शनिवार, 11 अप्रैल 2015

अंकिता आचार्य का बुंदेली आलेख - झाँसी वाली रानी और सुभद्रा कुमारी चौहान

झाँसी वाली रानी और सुभद्रा कुमारी चौहान

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सबरे संसार हे बीरता को र्माग दिखाबे वारी। सौर्य, तेज, दया, करुना और देसभक्ती को जजबा जाके रग रग में भरौ थो। माँ की मनु, बाजीराव की छबीली, सुभद्रा कुमारी चौहान की खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। हम सब की पिरेरनासिरोत और चहेती रानी लछमीबाई को जनम19 नबम्बर , 1835 को कासी में भओ थो।

माता भागीरथी देवी और पिताजी मोरोपंत के सबसे ऊँचे संस्कारों से बालिका मनु को मन और हिरदय कई पिरकार के उच्च और महान उज्जबल गुणों से भर गए। बचपन में ही बिनकी माता से कई पिरकार की धार्मिक, सांस्किरितिक और सौर्यपूर्ण गाथाएं सुनके मनु के मन में सुदेस परेम की भाबना और बीरता की ऊँची तरंगे हिलोरे लेन लगीं। इनको बचपन को नांओं ‘मनिकरनिका’ (मणिकर्णिका) धरो गओ लेकिन लाड़ में मणिकर्णिका को ‘मनु’ पुकारो जान लगो।

एक बेर बचपन मेंई कासी के घांट की सिड्ढीयों पे बे बैठीं हतीं तभै कुछु अंगरेज बई रस्ता से नीचे उतर रए ते। मनु हे रस्ता से हटबे के लाने कओ मगर बे भईं अटल होखें बैठी रहीं, अंगरेजों के लाने बिनके मन में रौस बचपन सेई भरो तो। अंगरेज बिन्हें बच्ची समझके दूसरी तरपी निकर गये। बिन्हें का पता थी कि जे बच्ची बिनके बजूद हे मिटाबे को दम रखत है।

लगभग पाँच बरस की कम उमर मेंईं माँ को सांत छूट गओ बा के बाद  पिताजी मोरोपंत तांबे जो एक साधारन बामन और अंतिम पेसवा बाजीराव दुतीय के सेबक हते, मनु हे अपने संगे बिठूर ले गए। झैं पे मनु ने मल्लबिद्या, घुड़सवारी और सस्त्रविद्याएँ सीखीं, कायके घर में मनु की देखभाल करबे बारो कोउ ने हतो जइसे बिनके पिताजी मोरोपंत मनु हे अपने संगे बाजीराव के दरबार में ले जात थे, जितै चंचल और सुन्दर मनु ने सबको मन मोह लओ। बाजीराव मनु हे लाड़ से ‘छबीली’ बुलात थे।

सुभद्राकुमारी चौहान ने अपनी कबिता खूब लड़ी मरदानी.... में लिखो है-

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

मनु की सादी सन् 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ बड़े ही धूम-धाम से भई थी। सादी के बाद इनको नाव लक्ष्मीबाई धरो गओ। ऐंसे कासी की बिचिया मनु, झाँसी की रानी लछमीबाई बन गई। 1851 में मनु हे लड़का भओ मनो भगबान ने बा हे कुई खास पिरयोजन से धरती पे भेजो थो। मोड़ा (लड़का) की खुसी बो जादा दिना तक ने मना सकीं बो मोड़ा तीन मिहिना को होत होत चल बसो। गंगाधर राव जे आघात बरदास ने कर सके। लोगों की सलाह पे बिन्ने एक मोड़ा गोद लेलओ जेको नांव दामोदर राव धरो गओ। गंगाधर के मरबे के बाद जनरल डलहौजी ने दामोदर राव हे झांसी को उत्तराधिकारी मानबे से मना कर दओ। रानी लछमीबाई जा कैंसे बरदास कर सकत्ती । बिन्ने अंग्रेजों के खिलाफ जुद्ध को बिगुल बजा डारो और घोसना कर दई मैं अपनी झांसी अंगरेजों हे ने देहौं।

जा पे भी सुभद्रा जी ने अपनी कबिता में लिखो है--

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

तो जा पिरकार से रानी लछमी बाई अंगरेजों से जुद्ध कर सकत तीं मनो अपनी झांसी अंगरेजों हे ने दे सकत तीं। पिरसिद्द कबित्री सुभद्राकुमारी चौहान जी ने अपनी कबिता ‘खूब लड़ी मरदानी बो तो झांसी वाली रानी थी में सबरो किस्सा बयान करो है। जा कबिता हे पढ़ के लोगों को खून जोस से भर जात है और देस परेम की भाबना ऊफान खान लगत है।

जय हिन्द जय भारत

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