

कोई पूछने वाला नहीं है।

हो भी कैसे जब आने-जाने वालों में हम सारे के सारे लोग शुमार हैं। हमसे नीचे वाले भी हमारी तरह ही हैं, और ऊपर वाले भी। पुराने वाले भी इनसे कौन से कम थे। इन्हीं परंपराओं का निर्वाह हम भी कर रहे हैं।

ऎसे में कौन किससे, किसकी और क्यों शिकायत करे।

फिर हर इंसान आजकल अपना नहीं रहा।

सबके बारे में लोग खुले आम कहते हैं - यह अपना आदमी है, यह उसका आदमी है ...।

जैसे कि हम चोर बाजार में थड़ी लगाकर सामान बेच रहे हों और दूसरे चोर बाजार के कोई गुण्डे छाप दादा या भाई लोग आ जाएं तब हम अपने बारे में नहीं, अपने आकाओं के बारे में बताते हुए गर्व और गौरव का अनुभव करते हैं।

हमारी स्थिति ठीक उस मुक्ताकाशी अजायबघर या अभयारण्य के पालतु मवेशी की तरह हो गई है जिसके जिस्म पर टैग बांध दिया गया हो इसकी पहचान का।

अब हमारी अपनी कोई पहचान नहीं रही, खूंटों, पट्टों, टैग, नेम प्लेटों या बत्तियों से हमारी पहचान होने लगी है। किसी को पड़ी नहीं है धर्मशाला के वजूद को बनाए रखने या इसके भविष्य के बारे में चिन्ता करने की।

हम सभी को पता है कि पुराने लोग भी हमारी ही तरह थे और आने वाली फसल भी तकरीबन ऎसी ही है। धर्मशालाओं का वजूद हर युग में रहेगा, आज यह तो कल इसकी जगह दूसरी बन जाएगी।

हमें तो बस मौका मिलना चाहिए।

नाम धर्मशालाओं का, और काम .... राम-राम, अपना मुँह गंदा क्यों करें।

अपना कोई धर्म नहीं है फिर भी धर्म के नाम पर हम वो सब कुछ कर गुजर रहे हैं जो धर्मशालाओं में रहकर किया या कराया जा सकता है।

धर्मशालाओं में हमारा आना-जाना या रहना भी बड़ा अजीब किस्म का है।

फेरी वालों की तरह आते हैं, गपियाते हैं, चाय-कॉफी की चुस्कियाँ लेते हैं।

दिन में कई-कई बार अपने पापी पेट को कुछ खाते-पीते रहने की इच्छा हो जाती है।

ऎसे में चाय की थड़ियों और होटलों की तरफ रूख कर देते हैं।

पहले तलाशते हैं कोई न कोई मुर्गा मिले, जिसकी जेब तराश ली जाए, मिल जाए तो भगवान का शुक्रिया अदा कर लेते हैं, न मिल पाए तो एकाध दिन अपनी जेब से ही सही, किसी से भी वसूल लेंगे।

घूमने-फिरने और खाते-पीते रहने से ही तो हमारी सेहत अभी तक एकदम हिट एण्ड फिट बनी हुई है।

धर्मशालाओं की हर चीज पर हम लोगों का सर्वाधिकार सुरक्षित लिखा हुआ है, जो औरों को कभी नहीं दिखाई देता। इसे देखने के लिए दिव्य चक्षुओं का होना जरूरी है, और वे सिर्फ हमारे पास ही हैं।

जब मर्जी हुई धर्मशाला का टीवी ऑन कर दिया और घण्टों जम गए।

हमारे पास खूब सारे संसाधन हैं जिनकी वजह से हमें धर्मशालाएं रास आती हैं।

और कुछ नहीं तो मुफत का फोन भी तो है। जब दाव लगा, मौका मिला नहीं कि फोन का चोगा उठाकर लग गए बतियाने, वह भी नॉन स्टॉप।

अपने मोबाइल से काल लोग्स को खंगाल-खंगाल कर नंबर तलाशी करते हुए ऎसे भिड़े रहते हैं जैसे कि अचानक कोई राष्ट्रीय आपदा आ गई हो और जल्द से जल्द सूचित करना पड़ रहा हो।

फिर लंच का समय हो तब तो फोन हथियाने को उतावली भेड़छाप कतारों की आतुरता देखते ही बनती है।

और आजकल तो इंटरनेट ने हमारी पूरी जिन्दगी को ही एंटरटेनमेंट बना डाला है। मुफ्त का नेटवर्क इस्तेमाल करो और व्हाट्सएप, फेसबुक और दूसरे रास्तों पर चलते हुए रमे रहो, पूरी दुनिया को मुट्ठी में और दुनिया भर की हलचलों को अपने दिमाग में चक्कर लगवाते रहो।

हमें अपने काम-धाम में उतना आनंद नहीं आता जितना रोज कुछ न कुछ बटोर कर घर ले जाने के ताने-बाने बुनने या कि हमारी ही तरह के गपोड़ियों से घण्टों बैठकर चर्चाएं करते रहने में।

हम सभी लोग भगवान के आभारी हैं जिसने दिन-रात बोलने, चर्चाएं करने वाले और हर घटना-दुर्घटना या हलचल पर बिना थके समीक्षा, आलोचना और निन्दा करने वाले संगी-साथी भरपूर संख्या में हमें दिए हैं वरना ये धर्मशालाएँ मौनघरों के रूप में अभिशप्त ही हो जाती।

फिर हमारा क्या होता, हमारे उन बतरसियों का क्या होता, जो अपनी और घर-परिवार या अपने काम-काज की बजाय पूरी दुनिया की चिन्ता करते हैं और संसार भर के कचरे को जमा कर सूंघना, पकाना और परोसना करते रहे हैं।

हे भगवान .... सबकी अपनी-अपनी धर्मशालाओं को आबाद रखना।

---000---

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

image

 

डॉ दीपक आचार्य

हर बीमारी के पीछे सिर्फ शारीरिक समस्याएं ही नहीं होती बल्कि इनमें मानसिक विकारों और तनावों का योगदान अधिक रहता है।

दुनिया में कुछ बिरले लोग ही होने संभव हैं जो बिना किसी मानसिक या शारीरिक व्याधियों के जिन्दा हों। अन्यथा सभी लोग किसी न किसी बीमारी या उन्माद से ग्रस्त हैं।

आरंभिक तौर पर बीमारियों का जन्म मानसिक धरातल पर होता है और इनके बीज मन के धरातल पर अंकुरित होते हैं और इसके बाद दिमागी खाद से परिपुष्ट होकर पल्लवित होने लगते हैं तथा समय पाकर शरीर में प्रस्फुटित हो जाते हैं।

इसलिए यह कहा जाए कि हर बीमारी का मूल कारण मन की उपज है, जो गलत नहीं होगा।

यदि मन और मस्तिष्क के स्तर पर ही किसी भी प्रकार के तनाव, विषाद और अवसाद के बीजों का खात्मा कर दिया जाए तो शरीर कई प्रकार की बीमारियों से मुक्त रह सकता है।

लेकिन ऎसा कर पाना सामान्य लोगों के बस में कभी नहीं होता।

इसके लिए चरम आत्मविश्वास और ईश्वर के प्रति अगाध आस्था का भाव होना चाहिए।

जिन लोगों को अपने आप पर विश्वास होता है वे लोग संसार में अपने अकेले के बल पर परिवर्तन लाने में समर्थ होते हैं जबकि अपने आप पर भरोसा नहीं रखने वाले लोग हमेशा पराजय और हताशा का सामना करते हैं।

इसी प्रकार स्वास्थ्य का पाया भी सुदृढ़ आत्मविश्वास और रोग प्रतिरोधक क्षमताओं के साथ ही सेवा और परोपकार पर निर्भर है।

सेवा और परोपकार भी वही कर सकता है जिसका मन उदार हो, मस्तिष्क खुला हो और वृत्तियां लोक मंगलकारी हों, क्योंकि इसी प्रकार के लोग समाज के लिए जीते हैं।

इनके पास अपना कहने के लिए कुछ नहीं होता, जो कुछ होता है वह समाज का होता है इसलिए इसकी रखवाली और अभिवृद्धि के लिए किसी भी प्रकार की चिन्ता नहीं होती।

यही कारण है कि सांसारिक ऎषणाओं से मुक्त होकर जीने वाले ये लोग सांसारिक मानसिक विकारों और प्रदूषित वृत्तियों से दूर रहते हैं और इनका मन-मस्तिष्क हमेशा ताजा होता है।

जो लोग वैचारिक दृष्टि से हमेशा उदारवादी, सेवाभावी और परोपकारी होते हैं उन लोगों को अवसाद या तनाव छू भी नहीं पाते क्योंकि तनाव, अवसाद, शोक, पीड़ा और दुःख उन्हीं लोगों को होते हैं जो लोग अपने स्वार्थ के लिए गोरखधंधों में रमे रहते हैं, षड़यंत्रों को पेट और घर भरने के साधन बनाते हैं, हर क्षण किसी न किसी प्रकार की सैटिंग में अस्त-व्यस्त रहते हैं, जायज और नाजायज समझौतों को अपनाते रहते हैं।

यह जरूरी नहीं है कि हमारी हर खुराफात और षड़यंत्र हर अवसर पर सफल हो ही जाएं, बहुधा हमें असफलता हाथ लगती है और यही हमारे दुःखों और पीड़ाओं का कारण बन जाती है जो हर क्षण तनाव, उन्माद और उद्विग्नता के साथ मानसिक और शारीरिक आवेगों की गति को आकस्मिक रूप से न्यूनाधिक कर देती है।

यहीं से हमारी सेहत की बरबादी का आत्मघाती दौर आरंभ होता है। जब-जब भी ऎसी अनचाही स्थितियां सामने आती रहती हैं हमारी सेहत के लिए चुनौतियां खड़ी होती रहती हैं।

यह क्रम बारम्बार सामने आ जाने की स्थिति में शरीर का कोई न कोई अंग दुष्प्रभावित हो ही जाता है जिससे उसकी कार्यक्षमता या तो मंद हो जाती है अथवा बंद।

अधिकांश लोगों की मानसिक और शारीरिक सेहत खराब रहने तथा साध्य-असाध्य बीमारियों का असर दिखने का मूल कारण उनकी जीवनशैली, कार्य संस्कृति और व्यवहार है।

यह सब अच्छे होने की स्थिति में इंसान को दुआएं ही दुआएं मिलती हैं और यही दुआओं की ताकत उन्हें दवाओं से दूर रखती है।

जिन लोगों को दीर्घायु व यश चाहिए उनको चाहिए कि वे दुआओं को पाने के लिए निरन्तर तत्पर रहें, सेवा और परोपकार के काम करें और अपने जीवन को कारोबारी की बजाय सेवाभावी बनाएंं।

ये परोपकारी कर्म हमें दुआएं देते हैं और दुआओं के भण्डार को इतना अधिक समृद्ध कर देते हैं कि हमें दवाओं की जरूरत नहीं पड़ती।

सेवाभावी और परोपकारी स्वभाव की बजाय स्वार्थी और कारोबारी व्यक्तित्व पैदा हो जाने पर इंसान अपने संपर्क में आने वाले हर इंसान और कर्म को किसी धंधे से कम नहीं समझता जहाँ मुनाफा कमाना ही जीवन का परम उद्देश्य रहता है, सेवा-परोपकार तथा मानवीय मूल्य और संवेदनाएँ गौण।

यह स्थिति बददुआओं की हम तक पहुँच की गति और घनत्व को तीव्रतर कर देती है और यही बददुआएं हमारे आभामण्डल को इतना अधिक छेद डालती हैं कि हमारा पूरा जीवन दवाओं पर निर्भर हो जाता है और मरते दम तक दवाएं तथा तरह-तरह की जाँचें हमारी संगी साथी बनी रहती हैं।

दुआओं और दवाओं में शाश्वत शत्रुता रही है। जहाँ दुआएं होंगी वहाँ दवाएं नहीं होंगी।

जहाँ दुआएं नहीं होंगी वहाँ किसम-किसम की दवाओं का इस्तेमाल इंसान की मजबूरी होगा।

दवाओं और दुआओं में से एक को चुन लें।

न चुनें तब भी दोनों में से एक का ही वजूद रहेगा।

तय हमें ही करना है - दवाओं पर जिन्दा रहें या दुआओं का आनंद पाएं।

---000---

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

clip_image002

कैथलीन मुलडून

अनुवाद -

अरविन्द गुप्ता

मेरी बड़ी बहन 10 साल की है। उसका नाम है - पेनीलोप मेरी पाईपर। पर सब लोग उसे ‘पेनी’ नाम से बुलाते हैं, मुझे छोड़कर बाकी सब लोग। मैं पैटी जेन पाईपर उसे ‘नकचढ़ी राजकुमारी’ कहकर बुलाती हूं। इसके बारे में किसी और को नहीं पता है। मेरी राय में यह नाम उसके लिए एकदम फिट है। वह दिन भर अपने पहियों वाले सिंहासन पर बैठकर बाकी सब लोगों पर हुक्म चलाती है।

जब हम सामान खरीदने बाजार जाते हैं तो नकचढ़ी राजकुमारी अपने सिंहासन पर विराजमान रहती है और पापा उसके रथ को पीछे से धक्का देते हैं। रथ में बैठे-बैठे वह किसी मशहूर फिल्म-स्टार की तरह लोगों को देख मुस्कुराती है और हाथ हिलाती है। मेरी मम्मी उसकी बैसाखियां (क्रचिज) ढोती हैं, और मैं नौकरानी जैसी सारी शॉपिंग का बोझ ढोती हूं। कई बार तो मेरे हाथों में इतने सारे थैले होते हैं कि मैं एक पहियों वाला डिब्बा नजर आती हूं।

हर कोई नकचढ़ी राजकुमारी को प्यार करता है। पूरा परिवार - नाना-नानी, दादा-दादी, चाचा-मामा, चचेरे-मौसेरे भाई-बहन - उसे गले लगाता है। ये सारे उसकी तारीफ करते हैं। फिर वे मेरी ओर देखकर कहते हैं कि मैं किसी खरपतवार की तरह बढ़ रही हूं। लाखों-करोड़ों सालों से यही सिलसिला चला आ रहा है। नकचढ़ी राजकुमारी गुलाब का फूल है, और मैं उसकी छोटी बहन पैटी जेन एक कांटा हूं।

एक बार हम सभी लोग एक मेले में गए। नकचढ़ी राजकुमारी ने मुझे सैकड़ों बार झूले पर चढ़ते हुए देखा। झूले पर मुझे बड़ा मजा आया। अगर कोई दोस्त मेरे साथ होता तो शायद और ज्यादा मजा आता। काश! नकचढ़ी राजकुमारी मेरे साथ झूले की सवारी कर पाती। फिर मैंने एक प्रतियोगिता में रुई का कुत्ता जीतने की कोशिश की। मैंने अपनी जेब के सारे पैसे खर्च कर डाले और सैकड़ों बार गेंद फेंककर बोतलों को गिराने की कोशिश की। परंतु उन्हें गिराने में मैं पूरी तरह फेल हुई। पर जब हम वहां से जा रहे थे तो उस स्टाल वाले ने रुई का वह पीला कुत्ता नकचढ़ी राजकुमारी को भेंट कर दिया! यह असलियत है। हर कोई उस पर तौहफे न्यौछावर करता है!

मेरा स्कूल कोई सौ साल पुराना है। स्कूल मेरे घर से इतना दूर है कि मुझे वहां पहुंचने के लिए बस में घंटों बिताने पड़ते हैं। परंतु नकचढ़ी राजकुमारी घर के पास स्थित नए स्कूल में जाती है। वह अपनी व्हील-चेयर में वहां एक सेकंड में पहुंच जाती है। जब बारिश होती है तो पापा नकचढ़ी राजकुमारी को उसके सिंहासन के साथ कार में लादते हैं और एक सेकंड में घर पहुंचाते हैं। और मैं, पैटी जेन, कीचड़ में पीले रंग के गंदे रेनकोट को पहने घंटों बस का इंतजार करती हूं।

शनिवार के दिन ढेरों काम होते हैं। मम्मी लॉन की घास काटती हैं। पापा कपड़े धोते हैं और गैरेज साफ करते हैं। कपड़े सूखने के बाद पापा साफ कपड़ों को नकचढ़ी राजकुमारी के पास लाते हैं, जहां वह उन कपड़ों को तह करके मेज पर सजाती है। और मैं पैटी जेन नौकरानी बाथरूम साफ करती हूं।

एक शनिवार नकचढ़ी राजकुमारी को डाक्टर के पास जाना था, इसलिए मम्मी ने मुझसे कपड़े तह करने को कहा। मैं मेज पर ऐसे

बैठी, जैसे मैं कोई राजकुमारी हूं। मैंने जल्दी-जल्दी कपड़े तह किए और फिर उनको अच्छी तरह से एक के ऊपर एक करके रखा। जब नकचढ़ी राजकुमारी घर वापस आई तो मुझे लगा कि मम्मी उससे बाथरूम साफ करने को कहेंगी। परंतु मम्मी ने उसे तुरंत पलंग पर लेटा दिया, क्योंकि नकचढ़ी राजकुमारी थक गई थी। और उसके बाद मुझे

- पैटी जेन को बाथरूम भी साफ करना पड़ा। अब गर्मी की छुट्टियां हैं। मेरे सभी मित्र अलग-अलग जगह

घूमने-फिरने, कैम्पिंग, ट्रेकिंग के लिए गए हैं। सिर्फ मैं ही एक अभागी यहां सड़ रही हूं। मम्मी कहती हैं कि मुझे कैम्पिंग भेजने के लिए पैसे ही नहीं हैं। क्योंकि नकचढ़ी राजकुमारी के पैरों के लिए महंगे ब्रेसिस (पैरों को सहारा देने के उपकरण) खरीदे गए हैं, इसलिए पैसे ही नहीं बचे हैं।

भला नकचढ़ी राजकुमारी को उनकी क्या जरूरत? वह वैसे भी दिनभर अपने सिंहासन पर विराजमान रहती है। वह कभी-कभी बस थोड़ा-सा चलती है- जैसे किसी रेस्ट्रां के बाथरूम तक जाना, जिसके दरवाजे में उसकी व्हील-चेयर घुसती ही नहीं। मम्मी के अनुसार, जब नकचढ़ी राजकुमारी डॉक्टर के पास जाती है तो भी वह थोड़ा चलती है। परंतु मैंने उसे ऐसा करते हुए कभी नहीं देखा है।

दोपहर के खाने के बाद मैं बाहर चली जाती हूं और नकचढ़ी राजकुमारी अपने झूले पर लेटकर आराम से किताब पढ़ती है।

"क्या हम दोनों मिलकर एक कठपुतली का खेल खेलें?" मैंने उससे पूछा।

"नहीं, शुक्रिया," नकचढ़ी राजकुमारी ने शाही लहजे में जवाब दिया - "मैं बहुत सारी किताबें पढ़ना चाहती हूं, जिससे मैं गर्मियों में होने वाली प्रतियोगिता में पुरस्कार जीत सकूं।"

मेरा दिल पढ़ने का बिल्कुल नहीं था। फिर भी मैंने एक किताब ले ली और उसके चित्र निहारती रही। एक मिनट में मैंने पूरी किताब खत्म कर डाली।

"यह किताब काफी उबाऊ है," मैंने कहा - "चलो, अब तो कठपुतलियों वाला खेल खेलें।" परंतु नकचढ़ी राजकुमारी ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया। महारानी अब खर्राटे भर रही थीं!

पेड़ के पीछे ही उनका सिंहासन खड़ा था। उसे देख मेरे दिमाग में दुनिया का सबसे ग्रेट आइडिया आया - आज मैं, पैटी जेन, राजकुमारी बनूंगी!

मैं झट से सिंहासन पर बैठ गई। मुझे उसकी मुलायम गद्दी अच्छी लगी। कितना मजा आया उसपर बैठकर!

"मैं अपने सुनहरे सिंहासन पर पूरी शान से शाम तक बैठूंगी," मैंने अपने-आपसे कहा। मेरे राज-दरबार में कैसे लोग होंगे, वे अपनी नई सुंदर राजकुमारी को कितने प्यार से निहार रहे होंगे, मैं यही सोचती रही!

व्हील-चेयर यानी सिंहासन को मिटी्ट और घास पर चलाना काफी कठिन था। इसलिए मैं उसे खींचकर सामने के बरामदे में लाई। "अब मेरा हर मिनट इसी सिंहासन पर बीतेगा," मैंने अपने-आपसे कहा। मैंने व्हील-चेयर पर नकचढ़ी राजकुमारी के स्कूल तक जाने की ठानी। सड़क तक जाने के लिए घास पर एक ढाल था। शायद इस टीले से नीचे फिसलने में बड़ा मजा आएगा। मैंने व्हील-चेयर पर बैठकर उसे एक जोर का धक्का दिया।

धत्त! मैं धड़ाम से लुढ़ककर सिंहासन से नीचे गिरी और व्हील-चेयर मेरे ऊपर आकर गिरी। मेरे घुटनों में कुछ खरोंचें आईं, पर उसमें कोई खास दर्द नहीं हुआ। आसपास कोई नहीं था जो मेरी बेवकूफी पर हंसे। यह सोच मैं खुश हुई। क्या नकचढ़ी राजकुमारी ने भी व्हील-चेयर सीखते समय इसी तरह पटकी खाई होगी? फिर मैंने अपने सिंहासन को सीधा किया और दुबारा उस पर बैठी। धीरे-धीरे मैं सड़क पार करने के लिए कोने तक गई।

जैसे ही सिग्नल की हरी बत्ती जली मैंने तुरंत व्हील-चेयर को तेजी से आगे बढ़ाया। पर जैसे ही मैं सड़क के बीचोंबीच पहुंची, वैसे ही सिग्नल की बत्ती दुबारा लाल हो गई। मेरी तरफ चारों ओर से कारें और ट्रक बढ़ने लगे। मैं इतनी सहम गई कि मैंने डर के मारे दोनों हाथों से अपनी आंखों को बंद कर लिया।

अंत में ट्रैफिक रुका। दुबारा फिर से सिग्नल की हरी बत्ती जली। अब तक मैं सड़क पार कर चुकी थी। अब थोड़ी चढ़ाई थी। व्हील-चेयर को ढाल पर ऊपर चढ़ाते-चढ़ाते मेरी हालत खस्ता हो गई। इतनी ताकत लगानी पड़ी कि मुझे लगा जैसे मेरे हाथ ही टूट गए हों।

एक अंकल-आंटी मेरी तरफ बढ़े। उन्होंने मुझे और मेरे सिंहासन को गौर से देखा और फिर जल्दी ही वहां से खिसक लिए। डरावनी फिल्म देखते समय मैं भी अक्सर यही करती हूं। क्या नकचढ़ी राजकुमारी ने भी ऐसे अनुभव झेले होंगे? कुछ लड़के सड़क के किनारे खेल रहे थे। वे मेरी व्हील-चेयर के सामने से हटने को तैयार नहीं थे। "तुम मेरे ऊपर से होकर गुजरो, पहियों वाली लड़की," उनमें से एक मुझे चिढ़ाया। उसके बाकी दोस्त ठहाके मारकर हंसने लगे। "मैं तुम्हारी पिटाई लगाऊंगी!" मैं चिल्लाई, परंतु वे और जोर से हंसे और वहां से भाग गए।

स्कूल के मैदान में मुझे एक ऑइस-क्रीम का ठेला दिखाई दिया। कई बच्चों ने उसे घेरा था। मैं मैदान पार करके सीधे ठेले की ओर बढ़ी। मैंने अपनी जेब में से कुछ पैसे निकाले। तभी अचानक दुनिया की सबसे दुखद घटना घटी। सब तरफ मोटी-मोटी बारिश की बूंदें टप-टप करके गिरने लगीं! सारे बच्चे खिलखिलाते हुए इधर-उधर बिखर गए। ऑइस-क्रीम का ठेलेवाला तेजी से दूर चला गया। एक मैं ही ऐसी बदनसीब थी जो अपने गीले सिंहासन पर अकेली बची थी।

बारिश तेज, और तज बरसने लगी। मेरा मन किया कि मैं भी झट से घर दौड़कर चली जाऊं। परंतु मैं इस सिंहासन को छोड़कर कैसे जाऊं? वैसे मैं अभी भी राजकुमारी थी और मैंने हर पल अपने सिंहासन पर बिताने का वादा किया था - चाहे सिंहासन की गद्दी गीली ही क्यों न हो। इसलिए अब मैंने पूरी ताकत लगाकर व्हील-चेयर को चलाया। जब मैं मैदान में वापस पहुंची तो वहां मुझे हर तरफ कीचड़ ही नजर आई। व्हील-चेयर के पहिए गीली मिटी्ट में धंसने लगे - वे नीचे, और नीचे धंस रहे थे। फिर पहियों ने घूमना बंद कर दिया। मेरे हाथ भी मिटी्ट से सन गए। जब मैं सिंहासन से कूदकर नीचे आई तो मेरी नई सैंडिल भी मिटी्ट में धंस गई। मेरे पैर मिटी्ट में गायब हो गए। बड़ी मुश्किल से मैंने व्हील-चेयर को निकाला। अब तक मैं पूरी तरह मिटी्ट से सन चुकी थी और पानी में भीग चुकी थी। मैं पैटी जेन बड़ी मुश्किल में थी। अब शायद सिंहासन छोड़ने का समय आ गया था। अब बारिश रुकी। सड़क के उस पार मुझे इंद्रधनुष दिखाई दिया। मुझे अपने दूर स्थित घर के बरामदे में पापा खड़े नजर आए। वे जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। परंतु कारों और ट्रकों के शोर में उनकी आवाज सुनाई नहीं देती थी। मम्मी इधर-उधर देखती सड़क की तरफ बढ़ रही थीं। मैं किसी तरह व्हील-चेयर को खींचकर सड़क के किनारे तक लाई।

फिर मैंने सड़क पार की। जैसे ही मम्मी ने मुझे देखा, वे मुझे गले लगाने के लिए दौड़ीं। पापा भी उनके पीछे-पीछे थे। "सिंहासन को गंदा करने की मेरी बिल्कुल मंशा नहीं थी। मैं माफी चाहती हूं," मैंने कहा।

"सिंहासन?" मम्मी ने आश्चर्य से पूछा - "तुम्हारा मतलब व्हील-चेयर! हमें लगा तुम कहीं खो गई हो।"

"आप व्हील-चेयर को तो नहीं तलाश रहे थे?" मैंने पूछा।

"पैटी जेन, हम तुम्हें तलाश रहे थे।" कहते हुए मम्मी ने मुझे अपने सीने से चिपका लिया - "तुम्हें पेनी की व्हील-चेयर नहीं ले जानी चाहिए थी। पर हमें खुशी है कि तुम सही-सलामत वापस आ गई हो!"

घर आकर मम्मी ने मुझे रगड़-रगड़कर नहलाया और फिर मुझे पलंग पर लिटाया जैसा कि वे पेनी के साथ करती थीं। कुछ देर बाद मम्मी-पापा गुड-नॉइट कहकर, लाईट बंद करके चले गए। फिर मैं अकेले काफी देर तक सोचती रही।

"पेनी," मैंने फुसफुसाते हुए कहा, "क्या तुम जगी हो?"

"हूं।"

"क्या तुम्हें चलना अच्छा लगता है या बैठे रहना?"

"देखो," पेनी ने कहा, "चलने से मैं बहुत जल्दी थक जाती हूं। वैसे मैं व्हील-चेयर चलाकर भी पस्त हो जाती हूं। पर मुझे व्हील-चेयर ज्यादा पसंद है, क्योंकि उस पर बैठे-बैठे मैं अपनी मनपसंद चीजें कर सकती हूं। बैसाखी से मेरे लिए वह सब करना संभव नहीं है।" "तुम उस गंदी-सी व्हील-चेयर पर बैठे-बैठे हर समय मुस्कुरा कैसे सकती हो?"

"व्हील-चेयर गंदी नहीं है," पेनी ने कहा, "व्हील-चेयर के सहारे ही मैं उन जगहों पर जा सकती हूं जहां बैसाखियों से मेरे लिए जाना संभव नहीं है।"

यह सब सुनकर मैं और गहराई से सोचने लगी, "मैंने तुम्हारी व्हील-चेयर का इस्तेमाल किया, इसके लिए मैं माफी चाहती हूं।"

"चलो कोई बात नहीं। अब जल्दी से सो जाओ।"

पर अब मेरी आंखों से नींद गायब है। मैं लेटे-लेटे सोचती हूं और दुआएं मांगती हूं कि मेरी बहन को जिस काम में खुशी मिले वह उन्हें कर पाए। अब मुझे लग रहा है कि नकचढ़ी राजकुमारी उसके लिए शायद सही नाम नहीं है। शायद उसका असली नाम पेनीलोप मेरी और उसकी छोटी बहन यानी मेरा नाम पैटी जेन ही बेहतर है।

--

(अनुमति से साभार प्रकाशित)

image

 

मार्ज़ोरी फ्लैक और कुर्त वीज़

 

हिंदी अनुवाद

अंशुमाला गुप्ता

 

एक बार की बात है- पिंग नाम का एक खूबसूरत छोटा बत्तख था। वह अपनी मां, अपने पिता, अपनी दो बहनों, अपने तीन भाइयों, ग्यारह चाचियों, सात चाचाओं और बयालीस चचेरे भाई-बहनों के साथ रहता था। उनका घर था यांगजी नदी पर समझदार आंखों वाली एक नाव।

 

हर सुबह जब सूरज पूरब में निकलता पिंग, उसकी मां और पिता, दो बहनें और तीन भाई, ग्यारह चाचियां और सात चाचा और बयालीस चचेरे भाई-बहन, सब एक-एक करके, एक छोटे-से पुल पर कदम बढ़ाते हुए यांगजी नदी के किनारे जाते

 

सारा दिन वे घोंघे, मछलियां और खाने की दूसरी मजेदार चीजें ढूंढते। लेकिन शाम होते ही जब सूरज पश्चिम में डूबने लगता, नाव का मालिक जोर से हांक लगाता- "ला-ला-ला-ला-लेई!"

 

तुरंत ही पिंग और उसका सारा परिवार जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए दौड़कर आते और एक-एक करके उस छोटे पुल पर चढ़कर समझदार आंखों वाली उस नाव पर पहुंच जाते, जो यांगजी नदी पर उनका घर था।

पिंग हमेशा ध्यान रखता, बहुत-बहुत ध्यान रखता कि वह आखिर में न पहुंचे, क्योंकि जो भी बत्तख पुल को आखिर में पार करता था, उसकी पीठ पर एक तमाचा पड़ता था।

 

लेकिन एक दिन शाम को जब छायाएं लम्बी होने लगीं, पिंग ने आवाज नहीं सुनी, क्योंकि उस समय वह एक छोटी मछली पकड़ने की कोशिश में लगा था और उसका गलत हिस्सा पानी के ऊपर था।

 

जब पिंग का सही हिस्सा पानी के ऊपर आया, उसकी मां,  उसके पिता और उसकी चाचियां पहले ही एक-एक करके पुल के ऊपर चल पड़े थे। जब पिंग तट के पास पहुंचा, उसके चाचा और चचेरे बहन-भाई आगे बढ़ रहे थे। जब तक वह तट पर पहुंच पाया, उसके बयालीस भाई-बहनों में से आखिरी बत्तख भी पुल पार कर चुका था।

 

पिंग को पता था कि अगर उसने पुल पार किया तो वह आखिरी, बिल्कुल आखिरी, बत्तख होगा। वह तमाचा खाना नहीं चाहता था।

तो वह छिप गया।

पिंग घास के पीछे छिप गया। जैसे-जैसे अंधेरा छाता गया और आसमान में पीला चांद चमकने लगा, पिंग ने समझदार आंखों वाली नाव को यांगजी नदी में धीरे-धीरे तैरकर जाते देखा।

 

 

 

सारी रात पिंग नदी के किनारे घासों के बीच अपने पंख में सिर छुपाए सोता रहा और जब सूरज पूरब में निकल आया, तो उसने पाया कि वह यांगजी नदी पर बिल्कुल अकेला है।

 

वहां पिता या मां नहीं थे, बहन या भाई नहीं थे, चाची और चाचा नहीं थे, बयालीस चचेरे भाई-बहन नहीं थे-  इनमें से कोई भी वहां नहीं था, जो पिंग के साथ मछली पकड़ने जाता।

तो यांगजी नदी के पीले पानी पर तैरता हुआ पिंग उन्हें ढूंढने लगा।

 

जैसे-जैसे सूरज आकाश में ऊपर चढ़ता गया,  नावें आने लगीं- बड़ी नावें और छोटी नावें, मछली पकड़ने वाली नावें और भिखारियों की नावें, घर वाली नावें और लट्ठों की नावें।

इन सभी नावों को पिंग की आंखें देख रही थीं।

पर उसे कहीं भी समझदार आंखों वाली वह नाव नजर नहीं आई, जो उसका घर थी।

 

फिर एक नाव आई जो अजीब-से काले मछली पकड़ने वाले पक्षियों से भरी थी। पिंग ने देखा कि वे अपने मालिक के लिए मछली लाने के लिए गोता लगा रहे थे। जैसे ही कोई पक्षी अपने मालिक को एक मछली लाकर देता, उसका मालिक तनखाह के तौर पर मछली का एक छोटा टुकड़ा उसे देता।

 

मछली पकड़ने वाले पक्षी उड़कर पिंग के और नजदीक आए।

अब पिंग उनकी गर्दनों के चारों ओर चमकते छल्ले देख सकता था। ये धातु के छल्ले इतने कसे हुए थे कि पक्षी कभी भी उन बड़ी मछलियों को निगल नहीं सकते थे जिन्हें वे पकड़ रहे थे।

 

लपक, छपाक, छपाक, छल्ले वाले पक्षी पिंग के चारों ओर जोर से झपट रहे थे। उसने अंदर गोता लगाया और यांगजी नदी के पीले पानी के नीचे तैरने लगा।

जब पिंग उन पक्षियों से बहुत दूर पानी के ऊपर निकला तो उसे खाने के छोटे-छोटे टुकड़े तैरते मिले। ये चावल की केक के टुकड़े थे, जो एक घरवाली नाव तक रास्ता बनाए हुए थे।

जैसे-जैसे पिंग इन टुकड़ों को खाता गया, वह घर वाली नाव के नजदीक, और नजदीक आता गया, और छपाक!

 

पानी के अंदर एक लड़का था- एक छोटा लड़का।

उसकी पीठ पर एक पीपा था, जो नाव के साथ रस्सी से उसी प्रकार बंधा था, जिस तरह यांगजी नदी के सभी नाव वाले लड़के अपनी नावों से बंधे होते थे। उस लड़के के हाथ में एक चावल का केक था।

 

"ओह - ओ ओ ओ ओ उ उ उ !"

वह छोटा लड़का चिल्लाया और पिंग झपटा और उसने चावल का केक छीन लिया।

 

तुरंत ही लड़के ने पिंग को पकड़कर हाथों में जकड़ लिया। "कैं-कैं-कैं-कैं!" पिंग चिल्लाने लगा।

"ओह! - ओ ओ ह - उ उ!" छोटा लड़का चिल्लाया।

 

पिंग और लड़के ने इतना पानी उछाला और इतना शोर मचाया  कि लड़के का बाप दौड़ता हुआ आया और लड़के की मां भी दौड़ती हुई आई। लड़के की बहन और भाई दौड़ते आए।

उन सबने नाव के किनारे से झांककर पिंग और लड़के को यांगजी नदी के पानी में हाथ-पैर मारते देखा।

फिर लड़के के पिता और माता ने वह रस्सी खींची जो लड़के के पीठ पर बंधे पीपे से जुड़ी थी।

उन्होंने खींचा और पिंग तथा लड़का दोनों घर वाली नाव के ऊपर आ गए।

"आह, एक बत्तख का भोजन हमारे पास आ गया!" लड़के के पिता ने कहा।

 

"आज रात सूरज ढलने पर मैं इसे चावल के साथ पकाऊंगी," लड़के की मां ने कहा।

"नहीं-नहीं! मेरी प्यारी बत्तख इतनी सुंदर है कि उसे खाया नहीं जा सकता," लड़का चिल्लाया।

लेकिन पिंग के ऊपर एक टोकरी डाल दी गई और अब वह न लड़के को देख सकता था, न नाव को, न आकाश को और न ही यांगजी नदी के सुन्दर पीले पानी को।

 

सारे दिन पिंग सूरज की उन पतली रेखाओं को ही देख सकता था जो टोकरी के छेदों से चमक रही थीं,  और पिंग बहुत उदास था।

काफी देर के बाद पिंग ने चप्पुओं की आवाजें सुनीं और नाव की धच्च-धच्च महसूस की, जब उसे खेकर यांगजी नदी में ले जाया जा रहा था।

 

जल्दी ही टोकरी के छेदों से आ रही धूप की लकीरों का रंग गुलाबी हो गया और इससे पिंग को पता चल गया कि सूरज पश्चिम में डूब रहा है। पिंग ने अपने नजदीक आते पैरों की आवाज सुनी।

जल्दी से टोकरी को हटाया गया और अब छोटे लड़के के हाथ पिंग को पकड़े हुए थे।

जल्दी से चुपचाप लड़के ने पिंग को नाव के किनारे से गिरा दिया, और पिंग पानी में उतर गया - यांगजी नदी के खूबसूरत पानी में।

 

तभी पिंग ने अपनी पुकार सुनी, "ला-ला-ला-ला-लेई।"

पिंग ने नजर दौड़ाई। नदी के तट के पास उधर समझदार आंखों वाली वह नाव थी जो पिंग का घर थी।

पिंग ने अपनी मां और अपने पिता और अपनी चाचियों को देखा, सब के सब कदम बढ़ाकर एक-एक करके छोटे पुल के ऊपर जा रहे थे।

 

जल्दी से पिंग मुड़ा और तैरने लगा और तट की ओर बढ़ने के लिए पैर मारने लगा। अब पिंग को अपने चाचा एक-एक करके कदम बढ़ाते हुए दिख रहे थे।

जल्दी-जल्दी पैर मारकर पिंग तट की ओर बढ़ा।

उसने अपने चचेरे भाई-बहनों को एक-एक करके कदम बढ़ाते देखा।

 

जल्दी-जल्दी पिंग पैर मारकर तट के नजदीक पहुंचा, लेकिन-  जब पिंग तट पर पहुंचा उसके बयालीस चचेरे भाई-बहनों में से आखिरी बत्तख भी पुल के ऊपर पहुंच चुकी थी। पिंग समझ गया कि उसे फिर से देर हो गई है।

लेकिन वह फिर भी पुल के ऊपर चलता गया।

‘चटाक’ पिंग की पीठ पर तमाचा पड़ा।

 

आखिकार पिंग अपनी मां और अपने पिता, अपनी दो बहनों और तीन भाइयों, ग्यारह चाचियों और सात चाचाओं और बयालीस चचेरे भाई-बहनों के पास पहुंच गया - फिर से अपने घर में, यांगजी नदी के ऊपर समझदार आंखों वाली नाव में।

--

(अनुमति से साभार प्रकाशित)

image

मोहम्मद इस्माईल खान 

आज हरीराम अपनी जेल की कोठरी में हमेशा से कुछ ज्यादा ही परेशान है। आज उसकी बेटी मुलाकात करके गई है, वह एक ऐसी पुरानी इमारत की तरह ढ़ह गया है, जो पिछले पन्द्रह सालों से तेज आँधी और तूफान के थपेड़ों को सहती आ रही हों और हर बार किसी न किसी तरह अपने वजूद को बचाती रही हो। पर आज तो उसका नेस्तनाबूद हो जाना यकीनी लगता है। आज गोमती जो कुछ भी हरीराम को बता कर गई है। वह किसी इन्सान को पागल कर दे, उससे भी आगे की बात थी। अपनी पूरी बात हरीराम को बताने के लिये, गोमती ने कितना साहस जमा किया होगा यह तो गोमती का दिल ही जाने। किस तरह उसने यह मर्मभेदी तहरीर को अपनी टुकड़े-टुकड़े होती आवाज के साथ साँसों की डोर में बान्धे, हिचकोले खाती कश्ती की तरह पार तक पहुंचाया होगा और सलाखों के उस पार हरीराम बुत बना, गर्म पिघला हुआ सीसा अपने कानों के जरिये, अपने पूरे जिस्म में उतरता महसूस कर रहा होगा। अपने दिल और दिमाग को एक बेजान राख में तब्दील होता महसूस कर रहा होगा।

पिछले पन्द्रह सालों से यह मुलाकात का दिन, एक काला नाग बनकर उसकी जिन्दगी में आता और यह अचानक न आता। पूरे साल उसके आने का खौफनाक इन्तेजार उसे पल पल सताता, और वह अनजान रिश्तों की बैड़ियों में जकड़ा उस डसने की असहनीय पीड़ा को भोगता। और उसका दर्द सारा साल उसे बेचैन रखता। साथ ही अगली मुलाकात की दहशत उसके वजूद को तार-तार कर बिखेरती रहती और न जाने क्यों वह अपने आप को समेट कर इकट्ठा करता रहता शायद इसलिये कि जाने और अनजाने रिश्ते उसे विवश करते रहते अपनी साँसों की धमनी खींचते रहने के लिये।

जितने कैदी उसके साथ जेल में सज़ा काट रहे थे वे तो कब के अपने किये गये अपराधों को भूल चूके थे। अब तो जेल की रोजमर्रा की जिन्दगी ही उनका मकसद थीं। आज खाना क्या मिला, जेलर ने किस काम पर लगाया, आज नशे की क्या-क्या चीजें चोरी छिपे आई और रोज़मर्रा की लड़ाई झगड़े। लेकिन हरीराम को कत्ल के इल्ज़ाम में बीस बरस की जेल ऐसे ही नही हुई थी।

पन्द्रह साल गुजर गये उसे इस जेल में। कहने को तो वह बड़ा शान्त मिज़ाज और सीधा नज़र आता पर उसके अन्दर एक अलाव धधकता रहता जिससे उसकी अन्तरात्मा तिल-तिल कर जला करती। हालात यों बने कि उसे कुछ भूलने न देते। पन्द्रह साल से जो बोझ उसकी छाती पर रखा था, वह उससे उठाये न उठाता। हर साल उसके ज़ख्मों पर लगाने के लिये उसे मरहम दिया जाता, पर वह तो तेज़ तेज़ाब की जलन उसके लिये छोड़ जाता। पिछले पन्द्रह सालों में वह यह आघात सहता रहा पर इस बार तो उसे ऐसा लगा कि उसका ज़ख्मों से भरा कलेजा, उसका दर्द से बेहाल दिल और सुर्ख तवे पर भुनता हुआ उसका दिमाग, किसी ने बाहर निकाल कर जमीन पर पटक दिया हो और उन सबका कीमा बनाकर अपने पेरों से रोंद डाला हो।

गोमती दो साल की थी जब हरीराम ने शराब के नशे में धुत होकर उसके कस्बे में चल रहे मिशन अस्पताल की एक मासूम नर्स जूली से बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी। पकड़ा गया ओर जेल की सलाखों के पीछे डाल गया। उसके इस कारनामें की वजह से उसकी पत्नी के मन में इतनी नफरत जन्मी कि उसे अपने शरीर से, जिसे कभी हरीराम ने छुआ था और जिसकी वजह से गोमती जन्मी थी मिटा देना चाहती थी पर ममता ने गोमती को तो जेल की सीढ़ियों पर रोता छोड़ दिया और अपने आप से मुक्ति पा ली।

इधर जब जूली की हत्या का समाचार पाकर उसकी बड़ी बहन सिस्टर जैन वहाँ आई तो उसने जो व्यवहार हरीराम के साथ किया उसकी सज़ा से वह कभी भी नही उबर पाया। हरीराम और दूसरे लोग बहुत हैरान है कि अपनी बहन के कातिल के साथ और सिर्फ कातिल ही नही विभत्स क्रूर जानवर कातिल के साथ भला ऐसा व्यवहार कोई करता है? ऐसा न पहले कभी सुना न देखा।

गम्भीर अपराधो की सज़ा तो कठोर होती ही है पर ऐसी भी होती है कोई सोच भी नहीं सकता जितना गम्भीर अपराध! उतनी बड़ी क्षमा! उतनी बड़ी दया। इन्सान क्या सोचता है और क्या करता है उसके अन्दर की यह बात पता लगाना बड़ा मुश्किल काम है। सिस्टर जैन के हृदय में क्षमा, दया, ममता, प्रेम यही सब कुछ था हरीराम के लिये।

उन्होंने अपने दिल में हरीराम के प्रति घृणा को पनपने ही न दिया। शराब ने नशे में, अनजाने में किया गया अपराध मान कर क्षमा कर दिया। उसे अपना भाई बनाया, उसे राखी बान्धी, उसकी मौत की सजा को आजन्म करावास में बदलवाने के लिये जी जान एक कर दी और उसकी दो साल की गोमती को सारी जीवन सम्भालने का जिम्मा लिया।

हरीराम सोच नहीं पा रहा था कि ये उसके साथ हमदर्दी है या कोई बदला। वह बहुत सोचता पर उसका मन सिस्टर जैन के इस अजब व्यवहार के लिये कृतज्ञ होने के लिये तैयार ही नहीं होता। वह ता बस सहमा, सहमा, डरा सा रहता। क्या जाने वह मुझसे कोई बदला ले या मेरी बच्ची से। जब उसकी बच्ची को अपने साथ केरल ले जाने का फैसला किया तो वह मना भी तो न कर सका और फिर उस बच्ची का यहां देखने वाला भी कोई नहीं था। वह तो गरीब गाय की तरह सिर्फ सर ही हिलाता रहा। जब अकेले में सिस्टर जैन के बारे में सोचता कि आखिर वह ऐसा सब क्यों कर ही है। इतनी हमदर्द क्यों है, उसकी बहन के कातिल के साथ। कई तरह की शंकाए, कुशंकाऐं उसे घेर लेती और जो सोम्य तस्वीर सिस्टर जैन की उसके जहन में बनी थी वह विकृत होने लगती डरावनी लगने लगती। उसका दिमाग सुन्न हो जाता, और उसकी सोचने समझने की शक्ति जाती रहती। परन्तु पिछले पन्द्रह सालों से हर मुलाकात पर सिस्टर जैन जब गोमती को साथ लेकर केरल से उससे मिलने आती और बालिश्त दर बालिश्त वह गोमती को बड़ा होते देखता। उसकी संस्कारवान बोलचाल, साफ सुथरे कपड़े, अच्छे खाने पीने के असर से उसके चमकदार गाल, यह सब वह देखता तो उसे इत्मीनान होता कि सिस्टर जैन वाकई उस पर मेहरबान है, वह सब कुछ भूल चुकी हे, पर पुरानी यादों की डायरी का कोई पिछला पन्ना उसके सामने लहराने लगता और वह फिर भयभीत हो जाता। सिस्टर जैन उस पर मेहरबानी कर रही है या कोई बदला ले रही है।

अगर मैं बाहर होता तब भी गोमती की परवरिश ऐसे न कर पाता। क्या पता गोमती के भाग्य से ही तो मैं यहां नहीं पड़ा हूं। या गोमती एक बहाना मिल गई है सिस्टर जैन को, मुझसे बदना लेने का। पिछले चौदह सालों से सिस्टर जैन हर मुलाकात में अप्रत्यक्षित रूप से उस पर क्षमा, प्रेम सदाचार का मुलम्मा चढ़ाकर जाती जिसकी महक बाद में जेल के सारे साथी कैदी, जेलर और जेल का स्टाफ महसूस करते रहते। वह एक आदर्श कैदी की तरह हो गया। सबसे प्रेम, सब से नर्म व्यवहार, न लड़ना न झगड़ना। सबका चहेता सबका विश्वास पात्र।

आज उसकी ड्यिूटी जेल की मेस में खाना, पकाने पर लगी है। एक तेज धार वाली छुरी उसके हाथ में है, वह उसे सब्जियों पर रखता ही कि सब्जीयां कट-कट कर गिरने लगती है।

नर्म गुदाज टमाटर तो उसके स्पर्श मात्र से बिखरने लगते है। हरीराम उस छुरी की धार को अपने अंगूठे के पोर पर फेर कर उसका पैनापन जांचने लगता है कितनी तेज है यह गले पर चल जाये तो आर-पार कर दे। पर इससे तेज तो सिस्टर जैन की ......................... ! उसे सुबह गोमती की मुलाकात याद आ गई। मेरी बची पाँच साल की सजा माफ करवा दी है सिस्टर जैन ने। जल्द ही रिहाई का परवाना आ जायेगा। पर इससे बड़ी बात ..... .............. क्या सिस्टर जैन का सबसे बड़ा उपकार या सबसे बड़ा बदला। सिस्टर जैन की याद में रो-रो कर गोमती पागल हुई जा रही थी। अपनी माँ से बिछड़ने का गम तो उसे याद नहीं, पर सिस्टर जैन को ही माँ समझती थी वह। इस माँ ने ईमानदारी से अपना फर्ज भी निभाया था और इस माँ के बिछड़ने का गम उसे पागल किये जा रहा था। उस माँ ने एक मौके पर गोमती इज्जत बचाने के खातिर अपनी जान बलिदान कर दी। मुझ पर आखरी वार इतना संगीन इतना घातक और अब वह मुझे शर्मिन्दा करने मेरे सामने भी न आयेगी। और मैं हर वार की जिल्लत से बच जाऊँगा।

पर यह क्या वह मेरे मस्तिष्क पटल से कभी दूर हो पायेगी। भीड़ में और अकेले क्या मैं उससे कभी छिप पाऊँगां वह तो हमेशा मेरा पीछा करती रहेगी, पहले से भी ज्यादा करीब होकर। मैं भाग कर कहाँ जाऊँ। उसकी इतनी सारी दया अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हाती। वह तो मुझे बदला महसूस होती है, बड़ा भारी बदला। आज को अच्छा दिन कहूँ या मनहूस। दिन शाम में ढल गया। रात घिर आई हरीराम जल्दी ही अपनी बैरक की कोठड़ी में सर से पैर तक कम्बल ताने सो गया। क्या आज उसने अपने सर का सारा बोझ उतार फेंका है, इसलिये सुबह जल्दी उठने वाला हरीराम देर तक सोया पड़ा हैं।

जेलर और सिपाहियों के जूतों की आवाज पर बैरक की कोठड़ियों से कैदी चौक गये पर हरीराम सो रहा है। सिपाही ने हरीराम की कोठड़ी का ताला खोला। जेलर ने हाथ में लहराते हुये कागज को कुछ ऊँचा किया - हरीराम उठो, तुम्हारे लिये एक अच्छी खबर हैं सरकार ने फरियादी की दरखास्त पर तुम्हारी बाकी सजा माफ कर दी है। अब तुम आजाद हो।

जेलर ने हरीराम की ओर से कोई प्रतिक्रिया न पाई तो उसने हरीराम को हिलाया, फिर उसका कम्बल उलट दिया। यह क्या हरीराम तो रात को ही किसी वक्त आजाद हो चुका था उसने अपने हाथ की रग काट ली थी। सब्जियाँ और टमाटर काटने वाली छुरी सुर्ख हुई वहीं पड़ी थी।

 

मोहम्मद इस्माईल खान

एफ-1 दिव्या होम्स् सी 4/30 सिविल लाईन

श्यामला हिल्स् भोपाल 462002

0755- 2660424; मो0 9826329005

--

(ऊपर का चित्र - कुमार गौरव की कलाकृति - उन्मुक्त, कैनवस पर तैल रंग)

तबाही का मंजर दिखाने वाला भूकंप हम सभी के लिए कई सारी चेतावनियां छोड़ गया है।

यह अपने आप में ऎसे मार्मिक संदेश हैं जिनके मर्म को समझ जाएं तो ठीक है वरना प्रकृति आज नहीं तो कल अपना काम करेगी ही।

पृथ्वी सहित पंच तत्वों का आदर-सम्मान जब तक होता रहता है तब तक प्रकृति प्रसन्न रहती है लेकिन जब-जब आसुरी भावों का उदय होने लगता है, पृथ्वी को अपने पर इतना अधिक भार महसूस होता है कि वह कुलबुला उठती है और इससे उपजेे गुस्से के बाद वह कितनी निर्मम और क्रूर हो जाती है, वह इस भूकंप ने हमें दर्शा ही दिया है।

प्रकृति और पर्यावरण को रौंदना छोड़ें, सृष्टि का उपयोग और उपभोग करें मगर इस हद तक शोषण न करें कि धरती मैया को ममत्व का सागर छोड़कर अपना आपा तक खो देना पड़े।

धरती मैया हिंसा, कलह, कपट, झूठ, अधर्म और आसुरी कर्म नहीं चाहती।

वह चाहती है सृष्टि में दैवीय गुणों के साथ मानवीय मूल्य बने रहें, लोग इंसानियत से रहें, प्राणी मात्र निर्भय रहे, शांति और सुकून के साथ हर जीव स्वतंत्र और मस्त होकर जीने में खुश हो तथा सदाचारों और संस्कारों की हवाओं का वेग निरन्तर बना रहे।

