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शादी करें, कराएँ शरारत नहीं

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दीपक आचार्य

आज अक्षय तृतीया है। अबूझ सावों का स्वयंसिद्ध परंपरागत महामुहूर्त। यों तो अक्षय तृतीया या अखातीज जीवन के कई सारे कामों के लिए अबूझ मुहूर्त है लेकिन हमने इसके एक पक्ष को ही महत्त्व दे डाला है और वह है इसका सांसारिक पक्ष यानि की विवाह।

षोड़श संस्कारों में से हरेक संस्कार की अपनी विशेष महिमा है लेकिन स्थूल रूप में हमने अखातीज के दिन को विवाह संस्कार के नाम ही समर्पित कर दिया है। यही कारण है कि अखातीज अब सिर्फ विवाहों के दिन की पर्याय तिथि होकर रह गई है, दूसरे सारे उत्सवी कर्म, पर्व और तिथिगत विशेषताओं करे हम भुला चुके हैं।

हमें अखातीज का सीधा सा यही अर्थ आता है - विवाह, विवाह और विवाह। जबकि अखातीज खेती-बाड़ी, अपने जीवन और लोक जीवन के लिए कई सारे शुभ कर्मों के आरंभ की तिथि है, नवीन संकल्प ग्रहण कर काम करने की तिथि।

आज के दिन हर तरफ शादियों की धूम परवान पर है। साज-सजावट, रंग-रोगन, रोशनी, मण्डपों, दुल्हे-दुलहिनों की भारी भीड़, बैण्डबाजों की धूम, पटाखों का शोरगुल और वैवाहिक गतिविधियों का धूम धड़ाका अपने यौवन पर है।

गली-कूचों से लेकर पहाड़ों, फलों, पालों, कस्बों, शहरों और महानगरों तक सर्वत्र शादियों ही शादियों का माहौल है। कई जगह सामूहिक विवाहोत्सवों की धूम है।

भारी शोरगुल और धूम के चलते लगता है इतनी शादियां हो रही हैं कि आज के बाद कोई कुँवारे ढूँढ़े नहीं मिलने वाले। हर कोई मस्त है शादियों में। शादियां करने वाले भावी जीवन के सपनों को लेकर कल्पनाओं के ताने-बाने बुनने में लगे हैं। शादियां कराने वाले तमाम प्रकार के इंतजामों में मग्न हैं। और खूब सारे लोग इस चिंता में खोऎ हुए हैं कि कैसे शादी-ब्याह आसानी से निपट जाएं और वे चिंताओं से मुक्ति पा जाएं।

जो लोग शादी की उम्र के हैं उनकी शादी होनी भी चाहिए और इनकी शादी कराने वालों को जल्द से जल्द अपना फर्ज निभाना भी चाहिए। लेकिन शादियों के इस महाकुंभ दिवस पर सर्वाधिक चिन्ता की बात यह है कि हम लोग बिना सोचे-समझे उन बच्चों की शादी करा देते हैं जिनकी उमर शादी के लायक नहीं है।

अपने फर्ज का भार उतारकर निश्चिन्त हो जाने के फिराक में हम लोग उन बच्चों का भविष्य बरबाद कर रहे हैं जिन बच्चों को पाने के लिए हमने जाने कितने देवरों, मन्दिरों और भौंपाओं, बाबाओं के चक्कर लगाकर देवी-देवताओं के आगे मिन्नतें की, मन्न्तें मानी होती हैं।

संतति के प्रति हमारा यही फर्ज नहीं है कि हम उनकी शादी करा दें और फिर अपने कत्र्तव्य की इतिश्री मानकर अपने हाल में मस्त हो जाएं।

अपने जीते जी अपनी संतति की सेहत, घर-परिवार की बरकत, अपनी वंश परंपरा के स्वस्थ विकास और पारिवारिक सामूहिक समृद्धि की चिन्ता हमें ही करनी है, सिर्फ अबूझ सावे को देखकर नाबालिगों का विवाह करा देना ही काफी नहीं है। ऎसा करना हमारे वंश के साथ धोखा तो है ही, इससे अपने पूर्वज, कुलदेवता व कुलदेवी भी नाराज होते हैं। इसका खामियाजा हमें भी भुगतना ही पड़ता है। इसके साथ ही हमारे पुण्यों का क्षय होता है, ग्रह-नक्षत्र कुपित होते हैं।

