मंगलवार, 12 मई 2015

भाग्य जगाता है मोहभंग

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डॉ दीपक आचार्य

हम चाहे कहीं रहें, किसी के साथ रहें और अचानक कोई समस्या आ जाए, किसी से बेवजह संबंधों में दूराव आ जाए अथवा परिवेश में कहीं कोई अनहोनी बातें होने लगें।

इनमें हमारा न कोई हाथ हो, न हमारा दोष हो, और न इनसे हमारा कोई  लेना-देना हो।

ऎसी स्थितियां अक्सर हर किसी के साथ होती रहती हैं।

हममें से अधिकतर लोग इन स्थितियों को अपना दुर्भाग्य या ग्रहों का कोप अथवा अनिष्ट की आशंका का संकेत मानने लगते हैं और खिन्न हो उठते हैं।

लेकिन हमारी खिन्नता निराधार ही हुआ करती  है।

आम तौर पर हम सभी के साथ ऎसा होता है।

हर तरफ अनुकूलताओं के साथ काम करते-करते अचानक कुछ ऎसा हो जाता है कि हमें उस स्थान विशेष तथा व्यक्तियों से घृणा होने लगती है।

जो लोग हमारे आस-पास हुआ करते हैं वे  बेवजह बिफरने लगते हैं, नकारात्मक भावों से पूरे माहौल को प्रदूषित करते रहते हैं और मलीनताओं भरा ऎसा कोहरा छा जाता है जिसमें हर कोई कुलबुलाहट महसूस करता है सिवाय नाकारा, विघ्नसंतोषी, टाईमपासिया और नकारात्मक लोगों के।

निकम्मों और षड़यंत्रकारियों पर इस काली धुंध का कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि इनके लिए यह रोजाना की बात हो जाती है।

कई बार बिना कोई कारण सामने आए भ्रमों, शंकाओं और आशंकाओं के मारे पारस्परिक अविश्वास और कटुता के भाव सामने आ जाते हैं।

कई बार हम किसी स्थान या व्यक्तियों के समूह के चक्कर में आकर ऎसे बंध जाते हैं कि हमारी अपनी पहचान खो जाती है और किसी समूह (इसे गिरोह कहना ज्यादा ठीक होगा) के नाम से पहचान कायम हो जाती है।

इस समूह के सारे लक्षण हममें भी दिखने लगते हैं या कि इनका प्रभाव हम पर भी हावी होता दिखता है।

ढेरों अनुकूलताओं या सम स्थितियों भरे हालातों के बाद अचानक किसी न किसी पीड़ादायी कारण के सामने उपस्थित होने का दौर हर तरफ विद्यमान है।

यह ऎसा प्रदूषण है जिससे न कोई व्यक्ति बच पाता है, न डेरे और बाड़े अथवा कोई से क्षेत्र।

कोई भी इंसान यह दावा नहीं कर सकता कि उसकी जिन्दगी में ऎसे किसी अवसर से उसका सामना नहीं हुआ हो।

आमतौर पर ऎसी स्थितियों का होना मनुष्यों के उस संसार में आम बात है जिसमें हर किसी का दिमाग अलग-अलग आसमान पर चढ़ा होता है।

‘मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना’ वाली स्थितियां हमारे सामने हैं और ऎसे में किस आदमी का दिमाग किस समय उन्मादी अवस्था में आकर नकारात्मकता को ओढ़ ले, किस समय खुराफाती होकर दौड़ने लग जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।

फिर आजकल उन लोगों की संख्या बढ़ती ही चली जा रही है जो नकारात्मक भावों के साथ पैदा हुए हैं, दूसरों को दुःख और तनाव देकर भी अपनी मनमर्जी करने पर तुले हुए हैं।

और तो और ऎसे इंसानों की तरह दूसरे भी खूब सारे हैं जो किसी न किसी मुकाम पर एक मंच पर आ कर ऎसा संगठित गिरोह बना लिया करते हैं कि जैसा आपराधिक दुनिया में भी देखने को नहीं मिलता।

इन तमाम प्रकार की स्थितियों का आध्यात्मिक दृष्टि से विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट सामने आएगा कि हमारी जानकारी में आए बगैर जो कुछ भी हमारे साथ होता है, जिससे हमारा कोई लेना-देना नहीं होता, वह सब कुछ ईश्वरीय विधान से ही होता है।

इसका मूल उद्देश्य हमारे स्थान मोह, कर्म मोह और व्यक्ति मोह को खत्म करना है, उनके प्रति तीव्र वैराग्य की भावभूमि का सृजन करना होता है।

तभी यह क्रम एक के बाद एक चलता ही रहता है।

एक अनचाही आफत आती है, उसके बाद दूसरी, तीसरी...।

इस प्रकार कोई न कोई वैराग्यकारी कारण सामने बना ही रहता है।

आरंभ में हमें खराब लग सकता है कि आखिर  यह सब क्यों हो रहा है, लेकिन धैर्य, गांभीर्य और शालीनता के साथ द्रष्टा भाव से सब कुछ देखते रहें तो सारा माजरा आसानी से समझ में आ सकता है।

स्थान, प्रवृत्ति और व्यक्तियों से संबंधों का टूटना इसी बात का संकेत है।

और यह सब कुछ होता है अपने कल्याण के लिए।

क्योंकि पुराने, अवधिपार और निन्दास्पद लोगों तथा खराब स्थलों के प्रति तनिक भी मोह का भाव रह जाने पर अगली यात्रा निरापद, सुखद और सुकूनदायी नहीं हो सकती।

नियति इसीलिए हमारे भले के लिए जब भी परिवर्तन लाती है तब अपने आप पुराने सेतुओं को कोई न कोई बहाना तलाश कर नष्ट-भ्रष्ट कर डालती है और चरम वैराग्य देकर अपने लिए हितकारी नवीन संपर्कों, स्थलों और प्रवृत्तियों का सृजन करती है, सेतु स्थापित कराती है और जीवन के आनंद को बहुगुणित करती है।

इस दृष्टि से चाहे-अनचाहे कहीं भी मोहभंग जैसी स्थितियां सामने आएं, उन्हें द्रष्टा बनकर सहर्ष स्वीकार करें और यह तय मानकर चलें कि यह सब कुछ हमारे भाग्योदय का संकेत है।

जब इंसान का भाग्य जगता है तब दुष्ट बुद्धियों, धंधेबाजों, नाकारा और यथास्थितिवादी लोगों, मलीन स्थलों और नैराश्यभरी प्रवृत्तियों से दूर कर देता है कि ताकि भावी स्वस्थ माहौल और स्वच्छ आबोहवा में पल्लवन-पुष्पन और यश प्राप्ति के अवसरों का चरमोत्कर्ष प्राप्त होता रहे।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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