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बोझ ही हैं ये उपदेशक

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डॉ  दीपक आचार्य

धरती पर काम करने वालों के मुकाबले कई गुना लोग हैं जिनकी जिन्दगी का एकमात्र मकसद सलाह देना ही रह गया है।

भ्रम कहें या उन्माद की अवस्था, इन राय देने वालों को यह लगता है कि दुनिया में भगवान ने उन्हें सिर्फ राय देने के लिए ही भेजा हुआ है और इस मामले में वे किसी महामेधा सम्पन्न बुद्धिजीवी या त्रिकालज्ञ ज्योतिषी से कम नहीं हैं 

यह भ्रम इन लोगों को न ढंग से जीने देता है और न ही मरने। पूरी दुनिया इनसे परेशान हैं, आप और हमारी क्या हस्ती है।

ये हमेशा दूसरों को बिना मांगे राय देना अपना वह फर्ज समझते हैं जिसे अदा करने के लिए ही उनका संसार में पावन अवतरण हुआ है।

असली सलाहकार वही है जो मांगे जाने पर ही राय दे और वह भी सही-सही। औरों को खुश करने के लिए तो बिल्कुल ही नहीं।

पढ़े-लिखे इंसान को हमेशा नेतृत्व करने का फोबिया दिमाग पर हावी रहता है इसलिए वह मेहनत नहीं कर सकता, वह हुकूमत करना चाहता है।

जबकि जो इंसान अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा है उसे मेहनत-मजूरी और काम-धाम करने में किसी भी प्रकार की कोई शर्म नहीं आती।

वह मेहनतकश होता है और मेहनत का मूल्य जानता है इसलिए पूरी ईमानदारी के साथ मेहनत करता है और मेहनत का अपने-अपने हिसाब से फल प्राप्त कर ही लेता है कभी कम, कभी अधिक।. 

जो मेहनत करता है वह अपने काम-धंधे और प्रवृत्तियों में व्यस्त रहता है और इसलिए दुनिया जहान के बारे में अनर्गल और अनावश्यक चर्चाओं के फितूर से दूर ही रहता है।

उसे इतनी फुर्सत ही नहीं होती कि दूसरों के बारे में फालतू की बातें करे और उन्हीं चर्चाओं में डूबा रहकर आनंद प्राप्त करता रहे।

जो लोग मेहनत से जी चुराते हैं, जिनसे मेहनत-मजूरी या कोई सा काम नहीं हो सकता, जिनका दिमाग नालायकियों और शातिर कामाें व शरारती चर्चाओं के भंवर में फँस गया हो,शरीर किसी काम का नहीं रहा हो, पुरुषार्थ की बजाय हराम की कमाई की आवक बनी हुई हो और बिना काम किए कहीं न कहीं से पैसा और जीवन निर्वाह की सामग्री प्राप्त होती रहे, उन्हीं लोगों के पास फालतू का समय होता है।

यही वे लोग हैं जो टाईमपास के लिए बेवक्त पैदा हो गए हैं, जिन्हें लगता है कि  संसार में अब और कोई काम शेष बचा ही नहीं है, सिवाय किसी न किसी तरह समय गुजारने के।

इस किस्म के नालायक और टाईमपास लोगों को अपने या परिवार के बारे में सोचने तक की भले ही फुर्सत न हो, अपने आस-पास से लेकर दुनिया के कोने-कोने तक के बारे में पूरी गंभीरता के साथ गहन चर्चाएँ करने, अपने हिसाब से औरों को दिग्भ्रमित कर चलाने और अपने कुटिल षड़यंत्रों भरे संकल्पों को पूरा करने के लिए हमेशा फुरसत बनी रहती है।

