गुरुवार, 21 मई 2015

सपनों से भरी एक जिंदगी का भयावह अंत

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अंकिता भार्गव

 

आखिर अरूणा शानबाग चली गईं। इसके साथ ही 42 साल से चली आ रही उनकी नारकीय यातना का भी अंत हो गया। अपने जीवन में उस स्त्री जो कुछ भोगा उसके बारे में सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अरूणा अपने पीछे कुछ सवाल, कुछ बहस के मुद्दे छोड़ गई हैं। अरूणा के समान हालातों में जी रहे किसी व्यक्ति को मर्सी किलिंग का अधिकार मिले अथवा नहीं इससे ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा तो समाज के समक्ष नारी सुरक्षा का है। जिस देश में स्त्री शक्ति को देवी का दर्जा प्राप्त है वही देश कभी अरूणा शानबाग तो कभी निर्भया जैसी बेटियों की बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर है।

अरूणा शानबाग हो या फिर निर्भया ये तो वो चंद मामले हैं जो मीडिया द्वारा या किसी अन्य वजह से उजागर हो गए हैं अन्यथा जाने हर रोज, हर पल कितनी ही महिलाएं और लड़कियां उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं इसका हिसाब किसी के पास नहीं है। जब भी ऐसी कोई वारदात होती हैं तो नारी सुरक्षा को लेकर बातें तो बहुत की जाती हैं बहस भी होती है किन्तु बात इससे आगे बढ ही नहीं पाती। मामला धीरे धीरे ठंडा पड़ जाता है और लोगों की कमजोर याददाश्त से निकल जाता है। प्रश्न यह है कि जिस देश में कन्या देवी का स्वरूप है क्या वह अपने भीतर कभी इतना संवेदनशील समाज विकसित कर पाएगा कि उसमें रहने वाली महिलाएं स्वयं को सुरक्षित महसूस कर सकें।

अंकिता भार्गव

संगरिया हनुमानगढ

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