बुधवार, 8 अप्रैल 2015

दीपक आचार्य का आलेख - बातों से भरता है पेट

बातों से भरता है पेट

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

बातों में रस किसे नहीं आता। जिसे नहीं आता वह या तो मूर्ख है या फिर संसार से ऊपर उठा हुआ। अन्यथा कहीं कोई ऎसा देखने को नहीं मिलता जिसे बतियाने में दिलचस्पी न हो।

हो सकता है काफी सारे लोग इस किस्म के हों जो कि खुद ज्यादा नहीं बोलते, गंभीर होने के तमाम स्वाँग रचने में माहिर हों, फिर भी ऎसे लोग बाहरी चर्चाओं, रहस्यों और सम सामयिक हलचलों को जानने के प्रति तीव्र आकांक्षी, जिज्ञासु और सतर्क जरूर रहते हैं।

ये लोग दूसरे सामान्य लोगों से ज्यादा घातक होते हैं। सीधे-सादे और सामान्यजन तो अभिव्यक्ति के उपरान्त विचारों से मुक्त हो जाते हैं जबकि हमेशा गंभीर रहकर सुनने ही सुनने वाले लोग भले ही कम संख्या में हों, मगर वे अघिक घातक होते हैं और ऎसे लोगों पर विश्वास करना आत्मघाती ही सिद्ध होता है।

दुनिया के अधिकांश लोग बोलने वाले हैं। इसके बाद सुनने वालों का नंबर आता है।  लेकिन बोलने वालों की कोई कमी नहीं है। इस प्रजाति के लोग सर्वत्र पाए जाते हैं।

जहाँ-जहाँ इंसान का वजूद पहुंचा हुआ है वहाँ-वहाँ सभी स्थानों पर बोलने वालों की कई किस्मों की भरमार है। इनमें जोर-जोर से बोलने वाले, चिल्लाने वाले, गलाफाड़ू, बेवजह बोलने वाले और नॉन स्टाप बोलने वालों से लेकर हर आकार-प्रकार के ढपोड़शंख विद्यमान हैं।

लोगों को जितना आनंद अपने कर्म या घर-परिवार के लोगों के साथ पारिवारिक चर्चाओं में नहीं आता, उतना उद्यानों, पाटों, सर्कलों, दुकानों की पेढ़ियों और तरह-तरह के डेरों में बैठकर चर्चाओं में आता है। और यह चर्चाएं भी ऎसी कि कोई सीधा संबंध उनसे नहीं होता फिर भी चूंकि दुनिया जहान की बातें इनके जेहन में होनी चाहिएं इसलिए बनी हुई रहती हैं, इनका रोजाना अपडेशन भी होता रहता है।

पहले जमाने में पनघट, बावड़ियों, कूओं, नदी-तालाबों के घाट इन चर्चाओं के केन्द्र हुआ करते थे। अब वे रहे नहीं, इसलिए नए ठिकाने बन गए। अब तो इन चर्चाओं ने आधुनिक युग में प्रवेश कर लिया है जहाँ मोबाइल और फोन ने सब कुछ आसान कर दिया है। बातें भी होती रहें और दूसरों को भनक भी  नहीं लग पाए कि किससे हो रही हैं।

बतरसिया प्रजाति में काफी कुछ तो ऎसे हैं जो अपने मोबाइल या फोन का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन अधिकांश के बारे में लोगों की पक्की धारणा यही है कि ये लोग पराये फोन या मोबाइल का ही इस्तेमाल करते हैं। फिर कई सारे गलियारे और बाड़े ऎसे हैं जहां हम काम धेले भर का नहीं करें मगर उन बाड़ों की हरेक वस्तु और संसाधन पर हम अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं जैसे कि हमारे पुरखों ने ही हमारे लिए मुफतिया प्रबन्ध कर रखा हो।