इन लोगों का दिमाग शैतान का घर हो जाता है। हो भी क्यों नहीं, जब खाने-पीने और दूसरी वस्तुओं के लिए इन्हें कोई मेहनत नहीं करनी पड़े, औरों को दबाकर या किसी न किसी तरह उल्लू बनाकर पैसा बटोरने का हुनर इन्हें घर-परिवार और आजीविका निर्वाह की सारी चिन्ताएं दूर कर देता है।

इस स्थिति में इनका पूरा समय अपने संस्थानों, समाजों और क्षेत्रों में गंदगी फैलाने, लोगों को भ्रमित करने तथा अपने गोरखधंधों को आकार देने के लिए कुटिल चालों, झूठ-फरेब और कदाचार में ही बीतता रहता है।

इस प्रजाति के लोगों का पूरा जीवन उपदेश या सलाह देने में ही व्यतीत होने लगता है।

ये लोग दिन भर में कई-कई डेरों में जा जाकर वहाँ बैठे लोगों को अपने-अपने हिसाब से कोई न कोई सलाह दे डालना कभी नहीं भूलते। यहां तक कि आगंतुकों और मेहमानों को भी सलाह देना नहीं भूलते।

इन सच्चे समाजसेवकों और समाजसुधारकों की बातों पर हालांकि हम लोग कोई गौर नहीं करते। एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल दिया करते हैं।

इसका मूल कारण यह है कि इनकी सारी सलाहें और उपदेश केवल वाणी के विलास से अधिक कुछ नहीं होते।

ये लोग जो उपदेश देते हैं वे सिर्फ इनके खुराफाती दिमाग की कल्पनाओं से भरे होते हैं और इनके पीछे न  तो इनका कोई ज्ञान या अनुभव बोलता है, न कोई आचरण।

जो लोग खुद निगुरे, नाकारा, निकम्मे और नालायक हैं वे ही दूसरों को उपदेश देने का काम करते हैं।

हर बाड़े और डेरे से लेकर मानवी गलियारों तक में ऎसे उपदेशकों की संख्या खूब है जो चाहते हैं कि पूरी दुनिया उनके विचारों, उपदेशों और सलाह का लोहा माने, सारा संसार और लोग उन्हीं के हिसाब से चलें।

इस पक्के और दुष्टताओं से भरे दुराग्रहों ने श्रेष्ठ और सकारात्मक चिंतन से भरपूर कई लोगों का जीना हराम कर दिया है।

ये दुराग्रही, सिद्धान्तहीन और तथाकथित बुद्धिजीवी लोग एक दिन में कई-कई लोगों को उपदेश देने का काम करते हैं।

अपने आस-पास भी ऎसे ढेरों दुराग्रही पतंगे अक्सर मण्डराते रहते हैं जो अपना कोई वजूद भले न बना पाएं हों, मगर दूसरों को बिना मांगे उपदेश या सलाह देने में कभी पीछे नहीं रहते।

इन उपदेशकों और सलाह देने वालों से जब भी कहीं पाला पड़े, इन लोगों की बातों को ध्यान से सुनें और इन्हीं से कहें कि वे कदम बढ़ाएं, हम उनके साथ हैं।

जो उपदेश दे उसे उसके उपदेशों के अनुरूप कोई न कोई काम सौंप दें, वे जो कुछ कहें उसमें उन्हीं को आगे कर दें और सहयोग की बात कह दें, अपने आप इनका उपदेशी स्वभाव थम जाएगा क्योंकि सलाह और  उपदेश देने वाले लोग सिर्फ बातें करना ही जानते हैं, कोई काम करना उनके बूते में नहीं होता।

इस प्रजाति के लोग दिमाग और शरीर दोनों से कमजोर होते हैं। हर उपदेशक या सलाहकार को कोई न कोई सौंप दें, फिर देखें इनकी असलियत।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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आचार्य जी,
बात तो आपने सही ही कही है.
लेकिन पिछले तीन चीर महीनों से मैं आपको इसी पेशे में देख रहा हूूँ.
निर्णय क्या लूँ और कैसे लूँ.
अयंगर.

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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