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नकचढ़ी राजकुमारी

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कैथलीन मुलडून

अनुवाद -

अरविन्द गुप्ता

मेरी बड़ी बहन 10 साल की है। उसका नाम है - पेनीलोप मेरी पाईपर। पर सब लोग उसे ‘पेनी’ नाम से बुलाते हैं, मुझे छोड़कर बाकी सब लोग। मैं पैटी जेन पाईपर उसे ‘नकचढ़ी राजकुमारी’ कहकर बुलाती हूं। इसके बारे में किसी और को नहीं पता है। मेरी राय में यह नाम उसके लिए एकदम फिट है। वह दिन भर अपने पहियों वाले सिंहासन पर बैठकर बाकी सब लोगों पर हुक्म चलाती है।

जब हम सामान खरीदने बाजार जाते हैं तो नकचढ़ी राजकुमारी अपने सिंहासन पर विराजमान रहती है और पापा उसके रथ को पीछे से धक्का देते हैं। रथ में बैठे-बैठे वह किसी मशहूर फिल्म-स्टार की तरह लोगों को देख मुस्कुराती है और हाथ हिलाती है। मेरी मम्मी उसकी बैसाखियां (क्रचिज) ढोती हैं, और मैं नौकरानी जैसी सारी शॉपिंग का बोझ ढोती हूं। कई बार तो मेरे हाथों में इतने सारे थैले होते हैं कि मैं एक पहियों वाला डिब्बा नजर आती हूं।

हर कोई नकचढ़ी राजकुमारी को प्यार करता है। पूरा परिवार - नाना-नानी, दादा-दादी, चाचा-मामा, चचेरे-मौसेरे भाई-बहन - उसे गले लगाता है। ये सारे उसकी तारीफ करते हैं। फिर वे मेरी ओर देखकर कहते हैं कि मैं किसी खरपतवार की तरह बढ़ रही हूं। लाखों-करोड़ों सालों से यही सिलसिला चला आ रहा है। नकचढ़ी राजकुमारी गुलाब का फूल है, और मैं उसकी छोटी बहन पैटी जेन एक कांटा हूं।

एक बार हम सभी लोग एक मेले में गए। नकचढ़ी राजकुमारी ने मुझे सैकड़ों बार झूले पर चढ़ते हुए देखा। झूले पर मुझे बड़ा मजा आया। अगर कोई दोस्त मेरे साथ होता तो शायद और ज्यादा मजा आता। काश! नकचढ़ी राजकुमारी मेरे साथ झूले की सवारी कर पाती। फिर मैंने एक प्रतियोगिता में रुई का कुत्ता जीतने की कोशिश की। मैंने अपनी जेब के सारे पैसे खर्च कर डाले और सैकड़ों बार गेंद फेंककर बोतलों को गिराने की कोशिश की। परंतु उन्हें गिराने में मैं पूरी तरह फेल हुई। पर जब हम वहां से जा रहे थे तो उस स्टाल वाले ने रुई का वह पीला कुत्ता नकचढ़ी राजकुमारी को भेंट कर दिया! यह असलियत है। हर कोई उस पर तौहफे न्यौछावर करता है!

मेरा स्कूल कोई सौ साल पुराना है। स्कूल मेरे घर से इतना दूर है कि मुझे वहां पहुंचने के लिए बस में घंटों बिताने पड़ते हैं। परंतु नकचढ़ी राजकुमारी घर के पास स्थित नए स्कूल में जाती है। वह अपनी व्हील-चेयर में वहां एक सेकंड में पहुंच जाती है। जब बारिश होती है तो पापा नकचढ़ी राजकुमारी को उसके सिंहासन के साथ कार में लादते हैं और एक सेकंड में घर पहुंचाते हैं। और मैं, पैटी जेन, कीचड़ में पीले रंग के गंदे रेनकोट को पहने घंटों बस का इंतजार करती हूं।

शनिवार के दिन ढेरों काम होते हैं। मम्मी लॉन की घास काटती हैं। पापा कपड़े धोते हैं और गैरेज साफ करते हैं। कपड़े सूखने के बाद पापा साफ कपड़ों को नकचढ़ी राजकुमारी के पास लाते हैं, जहां वह उन कपड़ों को तह करके मेज पर सजाती है। और मैं पैटी जेन नौकरानी बाथरूम साफ करती हूं।

