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ख्याल रखें पशु-पक्षियों का, यही है सेवा और पुण्य

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दीपक आचार्य

सर्वत्र भीषण गर्मी का माहौल है।

आसमान से आग बरस रही है। धरती तपने लगी है।

हर कण्ठ को तलाश है पानी की, चाहे वह पशु-पक्षी हों या फिर हम इंसान।

यह इंसान का ही फर्ज है कि वह खुद के लिए जतन तो करे ही, अपने आस-पास के प्राणियों खासकर पशु-पक्षियों के लिए भी ऎसा इंतजाम करे कि कोई भी दाना-पानी के अभाव में दम न तोड़ दे।

 

इंसान के रूप में हम अपने लिए सारे प्रबन्ध कर ही लिया करते हैं, सहज न सही तो लड़-झगड़ कर भी।

लेकिन बेचारे पशु-पक्षी कहाँ जाएँ, वे तो हमारे ही भरोसे हैं।

हम इन दिनों रोजाना जमकर भोज उड़ा रहे हैं, शीतल जल और दूसरे कई किस्मों के ठण्डे पेय-शरबत, कुल्फी और आईसक्रीम से गले तर कर रहे हैं, लेकिन हमें अपने आस-पास रहने वाले पशु-पक्षियों की कितनी चिंता है।

यह सब निर्भर करता है हमारी संवेदनशीलता पर। हालांकि अब हममें जिस तत्व की कमी है वह संवेदनशीलता ही है, जो न कहीं मोल मिलती है, न किसी में ट्रांसफर की जा सकती है।

यह आत्मा की बात है, मन होना चाहिए औरों के लिए जीने का।

हम सभी में उतनी तो संवेदनशीलता होनी ही चाहिए कि पशु-पक्षियों को दाना-पानी की कहीं कोई समस्या नहीं आए।

कहीं किसी भी स्थान पर दाना-पानी के अभाव में यदि कोई पशु या पक्षी तड़पता है, भीषण गर्मी का शिकार होकर भूख और प्यास से दम तोड़ देता है तो यह सारा पाप और दोष हमारे माथे पर ही है।

 

हम हद दर्जें के बेशर्म, निर्लज्ज, संवेदनहीन और मुर्दों की तरह रहकर यही सब कुछ देखते रहें तो हमारा जीना बेकार है।

इंसान के रूप में पैदा हुए हम सभी बुद्धिजीवियों, बुद्धिबेचकों और कुटिल बुद्धियों की ही जिम्मेदारी है कि कोई भी जीव भूखा-प्यासा न रहे।

जिस इलाके में पशु-पक्षियों की भूख-प्यास से मौत हो जाती है वह पूरा इलाका अभिशप्त हो जाता है और वहाँ कुछ समय बाद कलह, अकाल मृत्यु और भय की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं।

जहाँ बड़े पैमाने पर पशु-पक्षियों का वध होता है वहाँ भूकंप और प्राकृतिक आपदाओं की विपदाएं अक्सर आती रहती हैं और वह भी ऎसी कि सब कुछ बरबाद कर दिया करती हैं।

हममें से उन सभी को संवेदनहीन और खुदगर्ज कहा जाना चाहिए जो गाय, कुत्तों और कौओं के लिए रोटी नहीं निकालते हैं, पशुओं और पक्षियों के लिए पानी का प्रबन्ध करने से दूर रहते हैं उन लोगों की जिन्दगी अभिशप्त होती है  और ऎसे लोगों को बीमारियां व समस्याएं होती ही होती हैं।

सेवा, परोपकार और पुण्य का सबसे सहज, सरल और रोजमर्रा के लिए उपयोगी कोई प्रयोग है तो वह यही है कि पशु-पक्षियों के लिए भूख और प्यास मिटाने का काम करें।

यह अपने आप में  ऎसा प्रयोग है जिसमें बहुत थोड़े परिश्रम से विराट पुण्य और असीम आत्मतोष पाया जा सकता है। और वह भी घर बैठे ही।

हमारे सारे अनुष्ठान, कर्मकाण्ड, यज्ञ-यागादि, सामूहिक भोज और तमाम प्रकार के आयोजन व्यर्थ हैं यदि हम पशु-पक्षियों और गरीबों के लिए कुछ नहीं करते।

ईश्वर इन्हीं के माध्यम से हमें पुण्य देता है, और कोई माध्यम है ही नहीं।

धर्म-कर्म और फर्ज का सीधा संबंध सेवा और परोपकार से है।

जिस कर्म में निष्काम सेवा और परोपकार नहीं है वह कर्म अपने आप में कुकर्म और महापाप है क्योंकि यह उन नालायक लोगों की स्वार्थपूर्ति के माध्यम हैं जिन्हें साल भर कुछ न कुछ अतिरिक्त और हराम की कमाई और लाभ चाहिए होते हैं।

मन्दिरों में घण्टे हिलाने, घण्टों तक वैदिक ऋचाओं और पौराणिक मंत्रों, स्तुतियों, श्लोकों के उच्चतम और गलाफाड़ स्वर में उच्चारण से यजमानों के लिए कल्याण की बातें करने, कीर्तन और नर्तन करते हुए लोकवाद्यों की धूम पर थिरकते हुए भजन गंगा में बार-बार डुबकी लगाने,  विश्व कल्याण की डींगे हाँकने और ईश्वर को रिझाने के सारे जतन बेमानी हैं यदि हम अपने आस-पास के पशु-पक्षियों और जरूरमन्दों की आवश्यकताओं की किसी भी अंश में अनदेखी करते हैं।

वर्तमान भीषण गर्मी के दौर में हम सभी का एकमात्र धर्म यही है कि लू के थपेड़ों, गर्म आँधियों और आसमान से बरसने वाली आग से प्रभावितों के लिए खान-पान का इंतजाम करें।

हम सभी आज ही यह संकल्प लें कि पशु-पक्षियों के लिए परिण्डों और पानी की टंकियों का प्रबन्ध अपने घर की छतों व आस-पास करें, जहाँ हम काम करते हैं वहाँ भी यही सब करें।

आज इंसान की परीक्षा और इंसान होने की कसौटी का समय है

 

जो जहाँ है, वहाँ अपने सामथ्र्य के अनुसार पशु-पक्षियों के लिए कुछ न कुछ करे।

आज हमें सेवा और पुण्य प्राप्ति का मौका मिला है, इसे चूक गए तो फिर अपने हाथ कुछ नहीं आएगा।

हमारी आत्मा भी मरते दम तक हमें धिक्कारेगी।

हमारी संवेदनशून्यता पर आने वाली पीढ़ियाँ भी कोसती रहेंगी।

असल में जीता वही है जो औरों के लिए जीता है, बाकी तो सारे अधमरे, मरे या मुर्दालों से कम नहीं हैं जो गलती से इंसान के रूप में पैदा हो गए हैं।

और तब तक धरती पर भार बने रहेंगे जब तक कि ऊपर से बुलावा नहीं आ जाता।

पता नहीं लोग हमें क्यों झेल रहे हैं और कब तक लोग हम खुदगर्ज नालायकों को झेलते रहेंगे।

अपने जीवन की सारी समस्याओं का समाधान बिना कुछ किए जल्दी से जल्दी पाना चाहें तो पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी का इंतजाम करें और भावी जीवन में सुख-समृद्धि एवं सुकून का आवाहन करें।

इससे बढ़िया रामबाण नुस्खा न कोई ज्योतिषी बता सकता है, न आलीशान आश्रमों के एयरकण्डीशण्ड कमरों में बैठे, संसार को त्याग चुके परम वैराग्यवान बाबा लोग  या बड़े-बड़े लोगों के लिए भाग्यविधाता अथवा देवी-देवताओं को तंत्र-मंत्रों के बूते अपने वश में कर काम कराने का दावा कराने वाले दलाल। 

धर्म को कर्मकाण्ड और स्वार्थपूर्ति के दायरों से बाहर निकल कर देखें और आप्त प्राणियों के लिए अपने फर्ज निभाएं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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