इस मामले में चालाक और कृपण लोगों का कोई मुकाबला नहीं है। जहाँ कहीं मौका देखा नहीं कि टूट पड़े। अपना मोबाइल निकाला, नम्बर देख-देख कर डायल करो और फिर बतियाते रहो, चाहे जितनी देर। कोई नहीं है पूछने वाला।

बातें घर की रसोई से लेकर बाथरूम तक की हों या फिर प्रेमालाप। अश्लील बातें हो या दूसरों की। मुफत के फोन का लाभ उठाने वाले हर तरफ भारी संख्या में हैं। ये लोग मौके की फिराक में ही रहते हैं कि कब दाव लगे और फोन के आस-पास कोई न हो।

इस प्रजाति के लोग अपनी ड्यूटी या और कोई काम करें न करें, रोजाना अधिकांश समय फोन या मोबाइल पर गुजारना इनकी ऎसी आदत बन चुकी होती है कि घर के लोग तो परेशान रहते ही हैं, वे लोग भी हैरान-परेशान रहते हैं जहाँ के ये कर्मयोगी कहे जाते हैं।

एक बार बतियाने, मीठी-मीठी चिकनी-चुपड़ी बातें करने और पूरी दुनिया के बारे में जानने की जिज्ञासाओं की तलब जिस किसी को लग जाती है वह बतियाये बिना कभी रह नहीं सकता। कई लोग तो सवेरे जगने के बाद से ही बतियाने के डेरों के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं और तीव्र प्रतीक्षा करते हैं उस घड़ी की, जब उन्हें चर्चाओं के लिए कोई ठौर मिल जाए जहाँ इन्हीं की तरह के बड़बड़ियों का जमघट लगने की सनातन परंपरा रही हो।

कुछ लोग तो रोजाना बेवजह कई सारे लोगों से बातें करने के आदी हैं। ये लोग अपने दिमाग का कचरा फोन या मोबाइल के माध्यम से उन सभी तक पहुंचाने का दैनंदिन क्रम हमेशा बनाए रखते हैं जो इन्हीं  की तरह के नुगरे, नालायक और कामचोर होते हैं।

आत्मचिन्तन से कोसों दूर ऎसे लोगों की पूरी जिन्दगी फालतू की चर्चाओं में गुजर जाती है। दुनिया के बहुत सारे विवादों के लिए इन लोगों को जनक या जननी माना जाए तो कोई बुरा नहीं होगा।

ये लोग बातों को परोसने और उन्हें स्वादिष्ट बनाने के फेर में हर बात में अपनी ओर से नमक-मिर्च मिलाकर और अपनी दिमागी खुराफात का तड़का लगाकर ही आगे से आगे परोसते चलते जाते हैं। इन लोगोें को इसी में आनंद आता है।

सीधे सादे और सज्जनों को इन लोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रखनी चाहिए क्योंकि इन लोगों के विवादित कथनों से कभी भी कोई सा विवाद पैदा हो सकता है और कभी कभार लेने के देने भी पड़ सकते हैं।

मसालची बतरसिया पुरुष और स्त्री दोनों वर्गों में हैं। इन लोगाें को जितना आनंद बातों में आता है, उतना न खाने-पीने मेें आता है, न घर वालों के साथ, और न ही अपनी ड्यूटी या दूसरे कर्मों में।

एक-दो दिन अपने चहेतों और इनकी ही तरह के बतंगड़ियों से बात करने न मिल पाए तो ये उन्मादी हो  जाएं, कई सारी बीमारियां हो जाएं।

खूब सारे बाड़े हैं जहाँ इन मुफतिया बतरसियों के बारे में चर्चाएं आम रहती हैं पर ये दीठ लोग कभी सुधरने वाले नहीं।  इन्हें सुधारने या बतरस से दूर करने का कोई जतन भी ना करे, वरना इनकी सेहत ठीक कैसे रहेगी, मनोरोगी तो पहले से हैं हीं।

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