शनिवार, 11 अप्रैल 2015

अभिनव नारायण आचार्य का आलेख - संगीत के प्रभाव पक्ष में ताल वाद्यों की भूमिका

संगीत के प्रभाव पक्ष में ताल वाद्यों की भूमिका

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अभिनव नारायण आचार्य

प्रकृति का प्रत्येक जीव ध्वनि गति से आबद्ध है। ऊर्जायें भी इससे निरपेक्ष नहीं। ध्वनि और गति एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। जहाँ गति होगी वहाँ ध्वनि होगी ही और जहाँ ध्वनि होगी वहाँ गति होगी। गति का बराबर विभाजन और संतुलन यम (समय) को संयम में बदलता है और गति का यह संयम ही लय की संज्ञा पाता है। इसमें नियम की मात्रा इसके भाग- सहभाग को निर्धारित करती है तब इस व्यवस्था को ताल कहा जाता है। संक्षेप में गति का संयम लय और ‘लय’ में वैभागिक मात्राओं को ‘ताल’ कहा जाता है।

विश्व में संरचना का आदि-अंत संयोजन और वियोजन में ही परिलक्षित होता है। क्योंकि बनने और मिटने दोनों में ही गति होती है। भौतिकविज्ञान भी पदार्थ के सूक्ष्म अतिसूक्ष्म अणु परमाणु की केन्द्रक मूलक गतिशीलता की परिपुष्टि करता है। जो कि ध्वंस एवं सुवंश जैसी दोनों क्रियाओं में सक्षम है। विराट और सूक्ष्म की यह गति लीला ही कला की ललित लीला में प्रगतिशीला पायी जाती है। इसी गतिशीलता के लय निलय से तालमेल बैठाने के आराध्य- साध्य होते हैं-- तालवाद्य।

उत्तेजना की गति--हृदिसंचार की गति, नाड़ी संस्थान की गति, शरीर की दुर्गति-सद्गति आदि गतिविधि की भेदनिधी अपने में निहित रखती है। जीवनआनन्द के संचालन में प्रसन्नता की ‘ताली’ और भराव की अपेक्षा की ‘खाली’ इन्हीं तथ्यों की रखवाली करती है। अतः मन मयूर का नाच उठना और चाल चलन का सही गलत होना जीवन की अवस्था मूलक गतिविधि को व्यक्त करता है। संगीत के अविभाज्य पक्ष लय ताल की गतिविधि भावनिधि को प्रभावित करने में महती भूमिका का निर्वाह करती है। लोक से लेकर विशिष्ट तक इन्हीं भूमिकाओं की सार्थक अवस्थाओं का विश्लेषण करना मेरे इस लेख का प्रमुख उद्देश्य है जिससे प्रभावकारी पक्षों के उपयोग को सहजतया अपनाने में वादक एवं साधक को सरलता से सफलता मिल सके।

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