मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

बिनय कुमार पाण्डेय का आलेख - नेट न्यूट्रलिटी या अंतर्जाल (नेट) निष्पक्षता

Net Neutrality / अंतर्जाल (नेट) निष्पक्षता

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आप लोगों ने यह शब्द कई जगह पढ़ा या सुना होगा। आजकल भारत में यह शब्द सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। अर्थात ट्रेंडिंग कर रहा है। लोग इसके बारे में फेसबुक या ट्विटर पर पोस्ट कर रहे हैं। हमारी ट्राई ने भी अपने वेब साइट पर लोगों से सलाह माँगी है। अँग्रेज़ी में बहुत लेख मिल जाएँगे इसके बारे में। सोचा क्यों न हिंदी पढ़ने वाले लोगों के लिए साधारण भाषा में इसकी व्याख्या कर दी जाये। शायद यह जानकारी आपके लिए उपयोगी हो।

नेट निष्पक्षता क्या है?

नेट निष्पक्षता का अर्थ है, एक मुक्त इंटरनेट, जिसके किसी भी हिस्से को देखने/पढ़ने/सुनने के लिए सिर्फ़ एक प्रकार के साधन की आवश्यकता हो। अर्थात डाटा, किसी भी प्रकार का डाटा, समान माना जाये, और उसमें इसलिए कोई भेद ना किया जाये की वह कमेंट है, या वीडियो है या फोटो है। साधारण शब्दों में, आज आप अपने घर पर इंटरनेट लेते है, या फिर अपने मोबाइल फ़ोन पर इंटरनेट लेते हैं। आप उसके लिए पैसे देते है। घर पर ब्रॉडबैंड के अलग अलग डाटा रफ़्तार यानि स्पीड के पैकेज है, आप शायद वाई फाई भी लगा ले। वैसे ही मोबाइल पर भी कई पैकेज है, 2जी 3जी या फिर जल्द ही आने वाला एलटीई 4जी। एक बार हमने पैकेज ले लिया, उसके पश्चात हम उस इंटरनेट पर क्या करते हैं, उससे हमारे सर्विस प्रोवाइडर को कोई मतलब नहीं होता। हम चाहे तो यू ट्यूब पर वीडियो देखें, गाने सुनें, व्हाट्स एप्प या फेसबुक पर दोस्तों से बातचीत करें। वीडियो चाट या फिर स्काइप पर VOIP वाले कॉल करे। हमारे फ़ोन वाले या ब्रॉडबैंड वाले हमें सिर्फ़ इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए पैसे लेते हैं। यह है आज की परिस्थिति। और यही है नेट निष्पक्षता।

क्या बदल रहा है?

यदि आज का नेट निष्पक्ष है, फिर हम सभी इसके बारे में बात क्यों कर रहे हैं? क्या यह बदल रहा है? जी हाँ, यह बदल रहा है। हमारे देश की टेलिकॉम कंपनियाँ चाहती है कि वह हमें अलग अलग तरह के पैकेज बेचे। वह हमारे डाटा इस्तेमाल करने के अलावा वह डाटा कैसे इस्तेमाल होगा, उसके पैसे भी लेना चाहते हैं। जैसे की WhatsApp के लिए अलग पैकेज, Facebook के लिए अलग पैकेज, और YouTube के लिए अलग पैकेज। वैसे ही और भी अलग अलग पैकेज मिलेंगे, अलग कार्यों के लिए। अभी टेलिकॉम कंपनियों ने पैकेज बनाए नहीं है। पर वह इंतज़ार कर रहे है ट्राई के आदेश का। फिर शायद आपको सोशल नेटवर्किंग के लिए अलग पैसे देने पड़े, गाना सुनने के लिए अलग और वीडियो देखने के लिए अलग।

आपको एक बात और बता दे, जैसे आज आप एक वेब साइट से दूसरे पर एक लिंक पर क्लिक करके चले जाते हैं, वैसे आने वाले दिनों में जाना आपकी जेब के लिए खतरनाक रहेगा। जब अलग अलग पैकेज रहेंगे, तो आपको सावधानी बरतनी पड़ेगी। यदि आपने वीडियो का पैकेज नहीं लिया है, और फेसबुक के किसी लिंक पर क्लिक करके यू ट्यूब के वीडियो को चला दिया, तो बिना पैकेज वाला चार्ज लग जाएगा। और आपको पता होगा की बिना पैकेज वाला नेट का चार्ज कैसे लगता है। पता भी नहीं चलता और ढेरों पैसे चार्ज हो जाते है। कितना भी सर फोड़ ले हेल्प डेस्क के साथ, चार्ज वापस नहीं होता। कहा जाता है की आपने नेट इस्तेमाल किया है। अब कहा और कैसे, यह बताना उनका काम नहीं है।

इसकी एक और बड़ी समस्या होगी पक्षपात। आपकी फ़ोन कंपनी यदि चाहे तो वह किसी एक कंपनी की वेब साइट जल्दी खुलेगी और दूसरे वही सुविधा देने वाली कंपनी की साइट देर से खुलेगी, या फिर उसके लिए अलग से पैसे देने पड़ेंगे। जैसे अभी रिलायंस ने internet.org के नाम से एक सुविधा शुरू की है, जिसमे कुछ साइट ही खुलती है। यह वही साइट होगी, जिन्होंनें रिलायंस को पैसे दिये होंगे। एयर टेल भी एक नया प्लान ला रही थी, जिसमे फ्लिपकार्ट खुलेगी, परंतु अन्य साइट के लिए पैसे देने पड़ेंगे।

क्या यह परिवर्तन सही है?

इसमें बहुत मतभेद है। फ़ोन कंपनियों के अनुसार यह सही है, और बहुत से लोगों के अनुसार यह गलत है। आपके सामने दोनों मत रख देता हूँ।

टेलिकॉम कंपनियों का कहना है कि:

· अलग अलग तरीके से इस्तेमाल किए जाने वाली इंटरनेट सुविधाओं की वजह से उनका लाभ कम हो रहा है। जैसे की लोगों ने SMS भेजना लगभग बंद कर दिया है, अब Whatsapp या फिर वैसी ही दूसरी सुविधाओं का प्रयोग कर रहे हैं। फिर अब Whatsapp, फेसबुक जैसी कई ऐप्लीकेशन लोगों को कॉल करने की सुविधा भी दे रही है। इसलिए जो कॉल मोबाइल फ़ोन से होता था, और फ़ोन कंपनी को पैसे मिलते थे, वह कॉल अब इंटरनेट द्वारा हो रहा है। इसलिए उन्हें अलग अलग सुविधाओं के इस्तेमाल के लिए अलग अलग पैसे मिलने चाहिए।

· आवाज़, गाना, वीडियो के लिए बहुत अधिक रफ़्तार एवं डाटा इस्तेमाल होता है। इनके लिए सिर्फ़ डाटा एवं रफ़्तार ही नहीं, बिना अस्थिरता के डाटा का प्रवाह निश्चित करना पड़ता है। दूसरे प्रकार के इंटरनेट के इस्तेमाल में यह कठिनाइयाँ नहीं आती। इसलिए उन्हें अलग अलग तरीके की सुविधाओं के लिए अलग पैसे मिलने चाहिए।

· टेलिकॉम कंपनियों के अनुसार प्रत्येक सुविधाओं में यह होता रहा है, और वह कुछ नया नहीं मांग रहे है। आप फ़ोन करते है, तो किस नंबर पर फ़ोन कर रहे है, उसके हिसाब से पैसे देते हैं। आप फ़िक्स्ड लाइन या लैंड लाइन पर फ़ोन करे तो कॉल के पैसे अधिक लगते हैं। यदि आपको याद हो तो किसी जमाने में एस टी डी के पैसे भी अधिक ही लगते थे। वैसे ही घर पर पानी या फिर बिजली देते वक़्त हमें उसके इस्तेमाल के लिए अलग तरीके से पैसे देने पड़ते है। यदि हम उनका इस्तेमाल घर पे अपने लिए कर रहे है, तो अलग मूल्य है और यदि उसे अपने व्यापार में इस्तेमाल करते है तो अलग मूल्य देना पड़ता है। घर पर भी यदि आप एक पूर्व निर्धारित सीमा से अधिक बिजली इस्तेमाल करते हैं तो अधिक पैसे देने पड़ते हैं। केबल टीवी के लिए भी पहले एकमुश्त पैसे देते थे, परंतु अब अलग अलग पैकेज के हिसाब से पैसे देने पड़ते हैं। यह मूल्यांकन कई पहलुओं पर ध्यान देकर निर्धारित किया जाता है, एवं इससे कंपनियों को अपने ग्राहकों को उच्च कोटी की सुविधा देने में आसानी होती है। यदि मूल्यांकन का यह रूप अन्य सभी सुविधाओं में मान्य है तो फिर इंटरनेट में क्यों नहीं?

विरोधियों का कहना है कि:

· हम जो कुछ भी इंटरनेट पर देखते, सुनते, लिखते, पढ़ते या कहते हैं, उसमें टेलिकॉम कंपनियों का कोई योगदान नहीं होता। अलग अलग वेब साइट टेलिकॉम कंपनियों ने नहीं बनाई है। उन्होंने सिर्फ़ पहले से ही उपस्थित फ्रिक्वेन्सी को लेकर हमें उसपर इंटरनेट की सुविधा दी है। उसके लिए हम उन्हें पैसे दे रहे हैं। हम जितना डाटा इस्तेमाल करते है, वह हमसे उतना पैसा लेती है। अब वो चाहते है की किसी और की बनाई हुई सुविधाओं से उन्हें मुनाफ़ा मिले। यह गलत है।

· इंटरनेट एवं अन्य सुविधाओं में समानता नहीं है। यदि पानी या बिजली की बात की जाये तो वह निर्मित की जाती है। सिर्फ़ भेजी नहीं जाती, इसलिए हम जब उनके लिए पैसे देते है, तो निर्माण कार्य के पैसे भी उसमें शामिल होते हैं। साथ में व्यावसायिक रूप में इस्तेमाल करते वक़्त हमें बिजली और पानी अधिक जरूरत पड़ती है, जिसके लिए अधिक पैसे देने पड़ते हैं। इंटरनेट में फ़ोन कंपनियाँ हमें सिर्फ़ इंटरनेट के डाटा को भेजने का काम करती है। वह कुछ भी निर्मित नहीं करती। यह भेजने का कार्य भी पहले से उपस्थित फ्रिक्वेन्सी के इस्तेमाल से होता है। मतलब उन्हें फ्रिक्वेन्सी भी तैयार मिली है। फिर उन्हें दूसरी कौन सी सुविधा पहुँचाने के अलग से पैसे चाहिए? यदि मैं वीडियो देखता हूँ तो यू ट्यूब वालों को पैसे माँगना चाहिए, फ़ोन कंपनी को किस बात के पैसे दूँगा? क्या उन्होंने यह वीडियो बनाया है?

· यदि हम केबल टीवी की भी बात करें, तो हम केबल टीवी वालों को पैसे देते हैं सिग्नल हमारे घर तक पहुँचाने के लिए। बाकी के जो पैकेज है वह उन कंपनियों के लिए हैं जो हमें अपने चेनल्स पर कार्यक्रम बना कर प्रसारित करती हैं। वह कंपनियाँ कुछ बनाती है। सिर्फ़ भेजती नहीं है।

· अब आते है फ़ोन काल्स में मूल्यों पर। यहाँ पर झोल है। यह झोल भी फ़ोन कंपनियों का ही शुरू किया हुआ है। इन फ़ोन कंपनियों ने बिना वजह हम लोगों से बहुत पैसे बनाए हैं। धीरे धीरे काल्स के मूल्य कम हुए हैं। यदि इनका बस चलता तो आज भी हम अलग अलग तरीके से पैसे दे रहे होते। जो कार्य इन्होंने मोबाइल फ़ोन के मूल्यांकन के समय किया था, वही गलत मूल्यांकन फिर से लागू करने की कोशिश कर रहे हैं।

दोनों पक्ष के तर्क को प्रस्तुत करने के पश्चात आप लोगों को एक और उदाहरण देना चाहूँगा, इस उदाहरण की सहायता से आप समझ पाएँगे की क्या होने वाला है।

आप अपने बच्चों के साथ एक पार्क में जाते हैं। वहाँ पर आपको अंदर जाने के लिए एक टिकट लेना पड़ता है। आप टिकट लेकर अंदर जाते है। फिर अंदर में अलग अलग हिस्से बने हुए हैं, जिन हिस्सों में अलग अलग लोगों ने अलग तरह के खेल, झूला या सवारियाँ लगाई हुई है। कुछ का इस्तेमाल करने पर कोई रोक नहीं है, एवं कुछ के लिए आपको अलग से टिकट लेना पड़ता है। परंतु आपको यह जानकार आश्चर्य होता है की आप उन हिस्सों में नहीं जा सकते। आपको अलग से टिकट लेना पड़ेगा हर हिस्से में जाने के लिए। इस टिकट को खरीदने के बाद आप उन खेलो का उपयोग कर सकते हैं, पर उन खेलों के मूल्य को भी चुका कर। यहाँ तनिक भ्रांति हो गयी है। फिर से बताता हूं।

· आपने पार्क में अंदर जाने के लिए टिकट लिया।

· आपने झूले वाले हिस्से में जाने के लिए अलग से टिकट लिया।

· अब आप झूले के पास है, झूले अलग अलग लोगों ने लगाए हैं। कुछ मुफ्त है, तो कुछ में टिकट है। आप अपनी पसंद के हिसाब से झूला लेते हैं। शायद मुफ्त वाला या फिर से एक और टिकट लेकर।

अब शायद आपको समझ आया होगा।

· पहला टिकट बेसिक इंटरनेट इस्तेमाल करने का था। जिसे हम लोग डाटा पैक भी कहते हैं।

· दूसरा टिकट वीडियो देखने का था। जिसे टेलिकॉम कंपनियाँ डालना चाहती है।

· उसके बाद आप यू ट्यूब के फ़्री वीडियो देखें या फिर ऑनलाइन मूवी देखने के लिए किसी और कंपनी की सुविधा का पैसे देकर उपयोग करे, यह आपकी मर्ज़ी है।

इसका मतलब सरल शब्दों में यह है, कि फ़ोन कंपनियों को आपके इंटरनेट इस्तेमाल के लिए पैसे चाहिए, परंतु सिर्फ़ इंटरनेट इस्तेमाल के लिए नहीं, बल्कि उसके जरिए आप जो भी सुविधा का उपयोग करें, फ़ोन कंपनी उसके लिए आपसे अलग से पैसे लेगी। यदि और सरल तरीके से समझना हो तो आप अपने घर में बिजली इस्तेमाल करने के पैसे देते हैं, पर बिजली कंपनियाँ कल आपको यह कह सकती हैं कि आप यदि बिजली का उपयोग पंखे और बत्ती के अलावा किसी और रूप में करते हैं, तो उसके लिए अलग पैसे देने पड़ेंगे। यानि फ़्रिज के लिए अलग, टीवी के लिए अलग इत्यादि। इसी प्रकार पानी पीने के लिए तो ठीक है, पर यदि आप उस पानी से शरबत बनाते हैं तो उसके लिए अलग से पैसे लेंगे। भले ही शरबत आपने अलग से खरीदा क्यों ना हो।

क्या हम इसे रोक सकते हैं?

जी हाँ। यह अभी लागू नहीं हुआ है। ट्राई ने अपने वेब साइट पर हम सभी से अपने सुझाव देने को कहा है। समस्या यह है कि उन्होंने 118 पन्ने, छोटे अक्षर में अपने वेब साइट पर डाला है। अब हम सभी से कहा जा रहा है, की उसे पढ़िए, एवं उनके 20 प्रश्नों का उत्तर दीजिए। अब पहली बात तो यह है की कोई 118 पन्ने नहीं पढ़ेगा, दूसरी बात कि बिना पढ़े आप उन 20 प्रश्नों के उत्तर कैसे दे सकते हैं। मतलब यह एक ऐसा तरीका है जिससे बहुत कम लोग इसका विरोध करेंगे, और फिर यह नियम लागू कर दिया जाएगा। जब लोग कहेंगे कि यह क्यों हुआ? तो जवाब मिलेगा कि आप लोगों ने अपनी राय ही नहीं दी।

पर कहते है ना, कि जहाँ चाह है, वही राह भी है। कुछ अच्छे लोगों ने मिलकर एक वेब साइट सेव-द-इंटरनेट बनाई है, जिसके जरिए आप ट्राई को अपने सुझाव भेज सकते हैं। यदि आपको ऊपर लिखे लेख से यह समझ में आ गया है कि जो होने जा रहा है वह गलत है, तो फिर आपको 118 पन्ने पढ़ने कि जरूरत नहीं। सुझाव को उन 20 प्रश्नों के उत्तर के रूप में रखा गया है, जिसे आप पढ़ना चाहें तो पढ़ सकते है, बदलना चाहे तो बदल सकते हैं। और फिर जब संतुष्ट हो, तो भेज सकते हैं। अब तक 3 लाख से अधिक लोगों ने अपने सुझाव भेज दिये हैं। सुझाव भेजने की आख़िरी तारीख 24 अप्रैल है। जी हाँ, आपके पास बस कुछ ही दिन है अपने विरोध को दर्ज़ कराने के लिए। इसलिए, इस लिंक - http://www.savetheinternet.in/ पर जायें, एवं ईमेल से अपने विरोध को ट्राई तक पहुँचा दे।

अंत में AIB के इस लिंक - https://youtu.be/mfY1NKrzqi0 पर दिए वीडियो को देख सकते हैं, यह भी इसी के बारे में है। और यदि आपको लगता है यह सही है, तो औरों को भी बताएं। आप चाहें तो इस लेख को उनके साथ साझा करें, या फिर गूगल पर खोजें, और भी बहुत जानकारी मिलेगी इसके बारे में।

1 blogger-facebook:

  1. रविजी, इस लेख के लिए शुक्रिया |
    रिलायन्स internet.org के लिए उपभोक्ता से किसी पैसे की उम्मीद नहीं करता बल्कि कुछ बेसिक इंटरनेट की सुविधाएँ निशुल्क प्रदान करता है | उसी प्रकार एयरसेल भी फ्लिप्कार्ट से पैसे लेकर ग्राहक को निशुल्क सुविधा प्रदान करने की सोच रहा था | मैं मानता हूँ मोटे तौर पर ये नेट न्यूट्रलिटी का मामला है लेकिन देखा जाए तो ये उसी तरह है जैसे किसी एक कंपनी से सम्पर्क करने के लिए आप अपनी जेब से पैसे लगाकर STD काल करें जबकि दूसरी कंपनी आपको एक टोल फ्री नंबर मुहैया कराये |

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