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कहानी - बदला

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मोहम्मद इस्माईल खान 

आज हरीराम अपनी जेल की कोठरी में हमेशा से कुछ ज्यादा ही परेशान है। आज उसकी बेटी मुलाकात करके गई है, वह एक ऐसी पुरानी इमारत की तरह ढ़ह गया है, जो पिछले पन्द्रह सालों से तेज आँधी और तूफान के थपेड़ों को सहती आ रही हों और हर बार किसी न किसी तरह अपने वजूद को बचाती रही हो। पर आज तो उसका नेस्तनाबूद हो जाना यकीनी लगता है। आज गोमती जो कुछ भी हरीराम को बता कर गई है। वह किसी इन्सान को पागल कर दे, उससे भी आगे की बात थी। अपनी पूरी बात हरीराम को बताने के लिये, गोमती ने कितना साहस जमा किया होगा यह तो गोमती का दिल ही जाने। किस तरह उसने यह मर्मभेदी तहरीर को अपनी टुकड़े-टुकड़े होती आवाज के साथ साँसों की डोर में बान्धे, हिचकोले खाती कश्ती की तरह पार तक पहुंचाया होगा और सलाखों के उस पार हरीराम बुत बना, गर्म पिघला हुआ सीसा अपने कानों के जरिये, अपने पूरे जिस्म में उतरता महसूस कर रहा होगा। अपने दिल और दिमाग को एक बेजान राख में तब्दील होता महसूस कर रहा होगा।

पिछले पन्द्रह सालों से यह मुलाकात का दिन, एक काला नाग बनकर उसकी जिन्दगी में आता और यह अचानक न आता। पूरे साल उसके आने का खौफनाक इन्तेजार उसे पल पल सताता, और वह अनजान रिश्तों की बैड़ियों में जकड़ा उस डसने की असहनीय पीड़ा को भोगता। और उसका दर्द सारा साल उसे बेचैन रखता। साथ ही अगली मुलाकात की दहशत उसके वजूद को तार-तार कर बिखेरती रहती और न जाने क्यों वह अपने आप को समेट कर इकट्ठा करता रहता शायद इसलिये कि जाने और अनजाने रिश्ते उसे विवश करते रहते अपनी साँसों की धमनी खींचते रहने के लिये।

जितने कैदी उसके साथ जेल में सज़ा काट रहे थे वे तो कब के अपने किये गये अपराधों को भूल चूके थे। अब तो जेल की रोजमर्रा की जिन्दगी ही उनका मकसद थीं। आज खाना क्या मिला, जेलर ने किस काम पर लगाया, आज नशे की क्या-क्या चीजें चोरी छिपे आई और रोज़मर्रा की लड़ाई झगड़े। लेकिन हरीराम को कत्ल के इल्ज़ाम में बीस बरस की जेल ऐसे ही नही हुई थी।

पन्द्रह साल गुजर गये उसे इस जेल में। कहने को तो वह बड़ा शान्त मिज़ाज और सीधा नज़र आता पर उसके अन्दर एक अलाव धधकता रहता जिससे उसकी अन्तरात्मा तिल-तिल कर जला करती। हालात यों बने कि उसे कुछ भूलने न देते। पन्द्रह साल से जो बोझ उसकी छाती पर रखा था, वह उससे उठाये न उठाता। हर साल उसके ज़ख्मों पर लगाने के लिये उसे मरहम दिया जाता, पर वह तो तेज़ तेज़ाब की जलन उसके लिये छोड़ जाता। पिछले पन्द्रह सालों में वह यह आघात सहता रहा पर इस बार तो उसे ऐसा लगा कि उसका ज़ख्मों से भरा कलेजा, उसका दर्द से बेहाल दिल और सुर्ख तवे पर भुनता हुआ उसका दिमाग, किसी ने बाहर निकाल कर जमीन पर पटक दिया हो और उन सबका कीमा बनाकर अपने पेरों से रोंद डाला हो।

गोमती दो साल की थी जब हरीराम ने शराब के नशे में धुत होकर उसके कस्बे में चल रहे मिशन अस्पताल की एक मासूम नर्स जूली से बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी। पकड़ा गया ओर जेल की सलाखों के पीछे डाल गया। उसके इस कारनामें की वजह से उसकी पत्नी के मन में इतनी नफरत जन्मी कि उसे अपने शरीर से, जिसे कभी हरीराम ने छुआ था और जिसकी वजह से गोमती जन्मी थी मिटा देना चाहती थी पर ममता ने गोमती को तो जेल की सीढ़ियों पर रोता छोड़ दिया और अपने आप से मुक्ति पा ली।