एक शनिवार नकचढ़ी राजकुमारी को डाक्टर के पास जाना था, इसलिए मम्मी ने मुझसे कपड़े तह करने को कहा। मैं मेज पर ऐसे

बैठी, जैसे मैं कोई राजकुमारी हूं। मैंने जल्दी-जल्दी कपड़े तह किए और फिर उनको अच्छी तरह से एक के ऊपर एक करके रखा। जब नकचढ़ी राजकुमारी घर वापस आई तो मुझे लगा कि मम्मी उससे बाथरूम साफ करने को कहेंगी। परंतु मम्मी ने उसे तुरंत पलंग पर लेटा दिया, क्योंकि नकचढ़ी राजकुमारी थक गई थी। और उसके बाद मुझे

- पैटी जेन को बाथरूम भी साफ करना पड़ा। अब गर्मी की छुट्टियां हैं। मेरे सभी मित्र अलग-अलग जगह

घूमने-फिरने, कैम्पिंग, ट्रेकिंग के लिए गए हैं। सिर्फ मैं ही एक अभागी यहां सड़ रही हूं। मम्मी कहती हैं कि मुझे कैम्पिंग भेजने के लिए पैसे ही नहीं हैं। क्योंकि नकचढ़ी राजकुमारी के पैरों के लिए महंगे ब्रेसिस (पैरों को सहारा देने के उपकरण) खरीदे गए हैं, इसलिए पैसे ही नहीं बचे हैं।

भला नकचढ़ी राजकुमारी को उनकी क्या जरूरत? वह वैसे भी दिनभर अपने सिंहासन पर विराजमान रहती है। वह कभी-कभी बस थोड़ा-सा चलती है- जैसे किसी रेस्ट्रां के बाथरूम तक जाना, जिसके दरवाजे में उसकी व्हील-चेयर घुसती ही नहीं। मम्मी के अनुसार, जब नकचढ़ी राजकुमारी डॉक्टर के पास जाती है तो भी वह थोड़ा चलती है। परंतु मैंने उसे ऐसा करते हुए कभी नहीं देखा है।

दोपहर के खाने के बाद मैं बाहर चली जाती हूं और नकचढ़ी राजकुमारी अपने झूले पर लेटकर आराम से किताब पढ़ती है।

"क्या हम दोनों मिलकर एक कठपुतली का खेल खेलें?" मैंने उससे पूछा।

"नहीं, शुक्रिया," नकचढ़ी राजकुमारी ने शाही लहजे में जवाब दिया - "मैं बहुत सारी किताबें पढ़ना चाहती हूं, जिससे मैं गर्मियों में होने वाली प्रतियोगिता में पुरस्कार जीत सकूं।"

मेरा दिल पढ़ने का बिल्कुल नहीं था। फिर भी मैंने एक किताब ले ली और उसके चित्र निहारती रही। एक मिनट में मैंने पूरी किताब खत्म कर डाली।

"यह किताब काफी उबाऊ है," मैंने कहा - "चलो, अब तो कठपुतलियों वाला खेल खेलें।" परंतु नकचढ़ी राजकुमारी ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया। महारानी अब खर्राटे भर रही थीं!

पेड़ के पीछे ही उनका सिंहासन खड़ा था। उसे देख मेरे दिमाग में दुनिया का सबसे ग्रेट आइडिया आया - आज मैं, पैटी जेन, राजकुमारी बनूंगी!

मैं झट से सिंहासन पर बैठ गई। मुझे उसकी मुलायम गद्दी अच्छी लगी। कितना मजा आया उसपर बैठकर!

"मैं अपने सुनहरे सिंहासन पर पूरी शान से शाम तक बैठूंगी," मैंने अपने-आपसे कहा। मेरे राज-दरबार में कैसे लोग होंगे, वे अपनी नई सुंदर राजकुमारी को कितने प्यार से निहार रहे होंगे, मैं यही सोचती रही!