जब से हम सभी ने इंसानियत भुला दी है तभी से धरती मैया ने हम पर से अपना वात्सल्य और ममत्व छीन लिया है और हमें मुक्त कर दिया है अपने स्नेह बंधनों से।

और हम हैं कि अपने आपको संप्रभु, स्वच्छन्द और स्वेच्छाचारी मानकर खुश हो रहे हैं।

यह भूकंप हम सभी के लिए सीख देने वाला है।

सब अपनी-अपनी मर्यादाओं में रहें, कोई हदों को पार न करे, वरना अंजाम बुरा होगा।

आज हममें से हर इंसान को अपनी मर्यादाओं को त्यागने में आनंद का अनुभव होता है।

हम सभी चाहते हैं कि कोई न कोई शोर्ट कट अपना कर रातों रात प्रतिष्ठित हो जाएं अथवा मालामाल हो जाएं। भले ही इसके लिए हमें इंसानियत को गिरवी ही क्यों न रख देनी पड़े।

वह जमाना बहुत पुराना था, बीत गया। जब हमारे पास खूब सारे पराक्रमी, निष्ठावान, मेधावी और आदर्शवान लोग थे, जिनका अनुकरण करते हुए जीवन में सफलता पाकर गर्व और गौरव का अहसास होता था।

हम अपने आपको तौलें और देखें कि हममें से कितने लोग ऎसे हैं जो किसी मामले में आदर्श स्थापित कर पाएं हों, किसी भी विषय या व्यवहार में हम अनुकरण योग्य हों।

हमें निराशा ही हाथ लगेगी, क्योंकि हम अपनी सारी हदों को तोड़ चुके हैं और हमारी स्थिति उन पिल्लों जैसी हो गई है जो पीढ़ियों से भूखें हैं और रोटी या हड्डी का टुकड़ा दूर कहीं दिख जाने पर पाने के लिए लपक पड़ते हैं।

अपने स्वार्थों के लिए हम झूठ-फरेब और नालायकियों का सहारा लेने में कभी पीछे नहीं रहते।

हममें से कितने लोग बचे हुए हैं जो पक्के तौर पर भगवान को हाजिर-नाजिर रखकर या अपनी कसम खाकर यह दावा कर पाने की स्थिति में हैं कि हम सत्य का आचरण करते हैं, हमारी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है, कभी झूठ नहीं बोलते या अपने मामूली स्वार्थों के लिए दूसरों को तंग नहीं करते।

कदाचारियों, हिंसकों और दुष्टों को कोई कुछ कह पाने का साहस हम दोहरे-तिहरे चरित्र वाले स्वार्थियों में से भले ही कोई नहीं कर पाए, धरती मैया का एक कंपन ही काफी है।

दुष्टों का संहार हो जाए तो कोई बात नहीं, लेकिन इस प्रकार की त्रासदियों में उन लोगों को काल कवलित होना पड़ता है जिनका दोष नहीं होता। दूसरों के दोषों का खामियाजा सज्जनों और निर्दोषों को भोगना पड़ता है, यही विडम्बना है।

भूकंप के बाद जो स्थितियां उत्पन्न हुई हैं उनमें हमारा प्राथमिक फर्ज यही है कि हम जिस प्रकार से भी कर सकें, भूकंप पीड़ितों की दिल खोलकर मदद करें।

मानवीय संवेदनाओं के साथ उदारतापूर्वक सहयोग, संबलन और सहकार का वक्त है। सारे भेदभाव भुलाकर मानवीय पक्ष को ध्यान में रखते हुए जो मदद करता है वही सच्चा मानव है।

भूकंप त्रासदी के बाद जिस तरह हमारे प्रधानमंत्रीजी और केन्द्र सरकार ने त्वरित पहल की, उसका दुनिया भर में स्वागत हुआ है।

हम सभी को भी उसी जज्बे के साथ काम करने की आवश्यकता है।

कुछ दिन सब कुछ छोड़ कर भूकंप पीड़ितों की यथाशक्ति मदद करने में लगाएं।

इंसानों के लिए यह परीक्षा की घड़ी है जिसमें हम पास हो गए तो धरती मैया खुश होंगी और आयंदा वे भी इस प्रकार की त्रासदी देने के पहले सोचेंगी।

और हम फेल हो गए, सिर्फ खबरों और तस्वीरों के पीछे ही मर गए तो ध्यान रखें कि अगली आपदा के प्रभावित हम भी हो सकते हैं क्योंकि धरती मैया असंख्य आँखों से सब कुछ देख रही है।

---000---

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

दिनेश कुमार माली

कुछ दिन पूर्व मुझे डॉ॰ विमला भण्डारी के किशोर उपन्यास “कारगिल की घाटी” की पांडुलिपि को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। इस उपन्यास में उदयपुर के स्कूली बच्चों की टीम का अपने अध्यापकों के साथ कारगिल की घाटी में स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए जाने को सम्पूर्ण यात्रा का अत्यंत ही सुंदर वर्णन है। एक विस्तृत कैनवास वाले इस उपन्यास को लेखिका ने सोलह अध्यायों में समेटा हैं, जिसमें स्कूल के खाली पीरियड में बच्चों की उच्छृंखलता से लेकर उदयपुर से कुछ स्कूलों से चयनित बच्चों की टीम तथा उनका नेतृत्व करने वाले टीम मैनेजर अध्यापकों का उदयपुर से जम्मू तक की रेलयात्रा,फिर बस से सुरंग,कश्मीर,श्रीनगर,जोजिला पाइंट,कारगिल घाटी,बटालिका में स्वतंत्रता दिवस समारोह में उनकी उपस्थिति दर्ज कराने के साथ-साथ द्रास के शहीद स्मारक,सोनमर्ग की रिवर-राफ्टिंग व हाउस-बोट का आनंद,घर वापसी व वार्षिकोत्सव में उन बच्चों द्वारा अपने यात्रा-संस्मरण सुनाने तक एक बहुत बड़े कैनवास पर लेखिका ने अपनी कलमरूपी तूलिका से बच्चों के मन में देश-प्रेम,साहस व सैनिकों की जांबाजी पर ध्यानाकर्षित करने का सार्थक प्रयास किया है। अभी इस समय अगर लेखन के लिए सबसे बड़ी जरूरत है, तो वह है- हमारे बच्चों तथा किशोरों में देश-प्रेम की भावना जगाना ताकि आधुनिक परिवेश में क्षरण होते सामाजिक,राजनैतिक,आर्थिक मूल्यों के सापेक्ष राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की संप्रभुता,सुरक्षा व सार्वभौमिकता की रक्षा कर सके। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि बचपन में जिन आदर्श मूल्यों के बीज बच्चों में बो दिए जाते हैं,वे सदैव जीवन पर्यंत उनमें संस्कारों के रूप में सुरक्षित रहते हैं। इस उपन्यास में एक प्रौढ़ा लेखिका ने अपने समग्र जीवनानुभवों,दर्शन और अपनी समस्त संवेदनाओं समेत बच्चों की काया में प्रवेश कर उनकी चेतना,उनके अनुभव,उनकीसंवेदना,जिज्ञासा,विचार व प्राकृतिक सौन्दर्य को विविध रूपों में परखने को उनकी पारंगत कला से पाठक वर्ग को परिचित कराया है।

उपन्यास की शुरूआत होती है,किसी स्कूल के खाली पीरियड में बच्चों के शोरगुल,कानाफूसी र परस्पर एक-दूसरे से बातचीत की दृश्यावली से,जिसमें क्लास-मोनिटर अनन्या द्वारा सारी कक्षा को चुप रखना और अध्यापिका द्वारा पंद्रह अगस्त की तैयारी को लेकर स्टेडियम परेड में अग्रिम पंक्ति में अपने स्कूल के ग्रुप का नेतृत्व करने के लिए किसी कमांडर के चयन की घोषणा से। तभी कोई छात्र अपनी बाल-सुलभ शरारत से कागज का हवाई-जहाज बनाकर अनन्या की टेबल के ओर फेंक देता है,जिस पर अनन्या का कार्टून बना होता है। यह देख अनन्या चिल्लाकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती है,तभी क्लास में दूसरी मैडम का प्रवेश होता है। उसे ज़ोर से चिल्लाते हुए देख मैडम नाराज होकर सूची से परेड में शामिल होने वाली उन सभी बच्चों के नाम काट देती है,जिनका एक प्रतिनिधि मंडल स्वाधीनता दिवस पर कारगिल की घाटी में शहीद-स्मारक पर देश की सेना के जवानों के साथ मनाने जाने वाला था।इस घटना से सारी कक्षा में दुख के बादल मंडराने लगते हैं, मगर मैडम की नाराजगी ज्यादा समय तक नहीं रहती है।इन सारी घटनाओं को लेखिका ने जिस पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत किया है,मानो वह स्वयं उस स्कूल में पढ़ने वाली छात्रा हो, या फिर किसी प्रत्यक्षदर्शी की तरह छात्र-अध्यापकों के स्वाभाविक,सहज व सौहार्द सम्बन्धों स्कूल की दीवार के पीछे खड़ी होकर अपनी टेलिस्कोपिक दृष्टि से हृदयंगम कर रही हो। क्लास टीचर के क्षणिक भावावेश या क्रोधाभिभूत होने पर भी उसे भूलकर दूसरे दिन प्राचार्याजी विधिवत प्रतिनिधि मंडल के नामों की घोषणा करती है। कुल तीन छात्राओं और साथ में स्कूल की एक अध्यापिका के नाम की,टीम मैनेजर के रूप में। बारह दिन का यह टूर प्रोग्राम था जम्मू-कश्मीर की सैर का। ग्यारह अगस्त को उदयपुर से प्रातः सवा छः बजे रेलगाड़ी की यात्रा से शुभारंभ से लेकर वापस घर लौटने की सारी विस्तृत जानकारी सूचना-पट्ट पर लगा दी जाती है। सूचना-पट्ट पर इकबाल का प्रसिद्ध देशभक्ति गीत “सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा” भी लिखा हुआ होता है। यहाँ एक सवाल उठता है कि लेखिका इस देशभक्ति वाले गीत की ओर क्यों इंगित कर रही है? अवश्य, इसके माध्यम से लेखिका ने स्कूली बच्चों के परिवेश तथा उनकी उम्र को ध्यान में रखते हुए उनमें स्व-अनुशासन, स्व-नियंत्रण, शरारत, उत्सुकता तथा देश-प्रेम के गीतों से उनमें संचारित होने वाले जज़्बाती कोपलों का सजीव वर्णन किया है।

दूसरे अध्याय में रेलयात्रा के शुभारंभ का वर्णन है। सूचना-पट्ट पर कारगिल टूर के लिए चयनित लड़कियों में तीनों अनन्या (कक्षा 9 बी),देवयानी (कक्षा 8 बी) तथा सानिया (कक्षा 10 बी) के नाम की तालिका चिपकी होती है। अनन्या का यह रेलगाड़ी का पहला सफर होता है। अनन्या मध्यम-वर्गीय परिवार से है,मगर अत्यंत ही कुशाग्र व अनुशासित, और साथ ही साथ ट्रूप लीडर के अनुरूप ऊंची कद-काठी वाली। लेखिका ने अनन्या द्वारा घर में माता-पिता व दादी से कारगिल जाने की अनुमति लेने के प्रसंग से एक मध्यमवर्गीय परिवार की मानसिकता का उदाहरण प्रस्तुत किया है,जिसमें दादी अभी भी लड़कियों को बाहर भेजने से कतराती है,कारगिल तो बहुत दूर की बात है,दूध की डेयरी तक किसी के अकेली जाने से मना कर देती है। इस प्रसंग के माध्यम से लेखिका के नारी सुरक्षा के स्वर मुखरित होते है। आज भी हमारे देश में छोटी बच्चियाँ तक सुरक्षित अनुभव नहीं करती है। दादा-दादी के जमाने और वर्तमान पीढ़ियों के बीच फैले विराट अंतराल को पाटते हुए आधुनिक माँ-बाप लड़कियों की शिक्षा तथा टूर जैसे अनेक ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों के लिए तुरंत अपनी सहमति जता देते है तथा लड़का-लड़की में भेद करने को अनुचित मानते है। मगर यह भी सत्य है, मध्यमवर्गीय परिवार में आज भी लड़कियों को घर के काम में जैसे झाड़ू-पोंछा,रसोई,कपड़ें धोना आदि में हाथ बंटाना पड़ता है।अनन्या की यह पहली रेलयात्रा थी,उसका उत्साह,उमंग और चेहरे पर खिले प्रसन्नता के भाव देखते ही बनते थे। ऐसे भी किसी भी व्यक्ति के जीवन की पहली रेलयात्रा सदैव अविस्मरणीय रहती है। पिता का प्यार और माँ की ममता भी कैसी होती है!इसका एक अनोखा दृष्टांत लेखिका ने अपने उपन्यास में प्रस्तुत किया है। इधर अनन्या की बीमार माँ चुपचाप उसके सारे सामानों की पैकिंग कर उसे अचंभित कर देती है,उधर पिता उसकी यात्रा को लेकर हो रही बहस के अंतर्गत जीजाबाई,रानी कर्मावती और झांसी की रानी के अदम्य शौर्य-गाथा का उदाहरण देकर नई पीढ़ी में देश-प्रेम और देश-रक्षा की भावना के विकास के लिए उठाया गया सराहनीय कदम बताकर दादी को संतुष्ट कर देते है कि चौदह-पंद्रह वर्ष की उम्र में झांसी की रानी ने अंग्रेजों से लोहा लिया था,तब अनन्या को किस बात का डर? पिता के कहने पर दादी के प्रत्युत्तर में “वह जमाना अलग था पप्पू,अब तो घोर कलयुग आ गया है” कहकर आधुनिक जमाने की संवेदनशून्यता की ओर इंगित करती है। मगर दादी द्वारा अनन्या को घर से बाहर परायों के बीच रहने पर किस-किस चीज का ध्यान रखना चाहिए,किन चीजों से सतर्क रहना चाहिए,अकेले कहीं नहीं जाना चाहिए,तथा कुछ भी अनहोनी होने पर तुरंत अपनी अध्यापिका से कहना चाहिए, जैसी परामर्श देकर समस्त किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखने वाली लड़कियों के हितार्थ संदेश देना लेखिका का मुख्य उद्देश्य है ताकि किस तरह कठिन समय में वे अपनी बुद्धि-विवेक,धैर्य व हौंसले से पार पा सकती है। अनन्या के माता-पिता की बूढ़ी आँखों में शान से लहराते तिरंगे के सामने सेना के जवानों को सैल्यूट देने में भविष्य के सपने साकार होते हुए नजर आते हैं। बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के प्रति जागरूकता लाने के साथ-साथ लेखिका ने यह प्रयास किया कि बच्चों व किशोरों को रेलवे के आवश्यक सुरक्षा नियमों व अधिनियमों की जानकारी भी हो,जैसे कि रेलवे प्लेटफार्म टिकट क्यों खरीदा जाता है?,किस-किस अवस्था में चैकिंग के दौरान जुर्माना वसूला जाता है? आरक्षित डिब्बों में किन-किन बातों का ख्याल रखना होता है ? आदि-आदि।

