शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

दीपक आचार्य का आलेख - आनंद चाहो तो एकला चालो रे

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आनंद के कई धरातल हैं। कुछ लोगों को अकेले में आनंद आता है और कुछ लोगों को समूह में।

अन्तर्मुखी व्यक्ति एकान्तिक आनंद में विश्वास करते हैं और उनके चित्त की वृत्तियाँ औरों की अपेक्षा ऊध्र्वमुखी एवं ऊध्र्वगामी होती हैं जबकि समूहों में आनंद पाने वाले अधिकतम लोग बहिर्मुखी वृत्तियों के होते हैं तथा यह जरूरी नहीं कि इनकी वृत्तियां ऊध्र्वमुखी ही हों।

ऎसे लोग पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा से लेकर जाने किन-किन ऎषणाओं के मोहजाल में घिरे होते हैं। इन लोगों को लगता है कि आनंद का दरिया बाहर ही बहता है और यही कारण है कि जिन्दगी भर बाहरी प्रवृत्तियों और भौतिक चकाचौंध में रमे रहकर आनंद पाने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन अंतिम समय तक भी इच्छित आनंद नहीं मिलता और आनंद की आधी-अधूरी तलाश के साथ ही स्वर्ग सिधार जाते हैंं।

जीवन का असली आनंद हर व्यक्ति के भीतर ही होता है और यह आनंद अपने आप में इतना अखूट होता है कि जिसका क्षरण कभी नहीं होता।

आनंद के अक्षय स्रोत की तलाश हम सभी लोग करते ही हैं, भटकते भी हैं, खोज करते-करते थक भी जाते हैं लेकिन आनंद मिलना सौभाग्य का विषय है।

आनंद की तलाश में जो लोग निकले हुए हैं, जो लोग आनंद पाने को लालायित हैं या जो आनंद पाने के तौर तरीकों के बारे में सोचे रहे हैं उन सभी में से सिर्फ वे ही लोग आनंद के स्रोत की खोज कर पाने में सफल होते हैं जो कि अन्तर्मुखी होते हैं।

आनंद वहीं आता है जहाँ शांति, संतुष्टि, तृप्ति और एकान्त होता है, यह स्थितियां तभी उत्पन्न हो सकती हैं जबकि इंसान सारे सांसारिक व्यवहारों और लौकिक माया से दूर रहें और इतना एकान्त हो कि उसे जगत और बाहर की बजाय अपने बारे में सोचने का पर्याप्त वक्त मिले।

यही वह क्षण होता है जब इंसान बाहर का ख्याल छोड़कर अपने भीतर की ओर रमण करने का प्रयास करता है और जब एक बार कोई भी इंसान अपने आप के बारे में सोचने की शुरूआत कर देता है, अपने भीतर की यात्रा का आरंभ कर देता है तब उसका मन अपने  भीतर रमना आरंभ कर देता है।

और एक बार जब हम अपने भीतर के खजाने की ओर झाँकना आरंभ कर लेते हैं तब हमारा चित्त आनंद के उस आदि स्रोत की थाह पा लेता है और फिर उसका बाहर की ओर भटकाव करीब-करीब समाप्त ही हो जाता है।

ऎसा इंसान फिर बाहरी माया, भौतिकवाद या चकाचौंध की ओर आकर्षित नहीं होता। जगत में उसका लौकिक व्यवहार भी अनासक्ति का पर्याय हो जाता है और ऎसे लोग बाहरी मोहमाया से निर्लिप्त ही रहा करते हैं।     यह वह अवस्था है जिसमें अन्तर्मुखी व्यक्ति को लगता है कि बाहर की चकाचौंध की ओर भाग रहे सारे के सारे लोग पागल हैं। दूसरी ओर भौतिकवाद भरी भेड़चाल चलने वाले सारे लोगों को लगता है कि वे लोग पागल हैं जो अन्तर्मुखी और रिजर्व स्वभाव के हैं।

बाहर झाँकने वालों और भीतर झाँकने वालों के मध्य हमेशा संघर्ष  चलता रहा है और रहेगा।  लेकिन इस संघर्ष में विजयी हमेशा वह रहेगा जो अन्तर्मुखी है या सांसारिक जंजाल से अनासक्त। क्योंकि भीतरी आनंद के हकदार ये ही लोग हैं।

सामान्य लोगों के लिए दो ही रास्ते हैं या तो आनंद पाएं अथवा लोकाचार में पेण्डुलम बने रहें। जितना अधिक लोक व्यवहार होगा उतना अधिक खात्मा आनंद का ही होगा। जितना अधिक लोगों से दूर रहेंगे, लौकिक वृत्तियों से दूर रहेंगे, उतना अधिक आत्म आनंद आएगा और भीतर के महास्रोत की ओर खिंचाव बढ़ेगा।

यही कारण है कि महान और ज्ञानी लोग हमेशा गुटों, गिरोहों, समूहों और भेड़चाल से दूर रहकर अकेले ही अपने दम पर चलते हैं और ऎसा कुछ कर जाते हैं कि पूरी दुनिया सदियों तक याद रखती है।

इन लोगों का कर्मयोग एकान्तिक होता है और इस कारण कर्मयोग के प्रति इनकी एकमेव निष्ठा और समर्पण हमेशा चरम पर बना होता है और यही वह हुनर होता है जिसकी बदौलत ये कर्मयोग में उच्चतम शिखर भी हासिल करते हैं और चरम आनंद भी, जिसकी कल्पना दूसरे सांसारिक या महालोकप्रिय लोग भी नहीं कर सकते।

इसलिए जीवन में आशातीत सफलता और आनंद दोनों पाना चाहें तो भीड़ में रहने और भीड़ को साथ बनाए रखने का स्वभाव त्यागें और ‘एकला चालो, एकला चालो, एकला चालो रे ’ के मूल मंत्र को दीक्षा मंत्र मानकर अंगीकार करें।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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