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औरों को चलाते रहो, आगे बढ़ते रहो

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दीपक आचार्य

पने यहाँ सब तरह के लोग पाए जाते हैं। हर जगह हर किस्म के प्राणी पाए जाते हैं जिन्हें सामाजिक प्राणी की श्रेणी में जरूर रखा गया है लेकिन इनकी प्रकृति और प्रवृत्ति को देखा जाए तो कहीं से नहीं लगता कि ये सामाजिक भी हो सकते हैं।

इनकी हरकतों को देख कर कोई भी इन्हें सामाजिक कहने और मानने से हिचकता है। इनमें भी दो किस्मों के लोग अधिकांशतः पाए जाते हैं। जिस अनुपात में चलाने वाले लोग हैं उतने ही अनुपात में चलने वाले भी हैं।

आजकल काफी सारे लोग यही कर रहे  हैं। कोई किसी को चला रहा है, कोई किसी को। जो नहीं चलने वाले हैं उन खोटे सिक्कों को भी कहीं भी चला देने का तिलस्म जानते हैं ये लोग, जो दूसरों को चलाने के लिए ही पैदा हुए हैं और जब से समझदार हुए हैं तभी से किसी न किसी को चला ही रहे हैं। 

कोई चवन्नी चला रहा है, कोई आने-दो आने और कोई अठन्नी। और तो और शवों पर उछाले गए सिक्कों को भी चलाने का हुनर जानते हैं लोग। किसी की चवन्नी कहीं चल रही है, किसी की कहीं और। सब चला रहे हैं अपनी-अपनी चवन्नियाँ।

चलाने वालों की ही तासीर है कि लोग चक्करघिन्नियों की तरह चक्कर खा रहे हैं इनके फेर में आकर। और ये हैं कि जाने किस शातिराना दिमाग के बने हैं कि किसी न किसी को लपेटे में ले ही लेते हैं।

हम सारे के सारे इस एक विधा में तो जबर्दस्त माहिर हैं ही। कोई चला रहा है, कोई बना रहा है। हम सब एक दूसरे को चला रहे हैं, बना रहे हैं। और अपने काम निकालते चले जा रहे हैं। रोये रूई वाला, पिंजारे को क्या . 

जो लुट गया वह कहने से रहा। जो लूट गया वह इतना आगे निकल गया कि अब पकड़ में नहीं आने वाला, चाहे लाख कोशिशें कर लो। वह आया ही इसलिए था, और चला गया।

लोग अपनी बुद्धि का इस्तेमाल उतना नहीं करते जितना करना चाहिए। इस मामले में अनपढ़ों से लेकर बुद्धिजीवियों और बुद्धिबेचकों तक सब का एक ही रोना है।

बुद्धि के बूते जिन्दा लोगों की ही बात की जाए तो वे उनमें दो फाड़ हैं। एक को अपनी बुद्धि पर भरोसा नहीं है इसलिए औरों की बुद्धि और बतायी जाने वाली युक्ति पर चलते हैं। दूसरे वे हैं जिन्हें अपनी बुद्धि पर ओवरकॉन्फिडेंस है और इसलिए वे समझते हैं कि दूसरों को चलाने का पक्का लाईसेंस मिल गया है और वह भी ताजिन्दगी। जब तक जियेंगे, तब तक औरों को बना-बना कर, उनकी छाती पर मूँग दलते हुए।

तमाम गलियारों में खूब सारे लोग हैं जो दूसरों के कहे अनुसार चलते हैं और उन लोगों को खुदा से अधिक मानते हैं जो उन्हें चिकनी-चुपड़ी बातें कर भरमाते हैं, अपने-अपने हिसाब से ऎसे चलाते हैं जैसे वे उन्हीं के बाड़ों के गधे, भेड़-बकरी या दूसरी किस्मों के जानवर हों।

कई लोग तो जब भी बोलते हैं तब पता चल ही जाता है कि ये रट्टू तोते किसी न किसी के सिखाये हुए हैं तभी वही सब कुछ बोलते हैं जो इन्हें चलाने वाले सिखाते हैं।

आजकल सामाजिक प्राणियों के प्रत्येक कर्म से साफ-साफ पता चल ही जाता है कि वे किसके इशारों पर नाच रहे हैं, नंगों-भूखों और उन्मादियों जैसा बर्ताव कर रहे हैं, काम-धाम छोड़कर नालायकियों पर उतर आए हैं,  भिखारियों की तरह हाथ फैलाकर गिड़गिड़ा रहे हैं या कि अशोभनीय हरकतों में रमे हुए हैं।

चलाने वाले औरों को चला-चला कर छलांग लगाते हुए जाने कहाँ से कहाँ पहुंच कर मुकाम पा चुके हैं वहीं दूसरी तरफ औरों के इशारों पर बंदर, भालू और कुत्तों की तरह नाच रहे, बोल रहे, लिख रहे या अजीबोगरीब हरकतें कर रहे लोग वहीं के वहीं टिके हुए हैं जहाँ पहले थे।

औरों के इशारों पर लगातार चलते रहने के बावजूद ये लोग आगे नहीं बढ़ पाए  हैं। थकान को सहचर बनाकर एक ही एक बाड़े और गलियारे में कोल्हू के बैल की तरह चक्कर काट रहे हैं। पता नहीं लोगों को कब अक्ल आएगी, या यों ही शातिरों और नालायकों के चलाये चलते रहेंगे।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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चलाने वाले और चलने वालों की यह अपंगता है एक तरह की समाज में ..

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