इस प्रकार लेखिका ने अपने उपन्यास लेखन के दौरान वर्तमान जीवन-प्रवाह से संबंधित सभी चरित्रों व घटनाओं का चयन रचना-प्रक्रिया के प्रारम्भ से ही प्रतिबद्धता के साथ किया है। यह प्रतिबद्धता लेखिका के मानस-स्तर की अतल गहराई में बसती है,तभी तो उन्होंने काश्मीर की यात्रा-वृतांत पर आधारित इस उपन्यास में अपनी मानसिक प्रक्रिया से गुजरते हुए भाषा के जरिए नया जामा पहनाकर अधिक सशक्त और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। उपन्यास के तीसरे अध्याय ‘आपसी परिचय का सफर’ में इधर रेलगाड़ी का सफर शुरू होता है, उधर उसमें बैठे हुए यात्रियों के आपसी परिचय का सफरनामा प्रारंभ होता है। जोगेन्दर चॉकलेट का डिब्बा आगे बढ़ाकर अनजान अपरिचित वातावरण में जान-पहचान हेतु हाथ आगे बढ़ाने का सिलसिला शुरू करता है। सानिया, देवयानी, जोगेन्दर, अनन्या, कृपलानी सर व उनकी पत्नी सिद्धार्थ, आशु, श्रद्धा, मिस मेरी (स्कूल की पीटी आई), रणधीर, जीशान, मैडम रजनी सिंह सभी एक दूसरे का परिचय आदान-प्रदान करते हैं। सेठ गोविन्ददास उच्च माध्यमिक विद्यालय से टीम इंचार्ज कृपलानी सर, सेवा मंदिर स्कूल की टीम इंचार्ज रजनी सिंह मैडम। सभी का परिचय प्राप्त होने के साथ-साथ चिप्स, नमकीन जैसी चीजों का नाश्ते के रूप में आदान-प्रदान शुरू हो जाता है। रेल की खिड़की से बाहर के सुंदर प्राकृतिक नजारों में लगातार कोण बदलती हुई अरावली की हरी-भरी पहाड़ियां और उनकी कन्दराओं में फैले लहलहाते खेत नजर आने लगते हैं, जिन पर गिर रही सूरज की पहली किरणों का खजाना दिग्वलय के सुनहरे स्वप्निल दृश्यों को जाग्रत करती है। ट्रेन के भीतर मूँगफली,चिप्स,चाय,कॉफी,बिस्कुट, पानी,वडापाऊ,समोसे बेचने आए फेरी वालों का ताँता शुरू हो जाता है। बच्चे लोग जिज्ञासापूर्वक उनसे बातें करने लगते हैं। अब तक अपरिचय की सीमाएं परिचय के क्षेत्र में आते ही हंसी-मज़ाक, चुट्कुले, अंताक्षरी, फिल्मी गानों की द्वारा सुबह की नीरवता को चीरते हुए दोस्ताना अंदाज में दोपहर के आते-आते विलीन हो चुकी थी। रेलगाड़ी अलग-अलग स्टेशनों को पार करती हुई निरंतर अपनी गंतव्य स्थल की ओर बढ़ती जा रही थी। चितौडगड, भीलवाडा, विजयनगर, गुलाबपुरा, नसीराबाद से अजमेर। फिर अजमेर से शुरू होता है, जम्मू काश्मीर का सफर दोपहर दो बजे से। अपना-अपना सामान वगैरह रखने के कुछ समय बाद शुरू हो जाती है फिर से रोचक चुटकुलों की शृंखला, जिसे विराम देते हुए हिन्दी के व्याख्याता शिवदेव जम्मू-प्रदेश की कथा सुनाते है कि कभी महाराज रामचन्द्रजी के वंशज जाम्बूलोचन शिकार के लिए घूमते-घूमते इस प्रदेश की ओर आ निकले थे। जहां एक तालाब पर शेर और बकरी एक साथ पानी पी रहे थे, इस दृश्य से प्रभावित होकर प्रेम से रहने वाली इस जगह की नींव रखी, जो आगे जाकर जंबू या जम्मू के नाम से विख्यात हुआ। (मुझे लगता है कि यह कहानी बहुत पाठकों को मालूम नहीं होगी।) दूसरी खासियत यह भी थी, 1947 में भारत-पाक के विभाजन के दौरान जम्मू-कश्मीर में एक भी व्यक्ति की हत्या नहीं हुई और जम्मू काश्मीर की राजधानी सर्दियों में छः महीने जम्मू और गर्मियों में छः महीने कश्मीर रहती है। जम्मू को मंदिरों का नगर भी कहा जाता है, इसकी जनसंख्या लगभग दस लाख है। भारत के प्रत्येक भाग से जुड़ा हुआ है यह नगर। श्री वैष्णो देवी की यात्रा भी यहीं से शुरू होती है। जम्मू में डोगरा शासन काल के दौरान बने भवनों और मंदिरों में रघुनाथ मंदिर,बाहु फोर्ट, रणवीर केनाल, पटनी टॉप का व्हील रिसोर्ट प्रसिद्ध है। काश्मीर कोई अलग से नगर नहीं है, गुलमर्ग, पहलगाँव, सोनमार्ग सभी काश्मीर के नाम से जाने जाते है। मुगल बादशाह शाहजहां ने काश्मीर की सुंदरता पर कहा था – “अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है,तो यहीं है,यहीं है,यहीं है।”

डल झील में शिकारा पर्यटकों को खूब लुभाते हैं। श्रीनगर का खीर भवानी मंदिर व शंकराचार्य मंदिर भी न केवल विदेशी,बल्कि भारत के लाखों सैलानियों को काश्मीर की ओर खींच लाते हैं। काश्मीर का इतिहास भी भारत के इतिहास की तरह अनेकानेक उतार-चढ़ावों से भरा हुआ है। सर्वप्रथम मौर्यवंश के सम्राट अशोक के अधिकार में जब यह आया तो यहाँ के लोग भी तेजी से बौद्ध धर्म के ओर झुकने लगे,फिर बाद में तातरों और फिर सम्राट कनिष्क के अधिकार में काश्मीर रहा। ऐसा कहा जाता है कि महाराज कनिष्क ने बौद्ध की चौथी सभा कनिष्टपुर काश्मीर में बुलवाई थी। उस समय के प्रसिद्ध पंडित नागार्जुन कश्मीर के हारवान नामक क्षेत्र में रहते थे। काश्मीर के पतन के बाद हूण जाति के मिहरगुल नामक सरदार ने काश्मीर पर आक्रमण किया और यहाँ के निवासियों पर बर्बरतापूर्वक अत्याचार किए। उसकी मृत्यु के बाद इस देवभूमि ने पुनः सुख की सांस ली। आठवीं शताब्दी में ललितादित्य नामक एक शक्तिशाली राजा ने यहाँ राज्य किया। उसके समय में काश्मीर ने विद्या और कला में बहुत उन्नति की। श्री नगर से 64 किलोमीटर दक्षिण की ओर पहलगांव मार्ग पर जीर्ण अवस्था में खड़ा मार्तण्य के सूर्य मंदिर की मूर्तिकला आज भी देखने लायक है,जबकि सिकंदर के मूर्तिभंजकों ने कई महीनों तक इस क्षेत्र को लूटा व नष्ट-भ्रष्ट किया। नवीं शताब्दी में चौदहवीं शताब्दी तक हिन्दू राजाओं का राज्य रहा। सन 1586 में अकबर ने यहाँ के शासक याक़ूब शाह को हटाकर अपने कब्जे में कर लिया। अकबर की मृत्यु के बाद उसके पुत्र व पौत्र जहाँगीर व शाहजहां यहाँ राज्य करते रहे। उन्होंने यहाँ उनके सुंदर उद्यान व भवन बनवाएं। डल झील के आसपास शालीमार,नसीम और निशांत बाग की सुंदरता देखते बनती है। उसके बाद जब औरंगजेब बादशाह बना तो मुगल काल में फिर से अशांति की लहर दौड़ आई। उसने हिंदुओं पर जज़िया कर लगाया और हजारों हिंदुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया। इसके बाद काश्मीर पर आफ़गान अहमदशाह दुरगनी ने अधिकार कर लिया जिसके कुछ समय बाद महाराजा रणजीत सिंह ने इसे अफगानों से छीन लिया फिर काश्मीर सिक्खों के अधीन हो गया। फिर सिक्खों और अंग्रेजों ने जम्मू के डोगरा सरदार महाराजा गुलाब सिंह के हाथों 75 लाख में बेच दिया। उनकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र प्रताप सिंह यहाँ का राजा बना और चूंकि उसके कोई संतान नहीं थी, इसीलिए उसकी मृत्यु के बाद हरी सिंह गद्दी पर आसीन हुआ। यह वही हरी सिंह था,जिसने भारत में काश्मीर के विलय से इंकार कर दिया था और जब 22 अक्टूबर 1947 की पाकिस्तान की सहायता से हजारों कबायली लुटेरे और पाकिस्तान के अवकाश प्राप्त सैनिकों ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया तब उसने 26 अक्टूबर को भारत में विलय होने की संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। तब यह भारत का अटूट अंग बन गया।

चूंकि लेखिका इतिहासकार भी है,अंत जम्मू और काश्मीर के इतिहास की पूरी सटीक जानकारी देकर इस उपन्यास को अत्यंत ही रोचक बना दिया। न केवल उपन्यास के माध्यम से काश्मीर की यात्रा बल्कि सम्राट अशोक के जमाने से देश की आजादी तक के इतिहास को अत्यंत ही मनोरंजन ढंग से प्रस्तुत किया है,जिसे पढ़ते हुए आप कभी भी बोर नहीं हो सकते हो,वरन पीओके (पाक अधिकृत काश्मीर) के जिम्मेदार तत्कालीन भारत सरकार तथा महाराजा हरी सिंह की भूमिका से भी परिचित हो सकते है,जिसकी वजह से 50 -60 हजार वीर सैनिकों को अपनी जान कुर्बान करनी पड़ी। इस प्रकार लेखिका ने हमारी किशोर पीढ़ी को तत्कालीन राजनैतिक व्यवस्था से परिचित कराते हुए अपने कर्तव्य का बखूबी निर्वहन किया है।

चौथे अध्याय ‘जम्मू से गुजरते हुए’ में स्कूली दलों की ट्रेन का जम्मू पहुँचकर कनिष्का होटल में बुक किए हुए कमरों में ठहरकर जम्मू-दर्शन का शानदार उल्लेख है। आठ बजे जम्मू में पहुंचकर ठीक ग्यारह बजे कारगिल जाने वाले दल के सभी सदस्य एक-एककर नाश्ते के लिए होटल के लान में इकट्ठे होने के बाद किराए की टैक्सी पर जम्मू दर्शन के लिए रवाना हो जाते हैं। जीशान द्वारा अपनी डायरी में टैक्सी ड्राइवर का नाम व नंबर लिखता है। कहीं न कहीं लेखिका के अवचेतन मन में आए दिन होने वाली रेप जैसे घटनाओं से छात्राओं को सतर्क रहने की सलाह देना है, कि किसी कठिन समय में यह लिखा हुआ उनके लिए मददगार साबित हो सके। जम्मू-दर्शन का वर्णन लेखिका ने अत्यंत ही सुंदर भाषाशैली में किया है,रघुनाथ मंदिर की भव्य प्राचीन स्थापत्य कला,कई मंदिरों के छोटे-बड़े सफ़ेद कलात्मक ध्वज ,वहाँ की सड़कें, वहाँ की दुकानें,वाहनों की कतारें, फुटपाथिए विक्रेता, बाजार की दुकानों के बाहर का अतिक्रमण, रेस्टोरेंट यहाँ-वहाँ पड़े कचरे का ढेर ...... जहां-जहां लेखिका की दृष्टि पड़ती गई, उन्होंने अपनी नयन रूपी कैमरे ने सारे दृश्य को कैद कर लिया।

इस मंदिर के दर्शन के बाद उनका कारगिल जाने वाला ग्रुप श्रीनगर की ओर सर्पिल चढ़ावदार रास्ते पार करते हुए आगे बढ्ने लगा। रास्ते में कुद पहाड़ पर बना शिव-मंदिर शीतल जल के झरने,देशी घी से बनी मिठाइयों की दुकानें,पटनी टॉप,बनिहाल,पीर-पांचाल पर्वतमाला और उसके बाद आने वाली काश्मीर घाटी की जीवन रेखा ‘जवाहर सुरंग’ का अति-सुंदर वर्णन। यही वह सुरंग है जिसकी वजह से काश्मीर वाला मार्ग सारा साल खुला रहता है। बर्फबारी की वजह से या ग्लेशियर खिसक जाने की वजह से अगर कभी यह रास्ता बंद हो जाता है या वन-वे हो जाता है,तो वहाँ के लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सुरंग के भीतर से गुजरने का रोमांच का कहना ही क्या,जैसे ही टैक्सी की रोशनी गिरती इधर-उधर के चमगादड़ फड़फड़ाकर उड़ने लगते हैं। गाड़ियों के शोर और रोशनी से उनकी शांति भंग होने लगती हैं।

लेखिका जीव-विज्ञानी की विद्यार्थी होने के कारण वह बच्चों की चमगादड़ के बारे में जमाने की उत्सुकता को अत्यंत ही सरल,सहज व वैज्ञानिक दृष्टिकोण से रणधीर जैसे पढ़ाकू चरित्र के माध्यम से सबके सामने रखती है। चमगादड़ दीवारों पर क्यों लटकते है? क्या इनके पंख होते हैं? क्या इन्हें अंधेरे में दिखाई देता है? चमगादड़ के लिए ‘उड़ने वाला स्तनधारी’ जैसे शब्दों के प्रयोग से विज्ञान के प्रति छात्रों में जिज्ञासा पैदा करता है। रात के घुप्प अंधेरे में राडार की तरह काम करने वाले सोनार मंत्र की सहायता से बिना किसी से टकराए किस तरह चमगादड़ अपनी परावर्तित ध्वनि तरंगों से किसी आबजेक्ट की दूरी या साइज का निर्धारण कर लेते हैं। जिस पर आमेजन घाटी जैसी कई कहानियाँ भी लिखी गई है। चमगादड़ छोटे-छोटे कीड़ों फलों के अतिरिक्त मेंढक,मछ्ली,छिपकली छोटी चिड़ियों को खा जाते है और पीने में वे फूलों का परागण चूसते हैं,जबकि अफ्रीका में पाए जाने वाली चमगादड़ मनुष्य का खून चूसते हैं। विज्ञान से संबंधित दूसरी जानकारियों में यह दर्शाया गया है कि चमगादड़ के पंख नहीं होते वह उड़ने का काम अपने हाथ और अंगुलियों की विशेष बनावट से कर पाता है। उनके हाथ के उँगलियाँ बहुत लंबी होती है। उनके बीच की चमड़ी इतनी खींच जाती है कि वह पंख का काम करने लगती है। इसी तरह उनके पैरों की भी विशेषता होती है। इनके पैर गद्देदार होते है। सतह से लगते ही दबाव के कारण उनके बीच निर्वात हो जाता है यानि बीच की हवा निकल जाती है और ये आराम से बिना गिरे उल्टे लटक जाते हैं। इस तरह डॉ॰ विमला भण्डारी ने छात्रों को दृष्टिकोण में वैज्ञानिकता का पुट लाने के लिए जिज्ञासात्मक सवालों के अत्यंत ही भावपूर्ण सहज शैली में उत्तर भी दिए हैं। जैसे-जैसे सुरंग पार होती जाती है, गाड़ी के लोग ऊँघने लगते है। रात को ढाई बजे के आस-पास उधर से गुजरते हुए वर्दीधारी हथियारों से लैस फौजी टुकड़ी बैठते आतंकवाद के कारण मुस्तैदी से गश्त करते नजर आती है। यह पड़ाव पार करते ही उन्हें होटल “पैरेडाइज़ गैलेक्सी” का बोर्ड दूर से चमकता नजर आया।अब वह दल श्रीनगर पहुँच जाता है।

छठवाँ अध्याय श्रीनगर की सुबह से आरंभ होता है। वहाँ बच्चों की मुलाकात होती है,इनायत अली नाम के एक बुजुर्ग से। जब उसे यह पता चलता है कि यह दल 15 अगस्त फौजियों के साथ मनाने के लिए कारगिल आया है तो वह बहुत खुश हो जाता है। कभी वह भी फौज का एक रिटायर्ड़ इंजिनियर था। वह सभी बच्चों को एक एक गुलाब का फूल देता है तथा अपने बगीचे से पीले,हरे,लाल सेव,खुबानी,आड़ू सभी उनकी गाड़ी में रखवाकर अपने प्यार का इजहार करता है,तब तक मिस मेरी सभी बच्चों को कदमताल कराते हुए व्यायाम कराने लगती है। गर्मी पाकर उनकी मांस-पेशियों में खून का दौरा खुलने लगता है। गुलाबी सर्दी में दूध–जलेबी,उपमा,ब्रेड-जाम का नाश्ता कर काश्मीर घूमने के लिए प्रस्थान कर जाती है ।

सातवाँ अध्याय ‘आओ काश्मीर देखें’ में काश्मीर में दर्शनीय व पर्यटन स्थलों की जानकारी मिलती है। कभी जमाना था की मुगल बादशाह काश्मीर के दीवाने हुआ करते थे। जहांगीर और शाहजहाँ के प्रेम के किस्सों की सुगंध काश्मीर की फिज़ाओं में बिखरी हुई मिलती है।जहांगीर अपनी बेगम नूरजहां के साथ 2-3 महीने शालीमार बाग में ही गुजारता था और शाहजहां अपने बेगम मुमताज़ महल के साथ चश्मेशाही की सैर करता था। इस तरह यह स्कूली दल पहलगाँव, डल झील, मुगल बागों में चश्मे-शाही बाग, शालीमार बाग, नेहरू पार्क, शंकराचार्य मंदिर सभी पर्यटनों स्थलों का भ्रमण करता है। शिकारा, हाउसबोट की नावें झेलम नदी पर बने सात पुल, डल झील के अतिरिक्त नगीन झील,नसीम झील और अन्वार झील जैसे सुंदर झीलों का भी आनंद लेते है। इतनी सारी झीलें होने के कारण ही काश्मीर को ‘झीलों का नगर’ कहा जाता है। जिज्ञासु छात्र अपनी डायरी में पर्यटन स्थलों का इतिहास लिखने लगते हैं,उदाहरण के तौर पर चश्मेशाही को 1632 में शाहजहाँ के गवर्नर अली मरदान ने उसे बनवाया और बाग के बीच में एक शीतल जल का चश्मा होने के कारण उसे ‘चश्मेशाही’ के नाम से जाना जाता है। काश्मीरी कढ़ाई की पशमिजा शॉल दस्तकारी के उपहार देखकर सभी का मन उन्हें खरीदने के लिए बेचैन होने लगता है। ‘शिकारों’(नौका) में भी चलती-फिरती दुकानें होती है,जिसमें आकर्षक मोतियों की मालाएँ, केसर,इत्र जैसी चीजें मिलती है। वे लोग काश्मीर में पूरी तरह से घूम लेने के बाद वे दूसरे दिन कारगिल की और रवाना होते हैं 

