अशोक गुजराती की कहानी - कलई

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   हाथों में साइकिल थामे किसी तरह चल रहा था वह. साइकिल के कैरियर पर एक गठरी-सी लगी हुई थी और मैला-कुचैला थैला हैंडल पर लटक रहा था. बीच-बीच में वह आवाज़ लगा रहा था- 'कलई करा लो... कलई!'


   काफ़ी बूढ़ा था वह. सफ़ेद दाढ़ी, सर के बाल- उसी रंग के. कुछ-कुछ कमज़ोर-सा- निरीह और अकिंवन. साधारण कुर्ता-पाजामा- हल्का-सा मैला. आंखें बन्द-बन्द-सी, शायद कम दिखाई पड़ने के कारण सिकुड़ी हुईं. आवाज़ में दम था, शायद रोज़ के रियाज़ की वजह से. वैसे भी अक्सर लोगों की आवाज़ में ज़ोर रहा आता है, चाहें क़ब्र में पैर घुसने को बेताब हों.


   सामने की बिल्डिंग के ऊपरी फ़्लैट से उसे पुकारा गया. वह ठहरा. वहां से एक महिला ने पूछा, 'कितने पैसे लगेंगे एक कढ़ाई के...?'
   उसने मिचमिची आंखों से आकाश की ओर देखा- 'पहले आप कढ़ाई तो दिखाइए...'


   उस स्त्री ने रस्सी से बंधी थैली में कढ़ाई नीचे भेजी. बूढ़े ने उसका निरीक्षण किया और गर्दन ऊंची कर बोला,  'पचास रुपए होंगे, बहन जी.'
   बहन जी मोल-भाव पर उतर आयीं. कुछ अकड़ के साथ बूढ़े ने अपना अंतिम निर्णय सुना दिया- 'चालीस से कम में नहीं होगा, बहन जी.'


   बहन जी के हामी भरने पर थैली से उसने कढ़ाई निकाली. कढ़ाई अंदर-बाहर से कोयले की नाईं काली थी. अर्थात् तैलीय भी. पड़ोस की इमारत का पिछवाड़ा था उस गली में. वहां खड़ी की जाती कारें अभी अपने मालिकों के संग जा चुकी थीं. ख़ाली जगह देखकर बूढ़े ने अपनी बिना स्टैंड की साइकिल खम्भे से टिकायी और अपना असबाब- गठरी और थैला -नीचे उतारा. उकड़ूं बैठकर गठरी खोली. उसमें से चार पायों की चूल्हे जैसी चीज़ निकाली. थोड़ा-सा गड्ढा खोद कर उसे उस पर रखा. उसके बाहर निकले पाइप में पत्रे की बनी धौंकनी, जिसमें हैंडल फ़िट था, फंसायी. धौंकनी को एक चौड़े सपाट पत्थर पर जमाया ताकि चूल्हा उसके झटके से हिले नहीं. चूल्हे के छेद में एक कपड़ा ठूंसा, उसे जलाकर उस पर कोयले और लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े डाले. यह सारा सामान निश्चित ही उसकी गठरी या थैले के भीतर ही समाया हुआ था.


   धौंकनी के हैंडल को घुमाते ही चूल्हे से आग की लपटें उठने लगीं. कोयले और लकड़ी के टुकड़ों ने भी धीरे-धीरे आग पकड़ ली. अब उसने उस पर कढ़ाई को उलटा कर रखा. इस सारी कवायद के बाद उसने जेब से बीड़ी निकाल कर जलायी और अपने नितंब टिकाकर ज़रा सुस्ताते हुए कश लेने में डूब गया. कभी ध्यान आने पर वह आवाज़ लगा देता- 'कलई करा लो... कलई!'


   यह सब अपने फ़्लैट से वह और उसकी पत्नी देख रहे थे. पत्नी बोली, 'यह कैसी कलई है... कलई तो हम छोटे थे तब एक साथ चालीस-पचास पीतल के बर्तनों पर करवाते थे. चूल्हा ख़ैर कमोबेश ऐसा ही होता था लेकिन हवा मारने के लिए उससे जुड़ी ग़ुब्बारे-सी धौंकनी होती थी, जिसे दबा-दबाकर आग को तेज़ किया जाता था. और... हमारे साफ़-सुथरे बासनों पर वह रांगे की सख़्त-सी छड़ लगाकर कपड़े से उसे फैलाते हुए कलई करता था. बर्तन चांदी-से चमक जाते थे- बिलकुल नये जैसे.'


   पत्नी के इतने लम्बे संस्मरण को सुनते हुए वह सर हिलाता रहा क्योंकि उसने भी कलई करने की यही पद्धति अपने छुटपन में देखी हुई थी. प्रकटतः उसने अपने जाने संशोधन किया- 'भई, समय बदल गया है. चूल्हा देखो कैसा आधुनिक और उसका पम्प हैंडल वाला. पर कलई तो चल ही रही है...'


   'कैसे चल रही है, न वह कढ़ाई पीतल की है और न ही उस बुड्ढे के हाथ में रांगे की सलाख दीख रही है...'


