सोमवार, 13 अप्रैल 2015

बाल उपन्यास - सुंदरी और दानव

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बाल उपन्यास - सुंदरी और दानव

उपन्यासकार -  टैसा क्रैलिंग

चित्रांकन - डियाना माओ

अनुवाद - अरविन्द गुप्ता

एक रईस व्यापारी था। उसकी तीन बेटियाँ थीं। वे सभी देखने में सुंदर थीं परंतु सबसे छोटी एकदम लाजवाब थी। उसके बाल सुनहरे और लंबे थे और उसकी आँखों का रंग आसमान की तरह बदलता था। जब वह खुश होती तब उसकी आँखें नीली होतीं और जब वह उदास होती तो उसकी आँखें नम और सलेटी हो जाती थीं। उसके पिता उसे ' मेरी नन्हीं सुंदरी ' कह कर बुलाते। जब वह बड़ी हुई तो पिता का दिया हुआ वही नाम ही उसके साथ चिपक गया और लोग उसे ' सुंदरी ' बुलाने लगे।

'' यह सही नहीं है,'' उसकी बड़ी बहनों ने कहा, '' हम दोनों भी उसके जितनी ही सुंदर हैं। आप हमें भी ' सुंदरी ' कह कर क्यों नहीं बुलाते?'' '' उससे कुछ उलझन हो सकती है,'' पिता ने कहा, '' देखो, मैं उसे ' सुंदरी ' केवल उसकी शारीरिक सुंदरता के लिए नहीं, परंतु उसके सुंदर व्यवहार के लिए बुलाता हूँ। वह हरेक के साथ अच्छा बर्ताव करती है-नौकरों के साथ भी। ''

यह बकवास '' है!'' बहनों ने कहा। दोनों बहनें सबके साथ कठोर व्यवहार करती थीं-खास कर नौकरों के साथ।

इसके बाद से दोनों बहनें सुंदरी से और भी ईर्ष्या करने लगीं। वे सुंदरी के सुनहरे और लंबे बालों और उसकी नीली-सलेटी आखों से जलने लगीं। वे उससे इसलिए भी जलतीं, क्योंकि सुंदरी के बहुत सारे दोस्त प्रशंसक । परंतु एक दिन व्यापारी एक बुरी खबर लेकर घर लौटा।

'' समुद्र में एक भयंकर तूफान आया है उसने अपनी लड़कियों को बताया '' उस तूफान में मेरे सारे जहाज डूब गए हैं। मेरा सब कुछ लुट गया है। ''

'' सब कछ?'' सबसे बड़ी लड़की को यकीन नहीं हुआ। उसने पूछा, '' आपका मतलब है कि अब हम गरीब हो गए हैं!''

'' हम पूरी तरह बरबाद हो चुके हैं पिता ने कहा '' हमारी औकात अब शहर में रहने की नहीं है। हमें इस बडे मकान को बेचकर किसी गाँव में झोपड़ी बना कर रहना होगा। ''

'' पर हम आखिर गाँव में क्या करेंगे?'' दूसरी लड़की ने झल्लाते हुए कहा। '' वहाँ न तो दुकानें होंगी न ही पार्टियाँ और न ही मजा। हम वहाँ ऊब कर मर जाएँगे। ''

'' नहीं ऐसा नहीं होगा सुंदरी ने कहा और उसने सांत्वना देते हुए पिता की पीठ सहलाई। '' हम वहाँ खाना पकाने, सफाई करने और बार-बागीचे में इतने व्यस्त होंगे कि हमें ऊबने का समय ही नहीं मिलेगा। ''

'' तुम अपनी बात करो सुंदरी!'' दोनों बहनों ने डाँटते हुए कहा '' हम नहीं चाहते कि हमारे हाथ गंदे हों और नाक बरबाद हों। तुम्हारे सुझाव के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया!''

दोनों बहनों ने कुछ काम नहीं किया। नए घर तक सामान ढोने के काम में उन्होंने सुंदरी की कोई सहायता नहीं की। दोनों बहनें दोपहर तक पलंग पर लेट कर उबासियाँ लेतीं और गाँव की नीरस जिंदगी का रोना रोती रहतीं।

परंतु सुंदरी को अपनी नई जिंदगी में मजा आ रहा था। वह फर्नीचर को साफ कर उसे पालिश लगा कर चमकाती। वह पूरे परिवार के लिए स्वादिष्ट खाना बनाती। उसे सबसे अधिक मजा बाघ में काम करने में आता था। वह बात में नए पौधे लगाती खरपत निकालती और गुलाब के फूलों की देखभाल करती। इन कामों में उसे बेहद खुशी मिलती। इस आनंद की वजह से उसकी औखें नीली और गहरी नीली हो गई। अंत में उसके सुंदर चेहरे पर आखें एकदम नीलम जैसी चमकने लगीं।

