मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

पिंग की कहानी

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मार्ज़ोरी फ्लैक और कुर्त वीज़

 

हिंदी अनुवाद

अंशुमाला गुप्ता

 

एक बार की बात है- पिंग नाम का एक खूबसूरत छोटा बत्तख था। वह अपनी मां, अपने पिता, अपनी दो बहनों, अपने तीन भाइयों, ग्यारह चाचियों, सात चाचाओं और बयालीस चचेरे भाई-बहनों के साथ रहता था। उनका घर था यांगजी नदी पर समझदार आंखों वाली एक नाव।

 

हर सुबह जब सूरज पूरब में निकलता पिंग, उसकी मां और पिता, दो बहनें और तीन भाई, ग्यारह चाचियां और सात चाचा और बयालीस चचेरे भाई-बहन, सब एक-एक करके, एक छोटे-से पुल पर कदम बढ़ाते हुए यांगजी नदी के किनारे जाते

 

सारा दिन वे घोंघे, मछलियां और खाने की दूसरी मजेदार चीजें ढूंढते। लेकिन शाम होते ही जब सूरज पश्चिम में डूबने लगता, नाव का मालिक जोर से हांक लगाता- "ला-ला-ला-ला-लेई!"

 

तुरंत ही पिंग और उसका सारा परिवार जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए दौड़कर आते और एक-एक करके उस छोटे पुल पर चढ़कर समझदार आंखों वाली उस नाव पर पहुंच जाते, जो यांगजी नदी पर उनका घर था।

पिंग हमेशा ध्यान रखता, बहुत-बहुत ध्यान रखता कि वह आखिर में न पहुंचे, क्योंकि जो भी बत्तख पुल को आखिर में पार करता था, उसकी पीठ पर एक तमाचा पड़ता था।

 

लेकिन एक दिन शाम को जब छायाएं लम्बी होने लगीं, पिंग ने आवाज नहीं सुनी, क्योंकि उस समय वह एक छोटी मछली पकड़ने की कोशिश में लगा था और उसका गलत हिस्सा पानी के ऊपर था।

 

जब पिंग का सही हिस्सा पानी के ऊपर आया, उसकी मां,  उसके पिता और उसकी चाचियां पहले ही एक-एक करके पुल के ऊपर चल पड़े थे। जब पिंग तट के पास पहुंचा, उसके चाचा और चचेरे बहन-भाई आगे बढ़ रहे थे। जब तक वह तट पर पहुंच पाया, उसके बयालीस भाई-बहनों में से आखिरी बत्तख भी पुल पार कर चुका था।

 

पिंग को पता था कि अगर उसने पुल पार किया तो वह आखिरी, बिल्कुल आखिरी, बत्तख होगा। वह तमाचा खाना नहीं चाहता था।

तो वह छिप गया।

पिंग घास के पीछे छिप गया। जैसे-जैसे अंधेरा छाता गया और आसमान में पीला चांद चमकने लगा, पिंग ने समझदार आंखों वाली नाव को यांगजी नदी में धीरे-धीरे तैरकर जाते देखा।

 

 

 

सारी रात पिंग नदी के किनारे घासों के बीच अपने पंख में सिर छुपाए सोता रहा और जब सूरज पूरब में निकल आया, तो उसने पाया कि वह यांगजी नदी पर बिल्कुल अकेला है।

 

वहां पिता या मां नहीं थे, बहन या भाई नहीं थे, चाची और चाचा नहीं थे, बयालीस चचेरे भाई-बहन नहीं थे-  इनमें से कोई भी वहां नहीं था, जो पिंग के साथ मछली पकड़ने जाता।

तो यांगजी नदी के पीले पानी पर तैरता हुआ पिंग उन्हें ढूंढने लगा।

 

जैसे-जैसे सूरज आकाश में ऊपर चढ़ता गया,  नावें आने लगीं- बड़ी नावें और छोटी नावें, मछली पकड़ने वाली नावें और भिखारियों की नावें, घर वाली नावें और लट्ठों की नावें।

इन सभी नावों को पिंग की आंखें देख रही थीं।

पर उसे कहीं भी समझदार आंखों वाली वह नाव नजर नहीं आई, जो उसका घर थी।

 

फिर एक नाव आई जो अजीब-से काले मछली पकड़ने वाले पक्षियों से भरी थी। पिंग ने देखा कि वे अपने मालिक के लिए मछली लाने के लिए गोता लगा रहे थे। जैसे ही कोई पक्षी अपने मालिक को एक मछली लाकर देता, उसका मालिक तनखाह के तौर पर मछली का एक छोटा टुकड़ा उसे देता।

 

मछली पकड़ने वाले पक्षी उड़कर पिंग के और नजदीक आए।

अब पिंग उनकी गर्दनों के चारों ओर चमकते छल्ले देख सकता था। ये धातु के छल्ले इतने कसे हुए थे कि पक्षी कभी भी उन बड़ी मछलियों को निगल नहीं सकते थे जिन्हें वे पकड़ रहे थे।

 

लपक, छपाक, छपाक, छल्ले वाले पक्षी पिंग के चारों ओर जोर से झपट रहे थे। उसने अंदर गोता लगाया और यांगजी नदी के पीले पानी के नीचे तैरने लगा।

जब पिंग उन पक्षियों से बहुत दूर पानी के ऊपर निकला तो उसे खाने के छोटे-छोटे टुकड़े तैरते मिले। ये चावल की केक के टुकड़े थे, जो एक घरवाली नाव तक रास्ता बनाए हुए थे।

जैसे-जैसे पिंग इन टुकड़ों को खाता गया, वह घर वाली नाव के नजदीक, और नजदीक आता गया, और छपाक!

 

पानी के अंदर एक लड़का था- एक छोटा लड़का।

उसकी पीठ पर एक पीपा था, जो नाव के साथ रस्सी से उसी प्रकार बंधा था, जिस तरह यांगजी नदी के सभी नाव वाले लड़के अपनी नावों से बंधे होते थे। उस लड़के के हाथ में एक चावल का केक था।

 

"ओह - ओ ओ ओ ओ उ उ उ !"

वह छोटा लड़का चिल्लाया और पिंग झपटा और उसने चावल का केक छीन लिया।

 

तुरंत ही लड़के ने पिंग को पकड़कर हाथों में जकड़ लिया। "कैं-कैं-कैं-कैं!" पिंग चिल्लाने लगा।

"ओह! - ओ ओ ह - उ उ!" छोटा लड़का चिल्लाया।

 

पिंग और लड़के ने इतना पानी उछाला और इतना शोर मचाया  कि लड़के का बाप दौड़ता हुआ आया और लड़के की मां भी दौड़ती हुई आई। लड़के की बहन और भाई दौड़ते आए।

उन सबने नाव के किनारे से झांककर पिंग और लड़के को यांगजी नदी के पानी में हाथ-पैर मारते देखा।

फिर लड़के के पिता और माता ने वह रस्सी खींची जो लड़के के पीठ पर बंधे पीपे से जुड़ी थी।

उन्होंने खींचा और पिंग तथा लड़का दोनों घर वाली नाव के ऊपर आ गए।

"आह, एक बत्तख का भोजन हमारे पास आ गया!" लड़के के पिता ने कहा।

 

"आज रात सूरज ढलने पर मैं इसे चावल के साथ पकाऊंगी," लड़के की मां ने कहा।

"नहीं-नहीं! मेरी प्यारी बत्तख इतनी सुंदर है कि उसे खाया नहीं जा सकता," लड़का चिल्लाया।

लेकिन पिंग के ऊपर एक टोकरी डाल दी गई और अब वह न लड़के को देख सकता था, न नाव को, न आकाश को और न ही यांगजी नदी के सुन्दर पीले पानी को।

 

सारे दिन पिंग सूरज की उन पतली रेखाओं को ही देख सकता था जो टोकरी के छेदों से चमक रही थीं,  और पिंग बहुत उदास था।

काफी देर के बाद पिंग ने चप्पुओं की आवाजें सुनीं और नाव की धच्च-धच्च महसूस की, जब उसे खेकर यांगजी नदी में ले जाया जा रहा था।

 

जल्दी ही टोकरी के छेदों से आ रही धूप की लकीरों का रंग गुलाबी हो गया और इससे पिंग को पता चल गया कि सूरज पश्चिम में डूब रहा है। पिंग ने अपने नजदीक आते पैरों की आवाज सुनी।

जल्दी से टोकरी को हटाया गया और अब छोटे लड़के के हाथ पिंग को पकड़े हुए थे।

जल्दी से चुपचाप लड़के ने पिंग को नाव के किनारे से गिरा दिया, और पिंग पानी में उतर गया - यांगजी नदी के खूबसूरत पानी में।

 

तभी पिंग ने अपनी पुकार सुनी, "ला-ला-ला-ला-लेई।"

पिंग ने नजर दौड़ाई। नदी के तट के पास उधर समझदार आंखों वाली वह नाव थी जो पिंग का घर थी।

पिंग ने अपनी मां और अपने पिता और अपनी चाचियों को देखा, सब के सब कदम बढ़ाकर एक-एक करके छोटे पुल के ऊपर जा रहे थे।

 

जल्दी से पिंग मुड़ा और तैरने लगा और तट की ओर बढ़ने के लिए पैर मारने लगा। अब पिंग को अपने चाचा एक-एक करके कदम बढ़ाते हुए दिख रहे थे।

जल्दी-जल्दी पैर मारकर पिंग तट की ओर बढ़ा।

उसने अपने चचेरे भाई-बहनों को एक-एक करके कदम बढ़ाते देखा।

 

जल्दी-जल्दी पिंग पैर मारकर तट के नजदीक पहुंचा, लेकिन-  जब पिंग तट पर पहुंचा उसके बयालीस चचेरे भाई-बहनों में से आखिरी बत्तख भी पुल के ऊपर पहुंच चुकी थी। पिंग समझ गया कि उसे फिर से देर हो गई है।

लेकिन वह फिर भी पुल के ऊपर चलता गया।

‘चटाक’ पिंग की पीठ पर तमाचा पड़ा।

 

आखिकार पिंग अपनी मां और अपने पिता, अपनी दो बहनों और तीन भाइयों, ग्यारह चाचियों और सात चाचाओं और बयालीस चचेरे भाई-बहनों के पास पहुंच गया - फिर से अपने घर में, यांगजी नदी के ऊपर समझदार आंखों वाली नाव में।

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(अनुमति से साभार प्रकाशित)

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