व्हील-चेयर यानी सिंहासन को मिटी्ट और घास पर चलाना काफी कठिन था। इसलिए मैं उसे खींचकर सामने के बरामदे में लाई। "अब मेरा हर मिनट इसी सिंहासन पर बीतेगा," मैंने अपने-आपसे कहा। मैंने व्हील-चेयर पर नकचढ़ी राजकुमारी के स्कूल तक जाने की ठानी। सड़क तक जाने के लिए घास पर एक ढाल था। शायद इस टीले से नीचे फिसलने में बड़ा मजा आएगा। मैंने व्हील-चेयर पर बैठकर उसे एक जोर का धक्का दिया।

धत्त! मैं धड़ाम से लुढ़ककर सिंहासन से नीचे गिरी और व्हील-चेयर मेरे ऊपर आकर गिरी। मेरे घुटनों में कुछ खरोंचें आईं, पर उसमें कोई खास दर्द नहीं हुआ। आसपास कोई नहीं था जो मेरी बेवकूफी पर हंसे। यह सोच मैं खुश हुई। क्या नकचढ़ी राजकुमारी ने भी व्हील-चेयर सीखते समय इसी तरह पटकी खाई होगी? फिर मैंने अपने सिंहासन को सीधा किया और दुबारा उस पर बैठी। धीरे-धीरे मैं सड़क पार करने के लिए कोने तक गई।

जैसे ही सिग्नल की हरी बत्ती जली मैंने तुरंत व्हील-चेयर को तेजी से आगे बढ़ाया। पर जैसे ही मैं सड़क के बीचोंबीच पहुंची, वैसे ही सिग्नल की बत्ती दुबारा लाल हो गई। मेरी तरफ चारों ओर से कारें और ट्रक बढ़ने लगे। मैं इतनी सहम गई कि मैंने डर के मारे दोनों हाथों से अपनी आंखों को बंद कर लिया।

अंत में ट्रैफिक रुका। दुबारा फिर से सिग्नल की हरी बत्ती जली। अब तक मैं सड़क पार कर चुकी थी। अब थोड़ी चढ़ाई थी। व्हील-चेयर को ढाल पर ऊपर चढ़ाते-चढ़ाते मेरी हालत खस्ता हो गई। इतनी ताकत लगानी पड़ी कि मुझे लगा जैसे मेरे हाथ ही टूट गए हों।

एक अंकल-आंटी मेरी तरफ बढ़े। उन्होंने मुझे और मेरे सिंहासन को गौर से देखा और फिर जल्दी ही वहां से खिसक लिए। डरावनी फिल्म देखते समय मैं भी अक्सर यही करती हूं। क्या नकचढ़ी राजकुमारी ने भी ऐसे अनुभव झेले होंगे? कुछ लड़के सड़क के किनारे खेल रहे थे। वे मेरी व्हील-चेयर के सामने से हटने को तैयार नहीं थे। "तुम मेरे ऊपर से होकर गुजरो, पहियों वाली लड़की," उनमें से एक मुझे चिढ़ाया। उसके बाकी दोस्त ठहाके मारकर हंसने लगे। "मैं तुम्हारी पिटाई लगाऊंगी!" मैं चिल्लाई, परंतु वे और जोर से हंसे और वहां से भाग गए।

स्कूल के मैदान में मुझे एक ऑइस-क्रीम का ठेला दिखाई दिया। कई बच्चों ने उसे घेरा था। मैं मैदान पार करके सीधे ठेले की ओर बढ़ी। मैंने अपनी जेब में से कुछ पैसे निकाले। तभी अचानक दुनिया की सबसे दुखद घटना घटी। सब तरफ मोटी-मोटी बारिश की बूंदें टप-टप करके गिरने लगीं! सारे बच्चे खिलखिलाते हुए इधर-उधर बिखर गए। ऑइस-क्रीम का ठेलेवाला तेजी से दूर चला गया। एक मैं ही ऐसी बदनसीब थी जो अपने गीले सिंहासन पर अकेली बची थी।