ठीक एक साल बाद व्यापारी एक अच्छी खूबर लेकर घर वापस आया।

'' एक जहाज जिसे में समझ रहा था कि डूब गया है अब सुरक्षित वापस लौट आया है उसने अपनी लड़कियों से कहा '' कल मैं बंदरगाह पर जाकर माल बेचने की कोशिश करूंगा। ''

दोनों बड़ी बहनों ने पिता के गले में हाथ डालकर उन्हें चूमा। '' पिताजी प्रिय पिताजी उसके बाद आप हमारे लिए कुछ उपहार जरूर लाएं!''

उन्हौंने प्रार्थना की।

'' गहने और नए कपड़े और पशमीने का एक कीमती दुशाला। ''

'' मैं अपनी पूरी कोशिश करूँगा ''' व्यापारी ने वायदा किया। '' अच्छा सुंदरी - तुम्हारे लिए क्या लाऊँ?

सुंदरी ने बहुत सोचा। अंत में उसने कहा '' मुझे दुनिया में एक चीज बहुत पसंद हैं। अगर आप मेरे लिए एक सुंदर सफेद भीनी खुशबू वाला गुलाब ला सकें तो बहुत अच्छा होगा। ''

दोनों बड़ी बहनें एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्करायीं। '' एक गुलाब तो खास महंगा नहीं होगा!'' शायद इसी वजह से सुंदरी ने गुलाब की इच्छा जताई थी। उसे डर था कि कहीं पिताजी अपने माल को मनचाहे दाम पर नहीं बेच पाए और उन्हें अपेक्षा से कम पैसे मिलें तो! .और उसका यह डर सही निकला। माल बहुत कम कीमत पर बिका और सब पैसे कर्ज चुकाने में चले गए। व्यापारी जब बंदरगाह से वापस घर को चला तो उसके पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं बची थी। वह सोच रहा था कि यह खबर वह अपनी लड़कियों को किस तरह बताएगा।

वह अभी थोड़ी दूर ही गया था कि बर्फ गिरने लगी। कुछ ही देर में सारी जमीन पर बर्फ की सफेद चादर बिछ गई और सड़क दिखाई देना बंद हो गई। फिर जोर की हवा चली और वह एक भयानक बवंडर में फँस कर इधर-उधर भटकने लगा।

कुछ घंटों बाद व्यापारी ने .अपने आपको एक जंगल में पाया। वह खो गया था। वह इधर-उधर कोई सुरक्षित स्थान तलाशने लगा परंतु वहाँ दूर-दूर तक कोई इमारत नहीं थी। उसे लगा कि कुछ ही देर में उसका शरीर ठंड से जकड़ जाएगा। या फिर उसे भेड़िए खा जाएँगे।

'' कोई है? कृपा करके मुझे बचाओ वह सहायता के लिए चिल्लाया। वैसे उस वीरान इलाके में उसे सहायता की कोई उम्मीद नहीं थी।

उसकी पुकार के बाद रहस्यमय ढंग से जंगल के स्थान पर घने पेड़ों की दो कतारें खड़ी हो गई। पडा के .अंत में एक सुंदर भव्य महल खड़ा था। महल की खिड़कियों से तेज प्रकाश चमक रहा था।

यह देख कर व्यापारी को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। वह जल्दी से महल के अंदर घुसा क्योंकि उसे डर था कि महल में घुसने से पहले ही कहीं वह गायब न हो जाए। उसने अपने घोड़े को अस्तबल में बाँधा और फिर वह सीढियाँ चढ कर महल के मजबूत दरवाजे के पास पहुंचा,। वह दरवाजा खटखटाने वाला ही था कि अचानक जादुई डग से दरवाजा अपने आप खुल गया।

व्यापारी ने अंदर झाँक कर देखा। '' हलो अंदर कोई है? ''

किसी की आवाज नहीं आई। वह बड़ी सावधानी से एक बडे हॉल में घुसा 'और फिर वहाँ जलती आग के सामने अपने ठंडे शरीर को गरमाने लगा। पास ही में एक मेज पर स्वादिष्ट खाना लगा था जिसकी महक चारों ओर फैल रही थी। आसपास कोई नहीं था। मेज पर सिर्फ एक इंसान के लिए खाना सजा था।

