गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

शैलेन्द्र चौहान का आलेख - कामरेड धनवंतरि

शैलेन्द्र चौहान 

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(कामरेड धनवंतरि)

कामरेड धनवंतरि का जन्म 30 मार्च 1903 को जम्मू शहर के काली जन्नी मोहल्ले में हुआ था। उनके पिता का नाम दुर्गादत्त था, जो भारतीय सेना में कर्नल थे। कर्नल दुर्गादत्त सेना में स्वास्थ्य अधिकारी के पद पर कार्यरत थे। कामरेड धनवंतरि की शिक्षा जम्मू और लाहौर के डी.ए.वी कॉलेज में हुई। फिर उन्होंने 'आयुर्वेदिक कॉलेज', लाहौर से 'वैद्य कविराज' और 'वैद्य वाचस्पति' की डिग्रियाँ भी प्राप्त कीं। धनवंतरि भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारियों में से एक थे। डी.ए.वी. कॉलेज के दिनों से ही कामरेड पर राजनीतिक प्रभाव पड़ने लगा था। कविराज हरनाम दास के माध्यम से वे 'आर्य समाज' के सम्पर्क में आये, जिसका उनके व्यक्तित्व पर बहुत प्रभाव पड़ा। फिर उनका संपर्क क्रांतिकारियों भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, बटुकेश्वर दत्त तथा भगवती चरण आदि से हुआ और वे उनके सहयोगी बन गए। कामरेड ने पंजाब में क्रांतिकारी दल का संगठन भी किया। 'नौजवान भारत सभा' और 'बाल भारत सभाएँ' आदि गठित कीं। 'दिल्ली षड़यंत्र केस' के तहत कामरेड धनवंतरि को 10 वर्ष की सज़ा हुई थी। शेख़ अब्दुल्ला के 'आज़ाद कश्मीर आंदोलन' के कारण कामरेड धनवंतरि का उनसे मतभेद हुआ, क्योंकि वे राष्ट्रीय एकता के समर्थक थे और देश की जनता को एक सूत्र में बाँधना चाहते थे।

कामरेड धनवंतरि रियासत जम्मू और कश्मीर के एकमात्र  मात्र ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हैं, जिन्होंने देश आजाद करवाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी और काले पानी की सजा पाई। पढ़ने के लिए वह जब लाहौर गए तो नेशनल कालेज में उनका परिचय शहीद भगत सिंह, सुखदेव और अन्य क्रांतिकारियों के साथ हुआ। उन्होंने कई कामों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। काकोरी ट्रेन कांड, वायसराय की ट्रेन पर बम फेंकने और सांडर्स मर्डर के में सक्रिय भागीदारी के कारण उनको सजा-ए-मौत सुनाई गई, जिसको बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। उन्हें सन 1930 में गिरफ्तार किया गया और 1933 में कालापानी भेज दिया गया। वहां पर उन्होंने खुशी राम मेहता और शिव वर्मा के साथ मिल कर लंबी भूख हड़तालें की और यातनाएं सहीं। 

सन 1939 में उनको रिहा किया गया लेकिन पुलिस उनका पीछा करती थी। 1940 में उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया और 1946 तक जेल में रखा गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी उनके नाम से पंजाब में वारंट जारी होते रहे। जब अंग्रेज भगत सिंह की तलाश कर रहे थे तो धनवंतरि के प्रयासों की वजह से ही वह सकुशल पंजाब से बाहर निकल पाए। यही नहीं, असेंबली में बम फेंकने के बाद धनवंतरि ने ही सत्तर हजार पंफलेट पूरे देश में बंटवाने का प्रबंध ·किया। सिर्फ यही नहीं, 1931 में भगत सिंह को फांसी दिए जाने के बाद एचआरए का काम उन्होंने ही देखा था। 45 वर्ष की आयु में धनवंतरि जम्मू आए और रियासत के भूमि सुधारों का खाका उन्होंने ही तैयार किया था। यातनाओं के कारण कमजोर हुए शरीर के बावजूद उन्होंने अपना अभियान जारी रखा। 

अंग्रेज़ सरकार ने 'सांडर्स हत्याकांड' के तहत कामरेड आदि को गिरफ्तार करके उन पर मुकदमा चलाया, किंतु कोई भी सबूत नहीं मिलने के कारण वे छोड़ दिए गए। फिर एक राजनीतिक डकैती के सिलसिले में उनकी गिरफ्तारी के लिए पांच हज़ार रुपये का इनाम ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित किया गया। गिरफ्तारी के बाद 'दिल्ली षड़यंत्र केस' में उन्हें 10 वर्ष की सज़ा सुनाई गई, जो बाद में 7 वर्ष कर दी गई। सन 1933 में उन्हें अंडमान भेज दिया गया। वहाँ पर कामरेड जी ने राजबंदियों को अंडमान भेजने के विरोध में 60 दिन की भूख ह़ड़ताल की। कामरेड धनवंतरि को अंडमान में मार्क्सवादी विचारों से परिचित होने का अवसर मिला। अब वे देश की आज़ादी के लिए सशस्त्र क्रांति के स्थान पर श्रमिक वर्ग के संगठन पर जोर देने लगे। सन 1937 में प्रदेशों में नई सरकारें बनने के बाद वे अंडमान से वापस आए और सन 1939 तक मुल्तान और मांटगोमरी की जेलों में नजरबंद रहे। 1939 में रिहा होने पर कामरेड 'लाहौर कांग्रेस कमेटी' के अध्यक्ष और 'अखिल भारतीय कांग्रेस' के सदस्य चुने गए। सन 1940 में उन्हें नजरबंद कर दिया गया जहाँ से वे 1946 में मुक्त हुए। इसके बाद वे कश्मीर गए और पाकिस्तानी हमलावरों के विरुद्ध लोगों का संगाठित किया। देश की आज़ादी में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले कामरेड धनवंतरि का 13 जुलाई 1953 को निधन हुआ।

संपर्क : 34/242, सेक्टर -3,  प्रताप नगर,  जयपुर - 302033 (राजस्थान)

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