शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

दीपक आचार्य का आलेख - सब बताते हैं एक-दूसरे को खराब

सब बताते हैं

एक-दूसरे को खराब

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

हर सामान्य आदमी अपने आपको अच्छा और दूसरे को खराब बताता है। आदमी में अब वह माद्दा रहा ही नहीं कि सही को सही, बुरे को बुरा कह सके। इतनी हिम्मत जुटा पाना आज के इंसान के बस में है ही नहीं।

यही कारण है कि सच-झूठ और अच्छे-बुरे के सभी परंपरागत पैमाने ध्वस्त होते चले जा रहे हैं, मर्यादाओं का इस कदर चीरहरण हो रहा है कि समाज-जीवन से जुड़े हर मामले में गुड़गोबर होता जा रहा है जिसका दुष्प्रभाव इंसान के व्यक्तित्व, सेहत और चरित्र पर तो पड़ ही रहा है, समुदाय, परिवेश और देश भी इससे अछूते नहीं हैं।

हम सभी लोगों का यह कड़वा और सच्चा अनुभव है कि हमारे पास दो तरह के लोग आते हैं। कुछ लोग अपनी काबिलियत, ईमानदारी, नैष्ठिक कर्मयोग, श्रेष्ठ कार्यों में अपनी ओर पहले करने की आदत और सेवा-परोपकार की भावना से आगे आते हैं और अपनी प्रतिभाओं के बूते अलग ही तेजस्वी छवि का निर्माण करते हुए हर किसी को भीतर तक प्रभावित कर लिया करते हैं।

ऎसे नैष्ठिक कर्मयोगी लोगों की संख्या धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है, लेकिन आज भी ऎसे लोगों का वजूद कायम है, यह हम सभी के लिए सुकून और प्रसन्नता का विषय है।

दूसरी श्रेणी में वे बहुसंख्य लोग आते हैं जिन्हें अपनी प्रतिभा से कहीं अधिक भरोसा चापलुसी, औरों के प्रशस्तिगान, परिक्रमाओं, षड़यंत्रों, गोरखधंधों और दूसरों को उल्लू बनाने की नैसर्गिक कला पर होता है।

ऎसे लोग वाक्चातुर्य, दूसरों को भरमाने व भ्रमित करने के हुनरों और शोषक मनोवृत्ति का परिचय देते हुए छीनाझपटी स्वभाव का इस्तेमाल करते हुए अपने खोटे सिक्के हर दुकान पर चला लिया करते हैं।

इस किस्म के लोग जिस किसी से मिलेंगे, उससे अपने हुनर या मौलिक प्रतिभाओं के बारे में बढ़-चढ़ कर झूठी बातें करते हैं और इसके समानान्तर ही दूसरों की निन्दा करने में पूरा दम-खम भी लगा दिया करते हैं।

दूसरों को गुमराह करने के मामले में इस किस्म के लोग बेजोड़ ही हैं। आजकल हमारे आस-पास उस प्रजाति के बेशर्म  लोग सर्वाधिक विद्यमान हैं जो औरों को उल्लू बनाने के कामों में बड़ी ही निर्लज्जता के साथ रमे होते हैं।

बात किसी महकमे, दुकान, काम-धंधे, मित्र मण्डली, घर-परिवार, रिश्तेदारी की हो या फिर उन लोगों की जिनसे हमारा संपर्क होता रहता है।

हममें सत्यासत्य को परखने और नीर-क्षीर का विवेक हो तब तो ठीक, अन्यथा आजकल खूब सारे लोग इसीलिए जिन्दा हैं ताकि औरों के बीच मनभेद पैदा कर लड़वाते रहें और वहमों से जुड़ी लड़ाई के मजे लेते रहेंं।

इन युद्धोन्मादी लोगों का एक ही काम होता है, सज्जनों के बारे में फालतू की चर्चाएं कर भ्रम पैदा कर देना और इस विघटन का मौका देखकर अपने हक में अधिक से अधिक इस्तेमाल कर लेना।