वह घबराते हुए मेज के पास तक गया। '' क्या यह मेरे लिए है?'' उसने पूछा। परंतु उसे कोई उत्तर नहीं मिला। अब तक व्यापारी की भूख इतनी बढ चुकी थी कि वह खाने के लालच को नहीं रोक सका। उसने भरपेट खाना खाया और पानी पिया। खाने के बाद उसे बहुत थकान महसूस होने लगी और वह सोने के लिए जगह तलाशने लगा।

घबराते हुए बड़ी सावधानी से उसने सीढ़ियाँ चढ़ीं..। पहला दरवाजा खोलते ही वह एक बड़े आलीशान कमरे में दाखिल हुआ। उसे अंदर एक पलंग दिखाई दिया जिस पर बहुत ही मुलायम तकिया और एक रजाई रखी थी। '' क्या यह मेरे लिए है उसने पूछा।

अगली सुबह जब वह उठा तब तक तेज धूप फैल चुकी थी। अचानक उसके पलंग के पास रखी मेज पर एक कप में गर्म चॉकलेट कहीं से आ गई। उसने गर्म चॉकलेट पी और फिर सीढ़ियों से नीचे आया। बडे हॉल में आने के बाद वह रुका और उसने चारों ओर देखा। '' हलो उसने कहा '' कोई है?''

किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।

फिर व्यापारी ने महल का भारी दरवाजा खोला। '' मैं आपके आदर-सत्कार के लिए आपका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ '' उसने अपने अज्ञात मेजबान से कहा '' परंतु अब मुझे अपनी बेटियों के पास लौट जाना चाहिए। ''

महल का दरवाजा अपने आप धीरे से उसके पीछे बंद हो गया। कल पड़ी बर्फ आश्चर्यजनक तरीके से पिघल गई और उसकी जगह पर एक खूबसूरत गुलाब का बाग़ आ गया । चलो मैं अब सुंदरी के लिए उसकी माँगी चीज तो ले जा सकता हूँ उसने सोचा।

जो कोई यहाँ रहता है उसे इतने सारे गुलाब के फूलों में से एक गुलाब कम होना नहीं खलेगा।

परंतु जैसे ही उसने एक सुंदर सफेद .सुगंधित फूल तोड़ा, .अचानक एक दिल दहलाने वाली जोरदार आवाज उठी। अगले ही क्षण उसके सामने के रास्ते पर एक दानव आकर खड़ा हो गया। दानव का चेहरा इतना भयानक था कि उसे देखते ही व्यापारी गश खाकर लगभग बेहोश हो गया। घबराकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

'' नमकहराम बेशरम!'' दानव गुर्राया। '' मेरी मेहरबानी का हिसाब तुमने इस तरह चुकाया मेरे फूल की चोरी करके? तुम्हें इसके लिए तिल-तिल करके मरना होगा। ''

'' मैं--मैं माफी चाहता हूँ '' व्यापारी ने हकलाते हुए कहा '' मेरा नुकसान करने का कोई इरादा नहीं. था। मेरी सबसे छोटी बेटी मेरी प्यारी सुंदरी को दुनिया में गुलाब के फूलों से सबसे अधिक प्यार है। इसीलिए मैंने उसके लिए एक गुलाब का फूल ले जाने की सोची। कृपा करके मुझे माफ कर दें। '' यह सुनकर दानव चुप हो गया। वह बहुत देर तक गंभीरता से सोचता रहा।

कुछ देर बाद सतर्कता बरतते हुए व्यापारी ने अपनी आँखें खोली। हिम्मत करके जब उसने संभल कर दानव को देखा तो पाया कि बदसूरत होने के बावजूद वह आदमी जैसा सीधा खड़ा था। और उसकी बोली भी किसी आदमी की भारी आवाज जैसी थी।

'' देखो व्यापारी मैं तुम्हारे साथ एक सौदा कर सकता हूँ '' उसने कहा '' तुम चाहो तो इस गुलाब को अपनी छोटी बेटी के लिए ले जाओ। उससे कहना कि अगर वह मेरे साथ खुद अपनी मर्जी से रहने आएगी तो मैं तुम्हें छोड़ दूँगा नहीं तो तुम्हें मरना पड़ेगा। ''

व्यापारी थोड़ा हिचकिचाया। वह यह नहीं चाहता था कि उसकी सबसे प्यारी बेटी किसी बदसूरत पशु का शिकार बने। परंतु इस सौदे को स्वीकार करने का बहाना बना कर वह कम-से-कम एक बार घर जाकर अपनी बेटियों से तो मिल सकेगा।

'' अच्छा दानव ने पूछा '' बताओ क्या तुम्हें यह शर्त मंजूर हैँ?''