   'हां, यह तो है...' उसे भी ताज्जुब हो रहा था कि इस कारीगर ने अब तक न टिन की रॉड निकाली है मुलम्मे के लिए और न ही कढ़ाई पीतल की लग रही है... उसने कहीं पढ़ा था कि इन कढ़ाइयों को उस मिश्र धातु की चादर से, जिसे विमान बनाने में प्रयोग करते हैं, ख़राब हुए विमान के अवशेषों से इकट्ठा कर तैयार किया जाता है. उसने पत्नी को बताया तो उसने भी सहमति जतायी.
   वे देखते रहे. बूढ़ा आग की लौ बढ़ा-बढ़ाकर और कढ़ाई के अलग-अलग भागों को उलटा-पलटाकर सीधे अतीव ताप देता रहा.

कालापन छूमंतर हो शुभ्रता में बदलता गया. जली हुई कालिख की सफ़ेद राख कढ़ाई से अब भी कहीं-कहीं चिपटी हुई थी. फिर उसने कढ़ाई को नीचे उतार कर चूल्हा बुझा दिया. इंतज़ार के बावजूद और कोई ग्राहक आकर्षित नहीं हो पाया था. इसके पश्चात शुरू हुआ उसका फ़ाइनल टचिंग. लोहे के तार वाले ब्रश से घिस-घिसकर, पानी डाल-डालकर और कपड़े से पोंछ-पोंछकर उसने उस कलूटी को सुंदर से सुंदरतम बनाने में कोई क़सर नहीं छोड़ी.


   उसकी पत्नी की समझ में सारा मामला आ गया. वह बोली, 'कढ़ाई इतनी काली होती कैसे है ?...' इस बीच वह अपनी कढ़ाई अंदर से ले आयी थी. उसे दिखाते हुए उसने अन्य स्त्रियों के आलस और लापरवाही को जमकर कोसा- 'देखो, मेरी कढ़ाई... पता नहीं ये औरतें कैसे उसे इतनी गंदी होने तक इस्तेमाल पर इस्तेमाल किये जाती हैं...' उसे कहीं अपनी पत्नी की कार्य-कुशलता पर गर्व हो आया.


   बूढ़े ने उठकर वह कढ़ाई उस महिला के झोली में डाल दी. महिला ने रस्सी से ऊपर खींचने के पश्चात 'बहुत अच्छी साफ़ नहीं हुई' की शिकायत बुदबुदाते हुए ज़ाहिर की. फिर ज्यों अनिच्छा से थैली में चालीस रुपए नीचे बूढ़े तक मुंह टेढ़ा कर पहुंचा दिये. बूढ़ा ऐसी तोहमतों का कदाचित् आदी था, चुप्पी साधे रहा.


   बूढ़ा जाने ही वाला था कि वह उसके पास गया. उसने सहज जिज्ञासा हेतु पूछा, 'चाचा, आजकल पीतल के बर्तनों पर कलई नहीं होती क्या ?...'
   बूढ़े ने अपने सर पर हाथ फेरते हुए जवाब दिया- 'होती क्यों नहीं साब पर अब पीतल के भांडे होते ही कहां हैं.
यही कढ़ाई-वढ़ाई लोग साफ़ करवाते हैं.... हम भी क्या करें. जिस काम से दो रोटी नसीब हो, वही सही...'
   उसके मन में बूढ़े के प्रति करुणा उपज आयी. उसने कुछ कहने के लिए कहा, 'आपकी बात ठीक है लेकिन यह गंदली-गंदली कढ़ाई... लगता है लोग उसे अच्छे-से धोते-धुलवाते नहीं हैं.'


   उसे उम्मीद नहीं थी कि वह मामूली कलईगर उसकी इस साधारण-सी व्यर्थ टिप्पणी का कोई उत्तर भी देगा. इसके विपरीत बूढ़े ने मुस्करा कर जो कहा, उसे चकित कर गया. उसने अपना सब सामान समेटकर साइकिल पर यथास्थान लगा दिया था. साइकिल को आगे बढ़ाता हुआ वह बोला, 'साब, हम ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं. हां, तजरबा ज़रूर है. इसीलिए बता रहे हैं- वह कढ़ाई हमारा लोकतंत्र है और उस पर लिपटी कालिख और कुछ नहीं, आज की गंदी राजनीति है...'

 
   वह अवाक् जाते हुए बूढ़े को ताकता रह गया. वह सोच रहा था कि जैसे सियासत की ग़लीज़ की उसने सफ़ाई कर दी हो- क्या यही वह ग़रीब अपढ़ जनता है, जो नेताओं के दांव-पेचों को इन दिनों अधिक समझ-बूझ रही है; धर्मान्धता, भ्रष्टाचार विहीन समाज तथा विकास के झूठे वादों के वशीकरण से बचते हुए नये राजनीतिक-सामाजिक मूल्यों को वर्चस्व दे रही है. वरना तो मध्यमवर्ग, जो अधिकांश पढ़ा-लिखा है, अपवाद छोड़ दें तो इस उत्तर आधुनिक समय में अपने दिमाग़ को ताक पर सजाकर धर्म, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, अंधविश्वास जैसे नाशक तत्वों को वरीयता देने में नहीं हिचकिचा रहा और मटमैले सैलाब में बहा जा रहा है... क्या यह कालिमा कभी उतर पायेगी- स्वच्छता अभियान के बावजूद -क्या इन मटियाले मनों को साफ़-शफ़्फ़ाफ़ कर उन पर कलई हो जायेगी ?


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प्रा. डा. अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली- 110 095. सचल : 9971744164.

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