रविवार, 12 अप्रैल 2015

दीपक आचार्य का आलेख - मौसम भी हो गया आदमी की तरह

मौसम भी हो गया

आदमी की तरह

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अब तक कहा जाता रहा है कि मौसम की हवा आदमी को लग जाया करती है। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब आदमी की हवा मौसम को लग गई है तभी वह असामान्य होकर हर बार बदला-बदला सा होकर आता है और आकस्मिकताओं का परिचय दे जाता है।

इसे ही कहते हैं घोर कलिकाल, जहाँ ऋतुओं का परिवर्तन किसी निश्चित कालक्रम या कालावधि तक सीमित नहीं रहा। आदमी की तरह उन्मुक्त, स्वेच्छाचारी और मर्यादाहीन होता जा रहा है।

पहले सदी, गर्मी और बरसात के माह तय हुआ करते थे और इन्हीं माहों की मर्यादा में रहकर ऋतुओं का प्रभाव परिलक्षित होता था। अब ऋतुओं का कोई प्रभाव नहीं। कब किस समय बरसात हो जाए, सर्दी चमक जाए या भीषण गर्मी अपना प्रभाव छोड़ने लगे, कुछ कहा नहीं जा सकता।

हवाओं और बादलों का चलन आदमी की तरह हो गया है जिसका कोई पाया नहीं होता, अपने अरमानों को पूरा करने की खातिर कभी भी किसी भी पाले में कूद सकता है।

हवाओं और बादलों की नेकचलनी अब संदिग्ध होती जा रही है। हवाओं के रुख और बादलों के लपकते हुए तेज भागने को देखकर साफ-साफ नहीं कहा जा सकता है कि वह इधर या उधर जा रहा है।

अब इनके लिए कोई मर्यादाएं नहीं रही, ये किधर भी जा सकते हैं, अपनी मर्जी के मालिक हो गए हैं। अक्सर खुद ही बदचलनी का शिकार होकर भटक जाया करते हैं, कभी कोई दूसरे इन्हें भटका देते हैं।

कई मर्तबा यह भी होता है कि हवाएँ और बादल दोनों एक-दूसरे को अंधेरे में रख कर या भ्रमित कर अपने अलग-अलग रास्ते तलाश लिया करते हैं और मौसम की आकस्मिक बदचलनी का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ता है जो मौसम को मर्यादाओं का दूसरा नाम मानते रहे हैं।

हाल के कुछ वर्ष से तो यह सब कुछ परवान पर है। भीषण गर्मी में अचानक बारिश और ओलावृष्टि हो जाती है और ओले भी ऎसे कि लगता है जैसे ऊपर से युद्धोन्मादी तोपों से गोले बरस रहे हों।

देखने में ये कितने शुभ्र, शीत और पावन दिखते हैं लेकिन जनजीवन में कितना अंधेरा ला देते हैं, यह कहने की जरूरत नहीं।

कहीं बारिश के महीनों में पानी का नामोनिशान नहीं, और अचानक मूसलाधार वृष्टि हो उठती है। यही स्थिति सर्दी-गर्मी की है। रात-दिन में पारा इतना अधिक उतार-चढ़ाव करता रहता है कि आदमी को पता ही नहीं चलता कि खुद की सेहत को संभाले या कि परिवेश को देखे।

आदमियों की भारी भीड़ और शोर्ट कट से सफलता पा रहे अनगिनत लोगों को देखकर अब मौसम ने भी परंपरागत ट्रैक छोड़ दी लगती है।

उसे जब मौका मिलता है वह धरती ओर झाँकता है और बाकी समय अपने आप में खोया रहता है, अपने ही अरमानों का ताना-बाना बुनता रहता है। जैसे आदमी क्या सोच रहा है, क्या कर रहा है, क्या करने वाला है, इसकी थाह पाना आजकल असंभव है उसी तरह मौसम का मिजाज भी होता जा रहा है।

कब कोई सा आदमी अपने लाभों और स्वार्थों को देखकर किस पाले में गुड़क जाए, किसे धत्ता दिखा दे या धोखा दे डाले, कोई कयास नहीं लगा पाता।

मौसम भी आदमी की फितरत पालकर सारी मर्यादाओं और अनुशासन को तोड़कर एकदम नंगा होता जा रहा है। उसे न किसानों की फिकर है, न खेतों में खड़ी फसलों की, न खलिहानों की और न ही जगत की।

यह कहा जाए कि आदमी को देखकर ही मौसम ने करवट ले ली है, तो कोई बुरा नहीं होगा। दोहरे-तिहरे चरित्र वाले इंसानों की भीड़ जिस अनुपात में बढ़ती चली जा रही है, उसी अनुपात में मौसम की बदचलनी भी बढ़ती ही जा रही है।

जीव के पापों और दुश्चरित्र का सीधा प्रभाव जगत पर पड़ता है।  आज हरतरफ मौसम की आकस्मिक बदचलनी का मूल कारण भी यही है कि इंसानों ने अपनी मर्यादाओं और मानवता को तिलांजलि दे डाली है। जब इंसान में इंसानियत नहीं रही, तो फिर मौसम भी क्यों बँधा रहे इंसानों की संरक्षा और पालन में।

यही वजह है कि आज जो कुछ हो रहा है उसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं, और कोई नहीं, क्योंकि हमारे पापों की वजह से प्रकृति कुपित होती जा रही है और उसका कोपभाजन हो रहे हैं हम सारे के सारे लोग। 

हमारे पापों से परेशान वे किसान होते हैं जिनका पापों से कोई लेना-देना नहीं होता, उन्हें दिन-रात मेहनत से ही मतलब है । और किसी विषय पर न वे सोचते हैं, न उनके पास सोचने का कोई समय होता है।

प्रकृति के प्रकोप और मौसम की बदचलनी से बचना हो तो हमें आत्मानुशासन और मर्यादाओं में रहकर काम करने होंगे, तभी हम प्रकृति से सीधा रिश्ता कायम करते हुए उसे अपने अनुकूल बनाए रख सकते हैं।

अच्छा यही होगा कि हम समय रहते सुधर जाएं वरना एक ही दिन में सारे मौसम देखने की नौबत तक आ सकती है, प्रकृति तो पूरे दम-खम के साथ इसके लिए पूरी तरह तैयार बैठी है हमें सबक सिखाने।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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