मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

सबक लें भूकंप से

तबाही का मंजर दिखाने वाला भूकंप हम सभी के लिए कई सारी चेतावनियां छोड़ गया है।

यह अपने आप में ऎसे मार्मिक संदेश हैं जिनके मर्म को समझ जाएं तो ठीक है वरना प्रकृति आज नहीं तो कल अपना काम करेगी ही।

पृथ्वी सहित पंच तत्वों का आदर-सम्मान जब तक होता रहता है तब तक प्रकृति प्रसन्न रहती है लेकिन जब-जब आसुरी भावों का उदय होने लगता है, पृथ्वी को अपने पर इतना अधिक भार महसूस होता है कि वह कुलबुला उठती है और इससे उपजेे गुस्से के बाद वह कितनी निर्मम और क्रूर हो जाती है, वह इस भूकंप ने हमें दर्शा ही दिया है।

प्रकृति और पर्यावरण को रौंदना छोड़ें, सृष्टि का उपयोग और उपभोग करें मगर इस हद तक शोषण न करें कि धरती मैया को ममत्व का सागर छोड़कर अपना आपा तक खो देना पड़े।

धरती मैया हिंसा, कलह, कपट, झूठ, अधर्म और आसुरी कर्म नहीं चाहती।

वह चाहती है सृष्टि में दैवीय गुणों के साथ मानवीय मूल्य बने रहें, लोग इंसानियत से रहें, प्राणी मात्र निर्भय रहे, शांति और सुकून के साथ हर जीव स्वतंत्र और मस्त होकर जीने में खुश हो तथा सदाचारों और संस्कारों की हवाओं का वेग निरन्तर बना रहे।

जब से हम सभी ने इंसानियत भुला दी है तभी से धरती मैया ने हम पर से अपना वात्सल्य और ममत्व छीन लिया है और हमें मुक्त कर दिया है अपने स्नेह बंधनों से।

और हम हैं कि अपने आपको संप्रभु, स्वच्छन्द और स्वेच्छाचारी मानकर खुश हो रहे हैं।

यह भूकंप हम सभी के लिए सीख देने वाला है।

सब अपनी-अपनी मर्यादाओं में रहें, कोई हदों को पार न करे, वरना अंजाम बुरा होगा।

आज हममें से हर इंसान को अपनी मर्यादाओं को त्यागने में आनंद का अनुभव होता है।

हम सभी चाहते हैं कि कोई न कोई शोर्ट कट अपना कर रातों रात प्रतिष्ठित हो जाएं अथवा मालामाल हो जाएं। भले ही इसके लिए हमें इंसानियत को गिरवी ही क्यों न रख देनी पड़े।

वह जमाना बहुत पुराना था, बीत गया। जब हमारे पास खूब सारे पराक्रमी, निष्ठावान, मेधावी और आदर्शवान लोग थे, जिनका अनुकरण करते हुए जीवन में सफलता पाकर गर्व और गौरव का अहसास होता था।

हम अपने आपको तौलें और देखें कि हममें से कितने लोग ऎसे हैं जो किसी मामले में आदर्श स्थापित कर पाएं हों, किसी भी विषय या व्यवहार में हम अनुकरण योग्य हों।

हमें निराशा ही हाथ लगेगी, क्योंकि हम अपनी सारी हदों को तोड़ चुके हैं और हमारी स्थिति उन पिल्लों जैसी हो गई है जो पीढ़ियों से भूखें हैं और रोटी या हड्डी का टुकड़ा दूर कहीं दिख जाने पर पाने के लिए लपक पड़ते हैं।

अपने स्वार्थों के लिए हम झूठ-फरेब और नालायकियों का सहारा लेने में कभी पीछे नहीं रहते।

हममें से कितने लोग बचे हुए हैं जो पक्के तौर पर भगवान को हाजिर-नाजिर रखकर या अपनी कसम खाकर यह दावा कर पाने की स्थिति में हैं कि हम सत्य का आचरण करते हैं, हमारी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है, कभी झूठ नहीं बोलते या अपने मामूली स्वार्थों के लिए दूसरों को तंग नहीं करते।

कदाचारियों, हिंसकों और दुष्टों को कोई कुछ कह पाने का साहस हम दोहरे-तिहरे चरित्र वाले स्वार्थियों में से भले ही कोई नहीं कर पाए, धरती मैया का एक कंपन ही काफी है।

दुष्टों का संहार हो जाए तो कोई बात नहीं, लेकिन इस प्रकार की त्रासदियों में उन लोगों को काल कवलित होना पड़ता है जिनका दोष नहीं होता। दूसरों के दोषों का खामियाजा सज्जनों और निर्दोषों को भोगना पड़ता है, यही विडम्बना है।

भूकंप के बाद जो स्थितियां उत्पन्न हुई हैं उनमें हमारा प्राथमिक फर्ज यही है कि हम जिस प्रकार से भी कर सकें, भूकंप पीड़ितों की दिल खोलकर मदद करें।

मानवीय संवेदनाओं के साथ उदारतापूर्वक सहयोग, संबलन और सहकार का वक्त है। सारे भेदभाव भुलाकर मानवीय पक्ष को ध्यान में रखते हुए जो मदद करता है वही सच्चा मानव है।

भूकंप त्रासदी के बाद जिस तरह हमारे प्रधानमंत्रीजी और केन्द्र सरकार ने त्वरित पहल की, उसका दुनिया भर में स्वागत हुआ है।

हम सभी को भी उसी जज्बे के साथ काम करने की आवश्यकता है।

कुछ दिन सब कुछ छोड़ कर भूकंप पीड़ितों की यथाशक्ति मदद करने में लगाएं।

इंसानों के लिए यह परीक्षा की घड़ी है जिसमें हम पास हो गए तो धरती मैया खुश होंगी और आयंदा वे भी इस प्रकार की त्रासदी देने के पहले सोचेंगी।

और हम फेल हो गए, सिर्फ खबरों और तस्वीरों के पीछे ही मर गए तो ध्यान रखें कि अगली आपदा के प्रभावित हम भी हो सकते हैं क्योंकि धरती मैया असंख्य आँखों से सब कुछ देख रही है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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