बाल विवाह अपने आप में वैयक्तिक कुकर्म तो है ही, सामाजिक एवं राष्ट्रीय अपराध और महापाप भी है क्योंकि समाज और देश को स्वस्थ, समृद्ध और सबल नागरिक चाहिएं, और यह तभी संभव है जबकि उचित उम्र में शादी हो, उचित समय में बच्चे पैदा हों और उन्हें विकास के भरपूर अवसर मिलें।

नाबालिगों का विवाह होने पर समय पूर्व पति-पत्नी बन जाने वाले लोगों की आयु, बल और स्वास्थ्य का क्षरण होता है वहीं इनसे जो बच्चे पैदा होते हैं वे भी स्वस्थ या सबल नहीं होते और जच्चा-बच्चा के रोगी हो जाने अथवा दम तोड़ दिए जाने का खतरा भी हर क्षण बरकरार रहता है।

हम सभी जिम्मेदार लोगों को चाहिए कि हम सिर्फ शादी करा देने का एकमेव फर्ज अदा करने के लिए हमारे दूसरे सभी प्रकार के फर्जों की बलि न चढ़ाएं, अपनी संतति को शादी की भट्टी में न झोंकें बल्कि उनके जीवन का ख्याल रखें और जब तक जियें, कोई ऎसा कर्म न करें जिससे कि अपनी संतति को किसी भी प्रकार की हानि उठानी पड़े।

अपनी दो दिन की मौज-मस्ती, मिष्ठान्न और तमाम प्रकार के आमिष-निरामिष भोज तथा पीने-पिलाने की मस्ती में उन लोगों को जीवन भर के लिए अंधकार में न डालें जिन्हें बड़ी खुशी के साथ पाल पोस कर हम बड़ा करते हैं।

बाल विवाह जो करते हैं, कराते हैं उनकी पूरी जिन्दगी नारकीय हो जाती है। बाल विवाह कराने वाले लोग अभिशप्त हो जाते हैं और उनका पूरा जीवन अभिशापों से घिर कर रह जाता है तथा मरने के बाद भी इन लोगों के लिए नरक के द्वार सहर्ष और आदरपूर्वक खोल दिए जाते हैं।

बाल विवाह करने वालों और कराने वालों के घर का जो लोग खान-पान व व्यवहार करते हैं उन पर सभी प्रकार के देवी-देवता, पितर, ग्रह-नक्षत्र कुपित हो जाते हैं और ऎसे लोगों के सारे संचित पुण्य क्षय हो जाते हैं। बाल विवाह कराने वालों का सवेरे-सवेरे मुँह भी देख लिया जाए तो एक ही नहीं बल्कि कई-कई दिन खराब हो जाते हैं।

आज अक्षय तृतीया के दिन बाल विवाह रोकने के लिए सरकार खूब प्रयास करती रही है लेकिन यह अकेले सरकार का काम नहीं बल्कि समाज का कत्र्तव्य है कि अपने क्षेत्र में कहीं भी बाल विवाह होने न पाएं, इन्हें समझाईश से रुकवाएं, और बात न बनें तो कानून का डण्डा दिखाएं।

हमने अभी सख्ती नहीं की तो हमारी आने वाली पीढ़ी निर्बल, निस्तेज और नाकारा होगी, और ऎसी पीढ़ी के सहारे समाज, क्षेत्र और देश का न तो भला हो सकता है, न राष्ट्रीय सुरक्षा को अक्षुण्ण रखा जा सकता है।

समाज और देश को बचाना है तो बाल विवाह की कुरीति को रोकें। अक्षय तृतीया के दिन आज हम यही संकल्प ले लें तो देश की सबसे बड़ी सेवा होगी।

सभी को अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएँ ...।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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