'' मेरे पास इसे मानने के अलावा और चारा ही क्या है?'' व्यापारी ने हल्की-सी आवाज में कहा '' अच्छा तो तुम अब जाओ दानव ने कहा। '' परंतु कल इसी समय तक तुम अपनी छोटी बेटी को लेकर लौटना नहीं तो सजा मिलेगी। ''

परेशान और दुखी हालत में व्यापारी ने दानव से विदा ली और वह घर की ओर चला।

तीनों लडकियाँ अपने पिता को देखकर बेहद खुश हुई। परंतु जब दोनों बड़ी लड़कियों को यह पता चला कि उनके पिता खाली हाथ लौटे हैं तो दोनों गुस्से में खूब चिल्लाईं। और जब पिता ने सुंदरी को गुलाब दिया और उसे फूल की कीमत के बारे में बताया तो दोनों बड़ी लडकियाँ और जोर से चिल्लाई।

'' इसमें पूरी तरह सुंदरी की गलती है उन्होंने गरजते हुए कहा '' अगर उसने इस फालतू गुलाब की माँग न की होती तो ऐसा कभी नहीं होता। '' सुंदरी की नीली आँखें मुरझा कर एकदम गहरी और सलेटी हो गई। '' इसमें मेरी ही गलती है और मुझे उस गलती की सजा मिलनी ही चाहिए। '' '' मेरी प्यारी बच्ची तुम्हें नहीं पता कि तुम क्या कह रही हो व्यापारी ने विरोध करते हुए कहा '' वह दानव शायद दुनिया का सबसे बदसूरत और भयानक जीव होगा। मैं कभी भी तुम्हें उसके पास जाकर नहीं रहने दूँगा। ''

'' अगर उसे गुलाब के फूलों से प्यार है तो वह इतना खराब नहीं हो सकता सुंदरी ने अपनी हिम्मत बटोरते हुए कहा '' पिताजी मुझे अब रोकने से कोई लाभ नहीं -होगा। कल आप मुझे उस दानव के महल ले चलें। ''

अंत में हार कर व्यापारी इस बात के लिए तैयार हो गया। उसे लगा कि दानव को देखते ही सुंदरी का इरादा बदल जाएगा।

अगले दिन उसने अपनी दोनों बड़ी बेटियों से अंतिम विदा ली। परंतु वह दोनों उपहार न मिलने से इतनी दुखी थीं कि उन्होंने जाते समय पिता को चूमा तक नहीं।

जब सुंदरी और उसके पिता महल में पहुँच तो सब पहले की ही भांति ही पहले दरवाजा खुला फिर अलाव में गर्म आग जली और बाद में मेज पर स्वादिष्ट खाना लग गया। परंतु इस बार मेज पर एक की बजाय दो लोगों के लिए खाना सजा था।

'' लगता है यह दानव नर्मदिल है सुंदरी ने कहा '' नहीं तो इतनी सब तकलीफ करने की उसे क्या जरूरत थी?''

व्यापारी ने बस अपना सिर हिलाया। '' मुझ से मत पूछो। यहाँ सब कुछ रहस्यमय है। ''

जैसे ही उन दोनों ने खाना खत्म किया एक जोर की आवाज आई और सामने दानव प्रकट हुआ। सुंदरी का कलेजा तेजी से धड़कने लगा। उसने बड़ी हिम्मत से उस की ओर देखने की कोशिश की परंतु एक झलक देखने के बाद उसने अपना मुँह फेर लिया। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह देखने में इतना बदसूरत और भयावह होगा।

दानव ने उसे बहुत संभल कर देखा। अंत में उसने पूछा '' तुम यहाँ पर खुद अपनी मर्जी से आई हो?''

'' हाँ जनाब!'' सुंदरी ने नीचे रखी थाली को ताकते हुए कहा।

तब दानव ने एक लंबी आह भरी। '' आपका बहुत-बहुत धन्यवाद व्यापारी महोदय अब आपकी जान बख्श दी जाती है। आप सुबह यहाँ से चले जाएं और फिर कभी भी वापस नहीं आएँ। ''

और यह कह कर जिस तेजी से वह आया था उतनी ही जल्दी वहाँ से गायब हो गया।

'' देखो व्यापारी ने अपनी बेटी से कहा। '' अब तुम समझोगी कि मैं तुम्हें इस भयावह जीव के साथ अकेले छोड़ कर क्यों नहीं जा सकता। ''

सुंदरी का दिल डर से काँप रहा था। खौफनाक दानव के साथ रहने के विचार से ही उसका दिल दहल रहा था। परंतु अगर वह अपना मन बदलती तो उसके पिता को अपनी जान गँवानी पड़ती।

