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देश की मरणासन्न शिक्षा व्यवस्था

चुनौतियों से निपटने ठोस पहल नहीं

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सूर्यकांत मिश्रा
मानवजाति के विकास की आधार शिला शिक्षा को माना जाता है। एक सुव्यवस्थित शिक्षा प्रणाली ही मानव को सुसंस्कृत, संवेदनशील एवं विवेकशील बनाने के साथ विचारवान गुण का प्रस्फुटन करती है। किसी भी राष्ट्र के विकास में शिक्षा एक अपरिहार्य कारक के रूप में सामने आती है। शिक्षा ही किसी देश की विकास प्रक्रिया का अभिन्न अंग भी होती है। यही कारण है कि मानवीय संतुलित विकास को ध्यान में रखते हुए समाज में शिक्षा को उच्च प्राथमिकता के दायरे में रखा गया है। शिक्षा के सकारात्मक पहलुओं काकितना लाभ मनुष्य ने लिया है, यह तब ज्ञात हो पाता है जब मनुष्य के गुणों का परीक्षण कर उसकी क्षमताओं के उपयेाग पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। यह भी परखा जाता है कि शिक्षा से कौन सी सीख मनुष्य ने पायी है और अज्ञन के अंधकार केा किन अेशों तक दूर कर पाया है। शिक्षा के मूल्यों में वह ताकत है, जिससे मनुष्य सही और गलत में भेदकर समाज को आगे ले जाने मार्ग अग्रसर होता है। आजादी के बाद से शिक्षा के अधिकार से जुड़े कानूनों ने सामान्य वर्ग से लेकर खास वर्ग तक सर्वांगीण विकास की कितनी ही उम्मीदें क्यों न जगायी हो, सच्चाई यही है कि आज भी देश में कई करोड़ गरीब परिवार के बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित है


प्राचीन काल से ही भारत वर्ष को शिक्षा के सबसे केंद्र के रूप में जाना जाता रहा है। केवल भारतवर्ष ही नहीं अनेक देश के लोग यहां शिक्षा प्राप्त करने आते रहे है। शिक्षा और संस्कृति के लिये पूरे विश्व में सम्मान के साथ लिया जाने वाला नाम नालंदा, तक्षशिला और प्रयाग ऐसे ही प्रसिद्ध प्राप्त नहीं कर लिया। इन शिक्षा के केंद्रों में मिश्र, यूनान, चीन, श्रीलंका, इंडोनेशिया आदि देश के विद्यार्थियों ने शिक्षा ग्रहण कर ऊंचाईयों को प्राप्त किया। शिक्षा की भारतीय पद्धति को हमेशा एक आदर्श शिक्षा प्रणाली की संज्ञा दी गयी। कारण यह भी भारतीय प्राचीन शिक्षा पद्धति नैतिक शिक्षा एवं नीतियों से परिपूर्ण थी। बड़े दुख के साथ लिखना पड़ रहा है कि शिक्षा की वह सम्मानजनक पद्धति अब कही भटक गयी है। शिक्षा का उद्देश्य क्या है? इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करें तो आधुनिक शिक्षा प्रणाली से इसका कोई सरोकार नहीं है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली का अस्त व्यस्त ढांचा आज हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रचलित देखा जा रहा है। अंग्रेजों के शासनकाल में विकसित शिक्षा का वर्तमान स्वरूप आजादी के बाद भी आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन नहीं किया जा सका है। शिक्षा जगत से प्रत्यक्ष संबंध रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास होना चाहिए, किंतु वर्तमान ढांचा विद्यार्थियों की रूचि के अनुसार महज नौकरी तक ही सीमित रह गया है। शिक्षा में ज्ञान का परिमार्जन पूरी तरह से अंधेरे में खो गया है।


