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तड़क-भड़क से बचें, गरीब को दें सम्बल

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दीपक आचार्य

दुनिया की चकाचौंध में आजकल सबसे ज्यादा परेशान, पीड़ित और अभावग्रस्त वह इंसान है जो सीधा-साधा, सादगीपसंद और गरीब है।

उसकी मौलिकता कहें या दुर्भाग्य यह है कि वह आकर्षण के चोंचलों से दूर है और दिखावा करना नहीं आता।

वह जैसा है वैसा ही दिखता है, जैसा मन में होता है वैसा ही वाणी और चेहरे पर आता है।

दोहरा चरित्र अपनाने का हुनर न उसके खून में है, न ही उसे ऎसा अभिनय करना आता है।

वह विशुद्ध इंसानी बीज का है इसलिए वर्णसंकरों की तरह व्यवहार कर नहीं सकता।

जीने का हक सभी को है। उन लोगों का सबसे अधिक है जो भलाई और सेवा के उद्देश्य से काम करते हैं।

उन लोगों को जीने का कोई हक नहीं है जो आदमी की सेहत या विकास से अधिक अपनी अधिनायकवादी लोकप्रियता, पदों, प्रतिष्ठा, मुनाफों और स्वार्थों को तवज्जो देते हैं।

ऎसे लोगों का जीना और दीर्घायु पाना मातृभूमि, जननी और जगदीश्वर सभी को लजाने वाला है।

हमारे जीवन का सर्वोपरि उद्देश्य यही होना चाहिए कि औरों को स्वाभिमानपूर्वक जिन्दगी जीने के अवसर मिलें, उन्हें हमारे साथ रहकर और आनंद के साथ जीते हुए सुकून का अहसास हो।

और इसके लिए यह जरूरी है कि अमीर और गरीब के बीच जो लम्बे पाट हैं, दूरियाँ बनी या बना दी गई हैं, वे समाप्त हों, सभी लोग एक-दूसरे के लिए जीने का ज़ज़्बा पैदा करें और एक-दूसरे के लिए बने होने का गौरव व गर्व रखते हुए सामूहिक विकास की अवधारणा को आत्मसात करें।

‘संगच्छध्वं ... वाले उपनिषद और वेद वाक्य को जीवन का मूल लक्ष्य बनाएं।

लेकिन यह सब तभी संभव है कि जब हम अपने आप को मनुष्य के रूप में स्वीेकारें, संवेदनशील बनें और सारे असामाजिक व्यवहार, भिक्षुक वृत्तियों, कुटिलताओं, षड़यंत्रों से मुक्त होकर काम करें।

इंसान को कोई वस्तु, उपभोग का माध्यम अथवा मुनाफे की टकसाल न समझें, बल्कि इंसान को इंसान ही मानें, अपने सहयोगी और कुटुम्बी के रूप में स्वीकारें।

हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में खूब सारे मौके आते हैं जब हमें इंसान के रूप में अपने आपको स्थापित करते हुए समाज की सेवा के भरपूर अवसर मिलते हैं लेकिन हम इनका कोई मोल नहीं समझते।

जहाँ कहीं वस्तु या मुद्रा विनिमय की बात आए, खरीदारी के मौके आएं या अपने आपको उपभोक्ता के रूप में दिखना हो, तब समाज के उस अंतिम आदमी का चेहरा ध्यान में लाएं, जो अभावों से त्रस्त है और सामान्य जिन्दगी जीने के लिए उसे उन लोगों की तलाश है जो उसे मदद कर सकें।

यह मदद है उसके परिश्रम का यथोचित मूल्यांकन कर प्राप्त की गई सेवा, वस्तु या सुविधा का प्रतिफल। यह हमारा उस पर कोई अहसान भी नहीं है। यह उसका पुरुषार्थ है जिसका वह दाम चाहता है।

अंतिम आदमी हमसे ज्यादा परिश्रमी, नैष्ठिक कर्मयोगी और स्वाभिमानी है और वह कभी भी भीख स्वीकार नहीं करता। उसे चाहिए उसके परिश्रम का मूल्य ही।

इस मामले में हम अपनी दृष्टि बदलकर समाज और देश को बदल सकने का सामथ्र्य पा सकते हैं।

बड़े संस्थान, कारोबारी समूह या बड़ी दुकानों के लिए हम जैसे ग्राहकों या उपभोक्ताओं का कोई ज्यादा वजूद नहीं है। उनके लिए हम कमाई का वो जरिया होते हैं जो किसी न किसी आकर्षण या नाम देखकर उनकी और खींचे चले जाते हैं।

लेकिन छोटे कारोबारियों के लिए हम हमेशा महत्त्वपूर्ण होते हैं। वह हमारी जितनी इज्जत करता है उसकी अपेक्षा बड़े धंधेबाजों और मुनाफाखोरों से कभी नहीं की जा सकती।

उन कारोबारियों को पनपने के अवसर दें जो स्थानीय उत्पादों, ताजा सामग्री और गुणवत्ता का पूरा ख्याल रखते हैं, खरीदारों के लिए दिल से समर्पित होते हैं, जिनके लिए ग्राहकों की सेहत और सेवा सर्वोपरि हो तथा जिन लोगों को सामान्य जीवन जीने के लिए अभावों को समाप्त करना जरूरी है।

बात सब्जी, फल-फूल या किसी भी सामान की खरीदारी की हो, रेस्टोरंट या होटलों की हो अथवा किसी भी प्रकार की खरीदारी, सेवा या सुविधा की। 

इन सब में यथासंभव छोटे से छोटे ग्रामीण कारोबारियों, अभावग्रस्तों, गरीबों और जरूरतमन्दों का ध्यान रखें।

बड़ी दुकानों में चाय पीने वालों को चाहिए कि नाम के आकर्षण और चकाचौंध को छोड़कर कभी किसी थड़ी वाले के यहाँ एकाध बार चाय पीकर देख लें, आदर-सम्मान तो मिलेगा ही, स्वाद से भरपूर चाय का भी ऎसा मजा आएगा कि मशहूर होटलों का नाम लेना भूल जाएंगे।

जीवन व्यवहार में गरीब को संबल देने के अवसरों को जो लोग पूरे दिल से अपना लेते हैं कि वे समाज की सेवा और देश की उन्नति के असली सहभागी हो जाते हैं और अनचाहा पुण्य भी पा लेते हैं।

हम जहाँ कहीं हों, वहाँ हमेशा उन लोगों का पूरा-पूरा ध्यान रखें जिनके सामने रोजी-रोटी और घर चलाने का संकट है।

इनके परिश्रम का मूल्य चुकाकर इन लोगों को की जाने वाली हर मदद ईश्वरीय प्रसन्नता के द्वार खोलने वाली है।

वस्तुतः भगवान न मूर्तियों और मन्दिरों में बसता है, न यज्ञों और अनुष्ठानों या दूसरे कर्मकाण्डों में, ईश्वर उन्हीं पर रीझता है जो जरूरतमन्दों की मदद करते हैं।

हमारा हर कदम लोगों की तकदीर बनाने वाला, इलाके की तस्वीर बदलने वाला होना चाहिए, तभी हमारा इंसान होना सार्थक है वरना इंसान होकर भी नाकारा और संवेदनहीन बने हुए मुर्दे तो हर कहीं भारी संख्या में खूब घूम रहे हैं। अपने यहाँ भी इन मुर्दाल बिजूकों की कहाँ कोई कमी है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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