विश्व को स्वस्थ, निरोग बनाने में योग का योगदान

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विवेक पाठक (योगाचार्य, , little world school, TILWARA , JABALPUR)

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आज के समय में योग के नाम से कोई भी अनभिग्य नहीं है। योग परम्परा प्राचीन काल से ही भारत में प्रचलन  रही है। हमारे ऋषि मुनियों द्वारा आसन  , प्राणायाम, ध्यान आदि का प्रचलन निरन्तर व्यवहार में रहा है। योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और लंका में भी फैल गया है। अतः विश्व में योग का प्रचार प्रसार बहुत पहले ही हो चुका है।

गीता में कहा गया है- 'योग: कर्मसु कौशलम्‌' (कर्मो में कुशलता लाने को योग कहते हैं) व्यक्ति निरन्तर अपनी नैतिक दिनचर्या में कर्म करता रहता है और अपने कार्यों को सुव्यवस्थित अंजाम तभी दे सकता है जब वह तन मन दोनों से स्वस्थ हो। वर्तमान समय में मशीनीकरण ने मनुष्य को भी मशीन की भांति बना दिया है, अतः अपने लिए प्राणी के पास समय की बहुत कमी हो गई है। परन्तु जिस प्रकार मशीन को भी समय समय पर ऊर्जावान करने हेतु मरम्मत की आवश्यक्ता होती है उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी व्यस्त दिनचर्या में से थोड़ा सा समय अपने मन मस्तिष्क के लिए निकाल ले तो उसकी आयु, एकाग्रता के साथ- साथ कर्मठता में भी वृद्धि होगी तथा रोग दोषों से मनुष्य दूर हो सकेगा।  निम्न प्राणायाम व आसनों को करने से ही मनुष्य को अत्यन्त लाभ मिलेगा और लोगों की पुनः योग के प्रति रुचि बढ़ेगी। कोई भी कार्य तत्काल अपना प्रभाव नहीं दिखा सकता क्योंकि ये हानिकारक हो सकता है अतः साधक को धैर्य के साथ योग को अपने जीवन में उतारना चाहिए। इससे धीरे- धीरे शारीरिक क्षमता में अंतर महसूस होगा और कोई हानी भी नहीं पहुँचेगी।

प्राणायाम - प्राणायाम शुरू करने से पहले इनका अभ्यास करना अत्यंत ही लाभदायक होता है। अतः शुरुआत में 5 मिनट फिर धीरे -धीरे 15 मिनट तक का समय दिया जा सकता है ।
निम्न प्राणायाम करने से शरीर व मन निर्मल होते हैं :--
1 . अनुलोम - विलोम प्राणायाम:- इससे कई लोग परिचित होंगे बहुत ही प्रसिद्ध प्राणायाम है । लेकिन ये प्रसिद्ध ऐसे ही नहीं है, इसकी विशेषताएं ही ऐसी हैं । पद्मासन में बैठकर दोनों हाथ को उठाकर अंगूठे के द्वारा दायीं नासिका को बंद करें और अनामिका और मध्यमा अँगुलियों के द्वारा (अंगूठे से दूसरी और तीसरी) बायीं नासिका को बंद करें और श्वास लेकर छोड़ने का क्रम प्रत्येक नासिका के द्वारा करें ।

2 . भ्रामरी प्राणायाम:- श्वास को पूरा अन्दर भरकर दोनों हाथों के अंगूठों से दोनों कानों को बंद कर लें और मध्यमा अंगुलिओं के द्वारा नासिका मूल को दबाएँ फिर भंवरे की तरह गुंजन करते हुए नाद रूप में "ॐ" का उच्चारण करते हुए श्वास को बाहर छोडें । ( 5 मिनट ) ( विशेष:- डिप्रेशन,माइग्रेन और नेत्र रोग में लाभदायक )

3 . भस्त्रिका प्राणायाम :- सुविधानुसार बैठकर दोनों नासिकाओं से श्वास को डायफ्राम तक भरना और सहजता से बाहर छोड़ना ही भस्त्रिका है । एक मिनट में 12 बार होता है 5 मिनट प्रतिदिन करें ।
* HIGH B.P. वाले तेजी से ना करें । ( 5 मिनट )

4. कपालभाति :- श्वास को भरने के लिए विशेष प्रयत्न ना करें बल्कि जितना श्वास सहजता से अन्दर चला जाता है उसे पूरी एकाग्रता के साथ बाहर निकलने का प्रयत्न करें । एक मिनट ,में 45 बार 5 मिनट करें ( 5 मिनट )
5 . उदगीथ प्राणायाम :- 5 से 8 सेकण्ड में श्वास को एक लय क साथ अन्दर भरना और 18 से 20 सेकण्ड में बाहर छोड़ना। (5 मिनट )
*** भ्रामरी और उदगीथ से किसी प्रकार की हानि होने की सम्भावना नहीं है ।

बंध -
1 . जालंधर बंध :- पद्मासन में बैठकर श्वास अन्दर भरें, दोनों हाथ घुटनों पर टिकाकर ठोडी को कंठकूप पर लगाएं छाती को आगे के और तान कर रखें और दृष्टी भ्रूमध्य में स्थिर करना ही जालंधर बंध है । ( एक मिनट )
2 . उड्डीयान बंध :- खड़े होकर दोनों हाथों को घुटनों से लगाकर श्वास बाहर छोडें और पेट को ढीला छोड़कर छाती को ऊपर उठाएं और पेट को कमर से लगा दें । शुरुआत में तीन बार पर्याप्त है !
3. मूलबंध :- पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर गुदाभाग और मूत्रेन्द्रिय को ऊपर के और आकर्षित करें । ( एक मिनट )
4. महा बंध :- तीनों बंध एक साथ लगाएं । ( एक मिनट )

ध्यान :- अंत में 5 मिनट मौन रहकर समस्त विचारों को मन से निकालकर शिव का ध्यान करें । ( 5 मिनट )
ये पूरा अभ्यास 45 मिनट का है , यदि अधिक समय लग तो 60 मिनट का समय मन जा एकता है लेकिन ये समय आपके जीवन को नयी ऊर्जाओं से भर देगा ।

गीता में कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति का दैनिक आहार व्यवहार सुनिश्चित है तो वह रोग दोषों से मुक्त है।

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