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बुन्देलखन्ड की महिमा

डॉ० पवन अग्रवाल

बीर-जननी भूमि-बुन्देलखण्ड को अपनो पौरानिक, इतिहासिक, साहित्यिक सांसकृतिक महत्त्ब है। बिन्ध्याचल परबत सिरंखला को भू-भाग होबे के कारन जाको एक नांव बिन्ध्यइलाखन्ड भी हैगो। धसान, पार्बती, सिन्धु, बेतवा,चम्बल, जमुना, नरमदा, केन, टोंस और जामनेर नाम की दस नदियों से भरोपूरो होबे के कारन जाहे ‘दशार्ण’ भी कहो जात है। जा क्षेत्र को नांम बुन्देलखन्ड गहरबारबंसीय हेमकरिन पंचम के, अपनो नांव बुन्देला रखबे के बाद, बिनकी पीढ़ियों ने सासन करो तैं जो राज्य-बुन्देला बुन्देलखण्ड कहलाओ।

बिन्ध्य भूमि, बा भूमि है जोन की भगवान सिरी राम की आस्रय इस्थली बनके गौरबान्बित भई, जितै हिरन्यकस्यप को बध करबे के लाने नरसिंह अबतार भओ थो, समुद्रमंथन से उत्पन्न कालकूट को पान करबे के बाद भगबान संकर ने झईं बनों कालिंजर में आराम करो थो और जई धरती पे भगबान सिरीकिस्न को नांव ’रनछोड़’ पड़ो।

आदिकबि बाल्मिकी जी, बेद ब्यास, किस्न द्वैपाअन, दिरोनाचार्य जैसे बड़े गुरु जई भूमि पे पैदा भए। जोई छेत्र सूर-तुलसी की तपोभूमि कैलाओ, केसव-भूसन-ईसुरी-गुप्त की कबीभूमि, आल्हा-ऊदल छत्रसाल-हरदौल लछमीबाई की बीरभूमि, तानसेन, बैजूबावरा, प्रवीनराय की कलाभूमि जोई बुन्देल खन्ड रहो है।

ययाति नंदन-यदु, चेदिराज-सिसुपाल, गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त और समुद्रगुप्त, चंदेलराज-धंग और परमर्दिदेव, बुन्देला-मधुकरसाह, छत्रसाल, तोमर नरेस मानसिंग और मराठा लछमीबाई आदि सबई के रनकौसल से जाकी धरती सुरक्षित, बिकसित, चर्चित रई हैगी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी चन्द्रसेखर आजाद ने झईं अज्ञातबास करो थो, पं. परमानन्द, मास्टर रुद्रनारायन, भगवानदास माहौर, भाई सदासिव मलकापुर आदि सब जई भूमि के लाल हते।

बुन्देलखन्ड के दुर्ग, पिरसाद, मंदिरों के भग्नाबसेस खुद अपनी इस्थापना, ऐतिहासिकता की जसोगाथा कैत हैं। खजुराहो, देवगढ़, अजयगढ़, चंदेरी, ग्वालिअर आदि सबै केन्द्र, चित्रकूट, ओरछा, कुन्डेस्बर, कालिंजर, अमरकन्टक,जैनतीर्थ - सोनागिरि, सूर्य मंदिर बालाजी सब को अपनो धार्मिक महत्ब है। बिस्वबिख्यात पहलवान-गामा और हॉकी-जादूगर ध्यानचंद ने भी बुन्देलखन्ड भूभाग हे एक पहचान दई। नरमदा मइया को जा हे असीस मिलो है।

आज के समय में लोग बुन्देलखन्ड घूमबे भी आत हैं। बुन्देलखन्ड बिस्वबिद्यालय में पढ़बे आत हैं। आंगे भी सब के जोगदान से जा भूमि को नांव रोसन होत रै है।

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