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हरीश कुमार का आलेख - अपने ही देश में विस्थापित कश्मीरी (कुछ तथ्य)

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षि कश्यप के नाम पर स्थापित कश्मीर और अनेक पंडितों जिन्होंने वेदों की रचना की से लेकर कल्हण की राज तरंगिनी तथा सोमदेव रचित कथासरितसागर कश्मीर के इतिहास का एक अमूल्य हिस्सा है ।मुग़ल साम्राज्य के दौरान औरंगजेब के समय भी कश्मीरी पंडितों की समस्या सामने आती है जब वे सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेगबहादुर जी से मदद मांगते है ।पर गुरु जी जब उनकी समस्या लेकर दिल्ली जाते है तों उन्हें उनके दो ब्राह्मण अनुयायियों भाई मति दास और सती दास के साथ क्रूरता से शहीद कर दिया गया ।

कश्मीरी पंडितों को आज भी एक भय और असुरक्षा में जीना पड़ रहा है ।

आतंकवादियों ने उन्हें उनके घरों से निष्कासित कर दिया है ।बाढ़ पीड़ित धर्मशालाओ/मंदिरों में बिना किसी सरकारी मदद के मुश्किल हालत में है । उनकी औरतें बिंदी या अन्य श्रृंगार नहीं करती ,शायद पहचान के भी के कारण ।आज कश्मीर के पंडित एक ऐसा समुदाय बन गया है, जो बिना किसी गलती के ही अपने घर से बेघर हो गया है। उन्हें शायद अपनी शांतिप्रियता के कारण ही यह दिन देखने पड़ रहे हैं कि सब कुछ होते हुए भी वे और उनके बच्चे सड़क पर हैं। राजनेताओं की उपेक्षा ने भी हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया है।

सदियों से कश्मीर में रह रहे कश्मीरी पंडितों को 1990 में आतंकवाद की वजह से घाटी छोड़नी पड़ी या उन्हें जबरन निकाल दिया गया। कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में बेरहमी से सताया गया। उनकी बेरहमी से हत्याएं की गई। उनकी स्त्रियों, बहनों और बेटियों के साथ दुष्कर्म किया गया। उनकी लड़कियों का जबरन निकाह मुस्लिम युवकों से कराया गया।

सच में कश्मीरी पंडित समुदाय अपनी कौम को बचाने की खातिर अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। इसे सरकारी तौर पर भी स्वीकार किया जा चुका है तथा कई सर्वेक्षण भी इसे साबित कर रहे हैं कश्मीरी पंडित समुदाय अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है।

युद्ध में भारत का सामना न कर पाने वाले पाकिस्तान ने कश्मीर घाटी में छद्म युद्ध छेड़ रखा है। पाकिस्तानी समर्थित आतंकियों द्वारा कश्मीर में बड़े पैमाने पर आतंकी वारदातें की गई। आतंकियों के निशाने पर कश्मीरी पंडित रहे, जिससे उन्हें अपनी पवित्र भूमि से बेदखल होना पड़ा और अब वे अपने ही देश में शरणार्थियों का जीवन जी रहे हैं। पिछले 23 वर्षो से जारी आतंकवाद ने घाटी के मूल निवासी कहे जाने वाले लाखों कश्मीरी पंडितों को निर्वासित जीवन व्यतीत करने पर मजबूर कर दिया है।

'जेहाद' और 'निजामे-मुस्तफा' के नाम पर बेघर किए गए लाखों कश्मीरी पंडितों के वापस लौटने के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। ऐसे में जातिसंहार और निष्कासन के शिकार कश्मीरी पंडित घाटी में अपने लिए 'होम लैंड' की मांग कर रहे हैं।

चौंकाने वाला तथ्य इस समुदाय के प्रति यह है कि अगर मृत्युदर तथा जन्मदर यही रही तो अगले कुछ सालों के भीतर कश्मीरी पंडित समुदाय का नामोनिशान ही मिट जाएगा। इसके प्रति कुछ आंकड़े चौंकाने वाले हो सकते हैं कि पिछले 24 सालों के दौरान, जबसे उन्होंने कश्मीर से पलायन किया है, तीन लाख परिवारों में मात्र 10000 बच्चों ने जन्म लिया, जबकि इस दुनिया को त्यागने वालों की संख्या 23708 थी, जो दोगुनी से भी अधिक है।

एक गैर सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार, जिसे डॉक्टरों की एक टीम ने कुछ समय पूर्व किया था, कश्मीरी पंडित समुदाय पर अस्तित्व के संकट के बादलों के मंडराने के कई कारण हैं। जहां युवा पीढ़ी नौकरियां न मिल पाने के कारण शादी को फिलहाल लम्बे समय तक टालती जा रही है, वहीं बुजुर्ग सदस्य पलायन की त्रासदी को दिलोदिमाग पर बिठाए हुए हैं जो उन्हें समय से पहले ही बूढ़ा तो कर ही रही है उनकी मौतों का कारण भी बन रही हैं।

4 जनवरी 1990 को कश्मीर के प्रत्येक हिंदू घर पर एक नोट चिपकाया गया, जिस पर लिखा था- कश्मीर छोड़ के नहीं गए तो मारे जाओगे।

सबसे पहले हिंदू नेता एवं उच्च अधिकारी मारे गए। फिर हिंदुओं की स्त्रियों को उनके परिवार के सामने सामूहिक दुष्कर्म कर जिंदा जला दिया गया या निर्वस्त्र अवस्था में पेड़ से टांग दिया गया। बालकों को पीट-पीट कर मार डाला। यह मंजर देखकर कश्मीर से 3.5 लाख हिंदू पलायन कर गए।

संसद, सरकार, नेता, अधिकारी, लेखक, बुद्धिजीवी, समाजसेवी और पूरा देश सभी चुप थे। कश्मीरी पंडितों पर जुल्म होते रहे और समूचा राष्ट्र और हमारी राष्ट्रीय सेना देखती रही। आज इस बात को 23 साल गुजर गए।

भारत के विभाजन के तुरंत बाद ही कश्मीर पर पाकिस्तान ने कबाइलियों के साथ मिलकर आक्रमण कर दिया और बेरहमी से कई दिनों तक कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार किए गए, क्योंकि सरकार ने सेना को आदेश देने में बहुत देर कर दी थी।

इस देरी के कारण जहां पकिस्तान ने कश्मीर के एक तिहाई भू-भाग पर कब्जा कर लिया, वहीं उसने कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम कर उसे पंडित विहीन कर दिया।

अब जो भाग रह गया वह अब भारत के जम्मू और कश्मीर प्रांत का एक खंड है और जो पाकिस्तान के कब्जे वाला है, उसे पाक अधिकृत कश्मीर या गुलाम कश्मीर कहा जाता है, जहां से कश्मीरी युवकों को धर्म के नाम पर भारत के खिलाफ भड़काकर कश्मीर में आतंकवाद फैलाया जाता है।

23 साल से गुलाम कश्मीर में कश्मीर और भारत के खिलाफ आतंकवाद का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस आतंकवाद के चलते जो कश्मीरी पंडित गुलाम कश्मीर से भागकर इधर के कश्मीर में आए थे उन्हें इधर के कश्मीर से भी भागना पड़ा और आज वे जम्मू या दिल्ली में शरणार्थियों का जीवन जी रहे हैं।

1947 में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से भगाए गए कश्मीरी पंडित जम्मू में रहते हैं। उन्हें जम्मू में रहते हुए आज तक भारतीय नागरिकता नहीं मिली है।

1989 के पहले कभी कश्मीरी पंडित बहुसंख्यक हुआ करते थे, लेकिन आज ज्यादातर मुसलमान कश्मीरी पंडित हैं और जो नहीं है वह शरणार्थी शिविर में नारकीय जीवन काट रहे हैं।

भारत की आजादी ने उनसे उनका सब कुछ छीन लिया। 1989 के पहले भारतीय कश्मीर के पंडितों के पास अपनी जमीने, घर, बगीचे, नावें आदि सभी कुछ था।

घाटी से पलायन करने वाले कश्मीरी पंडित जम्मू और देश के अन्य इलाकों में विभिन्न शिविरों में रहते हैं। 23 साल से वे वहां जीने को विवश हैं। कश्मीरी पंडितों की संख्या 4 लाख से 7 लाख के बीच मानी जाती है, जो भागने पर विवश हुए। एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो गई।

1947 में पाकिस्तान शासित कश्मीर से भगाए गए कश्मीरी पंडित जम्मू में रहते हैं। इसके बाद घाटी से भगाए गए पंडित भी जम्मू में रहते हैं लेकिन वहां भी उनका जीवन मुश्किलों से भरा हुआ है।

35 से 40 वर्ष की आयु में ब्याह रचाने को प्राथमिकता देने के कारण जन्मदर घटी है। तो मृत्युदर में तेजी आने का कारण कश्मीरी पंडित समुदाय के सदस्यों को कई प्रकार की बीमारियों द्वारा घेरे लिए जाने का परिणाम भी है। यह 1990 से लेकर 1996 के वे आंकड़े स्पष्ट करते हैं जो सिर्फ 3000 परिवारों के हैं, जिनमें मात्र 160 बच्चों ने जन्म लिया तो 504 लोग परलोक सिधार गए। जायज है ऐसे हालत में समय की सरकारें उन्हें विश्वास या पुनर्वास का प्रलोभन दें ।लम्बे समय से सिर्फ झूठे वादों ने कश्मीर के इन पंडितों के समुदाय को असमंजस में जीते रहने या उजड़ने के सिवा कुछ नहीं दिया ।

काश्मीर में जो अलगाववादी नेता मसरत की रिहाई का मुद्दा है वो कही न कही मोदी सरकार की केंद्रीय सरकार के गठन के बाद की अप्रत्याशित घटना ही है। नहले पे दहला ये के आज कश्मीर की मौजूदा सरकार में बी जे पी स्वयं भागीदार है और पी डी पी की बाप बेटी वाली सरकार का समर्थन कर रही है। सरकार बनते ही पाकिस्तान और अलगाव वादियों का धन्यवाद करने वाली यह सरकार क्या विस्थापित कश्मीरी पंडितों के साथ न्याय कर पायेगी। भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रवाद भी संदेह के घेरे में है। किस विश्वास और भरोसे से पंडित वह जायेंगें। यासीन मालिक जैसे लोग जो नब्बे के दशक में दर और आतंकवाद के बड़े चेहरे थे जिन्होंने पंडितों के वनवास में बड़ी भूमिका निभायी वे आज भाईचारे की रुदाली ग रहे है। होना तो यह चाहिए कि सरकार पहले इन लोगो के खिलाफ अपना स्टैंड स्पष्ट करे फिर पंडितों के विस्थापन या अलग टाउन शिप की बात रखे। ऐसे गंभीर प्रश्नों को केवल कहने भर से ही हल नहीं किया जा सकता ,इसके लिए ठोस कदम उठाने की जरुरत है। प्रधानमंत्री जी को विदेश दौरों के साथ साथ कश्मीर और पूर्वी प्रांतों के अधिक से अधिक दौरे करने की आवश्यकता है

 

डा हरीश कुमार

गोबिंद कालोनी ,गली न.2,बरनाला

पंजाब

मो -9463839801

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पढ़ क्षोभ हुआ ....क्या हैम सच में आजाद हैं ....यासीन जैसे को फांसी होनी थी पर गद्दी का मोह कइयों के उम्मीदों पर पाNई फेर गया ....बढ़िया लेख

दुख बात है पर आज इस देश में संवेदनाओं के लिए स्थान नहीं बचा है। और तथा कथिय बुद्धिजीवियों ने स्थिति और खराब कर रखी। हर चीज की विवेचना उनके निजी स्वार्थों एवं अहम का हेतु मात्र बनकर रह गया है। उनकी नज़रों में तो संभवतः पंडितों को वहाँ रहने बारे में सोचना ही नहीं चाहिए। और रही बात कश्मीर सरकार की तो भगवान मालिक है।

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