हमारे देश में वर्तमान में शिक्षा का दिख रहा स्वरूप ज्ञान या जानकारी के खजाने से दूर व्यवसायिक ढांचे में ढला हुआ है। जितने प्रदेश उतने पाठ्यक्रम। एक प्रदेश की सरकार द्वारा दूसरे प्रदेश की शिक्षा के मानकों को स्वीकार न करना एक फैशन बन गया है। अखिल भारत वर्ष में रहने वाला बच्चा शिक्षा पूरी कर अपने ही देश में विभिन्न सरकारों द्वारा अलग अलग नजरों से देखा जा रहा है। कहीं उसकी उपाधि को शक के दायरे में रखा जा सकता है, तो कहीं उसके द्वारा पढ़े गये विषयों को ही निकृष्ट अथवा हल्का बताया जा रहा है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंड्री एजुकेशन (सीबीएसई) से लेकर आईसीएसई तथा कैम्ब्रीज के कोर्स को उत्तम मानते हुए प्रदेश सरकार के पाठ्यक्रम को न मानना या उसकी उपयोगिता को नकारना कहां का सिद्धांत है। जब भारत वर्ष में पढ़े सभी बच्चों के प्रगति पत्र अथवा बोर्ड द्वारा दिये गये प्रभाव पत्र में सभी को भारतीय की श्रेणी में रखते हुए मान्यता दी जा रही है, तो स्टेट बोर्ड की महत्ता को कम करके आंकना सरकारें क्यों बर्दाश्त कर रही है? इन सबके पीछे जो उद्देश्य छिपा है, वह केवल व्यवसायिकता से संबंध रखता है। आज पूरे देश में सीबीएसई का बोलबाला है। केंद्रीय सरकार भी यह चाहती है कि इस पाठ्यक्रम से बच्चों को शिक्षित करने के लिये सस्ती और अच्छी पुस्तकों का सहारा लिया जाये। पाठ्यक्रम को समायोजित करते हुए एनसीईआरटी प्रकाशक की सस्ती और उपयोगी पुस्तकें उपलब्ध कराई गई है। ‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद’  (National Council Of Educational Research & Trainning)  द्वारा प्रकाशित पुस्तकें सस्ती और उत्तम होने के बावजूद स्कूल संचालकों द्वारा इन्हें न पढ़ाया जाना अथवा संपूर्ण न मानते हुए टेक्स्ट बुक के नाम पर कक्षा 6वीं से 12वीं और कक्षा 1ली से 5वीं तक निजी प्रकाशकों की मोटी-मोटी पुस्तकें लगाना व्यवसाय की पुष्टता का ही प्रमाण है।


शिक्षा की व्यवस्था को यदि पटरी पर लाना है तो केंद्रीय सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय जिसके अधीन केंद्रीय शिक्षा विभाग भी सम्मिलित है, को पूरे देश में एक पाठ्यक्रम लागू कर शिक्षा के प्रति एकरूपता का संकल्प पूरा करना होगा। साथ कक्षा एक से लेकर उच्च शिक्षा तक पुस्तकों का प्रकाशन भी विभाग द्वारा कराते हुए शिक्षा विशेषज्ञों को लेखन का कार्य सौंपना होगा। इससे प्रकाशित पुस्तकें कम दर पर उपलब्ध कराई जा सकेंगी और शिक्षा के मामले में फल फुल रहे ऊंच नीच के भेदभाव को भी समाप्त किया जा सकेगा। शिक्षा विशेषज्ञों का सम्मेलन इस तारतम्य में आयोजित कर सभी पाठ्यक्रमों को अच्छे अंशों को लेते हुए एक नये पाठ्यक्रम का नाम देना उचित होगा। पाठ्यक्रम का एकरूपता बच्चों में सामान रूप से प्रतियोगी विचार को पुष्ट कर सकेगी। इस प्रकार का परिवर्तन आ जाने के बाद स्कूलों की रैंकिंग पर भी ध्यान देना होगा और सुविधाओं के अनुसार शुल्क निर्धारण भी आसान होगा। इस बड़ा फायदा यह होगा कि किसी भी रैंक वाले स्कूलों में बच्चों का दाखिला हो, वह पढ़ेगा वही जो एक अच्छे रैंक वाले स्कूल में पढ़ाया जा रहा है। शिक्षा की विभिन्न के आधार पर बट रहा समाज भी ऐसे परिवर्तन से संगठित हो सकेगा, भेदभाव के लिये कोई स्थान होने से सभी अपनी क्षमता के अनुसार विकास के दौर में एक दूसरे को पीछे करने प्रयासरत होंगे, जो एक ‘शिक्षा के दूत भारत’ का निर्माण करने में सहायक होगा।