बारिश तेज, और तज बरसने लगी। मेरा मन किया कि मैं भी झट से घर दौड़कर चली जाऊं। परंतु मैं इस सिंहासन को छोड़कर कैसे जाऊं? वैसे मैं अभी भी राजकुमारी थी और मैंने हर पल अपने सिंहासन पर बिताने का वादा किया था - चाहे सिंहासन की गद्दी गीली ही क्यों न हो। इसलिए अब मैंने पूरी ताकत लगाकर व्हील-चेयर को चलाया। जब मैं मैदान में वापस पहुंची तो वहां मुझे हर तरफ कीचड़ ही नजर आई। व्हील-चेयर के पहिए गीली मिटी्ट में धंसने लगे - वे नीचे, और नीचे धंस रहे थे। फिर पहियों ने घूमना बंद कर दिया। मेरे हाथ भी मिटी्ट से सन गए। जब मैं सिंहासन से कूदकर नीचे आई तो मेरी नई सैंडिल भी मिटी्ट में धंस गई। मेरे पैर मिटी्ट में गायब हो गए। बड़ी मुश्किल से मैंने व्हील-चेयर को निकाला। अब तक मैं पूरी तरह मिटी्ट से सन चुकी थी और पानी में भीग चुकी थी। मैं पैटी जेन बड़ी मुश्किल में थी। अब शायद सिंहासन छोड़ने का समय आ गया था। अब बारिश रुकी। सड़क के उस पार मुझे इंद्रधनुष दिखाई दिया। मुझे अपने दूर स्थित घर के बरामदे में पापा खड़े नजर आए। वे जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। परंतु कारों और ट्रकों के शोर में उनकी आवाज सुनाई नहीं देती थी। मम्मी इधर-उधर देखती सड़क की तरफ बढ़ रही थीं। मैं किसी तरह व्हील-चेयर को खींचकर सड़क के किनारे तक लाई।

फिर मैंने सड़क पार की। जैसे ही मम्मी ने मुझे देखा, वे मुझे गले लगाने के लिए दौड़ीं। पापा भी उनके पीछे-पीछे थे। "सिंहासन को गंदा करने की मेरी बिल्कुल मंशा नहीं थी। मैं माफी चाहती हूं," मैंने कहा।

"सिंहासन?" मम्मी ने आश्चर्य से पूछा - "तुम्हारा मतलब व्हील-चेयर! हमें लगा तुम कहीं खो गई हो।"

"आप व्हील-चेयर को तो नहीं तलाश रहे थे?" मैंने पूछा।

"पैटी जेन, हम तुम्हें तलाश रहे थे।" कहते हुए मम्मी ने मुझे अपने सीने से चिपका लिया - "तुम्हें पेनी की व्हील-चेयर नहीं ले जानी चाहिए थी। पर हमें खुशी है कि तुम सही-सलामत वापस आ गई हो!"

घर आकर मम्मी ने मुझे रगड़-रगड़कर नहलाया और फिर मुझे पलंग पर लिटाया जैसा कि वे पेनी के साथ करती थीं। कुछ देर बाद मम्मी-पापा गुड-नॉइट कहकर, लाईट बंद करके चले गए। फिर मैं अकेले काफी देर तक सोचती रही।

"पेनी," मैंने फुसफुसाते हुए कहा, "क्या तुम जगी हो?"

"हूं।"

"क्या तुम्हें चलना अच्छा लगता है या बैठे रहना?"

"देखो," पेनी ने कहा, "चलने से मैं बहुत जल्दी थक जाती हूं। वैसे मैं व्हील-चेयर चलाकर भी पस्त हो जाती हूं। पर मुझे व्हील-चेयर ज्यादा पसंद है, क्योंकि उस पर बैठे-बैठे मैं अपनी मनपसंद चीजें कर सकती हूं। बैसाखी से मेरे लिए वह सब करना संभव नहीं है।" "तुम उस गंदी-सी व्हील-चेयर पर बैठे-बैठे हर समय मुस्कुरा कैसे सकती हो?"

"व्हील-चेयर गंदी नहीं है," पेनी ने कहा, "व्हील-चेयर के सहारे ही मैं उन जगहों पर जा सकती हूं जहां बैसाखियों से मेरे लिए जाना संभव नहीं है।"

यह सब सुनकर मैं और गहराई से सोचने लगी, "मैंने तुम्हारी व्हील-चेयर का इस्तेमाल किया, इसके लिए मैं माफी चाहती हूं।"

"चलो कोई बात नहीं। अब जल्दी से सो जाओ।"

पर अब मेरी आंखों से नींद गायब है। मैं लेटे-लेटे सोचती हूं और दुआएं मांगती हूं कि मेरी बहन को जिस काम में खुशी मिले वह उन्हें कर पाए। अब मुझे लग रहा है कि नकचढ़ी राजकुमारी उसके लिए शायद सही नाम नहीं है। शायद उसका असली नाम पेनीलोप मेरी और उसकी छोटी बहन यानी मेरा नाम पैटी जेन ही बेहतर है।

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(अनुमति से साभार प्रकाशित)

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बहुत सुंदर बाल कथा.

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