गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

मक्सिम गोर्की की कहानी - कॉमरेड

कॉमरेड: एक कहानी

मक्सिम गोर्की

 

अनुवाद - कामता प्रसाद

इस शहर की प्रत्येक वस्तु बड़ी अद्भुत और बड़ी दुर्बोध थी। इसमें बने हुए बहुत-से गिरजाघरों के विभिन्न रंगों के गुम्बज आकाश की ओर सिर उठाये खड़े थे परन्तु कारख़ानों की दीवारें और चिमनियाँ इन घण्टाघरों से भी ऊँची थीं। गिरजे इन व्यापारिक इमारतों की ऊँची-ऊँची दीवारों से छिपे, पत्थर की उन निर्जीव चहारदीवारियों में इस प्रकार डूबे हुए थे जैसे मिट्टी और मलबे के ढेर में भद्दे, कुरूप फूल खिल रहे हों। और जब गिरजों के घण्टे प्रार्थना के लिए लोगों को बुलाते तो उनकी झनकारती हुई आवाज़ लोहे की छतों से टकराती और मकानों के बीच बनी लम्बी और संकरी गलियों में खो जाती।

इमारतें विशाल और अपेक्षाकृत कम आकर्षक थीं परन्तु आदमी कुरूप थे। वे सदैव नीचतापूर्ण व्यवहार किया करते थे। सुबह से लेकर रात तक वे भूरे चूहों की तरह शहर की पतली टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में इधर-से-उधर भागा करते और अपनी उत्सुक तथा लालची आँखें फाड़े कुछ रोटी के लिए तथा कुछ मनोरंजन के लिए भटकते रहते। इतने पर भी कुछ लोग चौराहों पर खड़े हो, निर्बल मनुष्यों पर यह देखने के लिए द्वेषपूर्ण निगाहें जमाये रहते कि वे सबल व्यक्तियों के सामने नम्रतापूर्वक झुकते हैं या नहीं। सबल व्यक्ति धनवान थे और वहाँ के प्रत्येक प्राणी का यह विश्वास था कि केवल धन ही मनुष्य को शक्ति दे सकता है। वे सब अधिकार के भूखे थे, क्योंकि सब गुलाम थे। धनवानो का विलासिता ग़रीबों के हृदय में द्वेष और घृणा उत्पन्न करती थीं। वहाँ किसी भी व्यक्ति के लिए स्वर्ण की झनकार से अधिक सुन्दर और मधुर दूसरा कोई भी संगीत नहीं था और इसी कारण वहाँ का हरेक आदमी दूसरे का दुश्मन बन गया था। सब पर क्रूरता का शासन था।

कभी-कभी सूर्य उस शहर पर चमकता परन्तु वहाँ का जीवन सदैव अन्धकारपूर्ण रहता और मनुष्य छाया की तरह दिखायी देते। रात होने पर वे असंख्य चमकीली बत्तियाँ जलाते परन्तु उस समय भूखी औरतें पैसों के लिए अपना कंकालवत शरीर बेचने को सड़कों पर निकल आतीं। विभिन्न प्रकार के सुगन्धित भोजनों की सुगन्धि उन्हें अपनी ओर खींचती और चारों ओर भूखे मानव की भूखी आँखें, चुपचाप चमकने लगतीं। नगर के ऊपर दुख और विषाद की एक धीमी कराहट, जो ज़ोर से चिल्लाने में असमर्थ थी, प्रतिध्वनित होकर मँडराने लगती।

जीवन नीरस और चिन्ताओं से भरा हुआ था। मानव एक-दूसरे का दुश्मन था और हर इन्सान ग़लत रास्ते पर चल रहा था। केवल कुछ व्यक्ति ही यह अनुभव करते थे कि वे ठीक मार्ग पर हैं परन्तु वे पशुओं की तरह रूखे और क्रूर थे। वे दूसरों से अधिक भयानक और कठोर थे…

हरेक जीना चाहता था परन्तु यह कोई नहीं जानता था कि कैसे जिये। कोई भी अपनी इच्छाओें का अनुसरण स्वतन्त्र रूप से करने में समर्थ नहीं था। भविष्य की ओर बढ़ा हुआ प्रत्येक क़दम उन्हें पीछे मुड़कर उस वर्तमान की ओर देखने के लिए बाध्य कर देता था, जो एक लालची राक्षस के शक्तिशाली और क्रूर हाथों द्वारा मनुष्यों को अपने रास्ते पर आगे बढ़ने से रोक देता और अपने चिपचिपे आलिंगन के जाल में फाँस लेता।

मनुष्य जब ज़ि‍न्दगी के चेहरे पर कुरूप दुर्भाग्य की रेखाएँ देखता तो कष्ट और आश्चर्य से विजड़ित हो निस्सहाय के समान ठिठक जाता, ज़िन्दगी उसके हृदय में अपनी हज़ारों उदास और असहाय आँखों से झाँकती, और निश्शब्द उससे प्रार्थना करती जिसे सुन भविष्य की सुन्दर आकांक्षाएँ उसकी आत्मा में मर जातीं और मनुष्य की नपुंसकता की कराहट, उन दुखी और दीन मनुष्यों की कराह और चीख़-पुकारों के लयहीन संगीत में डूब जाती जो ज़िन्दगी के शिकंजे में पड़े तड़फड़ा रहे थे।

वहाँ सदैव नीरसता और उद्विग्नता तथा कभी-कभी भय का वातावरण छाया रहता और वह अन्धकारपूर्ण अवसाद में लिपटा नगर अपने एक से विद्रोही पत्थरों के ढेर को लिए जो मन्दिरों को कलंकित कर रहे थे। मनुष्यों को एक कारागृह के समान घेरे तथा सूर्य की किरणों को ऊपर ही ऊपर लौटाते हुए, चुपचाप खड़ा था।

वहाँ जीवन के संगीत में क्रोध और दुख की चीख़, छिपी हुई घृणा की एक धीमी फुसकार, क्रूरता का भयभीत करने वाला कोलाहल और हिंसा की भयंकर पुकार भरी हुई थी।

 

दुख और दुर्भाग्य के अवसादपूर्ण कोलाहल के बीच लालच और इच्छाओं के दृढ़ बन्धन में जकड़े, दयनीय गर्व की कीचड़ में फँसे थोड़े-से एकाकी स्वप्नदृष्टा उन झोंपड़ियों की ओर चुपचाप, छिपकर चले जा रहे थे जहाँ वे निर्धन व्यक्ति रहते थे जिन्होंने नगर की समृद्धि को बढ़ाया था। तिरस्कृत और उपेक्षित होते हुए भी मानव में पूर्ण आस्था रख वे विद्रोह की शिक्षा देते थे। वे दूर प्रज्वलित सत्य की विद्रोही चिनगारियों के समान थे। वे उन झोंपड़ियों में अपने साथ छिपाकर एक सादे परन्तु उच्च सिद्धान्त की शिक्षा के फल देने वाले बीज लाये थे और कभी अपनी आँखों में कठोरता की ठण्डी चमक भरकर और कभी सज्जनता और प्रेम द्वारा उन गुलाम मनुष्यों के हृदय में इस प्रकाशवान प्रज्वलित सत्य की जड़ रोपने का प्रयत्न करते, उन मनुष्यों के हृदय में, जिन्हें क्रूर और लालची व्यक्तियों ने अपने लाभ के लिए अन्धे और गूँगे हथियारों में बदल दिया था।

और ये अभागे, पीड़ित मनुष्य अविश्वासपूर्वक इन नवीन शब्दों के संगीत को सुनते, एक ऐसे संगीत को जिसके लिए उनके क्लान्त हृदय युगों से प्रतीक्षा कर रहे थे। धीरे-धीरे उन्होंने अपने सिर उठाये और अपने को उन चालाकी से भरी हुई झूठी बातों के जाल से मुक्त कर लिया जिसने उनके शक्तिशाली और लालची अत्याचारियों ने उन्हें फँसा रखा था।

उनके जीवन में, जिसमें उदासी से भरा हुआ दमित असन्तोष व्याप्त था, उनके हृदयों में जो अनेक अत्याचार सहकर विषाक्त बन चुके थे, उनके मस्तिष्क में जो शक्तिशालियों की धूर्ततापूर्ण चतुरता से जड़ हो गया था – उस कठोर और दीन अस्तित्व में जो भयंकर अत्याचारों से सूख चुका था – एक सीधा सा दीप्तिमान शब्द व्याप्त हो उठा:

“कॉमरेड!”

यह शब्द उनके लिए नया नहीं था। उन्होंने इस सुना था और स्वयं भी इसका उच्चारण किया था। परन्तु तब तक इसमें भी वही रिक्तता और उदासी भरी हुई थी जो ऐसे ही अन्य परिचित और साधारण शब्दों में भरी रहती है जिन्हें भूले जाने से कोई नुकसान नहीं होता।

परन्तु अब इसमें एक नयी झंकार थी…सशक्त और स्पष्ट झंकार। एक नये अर्थ का संगीत व्याप्त था और एक हीरे के समान कठोर चमक और दिगन्तव्यापी ध्वनि थी।

उन्होंने इसे अपनाया और इसका उच्चारण किया…सावधानी से नम्रतापूर्वक और इसे अपने हृदय से इतने स्नेहपूर्वक चिपटा लिया जैसे माता अपने बच्चे को पालने में झुलाती है।

और जैसे-जैसे इस शब्द की जाज्वल्यमान आत्मा के भीतर प्रविष्ट होते गये वह उन्हें उतना ही अधिक उज्ज्वल और सुन्दर दिखायी देता गया।

“कॉमरेड!” उन्होंने कहा।

और उन्होंने अनुभव किया कि यह शब्द सम्पूर्ण संसार को एक सूत्र में संगठित करने के लिए, सब मनुष्यों को आज़ादी की सबसे ऊँची चोटी तक उठा उन्हें नये बन्धनों में बाँधने के लिए – एक दूसरे का सम्मान करने के लिए तथा मनुष्य को स्वतन्त्रता के बन्धन में लिये हुए – इस संसार में आया है।

जब इस शब्द ने गुलामों के हृदय में जड़ जमा ली तब वे गुलाम नहीं रहे और एक दिन उन्होंने शहर और उसके शक्तिशाली शासकों से पुकारकर कहा –

“बस, बहुत हो चुका!”

इससे जीवन रुक गया क्योंकि ये लोग ही अपनी शक्ति से इसका संचालन करते थे – केवल यही लोग, और कोई नहीं। पानी बहना बन्द हो गया, आग बुझ गयी, नगर अन्धकार में डूब गया और शक्तिशाली लोग बच्चों के समान असहाय हो उठे।

अत्याचारियों की आत्मा में भय समा गया। अपने ही मल-मूत्र की दम घोंटने वाली दुर्गन्ध से व्याकुल हो उन्होंने विद्रोहियों के प्रति अपनी घृणा का गला घोंट दिया और उनकी शक्ति को देख किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गये।

भूख का पिशाच उनका पीछा करने लगा और उनके बच्चे अन्धकार में आर्त स्वर से रोने लगे।

घर और गिरजे अवसाद में डूब गये और पत्थर और लोहे के क्रूर अट्टहास में घिरी हुई सड़कों पर मृत्यु की-सी भयावनी निस्तब्धता छा गयी। जीवन गतिहीन हो गया क्योंकि जिस शक्ति ने इसे उत्पन्न किया था वह अब अपने अस्तित्व के प्रति सजग हो उठी थी और गुलाम मनुष्य ने अपनी इच्छा को प्रकट करने वाले चमत्कारपूर्ण और अजेय शब्द को पा लिया था। उसने अपने को अत्याचार से मुक्त कर अपनी शक्ति को, जो विधाता की शक्ति थी, पहचान लिया था।

शक्तिशालियों के लिए वे दिन दूर न थे क्योंकि वे लोग अपने को इस जीवन का स्वामी समझते थे। वह रात हज़ार रातों के समान थी, दुख के समान गहरी। मुर्दे के समान उस नगर में चमकने वाली बत्तियाँ अत्यन्त धूमिल और अशक्त थीं। वह नगर शताब्दियों के परिश्रम से बना था। वह राक्षस जिसने मनुष्यों का रक्त चूस लिया था अपनी सम्पूर्ण कुरूपता को लेकर उनके सामने खड़ा हो गया था – पत्थर और काठ के एक दयनीय ढेर के समान। मकानों की अँधेरी खिड़कियाँ भूखी और दुखी-सी सड़क की ओर झाँक रही थीं जहाँ जीवन के सच्चे स्वामी हृदय में एक नया उत्साह लिये चल रहे थे। वे भी भूखे थे, वास्तव में दूसरों से अधिक भूखे, परन्तु उनकी यह भूख की वेदना उनकी परिचित थी! उनका शारीरिक कष्ट उन्हें इतना असह्य नहीं था जितना कि जीवन के उन स्वामियों को। न इसने उनकी आत्मा में प्रज्वलित उस ज्वाला को ही कम किया था। वे अपनी शक्ति का परिचय पाकर उत्तेजित हो रहे थे। आने वाली विजय का विश्वास उनकी आँखों में चमक रहा था।

वे नगर की सड़कों पर घूम रहे थे जो उनके लिए एक उदास, दृढ़ कारागृह के समान थीं। जहाँ उनकी आत्मा पर असंख्य चोंटें पहुँचायी गयी थीं। उन्होंने अपने परिश्रम के महत्त्व को देखा और इसने उनको जीवन का स्वामी बनने के पवित्र अधिकार के प्रति सजग बना दिया, जीवन के नियम बनाने वाला तथा उसे उत्पन्न करने वाला। और फिर एक नयी शक्ति के साथ, एक चकाचौंध उत्पन्न कर देने वाली चमक के साथ, सबको संगठित करने वाला वह जीवनदायी, शब्द गूँज उठा।

“कॉमरेड!”

यह शब्द वर्तमान के झूठे शब्दों के बीच भविष्य के सुखद सन्देश के समान गूँज उठा, जिसमें एक नया जीवन सबकी प्रतीक्षा कर रहा था। वह जीवन दूर था या पास? उन्होंने महसूस किया कि वे ही इसका निर्णय करेंगे। वे आज़ादी के पास पहुँच रहे थे और वे स्वयं ही उसके आगमन को स्थगित करते जा रहे थे।

 

उस वेश्या ने भी जो कल एक आधे जानवर के समान थी और गन्दी गलियों में थकी हुई इस बात का इन्तज़ार करती रहती थी कि कोई आये और दो पैसे देकर उसके सूखे ठठरी के समान शरीर को ख़रीद ले, उस शब्द को सुना परन्तु मुस्कराते हुए परेशान-सी होकर उसने इसका उच्चारण करने का साहस किया। एक आदमी उसके पास आया, उनमें से एक आदमी जिन्होंने इससे पहले इस रास्ते पर क़दम नहीं रखा था और उससे इस प्रकार बोला जैसे कोई अपने भाई से बोलता हैः

“कॉमरेड!” उसने कहा।

वह इस प्रकार मधुरता और लज्जापूर्वक हँसी जिससे अत्यधिक प्रसन्नता के कारण रो न उठे। उसके दुखी हृदय ने इससे पूर्व इतनी प्रसन्नता का अनुभव कभी नहीं किया था। आँसू, एक पवित्र और नवीन सुख के आँसू, उसकी उन आँखों में चमकने लगे जो कल तक पथरायी हुई और भूखी निगाह से संसार को घूरा करती थीं। परित्यक्तों की, जिन्हें संसार के श्रमिकों की श्रेणी में सम्मिलित कर लिया गया था, यह प्रसन्नता, नगर की सड़कों पर चारों ओर चमकने लगी और नगर के घरों की धुँधली आँखें इसे बढ़ते हुए द्वेष और क्रूरता से देखने लगी।

उस भिखारी ने भी जिसे कल तक बड़े आदमी, उससे पीछा छुड़ाने के लिए एक पैसा फेंक दिया करते थे और ऐसा करके यह समझते थे कि आत्मा को शान्ति मिलेगी, यह शब्द सुना। यह शब्द उसके लिए पहली भीख के समान था जिसने उसके ग़रीब, निर्धनता से नष्ट होते हुए हृदय को प्रसन्नता और कृतज्ञता से भर दिया था।

वह ताँगेवाला, एक छोटा सा भद्दा आदमी, जिसके ग्राहक उसकी पीठ में इसलिए घूँसे मारते थे कि जिससे उत्तेजित होकर वह अपने भूखे, टूटे शरीर वाले टट्टू को तेज़ चलाने के लिए हण्टर फटकारे। वह आदमी घूँसे खाने का आदी था। पत्थर की सड़क पर पहियों से उत्पन्न होने वाली खड़खड़ाहट की ध्वनि से जिसका दिमाग़ जड़ हो गया था उसने भी ख़ूब अच्छी तरह से मुस्कराते हुए एक रास्ता चलने वाले से कहा:

“ताँगे पर चढ़ना चाहते हो…कॉमरेड?”

यह कहकर, इस शब्द की ध्वनि से भयभीत होकर उसने घोड़े को तेज़ चलाने के लिए लगाम सम्हाली और उस राहगीर की तरफ़ देखा। वह अब भी अपने चौड़े, लाल चेहरे से मुस्कराहट दूर करने में असमर्थ था।

उस राहगीर ने प्रेमपूर्वक उसकी ओर देखा और सिर हिलाते हुए बोला:

“धन्यवाद, कॉमरेड! मुझे ज़्यादा दूर नहीं जाना है।”

अब भी मुस्कराते और प्रसन्नता से अपनी आँखें झपकाते वह ताँगेवाला अपनी सीट पर मुड़ा और सड़क पर खड़खड़ाहट का तेज़ शोर मचाते हुए चला गया।

फुटपाथों पर आदमी बड़े-बड़े झुण्डों में चल रहे थे और चिनगारी के समान वह महान शब्द, जो संसार को संगठित करने के लिए उत्पन्न हुआ था, उन लोगों में इधर से उधर घूम रहा था।

“कॉमरेड!”

एक पुलिस का आादमी – गलमुच्छेवाला, गम्भीर और महत्त्वपूर्ण, एक झुण्ड के पास आया, जो सड़क के किनारे व्याख्यान देने वाले वृद्ध मनुष्य के चारों ओर इकट्ठा हो गया था। कुछ देर तक उसकी बातें सुनकर उसने नम्रतापूर्वक कहा।

“सड़क पर सभा करना क़ानून के खि़लाफ़ है…तितर-बितर हो जाओ, महाशयो…”

और एक क्षण रुककर उसने अपनी आँखें नीची कीं और धीरे-से बोला:

“कॉमरेडो…”

उन लोगों के चेहरों पर, जो इस शब्द को अपने हृदय में संजोये हुए थे और जिन्होंने अपने रक्त और मांस से इसे और एकता की पुकार की तीव्र ध्वनि को बढ़ाया था – निर्माता का गर्व झलकने लगा। और यह स्पष्ट हो रहा था कि वह शक्ति, जिसे इन लोगों ने मुक्तहस्त होकर इस शब्द पर व्यय किया था, अविनाशी और अक्षय थी।

उन लोगों के खि़लाफ़, भूरी वर्दी पहने हथियारबन्द आदमियों के अन्धे समूह एकत्रित होने लगे थे। वे चुपचाप एक-सी पंक्तियों में खड़े थे। अत्याचारियों का क्रोध उन विद्रोहियों पर जो न्याय के लिए लड़ रहे थे फट पड़ने को तैयार था।

उस नगर की टेढ़ी-मेढ़ी संकरी गलियों में अज्ञात निर्माताओं द्वारा बनायी हुई ठण्डी, ख़ामोश दीवारों के भीतर मनुष्य के भाईचारे की भावना फैल रही थी और पक रही थी।

“कॉमरेडो!”

जगह-जगह आग भड़क उठी जो एक ऐसी ज्वाला में फूट पड़ने को प्रस्तुत थी जो सारे संसार को भाईचारे की मज़बूत और उज्ज्वल भावना में बाँध देने वाली थी। वह सारी पृथ्वी को अपने में समेट लेगी और उसे सुखा डालेगी। द्वेष, घृणा और क्रूरता की भावनाओं को जलाकर राख बना देगी जो हमारे रूप को विकृत बनाती हैं। वह सारे हृदयों को पिघलाकर उन्हें एक हृदय में – केवल एक हृदय में ढाल देगा। सरल और अच्छे स्त्री-पुरुषों का हृदय परस्पर सम्बन्धित स्वतन्त्र काम करने वालों का एक सुन्दर स्नेहपूर्ण परिवार बन जायेगा।

उस निर्जीव नगर की सड़कों पर जिसे गुलामों ने बनाया था, नगर की उन गलियों में जहाँ क्रूरता का साम्राज्य रहा था, मानव में विश्वास तथा अपने ऊपर और संसार की सम्पूर्ण बुराइयों पर मानव की विजय की भावना बढ़ी और शक्तिशाली बनी।

और उस बेचैनी से भरे हुए नीरस अस्तित्व के कोलाहल में, एक दीप्तिमान, उज्ज्वल नक्षत्र के समान, भविष्य को स्पष्ट करने वाली उल्का के समान, वह हृदय को प्रभावित करने वाला सादा और सरल शब्द चमकने लगा: “कॉमरेड!”

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Kamta Prasad

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