आत्महत्या ही है यह

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दीपक आचार्य

 

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आज के युग में बीमारियों और बीमारूओं की संख्या में सर्वाधिक बढ़ोतरी हो रही है।

देश का कोई सा क्षेत्र ऎसा नहीं बचा है जहाँ बीमारों और बीमारियों की तादाद खूब न हो। 

शारीरिक रूप से कोई बीमार भले न दिखे, आज का माहौल ही ऎसा है कि मानसिक रूप से न्यूनाधिक प्रतिशत में बीमार जरूर दिख जाएंगे।

बहुत सारी धनराशि हम बीमारों की सेहत को सुधारने और बीमारियों का खात्मा करने के नाम पर डॉक्टरी और अस्पतालों पर खर्च की जा रही है।

बावजूद इसके न बीमारियों पर अपेक्षित अंकुश पाया जा सका है, न बीमारों की संख्या में कोई कमी लायी जा सकी है।

इसके मूल में हम सभी किसी न किसी अंश में जिम्मेदार हैं।

ऊपरी तौर पर भले ही हमें अपनी नालायकियों और निकम्मेपन का अहसास न हो, लेकिन सारी बीमारियों की जड़ में हम मनुष्य ही हैं।

हम उन सभी कारकों को अपना रहे हैं जिनसे बीमारियों, कीटाणुओं और तमाम तरह की दैहिक समस्याओं और भौतिक संतापों का नाजायज और असमय जन्म हो रहा है।

हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी के हर पहलू को हम गंभीरता से देखें तो साफ पता चलता है कि हम लोग अपनी सेहत के प्रति कितने घोर लापरवाह और उदासीन हैं।

हमने सेहत की रक्षा के सारे उपायों को नज़रअन्दाज कर रखा है और उन सभी पहलुओं को श्रद्धा, सम्मान और आदर के साथ स्वीकार कर लिया है जो हमारी सेहत की जड़ों को चुपचाप खोखला करते जा रहे हैं।

हमारी दिनचर्या सूरज उगने के साथ शुरू होनी चाहिए और सूरज ढलने के बाद थम जानी चाहिए। मगर ऎसा हो नहीं रहा है।

हमने सूरज की उपेक्षा कर रातों को अपना बना लिया है।
और तभी से ही हम अंधेरों के आगोश में खोते चले जा रहे हैं।

रोशनी के मूल और आदि स्रोत के निकलने के घण्टों बाद तक हम सोते रहते हैं और देर रात तक काम करते रहते हैं।

इस वजह से न आँखों की रोशनी का पुनर्भरण हो पा रहा है और न ही बौद्धिक क्षमताओं का अनवरत ऊर्जीकरण।

आँखों की रोशनी, बौद्धिक सामथ्र्य और चेहरे तथा शरीर का ओज-तेज देने वाला सूरज ही है।

लेकिन हम सूरज से कन्नी काटने लगे हैं, सूरज से  सायास दूरी बनाने लगे हैं, मुँह और शरीर पर कपड़ा बाँधकर सूरज से अपने आपको बचाए रखने की जुगत में भिड़े रहते हैं।

यही कारण है कि हमारी नेत्र ज्योति, ओज-तेज और बौद्धिक प्रखरता आदि क्षीण होते जा रहे हैं और चश्मों से लेकर ब्यूटी पॉर्लरों तक का सहारा ले लेकर अपने आपको सौन्दर्यशाली एवं क्षमतावान बनाए रखने के भ्रम में जीने को विवश हो गए हैं।

सेहत की बजाय स्वार्थ को महत्त्व देने की खातिर हम उन सभी सिद्धान्तों को भुला बैठे हैं जिनसे सेहत को लम्बे समय तक ठीक-ठाक रखा जा सकता है।

उषः पान से लेकर शयनपूर्व दुग्धपान तक की तमाम श्रृंखलाबद्ध प्रक्रियाओं को हमने हीन मानकर त्याग दिया है और इसकी बजाय अपना लिया है पाश्चात्य अप संस्कृति की तमाम सड़ी-गली परंपराओं को।

आलस्य, प्रमाद और संताप से बचे रहने के लिए पैक्ड़ भोजन और पेय वर्जित माना गया है।

साफ-साफ कहा गया है कि ताजगी भरी जिन्दगी पाने, हर क्षण स्वस्थ, प्रसन्नतचित्त और मस्त रहने के लिए जो कुछ ग्रहण करें वह समशीतोष्ण अर्थात न अधिक ठण्डा, न अधिक गर्म हो, जो कुछ खान-पान करें वह ताजा हो, तत्काल का बना-पका हो।

लेकिन हम अब जीवन में ताजा खान-पान बिसरा चुके हैं।

फ्रीज में रखे बासी खाने को अपना चुके हैं, कई-कई दिन पहले पैक किया गया खान-पान अपना रहे हैं और वह सब कुछ खाने-पीने में आनंद पा रहे हैं जो पुराना और बासी है।

अपनी अस्त-व्यस्त दिनचर्या के भरोसे न सेहत को पाया जा सकता है, न मानसिक शांति को।

यही कारण है कि हमारे जीवन में निरन्तर परिश्रम, पुरुषार्थ और प्रसन्नता की बजाय आलस्य, उन्माद, क्रोध और तन्द्रा का समावेश जोरों पर होने लगा है।

खूब सारे लोग दिन भर ऊबासियां लेते, सुस्ताते, बेवक्त सोते और टाईमपास करते नज़र आने लगे हैं।

पूरी तरह फ्री स्टाईल जिन्दगी को आत्मसात कर लिए जाने की वजह से ही हम साध्य-असाध्य रोगों, थकान, उन्माद और अन्यमनस्क अवस्थाओं को प्राप्त करते जा रहे हैं।

हमारा किसी काम में मन नहीं लगता। कोई सा काम करते हैं जल्दी थक जाते हैं।

हमसे न किसी की सेवा बन पा रही है, न परोपकार।

जब तक हम अपनी दिनचर्या को नहीं सुधारेंगे, ताजे खान-पान पर ध्यान नहीं देंगे, तब तक यही सब यों ही चलता रहेगा।

लगता तो यही है कि हम सभी लोग अपने कुकर्मों और उन्मुक्त भोगवादी जीवन को अपना कर यमद्वार की ओर जाने के सारे रास्ते खोल चुके हैं क्योंकि जो हम कर रहे हैं वह सब आत्महत्या से कम नहीं कहा जा सकता।

सब कुछ जानते-बूझते हुए भी करना अपने आप में आत्महत्या ही है जिसका कोई प्रायश्चित नहीं है।

इन स्थितियों को देखते हुए हमें या हमारे परिजनों को अब हमें झेलने के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। क्योंकि अब जल्दी-जल्दी सुनाई देने लगा है -  राम नाम सत्य है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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