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व्यंग्य - जाँच

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शशिकांत सिंह 'शशि'

 

किसान की आत्मा स्वर्ग में न्याय पाने के लिए खड़ी थी। चित्रगुप्त की समझ में नहीं आ रहा था कि असमय आ कैसे गया। उन्होंने किसान से ही पूछा-

-' मुझे विश्वास नहीं होता कि तुम मर कैसे सकते हो ? अभी तो तुम्हारे खाते में बीस साल तीस दिन और चार घंटे का जीवन शेष था। तू मरा क्यों ?'

-' विश्वास तो हुजूर हमें भी नहीं हो रहा है। मैं तो .............................।'

चित्रगुप्त ने यमदूतों को बुलाया ।

-' तुम्हें यह किसान किस हालत में मिला ?'

-' महाराज यह पेड़ पर चढ़ा था । लोग तालियां बजा रहे थे। नारे लगा रहे थे। कोई नेता भाषण दे रहा था। पुलिस वाले नीचे गश्त लगा रहे थे। ऊपर देख भी नहीं रहे थे। मीडिया वाले तो नेता की कम और किसान के फोटो अघिक उतार रहे थे। एक से तो मैने पूछा भी था कि भाई फोटो क्यों उतार रहे हो ? उसका उत्तर था टी वी पर मरते किसान को लाइव दिखाना है। मैं तो यमदूत होकर भी सिहर उठा महाराज। '

चित्रगुप्त ने एक जांच कमिटी गठित की । अध्यक्ष थे पवन देवता। उन्होने तहकीकात की। सबसे पहले भीड़ से जाकर पूछा-

-' तुमलोग किसान की समस्या को लेकर दिल्ली गये लेकिन एक मरते किसान को बचाने के लिए पेड़ पर क्यों नहीं चढ़े ?'

-' हम क्या करते सरजी। हम तो नेताजी का भाषण सुन रहे थे। वह पेड़ पर चढ़कर चिल्ला रहा था। हमलोग समझे कि खेल कर रहा है। हमें क्या पता था कि सचमुच मर ही जायेगा। '

-' कम से कम उससे उतरने के लिए तो कहते।'

-' वह तो नेताजी कह ही रहे थे। सरजी यह हमारा काम नहीं है। पुलिस वाले वहीं थे। उनका काम था। हम क्या करते। मजबूर किसान हैं। आत्महत्या तो हमारी नियती है। हमारा भाई मर गया और आप हमें कातिल बता रहे हैं। हम तो हमेशा सरकार के भरोसे बैठे रहते हैं। हमें जब सरकार बचाती है तो उसे भी सरकार को ही बचाना चाहिए था। हमें तंग मत कीजिये सुकून से रोने दीजिये। '

पवन देवता की समझ में नहीं आया कि इस नियतिवादी को कैसे समझायें कि मरते आदमी को बचाने की पहली कोशिश तुम्हें करनी चाहिए थी। वह तुम्हारे बीच का था। तुम्हारा भाई था। उन्होंने नेताजी के घर जाने का निर्णय लिया। उन्हें पता चला था कि नेताजी ने ही किसानों को दिल्ली बुलाया था। नेताजी के घर पहुंचे। वहां गंभीर गोष्ठी चल रही थी। मीडिया के सवालों का उत्तर कैसे दें। माफी मांगने के पहले मुंह कैसे फुलायें। जहां तक हो सके आंखों में आंसू और होठों पर आह हो। देवता ने पूछा-

-' आपने किसानों को दिल्ली बुलाया। आपकी आंखों के सामने एक किसान मर गया आप देखते रहे। यही आपकी संवेदना है। '

नेताजी ने लच्छेदार शब्द झाड़ने की कोशिश की लेकिन देवता के सामने झूठ नहीं बोल पाये-

-' भाई साब , हमारा तो काम ही भाषण देना है। हमसे पेड़ काफी दूर था। हम उतर कर जाते तब तक देर हो जाती। हमने अपील की थी। आप चाहें तो टी वी के फुटेज देख लें। '

-' जो लोग आपके कहने पर इतनी गर्मी में दिल्ली आ गये। क्या वे लोग आपकी ललकार पर पेड़ पर नहीं चढ़ सकते थे। आपके वलंटियर जो गली-गली घूमकर लोगों को आपको वोट डालने के लिए समझा सकते हैं क्या वे पेड़ पर चढ़े किसान को नहीं समझा सकते थे। '

-' आप तो ख्वामखाह हमारे सिर पर चढ़ रहे है। क्या यह हमारा काम था कि पेड़ पर चढ़ जाते और उसे उतारते। यह काम पुलिस का है। पब्लिक का है। हमने तो उनसे अपील की थी। हमारा काम अपील करना ही है। हम कालाबजारी, आढ़तीय, माओवादी, आतंकवादी सबसे अपील ही करते हैं। यह लोकतंत्र है। सबको अपनी मर्जी का करने का अधिकार है। हम आंसू बहा सकते हैं। कविता लिख सकते हैं। यह नहीं हो सकता कि हम पेड़ पर चढ सकें। बचपन मे ंचढ़ते थे। '

देवता ने स्वर्ग में भी नेताओं के किस्से सुने थे। उन्हें मालूम था कि यह प्रजाति केवल चुनाव के दिनों में ही संवेदना पालती है बाकी दिनों में सपने। उन्होंने एकबार फिर समझाया कि भाषण बंद करके यदि एकबार ललकार भरते कि उस आदमी को नीचे उतारो , कहीं कोई अनहोनी न हो जाये तो लोग उसे उतार ही लेते। आप ने गंभीरता नहीं दिखाई तो लोगों ने भी उसे गंभीरता से नहीं लिया। आप हंसते रहे लोग मुस्कराते रहे। आदमी अपनी जान से गया। वहां से निराश होकर देवता पहुंच पत्रकारों के पास जो कैमरे के पीछे तो ठहाके लगा रहे थे लेकिन कैमरे के सामने आते ही इतने गंभीर हो जाते मानो देश की सारी जिम्मेवारी उन्हीं के कंधे पर हो। सारे संसार को नैतिकता का पाठ पढ़ाते रहने वाले कैमरे वाले कैंटीन में बैठे मिल गये। देवता ने उनसे पूछा-

-' आदमी मर रहा था और आप फोटो खींच रहे थे। आप कैमरे को नीचे रखकर उस आदमी को नीचे नहीं उतार सकते। '

पत्रकार का चेहरा तमतमा गया। उसकी अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में पड़ने लगी। अचानक बच गई। उसने सीधा सा सवाल किया-

-' हमसे सवाल पूछने वाले आप कौन ? सवाल पूछने का काम हमारा है आपका नहीं। हमें उत्तर देना नहीं सिखाया गया है। हम देश की किसी भी घटना के लिए उत्तरदायी नहीं है। हमारे खबरें दिखाने से दंगे तक हो जाते हैं। हम उसके लिए भी जिम्मेवार नहीं हैं तो किसान के मौत की जिम्मेवारी हम पर कैसे आती है ? आप अपना काम कीजिये। हमें हमारा काम मत सिखाइये। हमें कोई नहीं सिखा सकता। संसार को हम सिखाते हैं। '

देवता धरती पर आने के बाद पहली बार मुस्कराये।

-' लेकिन आपने हमारे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। आप नेताजी से , पुलिस से, जनता से सबसे पूछ रहे हैं कि उन्होंने मरते किसान को क्यों नहीं बचाया। आपने क्यों नहीं बचाया ? आप इन्सान नहीं है। आपलोग हत्या , बलात्कार, लूट सबकी फोटो खिंचने तक ही अपनी जिम्मेवारी क्यों मानते हैं ? नैतिकता जो दूसरों पर लागू होती है वह आप पर क्यों नहीं लागू होती। '

-' देखिये हमारा काम सत्य को दिखाना है। सत्य यह था कि किसान पेड़ पर चढ़ा । वहां से धमकी दी और अंत में आत्महत्या की। यह सत्य है हम दिखा रहे थे। हम सत्य से मुंह नहीं मोड़ सकते। यदि हम कैमरा रख देते तो दूसरे चैनल वाले उसे लाइव दिखा देते। हमारे चैनल का क्या होता ? सारी गलती दिल्ली सरकार की है। रैली के आयोजकों की है। हम उन्हें बेनकाब करके छोड़ेंगे। मरता रहा किसान और देखती रही सरकार। यह नहीं चलेगा हम नैतिकता के पहरेदार हैं। हम सदा सत्य के साथ हैं। हमारी सदा जय हो। '

देवता मुंह लटकाकर खड़े हो गये। उन्होंने पुलिस वाले की ओर रुख किया। वह समाज की रक्षक कहलाती है तो उससे भी पूछ लिया जाये। पुलिस वाले तम्बाकु रगड़ चुकने की बाद की अवस्था में थे। अर्थात थे भी और नहीं भी थे। वर्दी खूंटे पर लटक रही थी, पुलिसवाले खाट पर।

देवता ने जाते ही प्रश्न किया-

-' आपलोगों की डयूटी तो उसी रैली में थी न जिसमें किसान मरा था।'

-' आप कौन ?'

-' हम जांच कर रहे हैं। आपलोगों को उस मरते हुये किसान को बचाने की चिंता नहीं थी। आप समय पर चेतते तो उसे बचाया जा सकता था। '

-' भाईजान पहली बात तो हम यह नहीं जानते कि आप कौन सी जांच कमीशन हैं। दूसरी बात की दिल्ली की लॉ एंड आर्डर के लिए हम सीेधे जिम्मेवार नहीं हैं। हम दिल्ली सरकार के अंडर में नहीं आते। हमे जब गृह मंत्रालय कहता है तो हम एक्टिव होते हैं। '

-' मरते किसान को बचाने के लिए भी आदेश जरूरी है !!'

-' सरकारी नौकर हैं। सब काम कायदे से करते हैं। हमारी एक कागजी चूक से हमारी नौकरी चली जाती है। पेड़ पर चढ़ जाते तो कल कोई अधिकारी पूछता तुम्हारी डयुटी तो नीचे जमीन पर थी। पेड़ पर क्यों गये। हम क्या करते ? दिल्ली सरकार से पूछना चाहिए कि उसने क्या किया ? हमारा उनका तो पहले से छत्तीस का आंकड़ा है। हम केंद्र के सिपाही हैं।

-' आप लोगो की संवेदना मरते किसान के साथ नहीं है। कमाल है।'

पुलिस वाले ने तकिया गर्दन के नीचे लगाया और देखते ही देखते खर्राटे लगाने लगे। देवता वहां से कूच कर गये। चित्रगुप्त के सामने मुंह लटकाकर खड़े हो गये। उन्होंने सारा वृतांत सुना दिया। पहली बार किसान का ठहाका गूंजा।

-' हमें पता था सरकार कि आप खाली हाथ ही लौटेंगे। किसान के लिए धरती पर भी बहुत काम होते हैं लेकिन सबके परिणाम जीरो। मैं तो खुश हू कि जल्दी आ गया। आज न कल यही होना था। वहां किसान केवल वोट देने , कविताओ और कहानियों में हीरो बनने, भाषणों में विषय बनने का काम करता है। वह जिंदा रहा तो उम्रकैद मर गया फांसी। '

देवता उसे देखते रह गये

 

शशिकांत सिंह 'शशि'

पिता-स्व. रामाधार सिंह

माता- स्वर्गीया कांति सिंह

जन्म तिथि- 24.10.1969

शैक्षणिक योग्यता- एम ए बी एड

ग्राम-मड़पा मोहन

पो- देवकुलिया

जिला-पूर्वी चम्पारण, बिहार

सम्प्रतिः-

जवाहर नवोदय विद्यालय

शंकरनगर, नांदेड़ 431736

महाराष्ट्र

प्रकाशनः-

1. समरथ को नहिं दोष (व्यंग्य संग्रह ,2001)

2. ऊधो! दिन चुनाव के आए (व्यंग्य काव्य 2005)

3. बटन दबाओ पार्थ 2013 व्यंग्य संकलन

4 प्रजातंत्र के प्रेत 2014 व्यंग्य उपन्यास

सम्मान-

हरिशंकर परसाई सम्मान (क्षितिज पत्रिका द्वारा ,2005 )

कथा सागर साहित्य सम्मान- 2013

सम्पर्कः-

मो- 07387311701 ई मेल. skantsingh28@gmail.com

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