अगले अध्याय में जोजिला पॉइंट की दुर्गम यात्रा का वर्णन है। ऊंची-ऊंची पहाड़ियों के दुर्गम रास्तों को पारकर यह यात्री-दल जोजिला पॉइंट पर पहुंचता है। इस यात्रीदल का नामकरण अनन्या करती है,जेम्स नाम से;पहला अक्षर ‘जी’ गोविंद दास स्कूल के लिए,‘एम’ महाराणा फ़तहसिंह स्कूल और अंतिम अक्षर ‘एस’सेवा मंदिर स्कूल के प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए। सुबह-सुबह उनकी यात्रा शुरू होती है। मगर बाहर कोहरा होने के कारण अच्छी सड़क पर भी गाड़ी की रफ्तार कम कर हेड लाइट चालू कर देते है थोड़ी दूर तक कोहरे की धुंध को चीरने के लिए। चारों तरफ धुंध ही धुंध,आसमान में सिर उठाए बड़े पहाड़, उनके सीने पर एक दूसरे से होड़ लेते पेड़,गाड़ी के काँच पर पानी की सूक्ष्म बूंदें अनुमानित खराब मौसम का संकेत करती है। ऐसे मौसम में भी यह कारवां आगे बढ़ता जाता हैं, बीच में याकुला, कांगन व सिंधु आदि को पार करते हुए। गाड़ी से बाहर नजदीकी पहाड़ों पर चिनार के पेड़ की लंबी कतार देखकर ऐसा लग रहा था मानो कोई तपस्वी आपने साधना में लीन हो या फिर प्रहरी मुस्तैदी से तैनात हो, दूर-दूर तक छितरे हुए आकर्षक रंगों वाले ढालू छतों के मकान घुमावदार सड़कों को पार करते हुए जम्मू काश्मीर के सबसे ऊंचे बिन्दु (समुद्र तल से 11649 फिट अर्थात 3528 मीटर ) . जोजिला पॉइंट पर आखिरकर यह यात्रीदल पहुँच जाता है। यहाँ पहुँच कर रणधीर बताता है कि समुद्र-तल से जब हम 10,000 फीट की ऊंचाई पर पहुँच जाते हैं तो वहाँ में आक्सीजन कि कमी होने लगती है,इस वजह से कुछ लोगों को सांस लेने में तकलीफ होने लगती है, दम घुटता है, सिरदर्द होने लगता है। इस तरह इस उपन्यास में लेखिका ने हर कदम पर जहां वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जरूरत महसूस हुई है,वहाँ उसे स्पष्ट करने में पीछे नहीं रही है। यहाँ तक कि ग्लेशियर,लैंड स्लाइडिंग के भौगोलिक व भौगर्भीक कारणों आदि के बारे में भी उपन्यास के पात्रों द्वारा पाठकों तक पहुंचाने का भरसक प्रयास किया है। बीच रास्ते में वे लोग सोनमर्ग तक पहुँचते हैं,जहां मौसम खुल जाता है। नीले आसमान में छितराए हुए सफ़ेद बादलों की टुकड़ियाँ इधर-उधर तैरती हुई नजर आने लगती है। दूर-दूर तक फैले घास के मैदानों में इक्के-दुक्के खड़े पेड़ मनोहारी लगने लगते हैं। कलकल बहती नदिया,ठंडा मौसम,ठिठुराती हवा काश्मीर घाटी के सोनमर्ग को स्वर्ग तुल्य बनाती हुई नजर आती है। वहीं से थोड़ी दूर थाजवास ग्लेशियर, मगर एकदम सीधी चढ़ाई। घोड़ों से जाना होता है वहाँ। यहां पहुँचकर हिन्दी शिक्षिका रजनीसिंह काश्मीर यात्रा के दौरान लिखी अपनी कविता सुनाती है। सभी लोग तालियों से जोरदार स्वागत करते हैं। फिर कैमरे से एक दूसरे के फोटो खींचना तथा एक दूसरे पर बर्फ के गोले फेंककर हंसी मज़ाक करना जेम्स यात्रीदल के उत्साह को द्विगुणित करता है।

सोनमर्ग की यात्रा के बाद यह दल कारगिल की घाटी से गुजरने लगता है। दोनों किनारों में पहाड़ी काटकर यह रास्ता बनाया गया। आड़े घुमावदार सड़कों का लुकाछिपी खेल, भूरे-मटमैले पहाड़ों पर फैले-पसरे ग्लेशियर, वहाँ की नीरवता,वनस्पति का दूर-दूर तक नामों निशान नहीं, पक्षियों की चहचहाहट तक नहीं-यह था कारगिल की घाटी का परिचय। ऐसे खतरनाक रास्ते से पार करते समय उन्हें सांस लेने में सभी को तकलीफ होने लगती हैं। जाते समय रास्ते में उन्हें सैनिकों का एक रेजीमेंट तथा स्मारक स्थल दिखाई देता है। जोजिला दर्रे के आसपास की सड़क दुनिया की सबसे खतरनाक सड़कों में से एक है, यह बात का रणधीर जोजिला पास के यू-ट्यूब में वीडियो देखकर रहस्योद्घाटन करता है। देखते-देखते वे अपने जीवन की सबसे ऊंचाई वाले स्थान जोजिला पॉइंट पर पहुँच जाते हैं। इस खूबसूरत लम्हे को सभी अपने कैमरे में कैद करने लगते है। कृपलानी सर अत्यंत खुश होते है कि किसी को ‘एलटीट्यूड इलनेस’ की परेशानी नहीं हुई। अब यह दल द्रास की ओर बढ़ता है, जो सोनमर्ग से 62 किलोमीटर तथा कारगिल से 58 किलोमीटर पर है। यह दुनिया की दूसरी सबसे ज्यादा ठंडी जगह है। स्विट्जरलैंड के बाद द्रास का नंबर आता है। द्रास की तरफ जाते समय रास्ते में एक पवित्र कुंड नजर आता है, जिसके बारे में कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान द्रौपदी के नहाने और शिवपूजन के लिए अर्जुन ने बाण से पृथ्वी को भेद कर पानी के फव्वारे से इस कुंड का निर्माण किया था। इस पवित्र जगह का पानी पिलाने से निसंतान महिला को संतान प्राप्ति हो जाती है,ऐसी मान्यता है। इस कुंड को द्रौपदी कुंड के नाम से जाना जाता है। इस कुंड को पार कर जब यह कारवां आगे बढ़ता है तो सामने शहीद सैनिकों की याद में बनाया हुआ एक चौकोर आयताकार स्मारक नजर आता है, जिस पर पाकिस्तान के हमले के दौरान कारगिल युद्ध में शहीद हुए सेना के कुछ जवानों के नाम पद व विवरण लिखा हुआ है। चबूतरे के मध्य में खड़ी बंदूक पर सैनिक टोपी लगी हुई है। इस स्थल पर शहीद सैनिकों को भावभरी श्रद्धांजलि देते “कुछ याद उन्हें भी कर लो जो लौट कर घर ना आए” की पंक्तियाँ याद आते ही सभी की आँखें नम हो जाती है। लगभग 6-8 किलोमीटर आगे चलने के बाद भारत सरकार द्वारा कारगिल युद्ध के शहीदों की याद में बनवाया शहीद स्मारक व स्मारक का उद्यान दिखाई देने लगता है। अंदर जानेवाले रास्ते पर लोहे की बड़ी फाटक लगी हुई है। इस जगह पर इस यात्री दल का 15 अगस्त शाम को पहुँचने का निर्धारित कार्यक्रम है। सामने तलछटों से बनी आकृतियाँ वाले भूरे पहाड़,जिन पर पीली,लाल,काली रंग की करिश्माई रेखाओं के निशान बने हुए है। इन्हें ‘फोसिल्स’ के पहाड़ कहते है। इन पर वनस्पति का नामोनिशान नहीं, केवल शीशे की धातु जैसे चमकीले पथरीले पहाड़। सभी ने वहाँ फोटोग्राफी की और लक्ष्यानुसार सूर्यास्त से पहले कारगिल पहुँच गए। कारगिल में यह यात्रीदल 14 अगस्त को पहुँच जाता है। कारगिल शहर की अच्छी चौड़ी सड़कों को पार करते पतली सड़क की ओर से लगभग दो घंटों तक पहाड़ी वादियों में गुजरने के बाद एक बस्ती में उतरकर वे स्थानीय निवासियों से मिलने लगते हैं। सामने फिर ग्लेशियर नजर आने लगते है। हँसते-खिलखिलाते पहाड़ी चट्टानों पर बैठे प्राकृतिक आनंद के क्षणों को भी प्रकृति के साथ अपने कैमरे में कैद करते जाते है वे। 15 अगस्त को सभी अपने स्कूल ड्रेस पहनकर बटालिका जाने के लिए तैयार हो जाते है और सेना की छोटी गाडियों में बैठकर सैनिक छावनी पहुँच जाते हैं। जहां वर्दी में खड़े सैनिक दिखाई पड़ते हैं और सड़क के किनारे से जुड़ी सफ़ेद मुंडेर हरी सीढ़ियों की ओर बने चौकोर चबूतरे के बीच में लोहे के लंबे पाइप के ऊपरी सिरे पर बंधे तिरंगे झंडे, सीढ़ियों के दोनों तरफ गेंदे और हजारी के फूलों की क्यारियाँ, सामने अग्नि-शमन के उपकरण, ऊंची-ऊंची पहाड़ियाँ और वहाँ से दिखाई देने वाले पेड़ों के झुरमुट देखकर सभी के चेहरे खुशी से चमकने लगते है। मिस मेरी से कमांडर चीफ का परिचय व बातचीत होने के बाद आगामी कार्यक्रम की रूपरेखा पर संक्षिप्त में चर्चा की जाती है। मंच पर लगी कुर्सियों में अतिथियों के विराजमान होने के बाद कमांडर चीफ ने मिस मेरी को झंडे के नीचे इशारा करके बुलाया और राइफल धारी सेना की टुकड़ी झंडे की तरफ मुंह करके कतारें विश्राम की मुद्रा में खड़ी थी। बीच-बीच वाद्यमंत्र से सजे तीन जवान खड़े थे और ध्वज के नीचे दोनों और गार्ड। सभी बैठे लोगों का खड़ा होने का आदेश मिलता है। कमांडर ने सभी को सावधान किया और पलक झपकते ही स्तंभ पर बंधी डोरी को जैसे ही खींचता है,वैसे ही फूलों की बौछार के साथ तिरंगा हवा में लहरा उठता है और राष्ट्रगान "जन गण मन ...... " वाद्ययंत्रों की धुन के साथ गूंजता है। राष्ट्रगान के खत्म होते ही कमांडर के आदेश पर सेना की टुकड़ी कदमताल करती हुई तिरंगा झंडा को सलामी देने लगती है, जयहिंद के नारों से बट्टालिका घाटी गुंजायमान हो उठती है। अनन्या अपने दल का नेतृत्व करते परेड के साथ आगे बढ़ते हुए, रणधीर अनन्या के पीछे हाथ में ध्वज लिए और उसके बाद अगली पंक्ति में जुनेजा बिगुल बजाते हुए। सभी परेड करते हुए। जैसे ही यह दल ध्वज के नीचे पहुंचता है तो अनन्या सीढी चढ़कर चीफ के पास जाकर सैल्यूट करती है और चीफ भी बदले में जवाबी सैल्यूट। फिर सेआ राइफलों की गूंज के साथ जयहिंद की आवाज घाटी में गूंज उठती है। सभी के लिए यह दृश्य अत्यंत ही रोमांचक होता है, देश-भक्ति की भावना सभी के चेहरों पर दिखाई देने लगती हैं। साथ ही साथ समूह-गान ‘सारे जहां से अच्छा, हिंदुस्तान हमारा ... ‘ शुरू होता है। चीफ कमांडर सभी को संबोधित करते है। सम्बोधन के बाद सभी को चाय नाश्ते का आमंत्रण मिलता है। लड़के अपनी डायरी में सैनिकों के आटोग्राफ लेते हैं और लड़कियों फौजी भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर कुमकुम से तिलक लगाकर उनका मुंह मीठा करती है। बाजू में एक प्रदर्शनी हाल है, जिसे देखने के लिए जेम्स यात्रीदल आगे बढ़ता है। पास में ही बायीं ओर मेजर शैतान सिंह की काले संगमरमर की फूलमाला पहनी हुई प्रतिमा,जिसके नीचे अँग्रेजी में लिखा हुआ था मेजर शैतान सिंह,पी॰वी॰सी। दूसरी लाइन में लिखा था, 1 दिसंबर 1924 से 18 नवंबर 1962। आखिरी लाइन में प्रेजेंटेड बाय श्री मोहनलाल सुखाडिया द चीफ मिनिस्टर ऑफ राजस्थान आन 18 नवंबर 1962। सभी ने राजस्थान के महान सपूत की प्रतिमा को माला पहना कर नमन किया और उसके बाद सभी कतारबद्ध प्रदर्शनी हाल में प्रविष्ट हुए जहां शहीद हुए जवानों की खून सनी सैन्यवर्दी,हथियार,युद्ध में काम आने वाले गोले सभी को काँच के बने संदूकों व आलमीरा में पूरे वितरण के साथ रखा हुआ था। भारत चीन युद्ध के श्वेत-श्याम छायाचित्र भी टंगे हुए थे। कुछ मानचित्र भी लटके हुए थे। वहाँ से बाहर निकलकर भारत नियंत्रण रेखा को नमन करते हुए अपनी अपनी गाड़ियों में बैठकर वे सभी विदा लेकर दूसरा पड़ाव शुरू करते है।

ग्यारहवाँ अध्याय में द्रास में बने कारगिल के शहीद स्मारक का जिक्र है। जेम्स यात्रीदल कारगिल की होटल ग्रीनपार्क को खाली कर फिर से अपनी गाड़ी में सवार होकर वापसी के लिए निकल पडते है। 15 अगस्त के शाम उन्हें कारगिल में शहीद हुए वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि भी देनी हैं। सूर्यास्त होते-होते बावन किलोमीटर की दूरी तय अपने लक्ष्य स्थल शहीद स्मारक पर वे पहुँच जाते है। उधर सामने की पहाड़ियों में लंबे पतले स्तम्भ पर राष्ट्रीय ध्वज शान से फहरा रहा था । पहाड़ी पर लिखा हुआ था टोलोलिंग। शायद यह पहाड़ी का नाम होगा। स्मारक के बाईं ओर हेलिपेड़ बना हुआ था और स्मारक की बाहरी दीवार पर बोर्ड बना हुआ था जिस पर लिखा हुआ था आपरेशन विजय। यह उन शहीदों को समर्पित था, जिन्होंने हमारे कल के लिए अपना आज न्यौछावर कर दिया। जीओसी 14 कॉर्प ने ने उसे बनवाया था। युवा नायाब सूबेदार ने जेम्स यात्रीदल को यह स्मारक दिखाते हुए कहा – शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मिटने वालों का बाकी यही निशान होगा। आपरेशन विजय लिखे हुए स्मारक स्थल के चौकोर पत्थर के चबूतरे के बीच काँच की पारदर्शी दीवार के भीतर बीचो-बीच अमर ज्योति जल रही है और नीचे राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त की प्रसिद्ध कविता की पंक्तियाँ खुदी हुई है –

मुझे तोड़ लेना वनमाली,उस पथ पर देना तुम फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने,जिस पथ जाए वीर अनेक ।

यहाँ सभी खड़े होकर सुर में ‘ए मेरे वतन के लोगों’ गीत गाने लगे। यह गीत सुनकर सभी के रोंगटे खड़े हो जा रहे थे। इस गीत को 1962 में भारत चीन के युद्ध के दौरान कवि प्रदीप ने लिखा था,जिसे स्वर दिए लता मंगेशकर ने। सूबेदार दिलीप नायक ने बताया कि दो महीने से ज्यादा चले कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को मार भगाया था और अंत में 26 जुलाई को आखिरी चोटी भी जीत ली गई थी। इस दिन को ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। यहाँ फहरा रहे झंडे के बारे में बताते हुए भारत के राष्ट्रीय फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कमांडर (रिटायर्ड) के॰वी॰सिंह के अनुसार यह झण्डा 37 फुट लंबा,25 फुट चौड़ा,15 किलोग्राम वजन का है और जिस पोल पर यह फहरा रहा है उसका वजन तीन टन और लंबाई 101 फुट है। दिलीप नायक कारगिल युद्ध कि विस्तृत जानकारी देते है। दूर पहाड़ों की तरफ इशारा करते हुए उसने बताया कि वह टाइगर हिल है जिसे हमने जीता। आज भी हमारे सैनिक वहाँ पहरा देते है और रक्षा कर रहे है। सर्दी में वहाँ का तापक्रम-60 सेल्सियस रहता है। ऐसे में वहाँ रहकर काम करना आसान नहीं होता है। टाइगर हिल की छोटी-छोटी चोटियों को वे लोग ‘पिंपल्स’ कहकर पुकारते है। पास में एक प्रदर्शनी कक्ष भी बना हुआ था जिसमें परमवीर चक्र और वीर चक्र पाने वाले शहीदों के फोटोग्राफ लगे हुए थे, युद्ध स्थल का काँच की पेटी में रखा गया एक पूरा मॉडल, दूसरी तरफ सैन्य टुकड़ियों (13जेएके आरआईएफ़,2 आरएजे आरआईएफ़ ) की स्थिति का नामांकन, हाथ से गोले फेंकने वाले सैनिकों की तस्वीर तथा हरिवंश बच्चन की हस्त लिखित कविता ‘अग्निपथ!अग्निपथ!' रखी हुई थी। ये सारी चीजें जीवंत देखना जेम्स यात्रीदल के लिए किसी खजाने से कम नहीं था। कुछ समय बाद वे लोग द्रास पहुँच जाते हैं।

