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अशोक गुजराती की कविताएँ

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कविताएँ

अशोक गुजराती

मैं अण्णा! 


मत दो!
उसको सौ-दो सौ-पांच सौ रुपए
यदि कहीं अटका है तुम्हारा काम
झेलो तकलीफ़
उसके ऐवज़ में करोगे फिर तुम कोशिश
और ज़्यादा कमाने की
उसीके तरीक़े से
करो नहीं ऐसा तुम स्वयं
जड़ में इसके मानवीय प्रवृत्ति
सरकार, न्याय, अफ़सरशाही, राजनीति
है इसका तना, पत्ते, फूल-फल
बजाय उनको कटघरे में खड़ा करने के
झांको दामन में ख़ुद के
आंदोलन उचित उनकी बंदिश के लिए
लेकिन करो शुरू अपने-आपसे
ठीक हो जायेगा सब धीरे-धीरे!
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बनाम स्त्री

भटक गयी थी बकरी राह अपनी
नहीं, खूंटा तोड़कर नहीं भागी थी-
उसके बुढ़ापे से लापरवाह मालिक ने कहीं
की थी बांधने में कोताही
थोड़ी देर वह सर हिलाते ही
खुले बंधन को करती रही महसूस
फिर निकल पड़ी यूं ही बाहर
मालिक के अत्याचारों से आजिज़
क्योंकि नहीं जन सकती थी वह बच्चे अब
बूचड़ख़ाने से बची अद्यतन
और फिर भटक गयी...

यहां-वहां गर्दन इधर-उधर घुमाती
'मैं... मैं...' करती वह रही खोजती उस रात
जैसे किसी कार, बस या सुनसान जगह पर
फंसी लड़की
मदद की यह भाषा किसी को नहीं समझ आती
संवेदना की मौत की बरसी मनाते ये लोग
अपनी बेटी का चीत्कार क्योंकर लेते हैं सुन
क्या अपने तक सीमित रह गयी है
यह दुनिया- जो वैश्विक गांव बनाने का करती है दावा

...तो वह बढ़ती रही आगे ऐसे ही निरुद्देश्य
याद आया उसे अपना वह साथी
जो पहुंचा दिया गया था कसाई के यहां
और वह रह गयी थी अकेली
उनके सुकुमार बच्चे भी मालिक की
बाज़ारवादी सोच के चलते
ज़िन्दा या मुर्दा- तलाश के आयाम को कर चुके थे पार
पर प्यार था जो भी बीच दोनों के
वह ढूंढने की चीज़ नहीं थी, वह था-
गोया बस की बलात्कार पीड़ित और उसके घायल प्रेमी के मध्य

वह रुक जाती थी चलते-चलते
निर्मम मालिक के पास फिर जाने को उद्यत
किसी भी पत्नी की तरह जो
पति के ठीये के सिवा असुरक्षित-सी
लौट-लौट जाने को होती है मजबूर
उसके सारे कुकर्मों और ज़ुल्मों को नज़र-अंदाज़ कर
उसे माफ़ करती हुई
क्यों है यह अवशता... क्या ठोकर मारने लायक
नहीं हो पायी है सक्षम हमारी मां, हमारी बहन...
अब भी / इतने सार्वभौमिक विकास के बावजूद ?

और अंततः वह थक गयी
ज्यों निढ़ाल हो गयी थी दिल्ली की बस में
वह निर्भया जिसे रौंद रहे थे दरिंदे
बैठ गयी एक झाड़ी के पीछे चुपचाप
झाड़-झंखाड़ की पत्तियों से किसी प्रकार
पेट तो भर लिया था उसने
लेकिन था मन का हर कोना ख़ाली
अपना घर, जैसा भी था, छूट जाने का दर्द
उसे किसी करवट नहीं लेने दे रहा था चैन

तभी पास की पगडण्डी पर लड़खड़ाते क़दमों, ऊलजलूल बकवास
को लेकर आ गयी देसी दारू दो शरीरों में आत्मसात
वह भी थी स्त्री-लिंगी किन्तु
बलात्कार झेलती औरत ज़ात से अनजान
उसे नहीं था पता
कैसे तड़प-तड़प दे देती है जान
कोई मादा जब वह नर देह द्वारा उसे कर देती है तबाह.