इधर जब जूली की हत्या का समाचार पाकर उसकी बड़ी बहन सिस्टर जैन वहाँ आई तो उसने जो व्यवहार हरीराम के साथ किया उसकी सज़ा से वह कभी भी नही उबर पाया। हरीराम और दूसरे लोग बहुत हैरान है कि अपनी बहन के कातिल के साथ और सिर्फ कातिल ही नही विभत्स क्रूर जानवर कातिल के साथ भला ऐसा व्यवहार कोई करता है? ऐसा न पहले कभी सुना न देखा।

गम्भीर अपराधो की सज़ा तो कठोर होती ही है पर ऐसी भी होती है कोई सोच भी नहीं सकता जितना गम्भीर अपराध! उतनी बड़ी क्षमा! उतनी बड़ी दया। इन्सान क्या सोचता है और क्या करता है उसके अन्दर की यह बात पता लगाना बड़ा मुश्किल काम है। सिस्टर जैन के हृदय में क्षमा, दया, ममता, प्रेम यही सब कुछ था हरीराम के लिये।

उन्होंने अपने दिल में हरीराम के प्रति घृणा को पनपने ही न दिया। शराब ने नशे में, अनजाने में किया गया अपराध मान कर क्षमा कर दिया। उसे अपना भाई बनाया, उसे राखी बान्धी, उसकी मौत की सजा को आजन्म करावास में बदलवाने के लिये जी जान एक कर दी और उसकी दो साल की गोमती को सारी जीवन सम्भालने का जिम्मा लिया।

हरीराम सोच नहीं पा रहा था कि ये उसके साथ हमदर्दी है या कोई बदला। वह बहुत सोचता पर उसका मन सिस्टर जैन के इस अजब व्यवहार के लिये कृतज्ञ होने के लिये तैयार ही नहीं होता। वह ता बस सहमा, सहमा, डरा सा रहता। क्या जाने वह मुझसे कोई बदला ले या मेरी बच्ची से। जब उसकी बच्ची को अपने साथ केरल ले जाने का फैसला किया तो वह मना भी तो न कर सका और फिर उस बच्ची का यहां देखने वाला भी कोई नहीं था। वह तो गरीब गाय की तरह सिर्फ सर ही हिलाता रहा। जब अकेले में सिस्टर जैन के बारे में सोचता कि आखिर वह ऐसा सब क्यों कर ही है। इतनी हमदर्द क्यों है, उसकी बहन के कातिल के साथ। कई तरह की शंकाए, कुशंकाऐं उसे घेर लेती और जो सोम्य तस्वीर सिस्टर जैन की उसके जहन में बनी थी वह विकृत होने लगती डरावनी लगने लगती। उसका दिमाग सुन्न हो जाता, और उसकी सोचने समझने की शक्ति जाती रहती। परन्तु पिछले पन्द्रह सालों से हर मुलाकात पर सिस्टर जैन जब गोमती को साथ लेकर केरल से उससे मिलने आती और बालिश्त दर बालिश्त वह गोमती को बड़ा होते देखता। उसकी संस्कारवान बोलचाल, साफ सुथरे कपड़े, अच्छे खाने पीने के असर से उसके चमकदार गाल, यह सब वह देखता तो उसे इत्मीनान होता कि सिस्टर जैन वाकई उस पर मेहरबान है, वह सब कुछ भूल चुकी हे, पर पुरानी यादों की डायरी का कोई पिछला पन्ना उसके सामने लहराने लगता और वह फिर भयभीत हो जाता। सिस्टर जैन उस पर मेहरबानी कर रही है या कोई बदला ले रही है।

अगर मैं बाहर होता तब भी गोमती की परवरिश ऐसे न कर पाता। क्या पता गोमती के भाग्य से ही तो मैं यहां नहीं पड़ा हूं। या गोमती एक बहाना मिल गई है सिस्टर जैन को, मुझसे बदना लेने का। पिछले चौदह सालों से सिस्टर जैन हर मुलाकात में अप्रत्यक्षित रूप से उस पर क्षमा, प्रेम सदाचार का मुलम्मा चढ़ाकर जाती जिसकी महक बाद में जेल के सारे साथी कैदी, जेलर और जेल का स्टाफ महसूस करते रहते। वह एक आदर्श कैदी की तरह हो गया। सबसे प्रेम, सब से नर्म व्यवहार, न लड़ना न झगड़ना। सबका चहेता सबका विश्वास पात्र।