द्रास से वे लोग श्रीनगर पहुंचते है, जहां पहुँचकर शंकराचार्य मंदिर के दर्शन और हाउसबोट में रात्री विश्राम करना था। मगर वापसी के व्यस्त कार्यक्रमों के कारण वे गुलमर्ग नहीं देख पाते है। जेम्स यात्रीदल लेह-लद्दाख देखने के चक्कर में घर लौटना नहीं चाहते hain। जोगेन्दर भी घर जाना नहीं चाहती है। बातों-बातों में पता चला कि जोगेन्दर के माता-पिता दोनों हो इस दुनिया में नहीं है। दिल्ली में हुई दंगों के दौरान दोनों को ही दंगाइयों ने मार दिया था। यहाँ लेखिका ने देश में व्याप्त आतंकवाद के कारण होने वाले दुष्परिणामों के प्रति पाठकों को आगाह किया है कि वे इस उपन्यास को पढ़ते-पढ़ते जोगेन्दर जैसे मासूम बच्ची की मानसिक अवस्था से भी परिचित हो सकें।किस तरह आतंकवाद हमारे देश को और हमारे देश के बचपन को खोखला बना रहा है,इससे ज्यादा और क्या क्रूर उदाहरण हो सकता है। घर जाने के नाम से सभी के चेहरे पर उदासी देखकर कृपलानी सर सोनमार्ग में सभी को रिवर राफ्टिंग दिखलाने का निर्णय लेते है। रिवर राफ्टिंग के दौरान आपातकालीन अवस्था में रेसक्यू बैग, फ्लिप लाइन, रिपेयर किट, फर्स्ट-एड-किट जैसी चीजों के प्रयोग के बारे में सभी को बताया जाता है। पंद्रह-बीस साल पुराने खेल रिवर-राफ्टिंग की तेजी से बढ़ रही लोकप्रियता के कारण इसे ऋषिकेश के पास गंगा नदी जम्मू-कश्मीर की सिंध और जांसकर, सिक्किम की तीस्ता आदि और हिमाचल प्रदेश की बीस नदी पर खेला जा रहा है। बहुत ही रोमांचक खेल है यह! रिवर राफ्टिंग का मजा लेने के बाद शाम के उजाले-उजाले में उनकी गाड़ी श्रीनगर के शंकराचार्य के मंदिर के तरफ चली जाती है। इस मंदिर को तख्ते-सुलेमान भी कहा जाता है। लगभग साढ़े तीन किलोमीटर की चढ़ाई पार कर शिवलिंग के दर्शन के बाद मंदिर के परिसर में घूमते-घूमते श्रीनगर के सुंदरों नजारों जैसे डल झील और झेलम नदी को देखने लगते है। इस मंदिर की नींव ई 200 पूर्व ॰ के सुपुत्र महाराज जंतुक ने डाली थी। वर्तमान मंदिर सीख राजकाल के राज्यपाल की देन है। यह डोरिक पद्धति के आधार पर पत्थरों से बना हुआ है। रात को कार्यक्रम के अनुसार इस दल ने ‘पवित्र सितारा’ हाउस बोट में विश्राम लेने के लिए सभी ने अपना आवश्यक सामान लेकर शिकारा में बैठ गए। हाउस बोट के अंदर और बाहर की सुंदरता देखकर वे लोग विस्मित हो गए। खूबसूरत मखमली कालीन,नक्काशीदार फर्नीचर,शाही सोफा,बिजली के सुंदर काँच के लैंप,झूमर, झिलमिलाते बड़े बड़े दर्पण सबकुछ नवाबी दुनिया जैसा लग रहा था। इस यात्रा दल ने अलग-अलग स्थिति,जगह और धर्म के लोगों के साथ इतना दिन इस तरह गुजारे जैसे सभी एक ही परिवार के सदस्य हो। एक दूसरे से भावुकतावश गलवाहिया करते,फोटो खींचते यह कारवां अपने घर जाने के लिए रवाना हो गया, अपनी गाड़ी को जम्मू में छोडकर अगला सफर रेल से करने के लिए।

जैसे ही सभी बच्चे अपने घर पहुँचते हो तो बच्चों की परिजनो में खुशी की लहर दौड़ जाती है। सभी अपने-अपने बच्चों को लपककर गले लगा देते हैं। सब अपनी-अपनी ट्रिप की बातें सुनाने लगे तथा वहाँ से खरीदे गए उपहार अपने माता-पिता तथा सगे-संबंधियों को देने लगे। अनन्या ने तो अपने लिए कुछ न खरीदकर घरवालों के लिए बहुत सारे उपहार खरीदे,इस प्रकार घर का माहौल कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गया। यू-ट्यूब और इन्टरनेट के जरिए एक दूसरे को आपने घूमे हुए जगह को दिखाने लगे कि जोजिला पास का रास्ता कितना खतरनाक था और पहाड़ी रास्तों पर फौज के सिपाही किस मुस्तैदी से निर्भयतापूर्वक काम कर रहे थे? टाइगर हिल के दृश्य और वहाँ के सारे संस्मरण दूसरे को सुनाने लगे।

इस उपन्यास का अंतिम अध्याय सबसे बड़ा क्लाइमेक्स है।हल्दीघाटी के संस्कारों से सनी यह यात्रा कारगिल की घाटी में जाकर समाप्त होती है और खासियत तो यह है कि कारगिल की घाटी में शहीद हुए परम वीर चक्र मेजर शैतान सिंह को हल्दीघाटी की संतति राजस्थान के मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया द्वारा उनके स्मारक का विधिवत उदघाटन होता है। कारगिल घाटी और हल्दीघाटी के उन पुरानी वीर स्मृतियों को फिर से एक बार ताजा करने में इस उपन्यास ने सेतु-बंधन के रूप में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है,जो लेखिका के कार्य और इसके पीछे की पृष्ठभूमि की महानता को दर्शाती है। उदयपुर शहर के विख्यात सुखाडिया मंच के सभागार में सिटी क्लब द्वारा आयोजित वार्षिकोत्सव में कारगिल की ट्रिप करके लौटे बच्चे विशेष आकर्षण के तौर पर आमंत्रित किए जाते है। सर्वप्रथम इस यात्रीदल का परिचय देने के उपरांत उनके टीम इंचार्ज कृपलानी सर, टीम गार्जिन मिस मेरी तथा रजनीसिंह मैडम का स्वागत किया जाता है। उन्होंने अपने उद्बोधन में क्लब के इस पुनीत कार्य की प्रशंसा करते हुए बालकों को कम उम्र में देश के प्रति जोड़ने तथा उनमें राष्ट्र प्रेम जगाने वाले इस पदक्षेप की भूरि-भूरि सराहना की। फिर सारे प्रतिभागी बच्चों को अपनी स्कूल यूनिफ़ोर्म पहने मंच पर बुलाया जाता है,अपने-अपने संस्मरण सुनाने के लिए। सबसे पहले दल की लीडर अनन्या ने मंचासीन अतिथियों का प्रणाम कर कहना शुरू किया, “हमने ऐसे जगहों का दौरा किया,जहां कारगिल की युद्ध लड़ा गया। कौन भारतीय इससे परिचय नहीं होगे? जब भारत और पाकिस्तान की नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान घुसपैठियों ने 1999 में कारगिल क्षेत्र की 16 से 18 हजार फुट ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा जमा किया था और फिर श्रीनगर लेह की ओर बढ़ने लगे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार वे इन घुसपैठियों के विरुद्ध ‘आपरेशन विजय’ के तहत कार्यवाही की। इसके बाद संघर्षों का सिलसिला आरंभ हो गया। यह कहते-कहते भारतीय सेना की सारी रणनीति का उल्लेख करते हुए (भारतीय सेना के सबसे कम उम्र वाले वीर योद्धा जिसे परमवीर चक्र प्राप्त हुआ) जांबाजी की खूब तारीफ की। भावुकतावश उसकी आँखों में आँसू निकल आते है और वह आगे कुछ नहीं बोल पाती है। इसी तरह जीशान ने काश्मीर के इतिहास,होटल मालिक इनायत की मोहब्बत,बटालिका की सैनिक-छावनी तथा नायाब दिलीप नायक का शेर, "शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर साल मेले" सुनाते हुए सभी में देशप्रेम की भावना की उद्दीप्त कर देता है। इसके बाद श्रद्धा ने मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘चाह नहीं,मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ’ तो देवयानी ने सोनमार्ग की रिवर-राफ्टिंग, तो सानिया ने अभिभावकों से बच्चों को ऐसे आयोजन में भाग लेने की अनुमति देने, जोगेन्दर ने आतंकवादियों द्वारा अपने माता-पिता की हत्या पर विक्षुब्धता जताते हुए शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि प्रदान करते और अंत में रणधीर ने कारगिल युद्ध के तीनों चरणों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए टाइगर हिल पर फहरा रहे तिरंगा झंडे की याद दिलाकर सभी से जाति-धर्म से ऊपर उठकर देश की रक्षार्थ आगे आने का आह्वान किया जाता है। इस प्रकार सभी बच्चों का संस्मरण ने सभागार में एक पल के लिए खामोशी का माहौल पैदा कर देते हैं, राष्ट्र के समक्ष आतंकवाद महजबी खतरों से लिपटने के लिए कुछ प्रश्नवाचक छोड़ते हुए। ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ कहकर अंत में सिटी क्लब ने अध्यक्ष सहित सभी मंचस्थ अतिथियों ने जाति-धर्म के नाम पर दंगे न होने देने की शपथ लेते है व सभी शहरवासियों को इसमें सहयोग करने की शपथ दिलाते है। राष्ट्रगान की गूंज पर सभागार में उपस्थित सभी दर्शकगण खड़े हो जाते है।

इस तरह लेखिका ने अपने उपन्यास को चरम सीमा पर ले जाकर पाठको के समक्ष समाप्त करती है। मेरी हिसाब से यह उपन्यास केवल किशोर उपन्यास नहीं है, वरन हर देशभक्त के लिए पठनीय,स्मरणीय व संग्रहणीय उपन्यास है। इस उपन्यास में तरह-तरह की रंग बिखरे हुए हैं, बाल्यावस्था से बच्चों में देश-प्रेम के संस्कार पैदा करना,अद्भुत यात्रा-संस्मरण, सैनिक छावनियों व प्रदर्शनियों का वर्णन,कारगिल युद्ध की परिस्थितियों का आकलन, जम्मू-कश्मीर का सम्पूर्ण इतिहास का परिचय,देशभक्ति से ओत-प्रोत गाने,बाल सुलभ जिज्ञासा,वैज्ञानिक दृष्टिकोण सबकुछ समाहित है। इस उपन्यास की विकास-यात्रा पाठकों की चेतना को अवश्य स्पंदित करेगी। मैं अवश्य कहना चाहूँगा कि ‘कारगिल की घाटी’ उपन्यास में देश-प्रेम के जज़्बात,यात्रा संस्मरणों कि विविधता, संवेदनशीलता की शक्तिशाली धारा प्रवाहित होती हुई नजर आती है। ऐतिहासिक व सैद्धान्तिक रूप से वर्तमान युग की सच्चाई की व्याख्या की जरूरत आज के समय हमें राष्ट्रीय, सामाजिक और मानवीय स्तरों पर झेल रहे चहुंमुखी समस्याओं में आतंकवाद,सांप्रदायिकता और धर्मांधता से मुकाबला करना अनिवार्य है। भारत पाकिस्तान के बिगड़ते सम्बन्धों द्वारा निर्मित भयानक और आतंकपूर्ण माहौल में मानवीय संवेदनशीलता के बचे रहने या उसकी पहचान करने की कसौटी की तलाश में डॉ॰ विमला भण्डारी का यह उपन्यास एक अहम भूमिका अदा करता है। मैं इतना कह सकता हूँ कि हिन्दी उपन्यास लेखन के इस दौर में लेखिका ने समय की मांग के अनुरूप यथार्थ को प्रस्तुत करके नई गरिमा और ऊंचाई को हासिल किया है। एक और उल्लेखनीय बात यह है कि इस उपन्यास में कोई राजनैतिक पात्र नहीं है, मगर तीन स्कूलों के सामूहिक यात्रीदल जेम्स को देश की एकता और समाज माध्यम के भविष्य की चिंता का अंकुर देश के भावी कर्णधारों में बोकर देश-प्रेम की जो अलख जगाई है, वह चिरकाल तक जलती रहेगी। लेखिका में एक ऐसी प्रतिभा का विस्फोट हुआ है, जो कभी देश की आजादी से पूर्व देशभक्त,उपन्यासकार,कवियों,समाज सुधारकों जैसे प्रेमचंद्र,शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय, बंकिम चन्द्र बंदोपाध्याय, रवींद्र नाथ टैगोर,स्वामी दयानंद सरस्वती में पैदा हुई। मैं विश्वास के साथ यह कह सकता हूँ कि हिन्दी जगत में यह उपन्यास बहुचर्चित होगा और एक अनमोल कृतियों में अपना नाम दर्ज कराएगा।

.

image

प्रमोद भार्गव

भूकंप के बारे में और अधिक जानकारी पाने के लिए इस कड़ी पर जाएँ - http://vigyanvishwa.in/2015/04/27/earthquack/

        बिना आहट के इतने बड़े इलाके में भूकंप आना और पल भर में तबाही मचा जाना,इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक आपदाओं के आगे इंसान मजबूर है। 25 अप्रैल शनिवार 2015 को नेपाल में आए विनाशकारी जलजले के प्रवह में देखते-देखते ढाइ़ हजार से भी ज्यादा लोगों की जीवन-लीला खत्म हो गई। भारत में भी 40 लोग मारे गए। तूफान का असर नेपाल, चीन, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत में देखने में आया है। इससे पहले इतने बड़े भू-क्षेत्र में पहले कभी धरती नहीं डोली। इससे साफ होता है कि,वे सब क्षेत्र भूकंप के दायरे में हैं,जिनकी जानकारी भू-गर्भ वैज्ञानिक पहले ही दे चुके हैं। बावजूद हैरानी यह है कि इस भूकंप की पूर्व से भनक दुनिया के किसी भी भूकंप मापक यंत्र पर नहीं हो पाई ? जबकि नेपाल में राजधानी काठमांडू के ईद-गिर्द आए तूफान की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 7.9 आंकी गई है। भूकंप की यह तीव्रता और इससे पहले उत्तराखंड व जम्मू-कश्मीर में आई भीषण बाढ़ें इस बात का संकेत हैं कि असंतुलित विकास से उपजे जलवायु परिवर्तन के संकट ने पूरी हिमालय पर्वतमाला में भूकंप का बीजारोपण कर दिया है। इस तबाही के संकेत सामने आने लगे हैं। इन  सबूतों ने तय कर दिया है कि चुपचाप आया पल भर का प्रलय विनाश का कितना बड़ा कारण बन सकता है।
    भूकंप आना कोई नई बात नहीं है। भारत और नेपाल समेत पूरी दुनिया धरती के इस अभिशाप को झेलने के लिए विवश होती रही है। बावजूद हैरानी में डालने वाली बात यह है कि दुनिया के वैज्ञानिक आजतक ऐसी तकनीक ईजाद करने में असफल रहे हैं,जिससे भूकंप की पहले ही जानकारी हासिल कर ली जाए। भूकंप के लिए जरूरी ऊर्जा के एकत्रित होने की प्रक्रिया को धरती की विभिन्न परतों के आपस में टकराने के सिंद्धात से आसानी से समझा जा सकता है। ऐसी वैज्ञानिक मान्यता है कि करीब साढ़े पांच करोड़ साल पहले भारत और आस्ट्रेलिया को जोड़े रखने वाली भूगर्भीय परतें एक-दूसरे से अलग हो गईं और वे यूरेशिया की परत से जा टकराईं। इस टक्कर के परिणामरूवरूप हिमालय पर्वतमाला अस्तित्व में आई और धरती की विभिन्न परतों के बीच वर्तमान में मौजूद दरारें बनी। हिमालय पर्वत उस स्थल पर अब तक अटल खड़ा है,जहां पृथ्वी की दो अलग-अलग परतें एक दूसरे से टकराकर घुस गई हैं। परतों के टकराने की इसी प्रक्रिया की वजह से हिमालय और उसके प्रायद्वीपीय क्षेत्र में भूकंप आते रहते हैं। आधुनिकतम तकनीकी उपकरणों के माध्यम से परतों की गति मापने से पता चला है कि भारत और तिब्बत एक-दूसरे की ओर दो सेंटीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से खिसक रहे हैं। नतीजतन इस प्रक्रिया से हिमालय क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है। इस दबाव के प्रवाह को बाहर निकालने का प्रकृति के पास एक ही मार्ग है,और वह है भूकंप।. 
    एशिया के हिमालय प्रायद्वीपीय इलाकों में बीते सौ वर्ष से धरती के खोल की विभिन्न दरारों में हलचल जारी है। हालांकि वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि सामान्य तौर पर भूकंप 13 साल में एक बार आता है। लेकिन अब यह धारणा खंडित हो रही है। जबलपुर में 1997 में भूकंप आया और इसके ठीक 4 साल साल बाद गुजरात के कच्छ में भूकंप ने जबरदस्त तबाही मचाई थी। हालांकि नेपाल में इस तूफान के पहले 1934 में बिहार-नेपाल की सीमा पर तूफान आया था। अमेरिका की प्रसिद्ध 'सांइस' पत्रिका ने कुछ वर्ष पहले भाविष्यवाणी कि थी कि अभी हिमालय के क्षेत्र में एक भयानक भूकंप आना शेष है। यदि यह भूकंप आया तो यह 5 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को प्रभावित करेगा। जिसमें करीब 2 लाख लोग मारे जाएंगे। हालांकि पत्रिका ने इस अनुमानित भूकंप के क्षेत्र,समय और तीव्रता सुनिष्चित नहीं किए है,लेकिन यह ताजा भूकंप जितने बड़े इलाके को हिलाकर गुजर गया है,उससे यह संकेत मिलता है कि पत्रिका में की गई भयानक भूकंप की भविष्यवाणी महज अटकल नहीं है 
    वैसे भी भूकंप की परतें भारत से लेकर अंटार्कटिक तक फैली हैं। यह पाकिस्तान सीमा से भी स्पर्श करती है। यह हिमालय के दक्षिण में है। जबकि यूरेशियन परतें हिमालय के उत्तर में हैं। भारतीय परतें उत्तर पूर्व दिशा में यूरेशियन परतों से जा मिलती है। इसी क्षेत्र में चीन बसा है। यदि ये परतें आपस में टकराती है तो भूकंप का सबसे बड़ा क्रेंद्र भारत होगा। भूकंप के खतरे के हिसाब से भारत 5 क्षेत्रों में बंटा है। पहले क्षेत्र में पश्चिमी मध्यप्रदेश, पूर्वी महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और उड़ीसा के हिस्से आते है। यहां भूकंप का सबसे कम खतरा है। दूसरा क्षेत्र तमिलनाडू, मध्यप्रदेश, राजस्थान,पश्चिम बंगाल और हरियाणा है। यहां भूकंप की संभावना बनी रहती है। तीसरे क्षेत्र में केरल, बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र, पश्चिमी राजस्थान, पूर्वी गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश का कुछ भाग आता है। इसमें जब-तब भूकंप के झटके आते रहते है। चौथे क्षेत्र में मुबंई,दिल्ली जैसे महानगर हैं। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पश्चिमी गुजरात, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाके और नेपाल बिहार सीमा रेखा क्षेत्र शामिल हैं। यहां भूकंप का खतरा सबसे ज्यादा बना रहता है। पांचवे क्षेत्र में गुजरात का कच्छ इलाका और उत्तराखंड का कुछ हिस्सा आता है। पूर्वोत्तर के ज्यादातर राज्य इसी क्षेत्र में आते है। भूकंप की दृष्टि से ये इलाके सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं,। इन्हीं क्षेत्रों को भयानक भूकंपों का क्षेत्र माना गया है। नेपाल में आए भूकंप का क्षेत्र इसी इलाके में आता है।
    वैज्ञानिकों का मानना है कि रासायनिक क्रियाओं के कारण भी भूकंप आते हैं। भूकंपों की उत्पत्ति धरती की सतह से 30 से 100 किमी भीतर होती है। हालांकि नेपाल की राजधानी काठमांडू से 80 किमी दूर लामजुंग में यह जो भूकंप आया है वह जमीन से 15 किमी था। इससे यह पता चलता है कि भूकंप की प्रक्रिया की गहराई कम होती जा रही है। इसलिए कालांतर में आने वाले भूकंप बड़ी तबाही का सबब बन सकते हैं।
    दरअसल सतह के नीचे धरती की परत ठंडी होने व कम दबाव के कारण कमजोर पड़ जाती है। ऐसी स्थिति में जब चट्टानें दरकती हैं तो भूंकप आता कुछभूकप धरती की सतह से 100 से 650 किमी नीचे भी आते हैं। इतनी गहराई में धरती इतनी गर्म होती है कि एक तरह से वह द्व में बदल जाती है। लेकिन यह हलचल इतनी नीचे होती है,इसके झटकों या टकराव के असर ऊपर तक कम ही आ पाते हैं। लेकिन इन भूकंपों से ऊर्जा बड़ी मात्रा से बाहर निकलती है। धरती की इतनी गहराई से प्रगट हुआ सबसे बड़ा भूकंप 1994 में बोलीविया में रिकॉर्ड किया गया है। सतह से 600 किमी भीतर दर्ज इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8.3 मापी गई थी। हालांकि इस अवधारणा के विपरीत कुछ वैज्ञानिकों की यह भी मान्यता है कि इतनी गहराई से भूकंप धरती की सतह पर तबाही मचाने में सफल नहीं हो सकते,क्योंकि चट्टानें तरल द्व्य के रूप में होती हैं।