हमारे पास रोजाना खूब लोग आते हैं जिनमें से अधिकांश बिना पूछे ही दूसरों की निन्दा के स्तोत्र पढ़ने शुरू कर देते हैं। इन लोगों की हरचन्द कोशिश यही रहती है कि हमसे जुड़े हुए लोगों के बारे में हमारी बनी-बनाई धारणाएं बदलें और दूरियाँ बढ़ती रहें ताकि इन निन्दकों और घुसपैठियों को हमारा सामीप्य प्राप्त हो, जिससे कि ये हमारी मजबूत जड़ों की थाह पा कर इनकी गुपचुप खुदाई भी शुरू कर सकें और हमें भरमा कर अपने नाजायज स्वार्थ भी पूरे करते रहें।

रोजाना काफी लोग हमारे संपर्क में आते हैं। चाहे कोई सा बाड़ा हो, पाँच साला हो या साठ साला। हर तरफ जड़ें खोदने वाले और भरमाने वाले घुसपैठिये बड़ी संख्या में विद्यमान हैं और इन्हीं की तूती बोल रही है।

इंसान की बसी बसायी जिन्दगी और गृहस्थी से लेकर कब्र खोद देने तक में माहिर ये लोग दूसरों की जड़ें खोदने से काम से कभी विराम नहीं पाते। इनके लिए यही कर्मयोग है और ये इसीलिये पैदा हुए हैं।

हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में यदि हम किसी मुकाम पर हैं, नेतृत्व वाले कामों में हैं अथवा किसी भी किस्म की सामान्य कुर्सी या व्हील चेयर पर हैं, तब यह निश्चित है ही हम किसी भी बाड़े या गलियारे में हों, कोई दिन ऎसा नहीं जाएगा जब उन लोगों से पाला न पड़े जो घुसपैठिये और निन्दक हैं।

एक आएगा अपनी ही अपनी हाँकेगा, बड़ाई करेगा और दूसरों के बारे में कई सारे रहस्यों का उद्घाटन करता हुआ उन्हें नाकारा, आलसी और निकम्मा साबित करता हुआ चला जाएगा। दूसरा, तीसरा और चौथा भी आएगा और यही काम करेगा।

कुल मिलाकर दिन भर में सारे ही आ जाएंगे और एक-दूसरे के बारे में पोल खोलते हुए अपने को महान कर्मयोगी, स्वामीभक्त, ड्यूटी के प्रति ईमानदार और परम कत्र्तव्यनिष्ठ सिद्ध करते हुए अपनी राह लेंगे।

एकाध ही कोई होगा जो किसी की निन्दा बुराई नहीं करे और सिर्फ अपनी ही बात कहने को आया हो, अन्यथा कुल जमा में से एक भी नहीं बचता जो कि किसी के बारे में कुछ न कहे।

हर कोई एक-दूसरे को खराब बताता है, कमियाँ तलाशता है, रहस्यों का उद्घाटन करता हुआ मजे लेता है और सारा का सारा कचरा हमारे दिमाग में उण्डेल कर चला जाता है।

इस स्थिति में तीन ही रास्ते बचते है। अपने आपको गूंगा-बहरा मानते हुए सुनते जाओ, दूसरे कान से बाहर निकालते चले जाओ, या फिर सब कुछ सुनते हुए भी सभी को दिलासा देते रहो, झूठे वादे करते रहो और खुद उदासीनता ओढ़े बैठे रहो।

तीसरा रास्ता यही है कि वहाँ से पलायन कर जाओ क्योंकि उस स्थान पर रहना हमारे लिए किसी भी दृष्टि से निरापद नहीं है जहाँ सारे के सारे खराब हों, एक-दूसरे की टाँग खिंचने वाले, झूठे, टाईमपास, निंदक और विघ्नसंतोषी हों क्योंकि ऎसे नुगरे लोगों के साथ रहना भी पाप, ताप और शोक ही देता है, चित्त की शुचिता हरता है और मस्तिष्क की वैचारिक पावनता को धुंधला करने वाला है। इस प्रकार के बाड़ों से सुकून, शांति और आत्मसंतुष्टि की कामना करना व्यर्थ है। शास्त्र आज्ञा भी है - कुग्राम वासो ...  ... ...।

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