शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

गीता दुबे की लघुकथा - कुंठा के बीज

कुंठा के बीज

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बात उस समय की है जब मैं जूनियर क्लासेस में पढ़ाया करती थी, तब मैं के.जी. की क्लास टीचर भी थी| मेरी कक्षा में कुल 52 बच्चे थे, सभी बच्चों की अवस्था चार से पांच के बीच की थी| बहुत जल्दी सारे बच्चे मुझसे घुल-मिल गए थे सिवाए एक बच्ची के... नेहा नाम था उसका| मैंने देखा वह सबसे पिछली सीट पर बैठा करती, बाकी बच्चों के साथ हँसना- खेलना तो दूर उसे मैंने बातें करते भी नहीं देखा था| हमेशा संकोच से सिमटी नेहा की नजरें जमीन को ताकतीं रहतीं| गेम पीरियड में किसी भी खेल में हिस्सा लेना नहीं चाहती| यूनिफार्म उसके गंदे होते, जूतों पर पालिश नहीं होती, हाथों के नाखून काले-काले बढ़े रहते और तो और नेहा कभी टिफिन बॉक्स नहीं लाती, टिफिन टाइम में वह ललचाई नजरों से दूसरे बच्चों को देखती रहती| उसकी कम्प्लेन-डायरी कम्प्लेन्स से भर चुकी थी... लेकिन उसके पेरेंट्स की तरफ से कभी कोई जवाब नहीं आता| ऐसा लगता मानो नेहा बिन माँ- बाप की बच्ची हो|

मैंने देखा नेहा स्कूल एक बड़ी गाड़ी इनोवा से आती .. बकायदे ड्राइवर सफेद वर्दी में होता और उसका हाथ पकड़ उसे स्कूल कैम्पस में छोड़ जाता| मतलब वह पैसे वाले घर से ताल्लुक रखती थी| क्या करूँ? नेहा ऐसी क्यूँ है... मैं उसे लेकर काफी परेशान रहने लगी थी| घर आने पर भी नेहा का मासूम चेहरा आँखों के सामने घूमता रहता... जब मैंने प्रिंसिपल से नेहा के बारे में बताया तो उन्होंने मुझे उसे स्कूल से निकालने की सलाह दी, कहा कि ऐसे लापरवाह गार्जियन के बच्चों के लिए हमारे स्कूल में जगह नहीं है| प्रिंसिपल की दी सलाह मैं मानने को तैयार नहीं थी क्योंकि नेहा पढ़ने में ठीक थी, उसकी लिखावट साफ थी, सभी राइम्स उसे याद होते,  एडिसन-सबट्रैकशन वह झट सॉल्व कर देती| अब मैं नेहा को अधिक से अधिक जानने और समझने के प्रयास में लग गई| मैं क्लास के समय उसे अपने पास बैठाने लगी, हर रोज उसके लिए एक टिफिन बॉक्स में कुछ बिस्किट ले आती और टिफिन टाइम में उसे दे देती| टिफिन टाइम में जब सब बच्चे खेल रहे होते मैं उसे कहानियाँ सुनाती, कहानी से सम्बंधित सवाल पूछती.. वह खुश होती, सारे जवाब सही सही  देती| बहुत जल्दी ही वह मुझसे घुल- मिल गई|

फिर एक दिन मैंने उससे पूछा....

नेहा आपके घर में कौन- कौन है?

चार वर्षीय नेहा ने रुक-रूककर कुछ तोतली जबान में बताया...

मम्मी,पापा,दादी, स्नेहा दीदी, मैं और लवली...बस..और...

और कौन नेहा...

और....

हूं...और कौन बोलिए नेहा....

 

वह मेरी कलाई में पहनी कंगना को छूने लगी.. टीचर, टीचर मुझे भी ऐसी ला दीजिए न..

ठीक है, पहले आप बताइए और कौन है आपके घर में?

और हमारे घर में राजा भैया आने वाला है....

अच्छा... आपको कैसे पता कि राजा भैया आने वाला है..

हाँ.. टीचर राजा भैया ही आने वाला है.. वो अभी मम्मी के पेट के अंदर है..

कल पापा, मम्मी और दादी डाक्टर के पास गए थे.... फिर मम्मी ने बताया कि हमारे घर राजा भैया आने वाला है..

टीचर,टीचर कल पापा हमारे लिए चाकलेट भी लाए थे..नहीं तो...

नहीं तो क्या नेहा...

नहीं तो पापा, मम्मी, दादी सभी हमें मारते हैं...

क्यों मारते हैं बेटा..आपलोग बदमाशी करते होंगे?

नहीं टीचर, हम बिल्कुल भी बदमाशी नहीं करते, हम खेलते भी नहीं हैं.. मम्मी, पापा की सारी बातें मानते हैं..

फिर क्यों मारते हैं तुमलोगों को?

क्योंकि टीचर हम लक्की(लड़की) हैं ना....

चार वर्षीय बच्ची नेहा की जबान अभी लड़की शब्द ठीक से बोल भी नहीं पाते थे, अभी दूध के दांत तक नहीं टूटे थे लेकिन उसके माता-पिता ने उसके अंतर्मन   

में लड़की होने की कुंठा के बीज बो दिए थे|

गीता दुबे

जमशेदपुर, झारखण्ड                   

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