मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - प्रकृति संरक्षण का दायित्व

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25 अप्रैल पृथ्वी दिवस पर विशेष....

प्रकृति संरक्षण का दायित्व कब समझेगा मनुष्य

० इच्छाओं की मनमानी पर रोक जरूरी

पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान को विज्ञान की भाषा में ग्लोबल वार्मिंग के नाम से जाना जाता है। सामान्यतः देखा जाए तो पृथ्वी का तापमान लगभग स्थिर रहता है। ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति सूर्य से धरती पर आनी वाली उष्मीय विकिरण तथा पृथ्वी से परावर्तित होने वाली उष्मा के मध्य संतुलन से उत्पन्न होती है। पिछले कुछ वर्षों से अवशोषन और परावर्तन की प्राकृतिक क्रिया में असंतुलन के कारण ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति में वृद्धि हुई है।

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन विस्तृत चर्चा एवं चिंतन का विषय बन गया है। विषय विशेषज्ञों से लेकर सामान्य व्यक्ति भी इस बात को महसूस कर रहा है कि मौसम में तेजी से आ रही तब्दीली प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रही है। अभी कुछ वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि हमें गंभीर चिंतन की ओर सोचने विवश कर रही है। हम यह नहीं कह सकते कि इस प्रकार की समस्या अचानक पैदा हुई है, बल्कि यह सम्य मनुष्य की उपभोक्तावादी संस्कृति का ही परिणाम है। आज स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग एवं प्रदूषण की बढ़ती प्रवृत्ति में रोक लगा पाना संभव प्रतीत नही हो रहा है। यही कारण है कि वायुमंडल में लगातार कार्बन की मात्रा में बढ़ोत्तरी हो रही है।

विज्ञान के जानकार आर्थर स्मिथ ने गर्म होती पृथ्वी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यदि आप कुछ समय के लिए खुश होना चाहते है तो शराब अथवा सिगरेट या फिर कोई अन्य नशा कर लें, लंबे समय के लिए खुश होना चाहते है तो प्यार के चक्कर में पड़ जाए, इन दोनों के अलावा यदि आप हमेशा खुश रहना चाहते है तो बागवानी अथवा वृक्षारोपण जैसे कार्य में लग जाए। प्रकृति हम पर हमेशा परोपकार ही करती है। मनुष्य ने प्रकृति परोपकारी मर्म को समझते हुए उसे जननी स्वरूपा माना है। यह भी सत्य है प्रकृति अपने उत्पादों का स्वयं उपभोग नहीं करती बल्कि इस पृथ्वी पर रहने वाले समस्त जीवों के अस्तित्व को आधार प्रदान करती है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्राकृतिक संसाधनों का सर्वाधिक उपयोग मनुष्य ही करता है। इसी कारण प्रकृति के संरक्षण का दायित्व भी मनुष्य पर ही आधारित है।

जीवन के प्रारंभिक काल से ही प्रकृति एवं मनुष्य का संबंध एक दूसरे के पूरक के रूप में ही विकसित हुआ है। अपनी इच्छाओं पर अंकुश न लगा पाने वाले मनुष्यों की गतिविधियों ने ही नये आविष्कारों की जरूरत पैदा की। यहीं से शुरू हुआ प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन। आज प्रकृति स्वयं मानवता के समक्ष कराहते हुए कह रही है कि संसाधनों का व्यर्थ दोहन मत करो। प्रकृति का यही दर्द जब तब बेमौसम बरसात, रेगिस्तान में बाढ़, वर्षा वाले प्रदेशों में सूखा, मैदानी क्षेत्रों में भू स्खलन और वैश्विक तापमान जैसे पर्यावरणीय दुष्प्रभाव के रूप में परिलक्षित होता दिख रहा है।

पृथ्वी पर बढ़ रहे ताप का अध्ययन करें तो ज्ञात होता है कि वैश्विक स्तर पर 90 का दशक सर्वाधिक गर्म दशक के रूप में दर्ज है, जबकि वर्ष 1998 सबसे ज्यादा गरम वर्ष के रूप में। इससे साफ जाहिर है कि जलवायु में परिवर्तन बहुत ही तीव्र गति से हो रहा है। हम निश्चित तौर पर कह सकते है कि आने वाले कुछ वर्षों में विश्व के अधिकांश स्थानों पर तापमान अपनी चरम सीमा पर होगा। साथ ही कुछ ठंडे देश भी गर्मी की तपन महसूस कर सकते है।

हमने बढ़ते तापमान के कारण जंगलों में लगने वाले दावानल का दृश्य पिछले कुछ वर्षों में देखा है। इस प्रकार दावानल जहां मनुष्यों के जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे है। वहीं दूसरी ओर वन्य जीवों का जीवन भी खतरे में पड़ रहा है। इसी तरह प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि समस्त जनजीवन को प्रभावित कर रही है। बढ़ते तापमान का सबसे बड़ा और मूलभूत परिवर्तन कृषि व्यवस्था पर दिखाई पड़ेगा। इन्हीं कारणों से फसल चक्र और फसलीय क्षेत्र भी बदल जायेंगे। ब्रिटेन के पूर्व राष्ट्रपति बिल गेट्स ने पृथ्वी पर बढ़ रहे तापमान के कारण जलवायु परिवर्तन भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि ‘जलवायु परिवर्तन एक भयावह समस्या और इसे पूरी तरह से हल करने की आवश्यकता है, यह एक बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिये।’

शास्त्रों में यह अकारण नहीं कहा गया है कि प्रकृति का कोप सारे कोपों से बढ़कर होता है। ऐसे भयानक कोप खंड प्रलय के रूप में सामने आते है और जानमाल का भारी क्षति उठानी पड़ती है। प्रकृति का इस प्रकार कोप एक भयानक त्रासदी के रूप में विनाश को इस कदर ऊंचाई पर पहुंचा देता है कि उससे उबरने कई साल भी कम पड़ जाते हैं। प्रकृति के विनाशकारी रूप ग्रहण कर लेने से प्रभावित लोगों को या तो अपना छोड़ दूसरे स्थानों पर शरण लेनी पड़ती है या फिर नये सिरे से जिंदगी की शुरूआत ही उनकी विवशता होती है। दोनों ही कारण मानवीय जीवन और उसके विकास को दशकों पीछे धकेलने में कामयाब हो जाते है। प्राकृतिक आपदाओं से सर्वाधिक क्षति हमारी अर्थव्यवस्था को पहुंचती है।

आपदा प्रबंधन का भारी भरकम खर्च के साथ ही राजस्व एवं संसाधनों की क्षति भी देश की वित्तीय स्थिति को चरमरा देती है। प्रकृति की उदारता के संबंध में महात्मा गांधी ने कहा है ‘प्रकृति में सभी व्यक्तियों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की भरपूर सामर्थ्य है, किंतु इसमें एक व्यक्ति के भी लालच के लिये कोई स्थान नहीं है।’ अर्थात प्रकृति के साथ छेड़छाड़ ही मनुष्य की कठिनाई का कारण बनता है। इसी तरह एक अन्य पर्यावरण विशेषज्ञ जॉन लुब्बोक का मानना है कि ‘पृथ्वी और आकाश, जंगल और मैदान, झीलें और नदियां, पहाड़ और समुद्र ये सभी उत्कृष्ट शिक्षक है, और हम सभी को इतना कुछ सिखाते है जितना हम किताबों से नहीं सीख सकते।’ निष्कर्ष यह निकलता है कि हम मनमानी पर उतरकर अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये प्राकृतिक चक्र को नुकसान न पहुंचाये।

प्रकृति का रूप और लावण्य अत्यंत आकर्षक और मनोहर होता है, किंतु उग्र और कुपित होने पर वह नाराज हो जाती है और मानव के लिये प्रलयंकारी सिद्ध होने लगती है। प्रकृति के इसी स्वभाव का अध्ययन कर गोस्वामी तुलसी दास जी ने रामचरित मानस में लिखा है-

गगन, समीर अनल जल, धरनी।

इन्ह कई नाथ सहज जड़ करनी।।

अर्थात हमें ऐसे प्रयास करने चाहिये कि प्रकृति की नाराजगी मानवीय गतिविधियों के कारण मुखर न हो। मानव चेतन है, जबकि प्रकृति जड़। अतः यह मानव का कर्तव्य है कि वह प्रकृति को संतुलित व संरक्षित बनाये रखें, ताकि प्रकृति हंसे, मुस्कुराये और हमें अपने स्नेहिल स्पर्श से तरंगित करती रहे

 

प्रस्तुतकर्ता

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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