मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

अरूणा शास्त्री का व्यंग्य - अनूठे व्यंजन

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कुछ अनूठे व्यंजन

जिन अनूठे व्यंजनों की विधियां मैं आपको बतलाने जा रही हूँ उनको खिलाने का सपना मैं हमेशा से संजोए हुए हूं । परंतु इन व्यंजनों को खिलाने में मुझे कभी कामयाबी हासिल नहीं हो पाई है बल्कि हमेशा मैं खुद ही मुंह की खा कर हार गई है । खैर. एक बार और कोशिश करती हूं शायद कामयाबी हासिल हो जाए । आइए, 'सब्र के घूंट से शुरू करते हैं ।

सब्र के घूंट : पाश्चात्य शैली का अनुकरण करते हुए प्राय: सभी समारोहों में भोजन के प्रारंभ में सूप या शीतल पेय पेश करने का प्रचलन है । जब तक खाना मेज पर लगता है, रुभी आमंत्रित इसे घूंट-घूंट कर पीते रहते है । आप भी अपनी दावतों में सब्र के घूंट' पेश कर सकते हैं जिन्हें आपके आमंत्रित तब तक घूंट-घूंट कर के पीते रहेंगे. जब तक कि उन के 'सब का प्याला' छलकने न लग जाए । वैसे भी हमें रब के छ 'पीते रहने का अच्छा अभ्यास है और वही पी कर अब तक की जिंदगी तो गुजार ही दी है ।

लोहे के चने :. लोहे के चने' बनाने की विधि उतनी ही आसान नहीं है, जितनी कि आप समझ रहे हैं । मैं खुद ही अपनी शादी के दिन से ले कर आज तक प्रयत्नशील है कि किसी तरह अपने पति को लोहे के चने' चबवा दूं पर उलटे वह ही मुझे नाकों चने चबवाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं । पर आप इतनी जल्दी हार न मानिएगा । आप तो लोहे के चने चबवाने पर उतारु हो ही जाइए. फिर चाहे चबाने वाले के रात खटटे' क्यों न हो जाएं या बतीसी ही बाहर क्यों न आ जाए । कम-से-कम आप गर्व से यह तो कह सकेंगे कि आपने फलां को लोहे के चने' चबवा दिए और सुनने वाले आपका लोहा माने' बगैर नहीं रहेंगे ।

न गलने वाली दाल : यह समझ लीजिए कि इस दाल को गलाने में किसी भी कंपनी का कोई भी प्रेशर कुकर हमारी सहायता नहीं कर सकता है, जब तक कि हमारे पास कोई ऊपरी प्रेशर' न हो । मुसीबत तो तब आती है, जब यदि किसी तरह यह दाल बन जाती है तो लोग झट दाल में काला ढूंढने में आकाश-पाताल एक कर देते हैं । और तमाम कोशिशों के बावजूद अगर दालn

नहीं गलती है तो लोग 'यह मुंह और मसूर की दाल' कह कर खिल्ली उड़ाने से भी बाज नहीं आते । मतलब राह है कि अगर किसी तरह अपनी 'दाल गल जाए' तो भी मुश्किल और न गले तो भी मुश्किल । बस यही सोच-सोच कर अपनी तो 'दाल पतली' होती जाती है ।

बेले हुए पापड़ : पापड़ बेलने का दर्द वही जानता है (या जानती है) जिसने कभी पापड़ बेले हों । जिसके पैर न फटी बिवाई, वह क्या जाने पीर पराई? हर बेले हुए पापड़ के पीछे किसी कोमलांगी के फफोले पड़ गए हाथों का दर्द भरा इतिहास छिपा रहता है । बहुत पापड़ बेलने पड़ते है ' तब कहीं जा कर पापड़ बनते हैं । अब चाहे इन्हें तल कर पेश करें म चाहे भून कर, यह आपकी मर्जी हे ।

थाली का बैंगन : थाली का बैंगन बनाना इतना आसान नहीं है, जितना आप समझ रहे हैं । इसे बनाने से पहले काटने में ही आपको नानी-दादी याद न आ जाए तो कहना, आखिर थाली का बैंगन जो ठहरा, यह थाली में एक किनारे से दूसरे किनारे उसी तरह लुढ़कता है । जिस तरह कोई दलबदलू नेता एक दल से दूसरे दल में (जिधर भी पलड़ा भारी दिखता हैं) लुढ़कता हैं । ऐसे थाली के बैंगन का मुरता बनाने में खुद का ही भुरता बन जाए तो भी आश्चर्य नहीं ।

नीम चढ़ा करेला : आजकल ऐसे नीम चढ़े करेलों की मंडी में बहुत बहार है । यह तो सभी जानते हैं कि करेला मधुमेह के रोगियों के लिए कितना लाभकारी है और जब नीम चढ़े करेले से पाला पड़ जाए तो समझ लीजिए कि उसमें करेले और नीम दोनों के गुणों के मिल जाने से उसकी शक्ति दोगनी हो गई है जो आपके मन की सारी मिठास को नष्ट करके रख देगी ।

खयाली पुलाव : यह सच है कि 'खयाली पुलाव पकाने का ठेका तो सिर्फ शेखचिल्ली को ही मिला था, जो अपने जमाने के जाने-माने खान- पान के ठेकेदार' थे । उन्हें खयाली पुलाव पकाने में महारत हासिल थी । उनके पकाए खयाली पुलावों का स्वाद जो आज तक लोगों की जुबान पर है और उन्हीं के 'खान-पान विश्वविद्यालय' में दीक्षा लेकर लोग आज तक खयाली पुलाव पकाते आ रहे हैं । खयाली पुलाव पकाने के लिए सामग्री अपने अंदाज से ही चाहे 1०० ग्राम लीजिए चाहे एक क्विंटल भर या सामग्री न हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा । फिर उसे खयालों की धीमी-धीमी औच पर रख दीजिए । वाह, ऐसे खयाली पुलाव पकेंगे कि लोग चटखारे लेते रह जाएंगे ।

सलाद : 'किस खेत की मूली' और 'प्याज के छिलकों का' जब आप उपरोक्त अनूठे व्यंजन अपने मेहमानों के सामने पेश करेंगे तो वे यह तो समझ ही जाएंगे कि आप किस खेत की मूली हैं । वैसे हर मूली अपने सामने दूसरे खेत की मूली को बड़ी हिकारत की दृष्टि से देखती है कि आखिर वह है किस खेत कं मूली? चाहे किसी भी खेत की हो हमें तो उसका सलाद बनाने से मतलब जे- और इस मूली के सलाद में प्याज भी डालना है पर एक बात ध्यान रहे कि सलाद बनाते समय 'प्याज के छिलके ' एक के बाद एक कर के इतने न उतारते चले जाएं कि एक-दूसरे की बरसों पुरानी बखिया ही उधड़कर सामने आ जाए । इस सलाद पर 'अदरक के पंजे ' भी कद्‌दूकस करके छिड़क सकते हैं । (बंदर अगर अदरक का स्वाद नहीं जानता है तो क्या हुआ, इनसान तो जानता है) इस सलाद को यदि किसी खूबसूरत आकार में सजाना चाहें तो कुरसी के आकार में सजा कर पेश करें क्योंकि आजकल कितनी जोड़तोड़ चल रही है, सब कुरसी के लिए ही तो है । इसके बाद 'जले पर छिड़कने वाले नमक' को नमकदानी में भर कर मेज पर सजा दें ।

यह लीजिए, नमकीन व्यंजन तो बहुत सारे बन गए, अब मधुरेण समापयेत' का पालन करते हुए अंत में कुछ मिष्ठान्न होना भी बहुत जरूरी है । गुलगुले बनाने की तो सोचिए ही मत, क्योंकि कई लोग ऐसे हैं जो गुड तो खाते हैं किंतु गुलगुले से परहेज' करते हैं मन ही मन फूटने वाले 'मन के लड्‌डू तो सभी खाते रहते हैं । तबीयत कलाकंद होते भी कइयों की देखी है, पर 'टेढ़ी खीर' का स्वाद आज तक कोई नहीं बतला पाया है । इसलिए अंत में टेढी खीर' ही परोसी जाए तो क्या हर्ज है?

टेढ़ी- खीर : 'टेढ़ी खीर' बनाना सचमुच टेढ़ी खीर है । परन्तु जिस प्रकार प्रेम के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजर कर ही प्रेम की सार्थकता मालूम पड़ती है, उसी तरह टेढ़ी खीर जितनी टेढ़ी होती है उतनी ही स्वादिष्ट लगती है । इस टेढ़ी खीर को इतनी गरमागरम परोसिए कि इस दूध का जला अगली बार छाछ भी फूंक-फूंक कर पिए

 

(व्यंग्य संग्रह - मैय्या मोरी मैं नहीं कमीशन खायो से साभार)

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