शिक्षा के संबंध में हमारे देश के द्वितीय राष्ट्रपति एवं स्वयं शिक्षक रहे सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन ने कहा था कि ‘मात्र जानकारियां प्रदान करना ही शिक्षा नहीं है, यद्यपि जानकारी का अपना महत्व है और आधुनिक युग में तकनीकी जानकारी महत्वपूर्ण भी है। तथापि व्यक्ति के बौद्धिक झुकाव के प्रति समर्पण की भावना और निरंतर सीखते रहने की प्रवृत्ति का बने रहना आवश्यक है।’ कभी पूरी दुनिया को शिक्षा के लौ दिखाने वाले भारत वर्ष में अभी भी शिक्षा के मामले में प्रयोग ही किये जा रहे है, जो हमारी पीढ़ी के लिये खतरनाक है। एक दशक पूर्व पढ़े गये पाठ्यक्रम का अगले दशक में पूरी तरह बदल जाना भी उचित नहीं माना जा सकता है। शिक्षा को एक बड़ी चुनौती मानते हुए योजना आयोग ने एक नया प्रयोग करते हुए अब पीपीपी आधार पर चार बिजनेस मॉडल की पहचान की है। ये मॉडल है-पहला बुनियादी ढांचा मॉडल, दूसरा आऊट सोर्सिंग मॉडल, तीसरा मिला जुला मॉडल और चौथा रिवर्स आऊट सोर्सिंग मॉडल। शिक्षा के क्षेत्र में पीपीपी मॉडल अमेरिका, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, चिली, कनाडा और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में अपनाया गया है और सफल रहा है। इस मॉडल द्वारा पूंजी की कमी दूर होती है। कार्यकुशलता बढ़ती है, जोखिम कम होता है, खर्च कम होता, जवाबदेही-गुणवत्ता नियंत्रण और लचीलापन भी बढ़ता है। हमारे देश में पीपीपी मॉडल कितना सफल हो सकेगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता है। शिक्षा की स्थिति को देखते हुए हमारे पूर्व राष्ट्रपति एवं वैज्ञानिक डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने भी कहा है ‘अच्छी शिक्षा पद्धति समय की आवश्यकता है, ताकि विद्यार्थियों का प्रबुद्ध नागरिक के रूप में विकसित होना सुनिश्चित किया जा सके और उनकी राष्ट्रीय विकास योजनाओं में भागीदारी भी हो सके।’

 
शिक्षा की जहां चर्चा की जा रही है, वहां भारतीय मेघा अथवा बुद्धि की बात न की जाए तो चर्चा अधुरी ही रह जायेगी। भारतीय मस्तिष्क ने हमेशा से विश्व में श्रेष्ठ होने का प्रमाण दिया है। फिर वह स्वामी विवेकानंद के मस्तिष्क से संबंधित हो या फिर भारतीय मूल की इंदिरा नुई की प्रबंधन क्षमता अथवा मिसाईल मैन डा. अब्दुल कलाम की वैज्ञानिक क्षमता सभी ने अपना लोहा मनवाया है। हम विश्व पटल पर देखे तो वर्तमान में अमेरिका में 38 प्रतिशत डाक्टर भारतीय है, अमेरिका के वैज्ञानिकों में 12 प्रतिशत भारतीय है। नासा के लोगों में 36 प्रतिशत भारतीय है तथा माईक्रोसाफ्ट कंपनियों में 34 प्रतिशत भारतीय अपनी ज्ञान क्षमता के आधार पर काबिज है। भारतीय शिक्षा और पाठ्यक्रम को लेकर वर्तमान चिंता का होना गलत नहीं है। कारण यह कि पिछले दिनों एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आयी है कि भारत वर्ष अनपढ़ व्यसकों की सर्वाधिक आबादी वाला देश है। आंकड़ें बताते है कि अपनढ़ों की उक्त संख्या में 29 करोड़ तक पहुंच गयी है। इससे अधिक चिंता का विषय और क्या होगा कि पूरी दुनिया की अनपढ़ की आबादी का 37 प्रतिशत उस भारत में बसता है, जो अपने आप को विश्व गुरू मानता रहा है, और जिस देश के बारे में कहा जाता है कि सभ्यता सबसे पहले यहीं आई। भारत वर्ष की मरणासन्न शिक्षा व्यवस्था इतनी लाईलाज दिख रही है कि गरीब युवतियों को शिक्षित कर पाने में उतना ही समय और लगने की बात कही जा रही है। जितना समय देश को आजाद हुए हो गया।

                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                    मो. नंबर 94255-59291

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