आज उसकी ड्यिूटी जेल की मेस में खाना, पकाने पर लगी है। एक तेज धार वाली छुरी उसके हाथ में है, वह उसे सब्जियों पर रखता ही कि सब्जीयां कट-कट कर गिरने लगती है।

नर्म गुदाज टमाटर तो उसके स्पर्श मात्र से बिखरने लगते है। हरीराम उस छुरी की धार को अपने अंगूठे के पोर पर फेर कर उसका पैनापन जांचने लगता है कितनी तेज है यह गले पर चल जाये तो आर-पार कर दे। पर इससे तेज तो सिस्टर जैन की ......................... ! उसे सुबह गोमती की मुलाकात याद आ गई। मेरी बची पाँच साल की सजा माफ करवा दी है सिस्टर जैन ने। जल्द ही रिहाई का परवाना आ जायेगा। पर इससे बड़ी बात ..... .............. क्या सिस्टर जैन का सबसे बड़ा उपकार या सबसे बड़ा बदला। सिस्टर जैन की याद में रो-रो कर गोमती पागल हुई जा रही थी। अपनी माँ से बिछड़ने का गम तो उसे याद नहीं, पर सिस्टर जैन को ही माँ समझती थी वह। इस माँ ने ईमानदारी से अपना फर्ज भी निभाया था और इस माँ के बिछड़ने का गम उसे पागल किये जा रहा था। उस माँ ने एक मौके पर गोमती इज्जत बचाने के खातिर अपनी जान बलिदान कर दी। मुझ पर आखरी वार इतना संगीन इतना घातक और अब वह मुझे शर्मिन्दा करने मेरे सामने भी न आयेगी। और मैं हर वार की जिल्लत से बच जाऊँगा।

पर यह क्या वह मेरे मस्तिष्क पटल से कभी दूर हो पायेगी। भीड़ में और अकेले क्या मैं उससे कभी छिप पाऊँगां वह तो हमेशा मेरा पीछा करती रहेगी, पहले से भी ज्यादा करीब होकर। मैं भाग कर कहाँ जाऊँ। उसकी इतनी सारी दया अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हाती। वह तो मुझे बदला महसूस होती है, बड़ा भारी बदला। आज को अच्छा दिन कहूँ या मनहूस। दिन शाम में ढल गया। रात घिर आई हरीराम जल्दी ही अपनी बैरक की कोठड़ी में सर से पैर तक कम्बल ताने सो गया। क्या आज उसने अपने सर का सारा बोझ उतार फेंका है, इसलिये सुबह जल्दी उठने वाला हरीराम देर तक सोया पड़ा हैं।

जेलर और सिपाहियों के जूतों की आवाज पर बैरक की कोठड़ियों से कैदी चौक गये पर हरीराम सो रहा है। सिपाही ने हरीराम की कोठड़ी का ताला खोला। जेलर ने हाथ में लहराते हुये कागज को कुछ ऊँचा किया - हरीराम उठो, तुम्हारे लिये एक अच्छी खबर हैं सरकार ने फरियादी की दरखास्त पर तुम्हारी बाकी सजा माफ कर दी है। अब तुम आजाद हो।

जेलर ने हरीराम की ओर से कोई प्रतिक्रिया न पाई तो उसने हरीराम को हिलाया, फिर उसका कम्बल उलट दिया। यह क्या हरीराम तो रात को ही किसी वक्त आजाद हो चुका था उसने अपने हाथ की रग काट ली थी। सब्जियाँ और टमाटर काटने वाली छुरी सुर्ख हुई वहीं पड़ी थी।

 

मोहम्मद इस्माईल खान

एफ-1 दिव्या होम्स् सी 4/30 सिविल लाईन

श्यामला हिल्स् भोपाल 462002

0755- 2660424; मो0 9826329005

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(ऊपर का चित्र - कुमार गौरव की कलाकृति - उन्मुक्त, कैनवस पर तैल रंग)

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