शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

हर्षद दवे का प्रेरक आलेख - सुयोग

वर्तन परिवर्तन - हर्षद दवे

८. सुयोग

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एक बार शहर में जबरदस्त बाढ आई. पानी बढ़ता जा रहा था तो ईश्वर का एक परम भक्त पहले माले पर चढ गया. वह निरंतर ईश्वर का नाम जप रहा था. भक्त को भरोसा था कि ईश्वर उसे बचाने के लिए अवश्य आएँगे. किन्तु...

एक आदमी ने आ कर कहा: 'मेरी नैया में आ जाओ!;

'नहीं, मुझे बचाने मेरे ईश्वर आएँगे!' भकत ने कहा, 'तुम जाओ.'

बाढ का पानी बढ़ा. पहला माला डूब गया. भक्त दूसरे माले पर पहुँच गया. फिर दूसरी नैयावाला आया. उस ने कहा: 'अरे भाई आ जाओ!' भक्त का जवाब वही रहा: 'तुम जाओ, मुझे बचाने के लिए ईश्वर आएँगे.'

पानी दूसरे माले तक पहुँच गया. भक्त तीसरे माले पर जा पहुंचा. मन में वह ईश्वर का नाम रटता था पर साथ साथ उसे ईश्वर पर गुस्सा भी आ रहा था. परन्तु भीतर ऐसी श्रद्धा थी कि ईश्वर उसे बचाने के लिए जरुर आएँगे...

फिर एक नौका में कोई आया, भक्त नौका में नहीं गया... और बाढ़ के भयानक तांडव के आगे तीसरा माला भी डूब गया और भक्त भी टिक नहीं पाया...सो डूब गया.

स्वर्ग में उस की आत्मा की मुलाक़ात ईश्वर से हुई. भक्त ने बड़े क्रोध के साथ पूछा: 'कमाल करते हैं आप भी प्रभु, इतनी भक्ति की फिर भी मेरे डूब जाने तक आप मुझे बचाने आए ही नहीं!'

'आया तो था!' ईश्वर ने मार्मिक स्मित करते हुए कहा: 'तीन तीन बार नाव ले कर तुझे बचाने मैं ही तो आया था परन्तु तू मेरी नाव में आया ही नहीं तो मैं क्या करता?'

सुयोग का भी ऐसा ही है. सुअवसर कब, कहाँ और कैसे प्राप्त होगा यह पहले से नहीं जाना जा सकता. हमें उसे परख लेना चाहिए. असफलता के अंतर्गत भी मौके मिल सकते हैं. तितलियाँ उड़ जातीं हैं तो फिर वे हाथ नहीं आतीँ, ऐसा ही है मौके और सुख का! उसे पकड़ने की कोशिश करने पर वे भी उड़कर हम से दूर चले जाते हैं. और यदि हम स्वस्थ व शांत बैठते हैं तो वे आ कर तितलियों की तरह हमारे कंधे पर बैठ जाते हैं.

सुयोग के बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि उसे पैदा करो. पर मेरा अनुभव कुछ अलग है. हमें सही मौके को भांप लेना चाहिए, इस के क्लासिज नहीं होते. इन्हें अनुभव, गणना व सहज समझदारी से ही ताडा जा सकता है. रोज नई सुबह, इस से बड़ी अपोर्च्युनिटी और क्या हो सकती है? उदित होता सूर्य हमें नई शरुआत करने की प्रेरणा देता है.

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हर्षद दवे

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