प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
   
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।

image

डॉ दीपक आचार्य

भूकंप तो आएगा ही, इससे बचना मुश्किल है।

हम जिस ढंग से अधर्माचारण अपना चुके हैं, उन्मुक्त और स्वच्छंद हैं, स्वेच्छाचारिता को अपना चुके हैं उस हिसाब से अब प्रकृति हमें ठिकाने लगाएगी ही।

बचने की कोशिशें हमें ही करनी हैं, लेकिन कोई कैसे बच सकता है, जबकि हमने अपने बचाव के सारे रास्ते बंद कर डाले हैं।

आज वहाँ भूकंप आया है, कल अपने यहाँ भी आ सकता है। भूकंप ने हमारे करीब न आने की कसम थोड़े ही खा रखी है। इंच भर जमीन तक का धंधा हम करने लगे हैं।

सब कहते हैं, राय देते हैं भूकंप से बचाव के नुस्खे बताते हैं और इन्हें अपनाने की सीख देकर चले जाते हैं। कहते हैं भूकंप आते ही घर से बाहर निकल जाओ, खुले मैदानों में आ जाओ।

इन लोगों को कौन बताए कि हमने सीमेंट, कंकरीट और ईंट-चूने के जंगल बसा दिए हैं, जगह-जगह टॉवर खड़े कर दिए हैं, कोई खाली जमीन हो तो वहाँ जाएं।

दुर्भाग्य है जमीन के मामलों से जुड़े महकमे, निकाय और माफियाओं का जिन्होंने हमारी बेमौत मौत के सारे सहज प्रबन्ध कर रखे हैं। खेलने तक के लिए मैदान नहीं छोड़े हैं, कहीं कोई कोना बाकी नहीं बचा है जिसे खाली छोड़ रखा हो। गली-कूंचों तक में कोने-कोने, सड़कों के किनारे तक बेच डाले हैं। जमीन के टुकड़ों पर कहीं बिजनेस है और कहीं कोई आदमी बसा हुआ।

ऎसे में अचानक भूकंप आ ही जाए तो हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा है अपने बचाव का।

अपने आस-पास कोई मैदान या खाली जगह तक नहीं छोड़ रखी है जहाँ बिजली-टेलीफोन के खंभे, मोबाइल टॉवर, मकान-दुकान, होर्डिंग्स या दूसरे गिर पड़ने जैसे संसाधन न हों।

जमीनों का अंधाधुंध उपयोग और खरीद फरोख्त करने वालों से लेकर उन सभी को दोषी माना जा सकता है जिन लोगों ने आम आदमी को भूकंप के दौरान स्वर्ग पहुँचाने के सारे इंतजाम कर दिए हैं।

भूकंप आ भी जाए तो क्या, जो लोग भूमि की दलाली में लगे हुए हैं, जमीन के सौदेबाज और बिल्डर्स हैं उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि भूकंप आ जाए या कोई जलजला। उन्हें इंसान की जिंदगी से ज्यादा भाती है मुद्रा।

हम सभी लोग आज की बात करते हैं, आज के आनंद की जय बोलने में विश्वास रखते हैं।

हमें पता नहीं है कि कल क्या होने वाला है, कल जो होगा देखा जाएगा।

जो प्रभावित होंगे, वे भुगतेंगे, हमारा अपना क्या।

हमारी संवेदनशीलता और दूरदर्शिता खत्म हो गई है।

हमें सिर्फ अपने ही कल की चिन्ता है, दूसरों का कल कितना ही विकल हो, इस बात से हमें क्या फर्क पड़ता है।

आज फिर जरूरत आ पड़ी है। हम अपने कुकर्मों, स्वार्थों और जमीन की दलाली के धंधों से ऊपर उठकर कल के बारे में सोचें।

गंभीरता से सोचें कि किसी दिन हमारे यहाँ भी भूकंप आ गया तो हम जान बचाने के लिए कहाँ जाएंगे।

हमारे आस-पास कोई खाली जगह तक नहीं बची है जहाँ जाकर इस बात का सुकून पा सकें कि भूकंप से बच जाएंगे।

यह सोचने का काम नीति-निर्धारकों, विकास में माहिर पुरोधाओं का है, समाज की सच्ची सेवा करने के लिए जमा हुई भीड़ का है।

अपने आपदा प्रबन्धन पर गहन विचार करें और हर क्षेत्र में कुछ न कुछ खाली जमीन छोड़ रखने का यत्न करें। यह खाली जमीन सार्वजनिक और सामुदायिक उपयोग का सशक्त माध्यम और जन सहूलियत का भी काम करेगी।

है यह छोटा सा विषय लेकिन भूकंप के दृश्यों को देखकर भी हमारा दिल नहीं दहले, दिमाग में कंपन न हो, खुद झकझोर नहीं पाएं, तो समझ लें कि हद दर्जे की संवेदनहीनता और अपने पापों से प्राकृतिक आपदाएं आएंगी ही, कभी भी भूकंप का आना संभव है और ऎसा हो गया तो हम लोग सामूहिक हत्याओं के पाप से बच नहीं पाएंगे।

कम से कम भूकंप से बचाव के नाम पर तो जगह-जगह खाली जमीन छोड़ रखें।

आज भूकंप दूर दिख रहा है, बहुत जल्दी ही अपने करीब होगा, तब तक अक्ल आ जाए तो ठीक है वरना कोई बच नहीं पाएगा। ईश्वर हमें लोकमंगल की बुद्धि प्रदान करे।

भूकंप से प्रभावित सभी लोगों के प्रति हार्दिक सहानुभूति रखते हुए मानवता का परिचय दें और जहां कहीं हों वहाँ मदद के लिए तैयार रहें।

जो लोग भूकंप में मारे गए, उन दिवंगत आत्माओं की गति-मुक्ति के लिए मन से प्रार्थना करें और इन जीवात्माओं से इस बात के लिए ईमानदारी और सच्चाई के साथ क्षमायाचना करें कि हम उनके लिए कुछ नहीं कर सके।

---000--

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

--

(ऊपर का चित्र - पुलकेश मंडल की कलाकृति - फ़ोकस, कैनवस पर एक्रिलिक रंग)

image

क़ैस जौनपुरी

 

- “चार समोसे पैक कर देना.”

- जी, और कुछ?

- और...ये क्या है?

- ये साबुदाना वड़ा है.

- ये भी चार दे देना.

नाश्ते की दुकान पर खड़ा लड़का ग्राहक के कहे मुताबिक चीजें पैक कर रहा है. ग्राहक नज़र घुमा के चीजों को देख रहा है. दुकान में बहुत कुछ है. जलेबी...लाल इमिरती...और वो क्या होता है..पीला-पीला...हां... ढ़ोकला...

ग्राहक को दुकान में वड़ा पाव और कचौड़ी भी दिखी. वड़ा पाव उसे पसन्द नहीं है.

- “चार कचौड़ी भी दे देना.”

- “इसके साथ दही भी डाल दूं?”

- “हां, मगर दही अलग से पैक कर दो. और उसके साथ की चटनी भी.”

लड़के ने कचौड़ी और दही-चटनी भी पैक कर दी. ग्राहक को सामने ही कुछ और दिखा.

- “ये क्या है?”

- “ये पोहा है.”

- “हां, ये भी एक प्लेट दे दो.” ग्राहक अपने मन में सोचने लगा, “लेना तो पोहा भी था, मैं तो भूल ही गया था.”

तभी दुकान के अन्दर से एक बूढ़ी सी औरत कुछ बड़बड़ाते हुए बाहर निकल रही थी. ग्राहक के पास खड़ी होके वो कुछ बड़बड़ाने लगी.

- “भूख...लागी है....कछु... खावे को मिलबे? भजिया...दे दे...भूख... लागी है....”

उस बूढ़ी औरत ने जितना कुछ कहा उसमें से बहुत कुछ उस ग्राहक को समझ में नहीं आया. उसे लगा वो मुझसे कुछ कह रही है. ग्राहक ने सोचा बेचारी बुढ़िया के लिए भी कुछ खरीद के दे दे. जहां अपने लिए वो इतना ढ़ेर सारा नाश्ता खरीद रहा है तो उस बूढ़ी औरत के लिए भी कुछ ले ले. बेचारे ग्राहक का दिल कमजोर था शायद. मगर इससे पहले कि वो उस लड़के से कुछ कहता उस बुढ़िया ने वहीं सामने रखी पकौड़ियों की थाली में हाथ मारा और तीन-चार पकौड़ियां एक साथ उठा लीं. ग्राहक देखता रह गया.

उधर गल्ले पे बैठा दुकान का मालिक जो नोट गिन रहा था, उस बूढ़ी औरत पे चिल्लाने लगा.

- “ए आंटी! क्या कर रही है? थाली में हाथ डाल दिया.”

मगर उस बूढ़ी औरत को जैसे कुछ फरक ही नहीं पड़ा. वो बुदबुदाते हुए दुकान से बाहर निकलने लगी.

- “आंटी नहीं फांटी....बड़ा... हरामी है...नोट गिनता है...दो पकौड़ी में...चिल्लाता है...मारवाड़ी है ना...”

उस ग्राहक ने देखा वो बुढ़िया अपने आप ही सब कुछ कहे जा रही थी. तभी उस ग्राहक ने देखा कि वो अपने मन में नहीं कह रही थी. उसके सामने एक लगभग तीस साल का आदमी खड़ा था. वो उससे कह रही थी. वो आदमी भी उस बुढ़िया को कुछ कह रहा था.

- “एक बाम्बू रखने का आंटी.”

- “बाम्बू...? किसलिए...?”

- “इस मारवाड़ी सेठ के लिए...”

आंटी को एक हमदर्द मिल गया. वो हमदर्द खड़ा चाय पी रहा था. और आंटी को सलाह दिए जा रहा था. उस ग्राहक ने देखा वो बुढ़िया रही होगी करीब सत्‍तर साल की. उससे ठीक से चला भी नहीं जा रहा था. उसने जो हवाई चप्पल पहनी थी, वो भी उसके छोटे-छोटे पैरों से कहीं ज्यादा बड़ी थी. उसके पैरों की उंगलियां सिकुड़ के ऐसे हो गईं थी जैसे उनका सारा दम निकल चुका हो. बस मजबूरी है कि उसके पैरों से बंधीं हैं. आंटी ने एक मटमैला गाउन पहना हुआ था. बाल उसके खुले थे, जो ऊपर से थोड़े चितकबरे काले और अन्दर से पूरे सफेद थे.

वो सत्‍तर साल की आंटी दूध लेने आई थी. ग्राहक ने देखा उसके हाथ में एक दूध का पैकेट है. दूध का पैकेट जितना सफेद और साफ़ है, आंटी का हाथ उतना ही काला और भद्दा है. उसके हाथ की चमड़ी ऐसी लग रही है जैसे आग में झुलस गई हो. ये उम्र की मार है. बेचारी आंटी क्या करे? ज़िन्दा तो रहना ही है.

आंटी दुकान से बाहर हो गई. ग्राहक ने दुकान के मालिक को देखा. वो सच में एक मोटा-तगड़ा सेठ लग रहा है. गाल उसके मोटे-मोटे फुले हुए हैं. रंग भी गोरा है उसका. आंटी की बातों को शायद उसने सुन लिया था या पता नहीं. लेकिन वो हल्के-हल्के हँस रहा है. शायद वो आंटी उस दुकान पे रोज आती हो. और उसकी ये रोज़ की आदत हो.

ग्राहक ढ़ेर सारा नाश्ता लेकर दुकान से बाहर निकला. उसने देखा कि वो आंटी अभी भी उस आदमी से एक किनारे खड़ी होके बात कर रही है. और वो आदमी दिखने में एक नम्बर का चोर लग रहा है.

- “चलो आंटी, तुम्हें घर तक छोड़ दूँ. लाओ ये दूध का पैकेट मैं ले लूँ. भारी होगा.”

आंटी ने वो दूध का पैकेट उस हमदर्द को पकड़ा दिया और उसके साथ डुंगरे-डुंगरे अपने घर की ओर जाने लगी. घर उसका पास ही में था. म्हाडा, सोसाइटी नम्बर बारह.

आंटी घर में अकेली ही रहती है. इसलिए उसका दरवाजा खुला ही था. वो आदमी अन्दर गया और उसने दूध का पैकेट किचन में रख दिया. आंटी अपने बेड पे पैर लटका के बैठ गई. और अपने खुले और मरे हुए बालों को समेटने लगी.

- “और बोलो आंटी? क्या सेवा करूँ तुम्हारी?” वो हमदर्द और भी मदद करने को तैयार था.

- “बस...चाय...बनाऊँगी...दूध.....लाई इसीलिए...”

वो आदमी उस बूढ़ी आंटी के घर को अच्छे से निहारने लगा. घर की हालत आंटी के बालों की ही तरह हो चुकी है. कहीं सफ़ेद धब्बे तो कहीं काले धब्बे. सामान तो बस कहने भर को है. आंटी खड़ी हुई और डुंगरे-डुंगरे किचन तक दूध गरम करने आई. तभी उसे लगा कि वो चक्कर खाके गिर जाएगी. भला हो उस आदमी का जो वहाँ उस वक़्त मौजूद था. उसने आंटी को सहारा देकर बेड पर लिटा दिया. बुढ़ापे की उम्र में इतनी दूर तक पैदल चलके जाना और दूध लेके आना और खुद से चाय भी बनाना. ये सब आंटी के लिए बहुत मुश्किल है. उस आदमी ने आंटी को बेड पे सिधा लिटा दिया. और आंटी का गाउन ठीक कर दिया. आंटी के पैर की हड्डी ऐसे लग रही थी जैसे अभी चमड़ी फटेगी और हड्डी बाहर आ जाएगी. गोश्त तो सारा सूख चुका है. मगर फिर भी उस आदमी की नज़र आंटी का गाउन ठीक करते हुए वहाँ पहुंच गई जिसकी वजह से आंटी आज भी एक औरत है.

बस फिर क्या था. उस आदमी ने आंटी की इतनी खराब हालत का इतना अच्छा फायदा उठाया कि आंटी की तो आंखें खुली की खुली रह गईं. वो हमदर्द आदमी जब अपने होश में आया तो उसे पता चला कि आंटी का मुंह ऐसे खुला हुआ है जैसे कोई पानी माँगते हुए मर गया हो. उस आदमी ने आंटी का खुला हुआ मुँह बंद करने की कोशिश की मगर आंटी भी ज़िद्दी निकली. उसने अपना मुँह बंद ही नहीं किया. अब उस आदमी को तो जैसे साँप सूँघ गया.

आंटी मर चुकी थी.

 

संपर्क :

qaisjaunpuri@gmail.com

*******

(ऊपर का चित्र - दशरथ दास की कलाकृति - प्रेशर, मीडिया - ईचिंग)

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget