गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

अंकिता आचार्य पाठक का बुन्देली आलेख - बुन्देली भासा को बिकास

बुन्देली भासा को बिकास

अंकिता आचार्य पाठक

भासा अभिब्यक्ति को एक ऐसो समर्थ साधन हैगो जेके माध्यम से मनुस्य अपने बिचारों हे दूसरों से पिरकट कर सकत है और दूसरों के बिचार जाना सकत है।
संसार में कईठो भासाएँ हैं। जैसे-हिन्दी,संस्किरित,अंगरेजी, बँगला,गुजराती,पंजाबी,उर्दू, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, फिरैंच, चीनी, जर्मन आदि। कई नगर गाँब एसे हैंगे जितै मानक भासा को पिरयोग कम होत है, उतै बोली को बरचस्ब है। जैसे उत्तर पिरदेस में भोजपुरी, बिहार में बिहारी, मध्ध पिरदेस में बुन्देली, खड़ी बोली, केबल बोली को नावँ सुनके बता सकत हैं कि बा कहाँ बोली जात है।

जब बोली इतनी समरिद्ध हो जात है कि बा में साहित्य, उपन्नास, लिखे जान लगें और कुछु राजकीय कार भी होन लगैं तो समझलो कि बा बोली भासा को दरजा पा सकत है। मनो जा के सांत सांत जो भी जरूरी है कि बड़ी संख्या में लोग बा बोली को पिरयोग करें। जित्तो जादा बाको पिरयोग हूहै, बा बोली को बिकास भी तेजी से होत जा है।
भासा दो पिरकार की होत हैं-
1. मौखिक भासा।
2. लिखित भासा।
आमने-सामने बैठे लोग एकदूसरे से बातचीत करत हैं या कोई बियक्ती भासन आदि से अपने बिचार पिरकट करत है तो बा भासा को मौखिक रूप कैलात है।

जब लोग किसी दूर बैठे बियक्ती हो चिट्ठी या किताबों और पत्र-पत्रिकाओं में लेख के माध्यम से अपने बिचार पिरकट करत है तब बा भासा को लिखित रूप कैलात है। भासा को मौखिक रूप तो दूसरी भासाओँ के सम्पर्क में आबे के मारे बदलत जात है मनो लिखित रीप सुरच्छित रैत है, और लिखित रूप के लाने बियाकरन को होबो जरूरी है।

हर मानक भासा को बियाकरन होत है बियाकरन से भासा को नियम बद्ध करत है। एसो मानो जात है कि मनुस्य मौखिक और लिखित भासा में अपने बिचार पिरकट कर सकत है और करत रैहे मनो जासे भाषा को कोई निच्चित और सुद्ध सुरूप स्थिर नहीं हो सके। भासा के सुद्ध और स्थाई रूप हे निच्चित करने के लाने नियमबद्ध योजना की आवस्यकता होत है और बई नियमबद्ध योजना हे हम व्याकरण कैत हैं।

बुन्देलखण्ड की बोली बुन्देली है। जाको बिकास कई भौगौलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक कारनों से अलग- अलग दिसाओं में भओ है। आदर्स या मानक बुन्देली को सुरूप मध्य छेत्र में ही देखबे मिलत है। बुन्देली बोली अपने आप में समरिद्ध है जईसे जा एक भासा को रूप गिरहन करबे में सछम है। सौरसेनी अपभ्रंस से निकली बुन्देली मध्य पिरदेस की जन भासा है। आदर्स बुन्देली जालौन, हमीरपुर, झाँसी, सागर, ग्वालियर, भोपाल, सिवनी, ओरछा, नरसिंहपुर, होशंगाबाद तथा दतिया आदि में बोली जात है। मध्यदेस के बाकी जिलों में बोली जाबे बारी बुन्देली मिस्रित बुन्देली या बुन्देली की उपबोलियाँ हैंगी, जिनैं उतै की छेत्रीय भासा कहो जात है। नरमदा के दछिन में बैतूल, सिवनी और छिंदवाड़ा तक बोली जाबे बाली बुन्देली पे मराठी को पिरभाव है। उत्तर में ब्रज और कन्नौजी, पूर्वी छेत्र में अवछी, बघेली और छत्तीसगढ़ी और पश्चिम में मालवी और निमाड़ी को पिरभाव साफ झलकत है।

आदर्स बुन्देली या ठेठ बुन्देली के सब्द हिन्दी से अलग हैंगे। संस्किरित भासा के बिद्रोह सुरूप पिराकिरित और अपभ्रंस भासाओं को बिकास भऔ, झिनमें देसज सब्दों की अधिकता हती। सौरसेनी अपभ्रंस से बिकसित बुन्देली मध्यदेश की सम्पर्क भासा के रूप में कई सालों तक इस्थित हती। बुन्देली के ऐसे कई सब्द पिरचलित हैं जिनको पिरयोग हिन्दी में नहीं होए। बुन्देली में दसठो स्वर और सत्ताइसठो ब्यन्जन हैं। बुन्देली में हिन्दी के ऋ, अः, ञ, ष, क्ष, त्र, ज्ञ अछर नईं हैं। बुन्देली संयुक्ताछर बाली भासा है—इत्ते- इतने, कल्लई- कर लिया, अब्बई- अभी, बिन्ने- उन्होंने, जिन्ने- जिस ने, कोन्ने- किस ने, खोल्लई- खोल लिया, लगत्तो- लगता था आदि। जइसो जाके उच्चारन में भौत अंतर देखबे को मिलत है। हिन्दी स्वरों को उच्चारन बुन्देली में जा तरह से करो जेहै—अ, आ, अि , अी, अु , अू , अे , अै , अो , अौ , अं। बुन्देली भासा में नासिक्क ध्बनियों को पिरयोग अधिक होत है—ऊखौं, जैहों, करहों, खालेने, देखहों, आहौं, खाँड़, ऊंसई, पोंच, भुंसारे, नइंयां आदि। बुन्देली के कुछु सब्द अनूठे हैंगे जिनको पिरयोग बोलचाल में जादा होत है—बटाठाई- आवारा या बिना काम के, जुगत- जोगाड़, दांद-उमस, भुंसारे- भोर, सकारे- सबेरा, घांई- जैसा। बुन्देली भासा ब्यबहार (मौखिक भासा) में सघोस अछरों (स्वर) को पिरयोग अधिक करो जात है। जैसे- करत्तो- करत्थो, चाहत्ती- चाहत्थी, हतै- हथै आदि।

जा पिरकार से बम देख सकत हैं कि हिन्दी की एक बोली हिन्दी से कैसै भिन्न है। भासा को बिकास होत है, या भासा से कोई बोली बिकसित होत है बा को कोई ने कोई कारन जरूर रैत है।

मानक हिन्दी में संस्किरित के सब्द उर्दू के सब्द सामिल हैं जइसे बुन्देली हिन्दी से अलग दिखत है। काय से बुन्देली में हिन्दी के कई वर्ण पिरयोग में नइयां।

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