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खाली जगह रखें वरना मिट जाएंगे

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डॉ दीपक आचार्य

भूकंप तो आएगा ही, इससे बचना मुश्किल है।

हम जिस ढंग से अधर्माचारण अपना चुके हैं, उन्मुक्त और स्वच्छंद हैं, स्वेच्छाचारिता को अपना चुके हैं उस हिसाब से अब प्रकृति हमें ठिकाने लगाएगी ही।

बचने की कोशिशें हमें ही करनी हैं, लेकिन कोई कैसे बच सकता है, जबकि हमने अपने बचाव के सारे रास्ते बंद कर डाले हैं।

आज वहाँ भूकंप आया है, कल अपने यहाँ भी आ सकता है। भूकंप ने हमारे करीब न आने की कसम थोड़े ही खा रखी है। इंच भर जमीन तक का धंधा हम करने लगे हैं।

सब कहते हैं, राय देते हैं भूकंप से बचाव के नुस्खे बताते हैं और इन्हें अपनाने की सीख देकर चले जाते हैं। कहते हैं भूकंप आते ही घर से बाहर निकल जाओ, खुले मैदानों में आ जाओ।

इन लोगों को कौन बताए कि हमने सीमेंट, कंकरीट और ईंट-चूने के जंगल बसा दिए हैं, जगह-जगह टॉवर खड़े कर दिए हैं, कोई खाली जमीन हो तो वहाँ जाएं।

दुर्भाग्य है जमीन के मामलों से जुड़े महकमे, निकाय और माफियाओं का जिन्होंने हमारी बेमौत मौत के सारे सहज प्रबन्ध कर रखे हैं। खेलने तक के लिए मैदान नहीं छोड़े हैं, कहीं कोई कोना बाकी नहीं बचा है जिसे खाली छोड़ रखा हो। गली-कूंचों तक में कोने-कोने, सड़कों के किनारे तक बेच डाले हैं। जमीन के टुकड़ों पर कहीं बिजनेस है और कहीं कोई आदमी बसा हुआ।

ऎसे में अचानक भूकंप आ ही जाए तो हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा है अपने बचाव का।

अपने आस-पास कोई मैदान या खाली जगह तक नहीं छोड़ रखी है जहाँ बिजली-टेलीफोन के खंभे, मोबाइल टॉवर, मकान-दुकान, होर्डिंग्स या दूसरे गिर पड़ने जैसे संसाधन न हों।

जमीनों का अंधाधुंध उपयोग और खरीद फरोख्त करने वालों से लेकर उन सभी को दोषी माना जा सकता है जिन लोगों ने आम आदमी को भूकंप के दौरान स्वर्ग पहुँचाने के सारे इंतजाम कर दिए हैं।

भूकंप आ भी जाए तो क्या, जो लोग भूमि की दलाली में लगे हुए हैं, जमीन के सौदेबाज और बिल्डर्स हैं उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि भूकंप आ जाए या कोई जलजला। उन्हें इंसान की जिंदगी से ज्यादा भाती है मुद्रा।

हम सभी लोग आज की बात करते हैं, आज के आनंद की जय बोलने में विश्वास रखते हैं।

हमें पता नहीं है कि कल क्या होने वाला है, कल जो होगा देखा जाएगा।

जो प्रभावित होंगे, वे भुगतेंगे, हमारा अपना क्या।

हमारी संवेदनशीलता और दूरदर्शिता खत्म हो गई है।

हमें सिर्फ अपने ही कल की चिन्ता है, दूसरों का कल कितना ही विकल हो, इस बात से हमें क्या फर्क पड़ता है।

आज फिर जरूरत आ पड़ी है। हम अपने कुकर्मों, स्वार्थों और जमीन की दलाली के धंधों से ऊपर उठकर कल के बारे में सोचें।

गंभीरता से सोचें कि किसी दिन हमारे यहाँ भी भूकंप आ गया तो हम जान बचाने के लिए कहाँ जाएंगे।

हमारे आस-पास कोई खाली जगह तक नहीं बची है जहाँ जाकर इस बात का सुकून पा सकें कि भूकंप से बच जाएंगे।

यह सोचने का काम नीति-निर्धारकों, विकास में माहिर पुरोधाओं का है, समाज की सच्ची सेवा करने के लिए जमा हुई भीड़ का है।

अपने आपदा प्रबन्धन पर गहन विचार करें और हर क्षेत्र में कुछ न कुछ खाली जमीन छोड़ रखने का यत्न करें। यह खाली जमीन सार्वजनिक और सामुदायिक उपयोग का सशक्त माध्यम और जन सहूलियत का भी काम करेगी।

है यह छोटा सा विषय लेकिन भूकंप के दृश्यों को देखकर भी हमारा दिल नहीं दहले, दिमाग में कंपन न हो, खुद झकझोर नहीं पाएं, तो समझ लें कि हद दर्जे की संवेदनहीनता और अपने पापों से प्राकृतिक आपदाएं आएंगी ही, कभी भी भूकंप का आना संभव है और ऎसा हो गया तो हम लोग सामूहिक हत्याओं के पाप से बच नहीं पाएंगे।

कम से कम भूकंप से बचाव के नाम पर तो जगह-जगह खाली जमीन छोड़ रखें।

आज भूकंप दूर दिख रहा है, बहुत जल्दी ही अपने करीब होगा, तब तक अक्ल आ जाए तो ठीक है वरना कोई बच नहीं पाएगा। ईश्वर हमें लोकमंगल की बुद्धि प्रदान करे।

भूकंप से प्रभावित सभी लोगों के प्रति हार्दिक सहानुभूति रखते हुए मानवता का परिचय दें और जहां कहीं हों वहाँ मदद के लिए तैयार रहें।

जो लोग भूकंप में मारे गए, उन दिवंगत आत्माओं की गति-मुक्ति के लिए मन से प्रार्थना करें और इन जीवात्माओं से इस बात के लिए ईमानदारी और सच्चाई के साथ क्षमायाचना करें कि हम उनके लिए कुछ नहीं कर सके।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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(ऊपर का चित्र - पुलकेश मंडल की कलाकृति - फ़ोकस, कैनवस पर एक्रिलिक रंग)

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