...तभी एक शख़्स उनमें से गिर पड़ा
गड्ढे में पांव पड़ जाने से, यह वही गर्त था
मनुष्य को हैवानियत की राह ले जाता
उसके अनायास बकरी को स्पर्श करते पैरों ने
हड़बड़ायी-घबरायी बकरी को कर दिया
भय से सिमटने को लाचार
यह वही पल था जिससे बचना चाहे प्रत्येक नारी
जो था अकल्पनीय, दुर्दांत, बला का शर्मसार
पलक झपकते हो गये थे वे दोनों तब्दील
इनसान से जंगली बकरे में !
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दूसरा नाम


मेरी क्या बात , व्यग्र हो उठी प्रतीक्षा भी
फूल में छिपे पराग-कण की तरह
और जो आसपास था फूल के
पेड़-पौधे , कांटे , ज़मीन ,आसमान , तितली , वह लड़की
सब-सब एक सिवा तुम्हारे
तुम भी न रहती बेअसर , होती जो दायरे में निगाह के
काश! यह शक्ति होती
पारदर्शी दृष्टि में प्यार की
इसे-उसे अपना-सा बना लेने की
भ्रम वह , मन को विश्वास तो देता
विश्वास-
जिसका दूसरा नाम प्रेम है!
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पहचान


मुझे कवि जैसे चेहरे वाला
दिखा एक युवक
होटल में चाय पीते हुए
जान सकते हैं यदि चाहें
मुश्किल है व्याख्यायित करना
लेकिन थोड़े बड़े-बड़े बाल
छोटी-सी दाढ़ी तराशी हुई
सक्रिय हर क्षण- कभी बुदबुदाता, कभी ख़ामोश
आकर्षण की हद में करता गिरफ़्तार
जो शायद दूसरा कवि ही कर पाता है लक्ष्य.

क्या इतना ही या ऐसा ही
व्यक्तित्व बनाता है किसी को कवि
यदि होता यह तो सारे गुंडे भी होते यही
ये मात्र बाहरी संभावनाएं
भीतर का पता जानने कोई अंतर्यामी मैं नहीं
पर उसकी सूरत की वे सारी सलवटें, वे हाव-भाव
धोखा नहीं न दे सकती वह सुंदरता
अंदर से जो होती प्रकट
संवेदित मन का प्रतिबिम्ब
वह मृदुलता, वह भावुकता, अर्थात्मकता और अंतरंगता
हो सकती है कवि में जो आ जाती है अंर्तदृष्टि की पकड़ में
फिर भी मैं नहीं आश्वस्त कि वह
कवि है या होगा भी कभी.
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केंचुली

जहां हुआ है ज़ख़्म छोटा या बड़ा
वहीं-वहीं फिर लगती रहती है चोट
नाखून काटो कभी भी
अगले या उससे अगले दिन
कुछ-ना-कुछ खोलने-पकड़ने-खींचने के लिए
पड़ती है उनकी ज़रूरत
आप आज कबाड़ी को देते हैं बेच
काफ़ी दिनों से इकट्ठा अख़बार, पत्रिका याकि किताब
और दूसरे ही दिन पड़ जाता है काम
आपको पिछली किसी तारीख़ के अख़बार
बीते महीने की पत्रिका या पढ़ी हुई किताब का
किसी बेकार पड़ी चीज़ को
बहुत समय तक आलस करने के अनन्तर
रख देते हैं हम स्टोर के किसी ऊपरी हिस्से में
सबसे पीछे
और अमूमन पश्चात एक हफ़्ते के ही
आवश्यक हो जाता है उस वस्तु का उपयोग
लेकिन वह ढूंढे नहीं मिलती
इसी, इसी तरह
मैंने बेवजह उसे पता नहीं किसी अहंकार के तहत
या यूं ही-सा टाला
और तब से वह लगातार मेरे ज़ेहन को
कुरेद-कुरेद कर कर रही है बेचैन
इतने सालों बाद भी
मैं उसे प्यार न कर पाने के छूट गये अवसर हेतु
ख़ुद को कोसता रहता हूं अनवरत.
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कैसे जाता है दम...


सूरज इतना उष्ण
प्रखर- तेज़ बरसाता
भगवान तक मान लिया लोगों ने
बेबस लेकिन
अदनी-सी बदली के
घेर लेने के पश्चात
क्या है इस बदली में
हवा- अलग-अलग वायु
कूड़े के कण और आर्द्रता
पर बन जाती वह रज़ाई
चादर-सी लगती अवश्य
ज्यों हो असंवेदना की मोटी-सी चमड़ी
अपनी वाहियात आदतों पर अड़ा व्यक्ति
व्यावहारिकता की खोह में प्रविष्ट वंचित रिश्ते
राजनीति के धोखेबाज़ों पर नाअसर गालियां
प्राण-से ख़ूबसूरत खलनायक को
बेवजह ठुकराती नायिकाएं
सूरज दूसरी तरफ़
देता चर-अचर को ज़रूरी तापमान
लगातार उसके पृष्ठभाग पर चलती प्रक्रिया से
पैदा होती असीमित जीवनदायिनी ऊर्जा
इस सिंह के मुक़ाबिल वह लोमड़ी...
क्या ऐसा ही नहीं हो रहा इस विश्व में भी
जिनमें नहीं उतना दम
छा रहे हैं प्रसिद्धि के आकाश पर
और वे, जिनमें अद्भुत है प्रतिभा
इन दो नंबरी जुगाड़ुओं की पहुंच के आवरण में
रह जाते हैं छिपे-छिपे ही
तोड़ देते हैं दम यूं ही अनाम !
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किलकारी


बिखरा हुआ था मलबा यहां-वहां
नुमाइश लगी हो ज्यों मिट्टी-पत्थर-ईंटों की
गुजरात के उस गांव में
जी हां, आया था भूकम्प
हो गये थे दफ़न अनगिनत अपने ही मकान की क़ब्र में
संघर्ष-रत अस्पताल में जो थे
उन्हें कहा जायेगा ख़ुशकिस्मत ही...
जवान सेना के हटा रहे थे अवशेष धराशायी घरों के
युद्ध-स्तर पर
निकाले शवों का दाह-संस्कार हो रहा था
खुले ही में
कि अचानक
टूटी दीवारों, छत के टीनों, बल्लियों को खींचते-सरकाते
आयी आवाज़ कराहने की
खोजा तो थी एक औरत दबी हुई मगर जीवित
उसकी बांहों की गिरफ़्त में था
जकड़ा हुआ एक छोटा-सा शिशु
जिसे चिपटा रखा था उसने किसी बंदरिया की तरह
बांहें पड़ गयी थीं शिथिल उसकी, फिर भी
आंखें उसकी भरी-भरी थी चिन्ता से
निकाले जाने पर उसके आगोश से बच्चे को
नब्ज़ टटोली फ़ौजी ने और मुस्कराया-
ज़िन्दा है आपका बच्चा, बहनजी...
बात नहीं कोई फ़िक्र की !
तभी बच्चे की दबी लेकिन ख़ुशनुमा किलकारी
सुनी उस मां ने
और दिव्य शान्ति से आप्लावित
मूंद लीं अपनी आंखें सदा के लिए !
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चिड़िया का डर


कोयल के अण्डे चुराकर
निश्चिन्त निर्द्वन्द्व घूम रहा कौवा
सहमी हुई है चिड़िया
उसके संस्कार है वैसे
वह ज़रा-ज़रा-सी बातों में
दुखी हो जाती है
प्रसन्न हो लेती है
चिन्तित हो जाती है
उसे नहीं पता
वह क्यों है डरी हुई
जबकि है निर्दोष-निरपराध
वह तो इतनी-सी बात से है विचलित
कि कहीं कोयल
उस पर शक न कर ले
आक्रमण का न सोच ले
चुल्लू भर पानी में डूब मरने की
शर्मनाक घटना होगी उसके लिए यह
जगत के सारे पशु-पक्षियों का
उठ जायेगा उसकी ज़ाति पर से विश्वास
उसकी मासूमियत हो जायेगी बदनाम
शायद अच्छाई पर से ही
लोगों का यक़ीन उठ जाये
क्या करे वह ?
क्या कोयल को सब कुछ बता दे सच-सच...
उसका अपराध है सिर्फ़ इतना
कि वह उसी पेड़ की उसी डाल पर रहती है
कौवे से भी हंस-बोल लेती है
कोयल की मीठी लय में झूमती है...
लेकिन नहीं, ख़ुद कोयल के पास जाने से
कहीं उसका शुबहा और बढ़ गया तो ?
वह क्या करे ?
सहमी-विचलित है वहमी चिड़िया
निश्चिन्त निर्द्वन्द्व घूम रहा कौवा...
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दो रुबाइयां


 
दिल के मकां में वो रहता आया  है
महज़ मुहब्बत ही जिसका किराया है
शायद उसको ये ख़बर न हो लेकिन
किराया  एक  मुद्दत से बक़ाया  है


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ख़ुशियां  बेकल  थीं  चौराहों पर
मैंने  उठा  लीं  अपनी  बांहों पर
बांहें छिटकीं  जो ये  मंज़र देखा
ग़म भी घायल थे अगली राहों पर

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कविता
          

छालों भरी जीभ 

यह ज़िन्दगी अजीब-सी
अमीर-सी
ग़रीब-सी भी

आंचल नहीं बन पाता सोख़्ता
जब भी गलती है आंख
निब की तरह

रातें उलझी-उलझी
क़रीब होकर भी दूर
सुबह-शाम की सिन्दूरी आभा
और दिन के उजास से

होता है मिलन
बीच इन्सानों के
पर यहां तो मन में
परी है बसी

क्यों है परहेज़ वफ़ा से
जैसे छालों भरी जीभ
सूरज को संध्या के सन्निकट देख
बेतरतीब हुई जाती है रात

कोशिश करो बनने की ईशु
चाहो तो समझ लो
मेरी कविता को सलीब!
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प्रा. डा. अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली- 110 095. सचल : 9971744164.

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