'' यह सच है कि दानव देखने में निहायत ही भद्दा है उसने माना '' परंतु मुझे नहीं लगता कि वह मेरा कुछ बुरा चाहता है। .और इस तरह मैं और आप दोनों जिंदा तो बच सकते है। कृपा कर आप सुबह होते ही चले जाएं। ''

पूरी रात सुंदरी अपने पिता को समझाती रही कि वह उसे वहीं महल में छोडकर अगले दिन घर लौट जाएँ। भोर होने से पहले पिता ने उसकी बात मान ली। रोते हुए पिता ने अपनी प्रिय सुंदरी को चूमा और फिर उससे अलविदा कह कर वह घोड़े पर सवार होकर घर की ओर रवाना हुए।

अगली सुबह सुंदरी ने अपनी हिम्मत बटोरी और वह महल के आसपास घूमने निकली। उसे बहुत आश्चर्य हुआ जब उसने एक कमरे के सामने ' सुंदरी का कमरा ' लिखा पाया। कमरे के अंदर एक पुस्तकालय एक वाद्य-यंत्र और एक अलमारी में बिलकुल उसके नाप के बेहद खूबसूरत कपड़े रखे हुए थे। उसने सोचा कि दानव चाहे देखने में भयानक क्यों न हो परंतु दिल का दयालु है। वह आईने के सामने अपने बाल संवारने के लिए बैठ गई। काश! वह अपने पिता को देख पाती और उसे यह पता चल पाता कि वह एकदम सुरक्षित है।

वैसे उसने यह बात जोर से नहीं कही। पर अचानक आईने में उसका प्रतिबिंब गायब हो गया और उसमें सुंदरी को अपनी दोनों बहनें दिखाई दीं। वह उसके पिताजी के घर लौटने पर स्वागत कर रही थीं। सुंदरी के बारे में दुखद समाचार सुनकर उन्हें धक्का लगा हो। ऐसा नहीं था। दोनों बहनें समाचार सुनकर खुश थीं और चुपके-चुपके हँस रही थीं। अगले ही क्षण यह दृश्य गायब हो गया और सुंदरी को आईने मैं अपना चेहरा दिखाई देने लगा।

यह कोई जादू ही होगा । उसने हल्के से काँपते हुए सोचा। महल की हरेक चीज अजीबो-गरीब थी जैसे वहाँ किसी ने कोई जादुई मंत्र फूँक दिया हो। दिन भर ऐसी बातें होतीं जिन्हें समझ पाना असंभव था। परंतु वह अब अपने पिता की सुरक्षा के बारे में आश्वस्त थी। उसे यह भी लग रहा था कि दानव उसकी जिंदगी को खुशहाल .और सुखी बनाना चाहता था।

सुंदरी ने पूरी सुबह अपने कमरे में बिताई। उसने किताबें पढी और वाद्य - यंत्र बजाया। दोपहर वह बार। में गई। उसे बाघ में दानव से दुबारा मिलने का डर था। परंतु वहाँ दानव का कोई निशान नहीं था। उसे बारामदे में एक टोकरी दिखी जिसमें दस्ताने और पौधों की छँटाई करने वाली एक कैंची रखी थी। सुंदरी ने दस्ताने पहन कर गुलाब के पौधों की छँटाई की।

रात के खाने तक सुंदरी इस सुखद काम में रही। थकने के बाद उसे भूख लगी और वह अंदर के बडे हॉल में चली गई। वहाँ मेज पर खाना सजा था। जैसे ही सुंदरी ने खाना शुरू किया एक जोर की आवाज के साथ दानव अंदर आया।

'' क्या मैं यहाँ बैठ कर तुम से कुछ बातें कर सकता हूँ?'' उसने पूछा।

'' नहीं सुंदरी ने उत्तर दिया। वह लगातार अपनी थाली की ओर ही देखती रही।

'' क्या तुम्हें सूप अच्छा लगा?'' उसने पूछा।

'' हाँ सूप बहुत ही स्वादिष्ट था सुंदरी ने कहा।

दानव ने लंबी आह भरी। '' तुम मेरी तरफ क्यों नहीं देखतीं? क्या इसलिए कि मैं बहुत बदसूरत हूँ?''

सुंदरी ने बड़ी हिम्मत करके दानव के चेहरे की ओर सीधे देखा। '' यह सच है कि आपका चेहरा देखने में बेहद भद्दा है उसने सच्चाई बयान करते हुए कहा, परंतु आपकी भूरी आँखें बहुत प्यारी हैं। मुझे ऐसा लगता है कि आपका दिल भी बहुत भला है। ''

दानव ने अपना राक्षसी सिर हिलाया। '' काश! एक मैं एक खूबसूरत राजकुमार होता तो शायद तुम मुझसे प्रेम करने लगतीं। ''

सुंदरी को उस पर तरस आने लगा और उसने जल्दी से कहा '' मेरी राय में दिल अच्छा होना सुंदर चेहरे से कहीं अच्छा है। ''

'' क्या तुम सच में ऐसा सोचती हो?'' दानव को कुछ उम्मीद बँधी। '' तो फिर क्या तुम मुझ से शादी करोगी?''

'' नहीं!'' सुंदरी एकदम सहम गई। '' नहीं मैं आप से शादी नहीं कर सकती। ''

'' तो फिर मैं तुम से रात के लिए विदा लूंगा दानव ने दुखी होकर कहा और वह वहाँ से गायब हो गया।

पहले कुछ दिन तो धीरे- धीरे बीते परंतु कुछ समय बाद सुंदरी को महल में रहने में आनंद आने लगा। उसे किताबें पढ़ने वाद्ययंत्र बजाने और गुलाब के पौधों की देखभाल करना अच्छा लगने लगा । परंतु सबसे ज्यादा मजा उसे शाम के समय दानव के साथ बातचीत करने में आता था।

दोनों तमाम अलग- अलग विषयों पर चर्चा करते--संगीत साहित्य बागवानी आदि के बारे में बातें करते। समय गुजरने के साथ-साथ वह दानव को चाहने लगी उससे प्रेम करने लगी। परंतु जब हर शाम वह सुंदरी के सामने शादी का प्रस्ताव रखता तो वह उसे ठुकरा देती। वह उसे एक मित्र के रूप में चाहती थी पति के रूप में नहीं।

एक शाम दानव ने कहा '' मैंने देखा है कि तुम्हारी आँखें आसमान की तरह अपना रंग बदलती हैं। वैसे तो वे खुशी से नीली होती हैं परंतु आज तुम्हारी आँखें किसी दुख से सलेटी हैं। मुझे बताओ सुंदरी तुम्हें क्या दुख है?''

'' आज मैंने जादुई आईने में अपने पिता को देखा उसने दानव को बताया '' वह मेरे बारे में इतने चिंतित हैं कि उनकी तबीयत बहुत खुराब हो गई है और वह बीमार हैं। ''

दानव ने मुँह बनाया और अपना सिर हिलाया। '' अगर तुम मुझे छोडकर जाओगी तो कभी वापस नहीं आओगी। ''

'' कृपा करके मुझे एक बार घर जाने दें सुंदरी ने प्रार्थना की। '' मैं जरूर वापस आऊँगी। मैं वादा करती हूँ। ''

दानव अभी भी दुखी लग रहा था। अंत में उसने कहा '' ठीक है तुम कल चली तो जाना परंतु जाना केवल सात दिनों के लिए। लो यह सोने की अँगूठी अपने साथ लेती जाओ। जब सात दिन पूरे हों तो इस अँगूठी को अपने पलंग के पास वाली मेज के ऊपर रख देना। इससे तुम अपने आप यहाँ अगली सुबह वापस आ जाओगी। परंतु अगर तुमने अपना वादा तोड़ा तो मैं तुम्हारे गम में मर जाऊंगा! ''

सुंदरी ने अँगूठी ली और दानव को चूम कर उससें रात के लिए विदा ली।

अगली सुबह जब वह उठी तो उसने अपने आप को अपने घर में खुद के पलंग पर लेटा पाया। वह अपने पिता का नाम पुकारती दौड़ती हुई उनके कमरे में गई।

जैसे ही पिता ने सुंदरी को देखा वह बीमारी के बावजूद पलंग से कूद कर उठ खड़े हुए और खुशी से चिल्लाने लगे। उसकी दोनों बहनें भी दौड़ कर आई। बहनें सुंदरी को देख कर खुश नहीं हुई। '' तुम यहाँ कितने दिन ठहरने के लिए आई हो?'' उन्होंने पूछा '' और हाँ तुम ये रात की पोशाक क्यों पहने हो?''

सुंदरी ने उन्हें बताया कि वह किसी जादू के कारण घर इतनी जल्दी पहुंच गई। सुंदरी ने उन्हें दानव से किया अपना वादा भी बताया। '' उसने मुझे सात दिन के लिए घर आने की इजाजत दी है उसने कहा '' अगर आप मुझे अपने कछ कपड़े पहनने के लिए देंगी तो आपका बहुत अहसान होगा?''

दोनों जलनखोर बहनों ने कपड़े देने से इंकार कर दिया। परंतु इससे कुछ फर्क नहीं पड़ा। जैसे ही सुंदरी अपने कमरे में गई वहाँ रहस्यमय तरीके से एक संदूक आ गया जिसमें उसके मनपसंद कपड़े थे। वाकई दानव दिल का बड़ा उदार है उसने सोचा।

छह दिनों में उसके पिता की तबीयत एकदम ठीक हो गई। परंतु उसकी दोनों बहनें सुंदरी की अच्छी किस्मत और बेशकीमती कपड़ों से बहुत जलने लगी थीं और वे उसको नीचा दिखाने के लिए एक चाल गढ़ने लगीं।

' अगर उसे महल मैं पहुंचने में देर हुई तो दानव सुंदरी पर बेहद गुस्सा होगा उन्होंने सोचा ' अगर हमारा भाग्य अच्छा हुआ तो शायद वह सुंदरी को मार ही डाले। हम सुंदरी को यहाँ पर अधिक-से- अधिक दिनों तक रोकने की कोशिश करेंगे। '

और फिर दोनों बहनों ने सुंदरी के साथ बहुत प्यारा व्यवहार करना शुरू कर दिया जिस पर सुंदरी को पहले तो यकीन ही नहीं हुआ। '' हमारी प्यारी दुलारी छोटी बहन तुम हमारे साथ कुछ दिन तो और रहो उन्होंने सुंदरी से विनती की '' तुम्हारे बिना हमारी जिंदगी एकदम सूनी हो गई है। ''

सुंदरी इससे दुविधा में फँस गई। एक तरफ वह अपने पिता के घर में रहना चाहती थी पर दूसरी ओर वह महल में लौटना चाहती थी। उसे ताज्जुब हुआ जब उसे दानव के साथ बिताए सुखद क्षण याद आने लगे-रात के खाने के बाद की गपशप और उसका दयालुपन।

'' मुझे कल वापस जाना है उसने कहा '' मैंने दानव से इसका वादा किया हैं। ''

यह सुनते ही दोनों बहनों ने जोर से रोने का ढोंग किया। '' पिताजी को तुम्हारी बहुत याद आती हैं... और हम दोनों को भी! कृपा करके हमें छोड़ कर मत जाओ। ''

सुंदरी ने एक ठंडी साँस ली। '' कुछ दिन और रह लेने से लगता है कोई खास नुकसान नहीं होगा। '' '' सचमुच में कोई नुकसान नहीं होगा। '' उसकी दोनों बहनों ने यह कह कर अपनी क्रूर हंसी को हाथ के पंखे के पीछे छिपा लिया।

दसवीं रात सुंदरी को एक सपना आया जैसे वह महल में गुलाब के बाग में वापस पहुंच गई हो। वहां उसके पैरों के पास दानव पड़ा हुआ था। ऐसा लगता था जैसे वह अपनी आखिरी साँसें ले रहा हो। सपने ने सुंदरी को झकझोर दिया। वह झट से पलंग पर उठ कर बैठ गई। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

'' गनीमत है कि यह केवल एक सपना ही था!'' वह खुशी से चिल्लाई। '' मैं कल जरूर वापस लौट जाऊँगी। ''

उसने अपनी अँगूठी उतार कर पलंग के पास की मेज पर रख दी और फिर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। कछ ही मिनटों में वह गहरी नींद मैं सो गई।

अगली सुबह जब उसकी अखि खुली तो उसने अपने आप को महल के, अपने कमरे में वापस पाया।

उसके पास ही उसके कपड़ों का संदूक रखा था। वह पलंग पर से कूदी और अपने कपड़े पहन कर आतुरता से शाम होने का इंतजार करने लगी। वह जल्दी-से-जल्दी दानव से मिलना चाहती थी और उसकी तबीयत के बारे में जानना चाहती थी।

परंतु जब शाम को वह खाना खाने बैठी तो भी दानव नहीं आया। सुंदरी को इसमें कुछ खतरे का संकेत दिखा और वह पूरे महल में दानव को पुकारते हुए दौड़ी। उसके बाद भी दानव का कुछ पता नहीं चला। अंत में सुंदरी एक जलती मशाल लेकर गुलाब के बाग में गई। वहाँ पर जैसा कि उसने सपने में देखा था दानव बीमार पड़ा था और एकदम मरने की हालत में था।

सुंदरी उसके पास जाकर घुटनों के बल बैठ गई। '' मेरे प्रिय कृपा करके अपने प्राण न छोड़े मैं अपना वादा तोड़ने के लिए माफी चाहती हूँ। अगर मुझे यह पता होता कि मेरे न होने से इतना अनर्थ होगा तो मैं तुरंत वापस आ जाती। मैं सच कह रही हूं।

कमजोरी की हालत में दानव ने अपनी बोझिल आंखों को खोला और सुंदरी की ओर देखा। '' मुझे लगा कि अब तुम कभी वापस नहीं आओगी... और मुझे फिर से अकेले रहना पड़ेगा जैसे कि तुम्हारे आने के पहले मैं रहता था। मुझ से यह बर्दाश्त नहीं हुआ। मुझे तुम्हारी बहुत याद सताई। '' '' और मुझे भी तुम्हारी बहुत याद आई!'' सुंदरी ने रोते-रोते कहा '' मुझे माफ कर दो मैंने अपनी नादानी में काफी बड़ी गलती की है। अब मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम देखने में लगते कैसे हो । मुझे तुम्हारी भूरी आँखों और उदार दिल से प्यार है-और मैं तुम से शादी करके सारी जिंदगी तुम्हारे साथ बिताना चाहती हूँ। ''

सुंदरी के यह कहते ही चारों ओर शहनाइयों का संगीत गूँजने लगा और आसमान आतिशबाजियों के सितारों से चमक उठा। आश्चर्यचकित होकर सुंदरी आसमान को ताकने लगी। जब उसने अपनी आँखें दुबारा जमीन पर डालीं तो उसने वहाँ से दानव को गायब पाया। उस की जगह एक खूबसूरत नौजवान था। वह अपने बेशकीमती कपड़ों में एकदम राजकुमार लग रहा था।

'' कौन-आप कौन है सुंदरी ने हकलाते हुए पूछा '' और मेरा प्रिय दानव कहाँ है?''

राजकुमार अब उठ कर खड़ा हुआ। '' मैं ही तुम्हारा दानव हूँ '' उसने कहा '' परंतु अब तुम मुझे मेरे असली रूप में देख रही ही। क्या तुम अब भी मुझसे प्यार करती हो?''

सुंदरी एकदम हक्की-बक्की रह गई'। उसने फुसफुसाते हुए कहा '' मुझे... मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। ''

'' एक दुष्ट जादूगरनी ने मुझ पर एक जादू-टोना किया था। वह तभी खत्म होता जब कोई सुंदर लड़की मेरे साथ स्वेच्छा से शादी करने को तैयार होती। '' राजकुमार ने सुंदरी की उठने में मदद की। '' तुमने अभी भी मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया सुंदरी! का तुम मुझे .अभी भी प्यार करती हो ?

सुंदरी ने राजकुमार के चेहरे को निहारा। वैसे वह खूबसूरत बहुत था

परंतु उसकी आँंखें बिलकुल दानव की तरह भूरी थीं और उनमें दया का भाव था।

'' बिलकुल सुंदरी ने शर्माते हुए कहा। ' हाँ ''

'' आप चाहें देखने में अलग हों परंतु मैं मानती हूँ कि आप वही इंसान हैं जिसके साथ मैंने प्रेम किया था। ''

राजकुमार ने सुंदरी हाथ चूमा। '' चलो फिर हम दोनों चल कर शादी करें। ''

और उस दिन से सुंदरी की आँखों का रंग हमेशा के लिए नीला बना रहा।

राजकुमार इस बात के लिए राजी हो गया कि सुंदरी के पिता और उसकी दोनों बहनें भी महल में आकर रहें। परंतु एक दिन दोनों बहनों को वही जादूगरनी मिली जिसने राजकुमार पर जादू-टोना किया था। दोनों बेवकूफ बहनों ने उसके साथ बेहूदा व्यवहार किया। '' कमीनी लड़कियों,'' जादूगरनी चिल्लाई, '' तुम्हारे दिल तो पत्थर के हैं ही, तुम्हारा बाकी शरीर भी पत्थर का बन जाए। ''

और अपनी जादुई छड़ी को घुमाकर उसने दोनों बहनों को दो बड़ी पत्थर की मूर्तियों में बदल दिया। ये मूर्तियाँ अभी भी महल के दरवाजे के दोनों ओर खड़ी हैं और अनचाहे मेहमानों को महल में आने से रोकती हैं।

परंतु सुंदरी और राजकुमार उसके बाद हमेशा के लिए खुशी-खुशी जिए, क्योंकि उन दोनों के दिलों में एक-दूसरे के लिए सच्चा प्यार था।

(अनुमति से साभार प्रकाशित)

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