विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

व्यंग्य - भरे पेट का चिंतन खाली पेट का चिंतन

image

सुदर्शन कुमार सोनी

देश में इस समय दो तरह के चिंतन चल रहे हैं। वैसे इस समय कार्यकर्ता कम है चिंतक ज्यादा है , चिंतन इतना ज्यादा हो रहा है कि अब इसका भी विश्लेषण होने लगा है। रोज भरा पेट चिंतन करता है तो रोज खाली पेट का चिंतन भी सामने आता है इसे गुहार भी कह सकते हैं ! भरा पेट प्रहार करता है खाली पेट गुहार करता है।

भरे पेट का चिंतन कहता है कि हम देश के कोने कोने में इंटरनेट का जाल बिछा देंगे औने पौने दामों में यह सबको मिलेगा। खेत में , छात्र के बस्ते में सस्ते में , गृहिणी के चौके में , चाय की दुकान में सब जगह अंतरजाल की कनेक्टीविटी रहेगी लोग चलते फिरते उठते बैठते , पढ़ते , खाना बनाते जंमी पर , आसमां पर बर्फ पर नेट सर्फ कर सकेंगे।

खाली पेट का चिंतन कहता है कि देश के कोने कोने की बात बाद में करो पहले हमारे पेट के अधिकांश कोनों को भरने की बात करो जो कि भूख के कारण खाली पड़े रहते हैं !

भरे पेट का चिंतन कहता है कि सूचना का अधिकार लाने से क्रांति आ गयी है। लोगों के चेहरों में अधिकारों की कांति आ गयी है ? आज आदमी भूखा पेट रह लेगा अब असली भूख सूचना है जानकारी है ! सूचनाओं का प्रवाह उसकी भूख खत्म कर देगा वह इससे ताकतवर बन जायेगा ! बताओ आरटीआई ने ताकतवर बनाया कि नहीं ? सूचना मांगने के चक्कर में अपनी पेट की भूख भूल गये है लोग।

खाली पेट का चिंतन कहता है कि सूचना वूचना के अधिकार से उसका कुछ भला नहीं हुआ है ! यह सूचना का अधिकार उसे चूना लगाने के अधिकार से ज्यादा नहीं है ! बल्कि उसके नाम से रोटी कमाने वाले कुछ और लोगों की जमात खड़ी हो गयी है सही कहा जाये कि ये उसकी रोटी का बडा़ टुकडा़ तोड़ ले जा रहे है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। पहले से ही उसके नाम से न जाने कितनी जमाते अपनी रोजी रोटी कमा रही है बल्कि अब तो मंहगी दाल सब्जी भी कमा रही है ! उसको इससे कोई नफा नहीं होने वाला है हां वह जरूर धीरे धीरे सफा हो जायेगा ?

भरे पेट का चिंतन कहता है कि महंगाई बढ़ी है तो पगार व मजदूरी भी बढ़ी है , तो एैसी कोई मजबूरी नहीं है जैसा कि अखबार वाले चैनल वाले उठाते रहते है इनका तो काम ही है किसी मुददे को उठाकर किसी को गिरा देना !

खाली पेट का चिंतन कहता है कि जीना दूभर है महंगाई डायन सब खाय जाऊत है। बहुत कुछ आऊत है लेकिन यह सब जाउत कर देत है ! सरकार से तो निवेदन है कि पेट पर पत्थर बांधने की एक और योजना चला दे तो हमारी जीवन रूपी नैया मैया पार लग जाये।

भरे पेट का चिंतन हर तरफ नजर दौडा़ता है सबकी खैर खबर लेता है चाहे शराब या खाली पेट वाले की दारू ही क्यों न हो। हां अभी बारू का चिंतन भी भरे पेट का ही एक चिंतन है जो कि किताब के रूप में सामने आया है ? अक्सर भरे पेट का चिंतन किताब के रूप में सामने आता है और उस समय सामने आता है जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत रहती है ? जरूरत सबसे ज्यादा उसी समय रहती है जब यह कोई विवाद को हवा दे सके ! भरे पेट का चिंतन कहता है कि नशाखोरी जरूरी है इससे राजस्व बढ़ता है , इसी राजस्व से पुल पुलिया बांध बनते है ठेकेदार पलते है , राजनीति फलती फूलती है जिनका जी जलता है तो जलता रहे।

