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हाथ उठते नहीं कि दुआ क़ुबूल हो जाती है

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

संसार में सब एक-दूसरे से मिलजुल कर ही काम कर सकते हैं। आपकी भावनाएं दूसरों के लिए साफ होनी चाहिए क्योंकि जैसी भावना आप दूसरे के लिए रखते हैं, वैसी ही वह आपके लिए रखता है। आप किसी को प्यार करते हैं तो वह आपको प्यार करता है। आप किसी को प्रसन्न करते हैं तो वह भी आपको प्रसन्न करता है। ऐसे ही अगर आप किसी से नफरत करते हैं तो वह भी आपसे नफरत ही करेगा। अगर आप किसी पर गुस्सा करते हैं तो वह भी आप पर गुस्सा ही करेगा। संसार में जैसा दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं,वैसा ही वापस मिलता है। जीवन प्रतिध्वनि का दूसरा नाम है। 

जब तक आप खुद के कामों को अनासक्त भाव से नहीं करेंगे, तब तक मन की सफाई नहीं होगी। क्योंकि साफ मन ही सबकी भलाई का भाव रख सकता है इसलिए भगवान कृष्ण कहते हैं कि तुम सभी के लिए प्रसन्नता का भाव रखो, बदले में वह भी तुम्हारे लिए प्रसन्नता का भाव ही रखेंगे और इस प्रकार एक-दूसरे को प्रसन्न रखते हुए तुम अपने लक्ष्य को पा सकोगे।

जब हम स्वार्थ और अहंभाव के साथ कोई काम करते हैं, तब वह कर्म और फल देता है। जब तक वह कर्म, फल नहीं दे देता तब तक उस कर्म का बंधन बना ही रहता है। लेकिन जब मन में ये भाव हो कि जो काम मैं करता हूं, वह प्रकृति में की गई मेरी एक सेवा है और उसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं है। ऐसे में वह काम फल देने वाला नहीं होगा।बाकी सभी किए गए सभी काम फल जरूर देंगे। काम तो करना ही है, क्यों न अपने कर्मों के फल की चिंताओं से धीरे-धीरे अलग होना शुरू करें।

कोई भी प्राणी कार्य किए बिना रह नहीं सकता। यदि वह शरीर से कार्य नहीं करेगा तो मन से कर लेगा। यह संसार सत्व,रज व तम, तीन गुणों से मिलकर बना है। ये गुण हर पल काम करते रहते हैं। हल्कापन, गति, भारीपन, सुख-दुःख और मोह इन तीन गुणों के कारण ही होते हैं। हमारा शरीर भी इन्हीं तीनों गुणों से मिलकर बना है इसलिए शरीर में भी इन तीनों गुणों के कारण हर वक्त काम होता ही रहता है। यदि कोई व्यक्ति कहे कि मैं कर्म नहीं करूंगा तो यह उसकी नासमझी होगी क्योंकि ऊर्जा गतिशील होती है।

बस एक चीज हमारे वश में है कि होते हुए काम को हम अपने अनुरूप दिशा दे सकते हैं। पुण्य कर्म भी कर सकते हैं और पाप कर्म भी, सकाम भी कर सकते है निष्काम भी। जब काम हम नहीं करते बल्कि गुण हमसे करवाते हैं तो अच्छा होगा कि हम यह न समझें कि मैं कर्ता हूं, बल्कि ऐसा मानें कि मैं बस इस काम का साधन हूं। ऐसा अकर्ता भाव रखने से हम कर्म के फल के बंधन में नहीं बंधेंगे और चित्त शुद्ध रहेगा। यही तो गीता के कर्मयोग का सार है। 

कई लोग हैं जो भरपूर सुख-सुविधा मिलने के बाद भी अपने जीवन से असंतुष्ट रहते हैं। ऐसा क्यों? क्या धन, पद, सम्मान, ऐश्वर्य जीवन को आनंद नहीं दे पा रहे? क्या मनुष्य के भीतर कोई अपराधबोध बना रहता है? इस खुशी रहित स्थिति को ग्रीक भाषा में 'एन्हेडोनिया' कहते हैं- जिंदगी में आनंद को न समझने की दशा। इसका कारण है असंतुष्टि,अत्यधिक महत्वाकांक्षा,असीम लोकप्रियता की चाह और मानसिक एवं शारीरिक थकान।घड़ी की तेज सरकती सुइयां। सड़कों पर दूर-दूर तक फैली वाहनों की कतारें हैं। ट्रैफिक जाम, बॉस की तनी भृकुटियां, सहयोगियों की बीच की शीशे की दीवारें,दूषित पर्यावरण और आधुनिक दिनचर्या है। कमजोर पड़ता सामाजिक ढांचा, सुख-सुविधाओं की बढ़ती प्यास, घर-ऑफिस में खींचा-तानी, रोज के पल-पल के समझौते, दम तोड़ती आशाएं और मन की टूटन है।

अनासक्ति के भाव से किया गया काम मन को शांति देता है।  जीवन को आनंदमय करने का सरल उपाय है- संसार के प्रति अपनी आसक्ति को कम करते जाना। जब हम अनासक्त भाव से कार्य करते हैं तो वह कर्मयोग कहलाता है और आसक्ति से करते हैं तो वह कर्मभोग होता है। कर्मयोग में हम कर्म करते हुए अपनी चेतना से जुड़े रहते हैं। इसके लिए अपने मन में थोड़ा भाव बदलना होता है कि मेरे द्वारा किए गए सभी कार्य प्रभु की सेवा है। मेरा अपना कोई स्वार्थ नहीं, जो कार्य सामने आता है,वह करता हूं! 

जैसे शुगर की बीमारी में व्यक्ति मन से जीभ को काबू कर मीठा नहीं खाता,वैसे ही सभी इंद्रियों को मन से वश में कर लिया जाता है! इंसान सोचता है कि किसी को मेरे विषय-विकारों का पता ना चले और खुद को अच्छा जताने के लिए ऊपर से अच्छेपन को ओढ़ लेता है। इसी प्रकार अच्छा खाने-पीने और मौज-मस्ती में ज़िंदगी बीत जाती हैं। ये बुराइयां केवल युवावस्था में ही अपना जोर नहीं मारतीं बल्कि बुढ़ापे में भी उनका जोर बना रहता है, बस तब शरीर साथ नहीं देता। इसलिए अच्छा यही है कि हम पाखंडी बनकर न रहें, मन को निर्मल बनाकर जियें।

जो बाहर से तो शरीर को संचालित करने वाली इंद्रियों को नियंत्रित कर लेता है; परन्तु मन से उन इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह तय है कि दुहरी ज़िंदगी जी रहा है। …और जिसने पाक दिल और साफ़ मन से उसे याद किया,उसकी प्रार्थना कभी खाली नहीं जाती। वह बरबस बोल उठता है - 

तेरी रहमत देखकर मेरी आँख भर आती हैं

हाथ उठते नहीं कि दुआ क़ुबूल हो जाती है

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प्राध्यापक,शासकीय दिग्विजय

पीजी ऑटोनॉमस कालेज,

राजनांदगांव। मो.9301054300

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