शराब पीकर मर जाने वालों के बारे में भरे पेट का चिंतन कहता है जब सरकार ने उनकी लगातार प्राईवेसी में पीने की बांग की मांग को ध्यान रखकर अहाता खोल दिया है। तो यह सुरक्षित अहाते को छोड़ कर जाते क्यों है ,यहां वहां अब सारे जंहा से बिकने वाली शराब पर हमारा कौन वश है यह बात अलग है कि ये बेचने वाले भी क्षेत्र के दारोगा व कलाल की पुलिस के वश में रहते है ? लेकिन भई बहुत गंदी गंदी बात है कि ये अहाते को छोड़ कर जाते है , अहाता तो पियक्कड़ो का सुकून रूपी छाता है और चूंकि पियक्कड़ों का अन्न दारू ही है तो अहाता इनका अन्न दाता है। खूब पियो दालमोट के साथ और लोट लोट के जिंदगी जियो !

खाली पेट का चिंतन कहता है कि दारू , ये दारू भले ही हमें बड़ी अच्छी लगती हो कई समाजों की संस्कृति से जुड़ी है लेकिन इसमें घुस गये बाजारवाद ने ठेकावाद ने हमारे आबाद घरों को बरबाद कर दिया है। राजस्व से क्या होगा जब घर परिवार ही बरबाद हो रहे हैं। इसके कारण बेटा बाप का , बाप बेटे का कत्ल कर रहा है। बाप बेटी का बलात्कार कर रहा है ! मनुष्यता चीत्कार कर रही है।

भरे पेट का चिंतन कहता है शहर के तालाब तलैया पूर दो ! पार्क छोटे कर दो ! ये ज्यादा जगह घेर रहे हैं, ये रियल इस्टेट के शेर तालाब पार्क को ढेर करना अपनी जीत मानते हैं 

खाली पेट का चिंतन कहता है कि तालाब तलैया हमारे है फलैया। यहां हम करते हैं सिंघाड़े की खेती , पकडते मझली निस्तार जरूरतें भी यहीं से पूरी होती है जिससे हमारी जीविका चलती है कुंओ ट्यूब वेल में ये पानी पंहुचाते हैं। और भरे पेट वालों की जान मचलती है इन्हें सदियों से जीवित देखकर अभी तक क्यों नहीं ये पूरे गये उन्हें लगता कि वे अधूरे है जब तक ये नहीं पूर दिये जाते ? . 

खाली पेट वाला चिंतन कहता है कि पानी कहां से लाओगे कुंआ बावड़ी सब सूख जायेंगे ? भरे पेट वाले कहते हैं अरे नासमझ हम तो हरे हो जायेंगे तो इस हरियाली का कुछ लाभ तुम्हें भी दे देंगे ! रही पानी की बात तो वह सौ दौ सौ किलोमीटर दूर से नर्मदा गंगा से ले आयेंगे उससे नया प्रोजेक्ट भी तो खडा़ होगा और तुम्हारे जैसे कई नंगों को भी तो काम मिल जायेगा ? आम के आम और गुठली के दाम यदि तुमने यह पहले समझ लिया होता तो आज खाली पेट वाले कौन रहते ?

भरे व खाली पेट का चिंतन हर विषय पर चलता रहता है इसमें जीत तो अभी तक भरे पेट के चिंतन की ही होती रही है। गंगू तो उस दिन की बाट जोह रहा है जब खाली पेट वाले चिंतन की जीत होकर वह खली की तरह महाबली बनेगा !

 

सुदर्शन कुमार सोनी

भोपाल , 462016

9425638352

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget