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नाटक - जितने लब उतने अफ़साने

 

राजी सेठ की कहानी

''ग़मे हयात ने मारा''

से अनुप्रेरित

लेखक - अखतर अली

सम्पर्क - निकट स्टार कूलर

गुऱूद्वारा रोड़

कुकुर बेड़ा

आमानाका

रायपुर (छत्तीसगढ़) 492001

मोबाईल नम्बर : +919826126781

सप्रेम भेंट , इस आशा एवं विश्वास के साथ कि इसे आपके द्वारा अथवा आप के मित्र नाटय दल द्वारा इसे मंच तक पहुंचाया जायेगा ।

(भव्य कमरा । पुरुष ड़्रि्ंक बना रहा है और महिला पलंग पर अधलेटी हुई।मंच

कई हिस्सों में बटा रहेगा ,पलंग ,सोफा ,टेबल कुर्सी आदि आदि निर्देशक की कल्पनानुसार पात्र मंच के हिस्सों का इस्तेमाल करेंगे )

 

पुरुष : एक पेग लेने का शौक करो तो न जगह पर ग्लास मिलता है न बर्फ । ओय मैडम मैं आप से कुछ कह रहा हूं ।

महिला -- अपनी चीज़ें खुद देख लो न , बनियान से लेकर बर्फ तक सब मैं ही मैनेज करूं क्या ?

पुरुष -- अच्छा तो मैड़म का मूड उखड़ा उखड़ा है ? तभी कहूं कि बदले बदले मेरे सरकार

नज़र आते हैं ।

महिला -- तुम्हारा ये पैग मेरे से दूर रखो , मुझे इसकी स्मेल भी पसंद नहीं है ।

पुरुष -- देख लो हमारी पीड़ा , जिसे तुम सूंघ नहीं सकती उसे हमें पीना पड़ता है ,

और उस पर सितम ये कि तुम समझती हो हम मज़े कर रहे है ।

महिला -- मैं इतनी टेन्स हूं और तुमको मज़ाक सूझ रही है । कभी तो सीरियस हुआ करो ।

पुरुष -- टेंशन को लेकर टेंशन मत पालो । ये तो खुशी की बात है कि तुम टेंशन में हो ,

क्योंकि टेंशन में होना तो आजकल की खूबसूरत औरत की फैशन है , जो टेंशन

में नहीं सोसायटी में उस औरत की कोई इज़्ज़त नहीं , लोग बाग उसे शक की

नज़र से देखते हैं ।

महिला -- हाथ जोड़कर विनती करती हूं मेरे को मेरे हाल पर छोड़ दो और अपने पैग पर

ध्यान दो उसमें बर्फ नहीं है ।

पुरुष -- शुक्रिया , क्या इस मुश्किल घड़ी में मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूं ?

महिला क्या मैं इस मोहब्बत की वजह जान सकती हूं ?

पुरुष -- देखो ड़ियर जब तुम मेरे लिये बर्फ की फिक्र कर सकती हो तो मेरा भी तो कुछ

फ़र्ज़ बनता है तुम्हारी आग को ठंड़ा करने का ।

महिला -- प्लीज़ यार मेरी हेल्प करो ।

पुरुष -- शुक्रिया कि आपने नाचीज़ को इस काबिल समझा कि देश की मशहूर ख्याति प्राप्त

फेमस लेखिका मेरे से सलाह मशविरा कर रही है ।

महिला -- अब तुम न ज्यादा चढाओ नहीं मेरे को । सीरियसली मेरी मदद करो , मेरी

परेशानी ...........

पुरुष -- जानता हूं आपकी परेशानी । आपका नया उपन्यास लिखा कर तैयार है और

आपको प्रकाशक की जरूरत है । समझिये आपका काम हो गया ,कल प्रकाशक

का बल्कि प्रकाशकों का फोन आ जायेगा ।

महिला -- अभी तो उपन्यास लिखाया ही नहीं है ।

पुरुष -- कोई प्रांबलम नहीं , अपन प्रकाशक को बोल देंगे कि देख भाई छापने के साथ साथ उसे लिखवाने का काम भी तुम्हीं को करना होगा , मैड़म आजकल सब हो जाता है आप कहे तो छापने के साथ साथ उसे विमोचन समीक्षा और पुरस्कार का ठेका भी दे दे ?

महिला -- छिः ऐसा घटिया काम नहीं करते हैं हम ।

पुरुष -- तो फिर आप मुझ से क्या हेल्प चाह रही है ?

महिला -- मुझे कोई अच्छा सा प्लॉट चाहिये ।

पुरुष -- कितने बाई कितने का ? अच्छा तो आप कंस्ट्र्क्शन लाईन में हाथ आज़माना चाहती है , ये इंवेस्ट करने का सही टाईम है , इस वक्त प्रापर्टी सेक्टर में

काफ़ी बूम है ।

महिला -- हे भगवान ये कैसा आदमी है ? एकदम हड़बड़ सिंग ।

पुरुष -- क्यों भई , ये पति पत्नी के बीच वो क्यों ?

महिला -- वो कौन ?

पुरुष -- भगवान !

महिला -- चुप । प्रभु के संबंध में ऐसा नहीं कहते ।

पुरुष -- ठीक है मैड़म , करा दीजिये चुप लेकिन हम शांति से पैग ही खत्म नहीं करते रहेंगे बल्कि एक एक चुस्की के साथ आपके लिये मौके की जगह पर प्लॉट

ढूंढेंगे , हम अभी दलालों को फोन लगाते हैं , लेकिन पहले पैग बना लेता हूँ

ये तो खत्म ही हो गया । यार पैग अगर तुम जल्दी जल्दी खाली न हो तो

दुनियॉ में तुम से अच्छा कोई और हो ही नहीं सकता ।

महिला -- रोज़ तो बस एक पैग लेते हो न फिर आज दूसरा कैसे बना रहे हो ? तुम्हें सेकेंड़ की परमिशन दी किसने मिस्टर ?

पुरुष -- यार अब इतने भी ज़ालिम तो मत बनो , दो घूंट अंदर जायेगी तो आईड़ियाज़ बाहर निकलेंगे , और सब आईड़िये तुम्हारे ही काम आने है । बस ये एक लिटिल पैग ।

महिला -- लगता है अब तुम मेरे से प्रेम नहीं करते ?

पुरुष -- ऐसा है पार्टनर सिर्फ इल्ज़ाम लगाने से बात नहीं बनेगी ,इस गंभीर आरोप को साबित भी करना पड़ेगा । ये कोई बात हुई कि जो मैं सोच भी नहीं सकता वो तुम बोल दिये । चलो फटाफट साबित करो कि मैं तुम से प्रेम नहीं करता ।

महिला -- अगर मेरे से प्रेम करते तो मेरे रहते किसी और नशे की ज़रूरत नहीं पड़ती ।

पुरुष -- बाते बनाना कोई तुम औरतों से सीखे । पहले तुम्हारे लिये कोई मौके का प्लाट जुगाड़ किया जाये ।

महिला -- एक मिनट एक मिनट , मुझे जो प्लाट चाहिये वह ज़मीन वाला प्लॉट नहीं है ।

पुरुष -- मतलब ?

महिला -- दो महीने बाद कहानी प्रतियोगिता होने वाली है और मुझे उसके लिये एक नई कहानी लिखना है , लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी कहानी लिखने के लिये कोई अच्छा सा प्लॉट नहीं मिल रहा है।

पुरुष -- अच्छा अच्छा तो तुमको वो वाला नहीं ये वाला प्लॉट चाहिये ।

महिला -- कल्पना का ऐसा प्लॉट जिस पर कहानी की ईमारत खड़ी की जा सके । ऐसी ईमारत जिसमें रिश्तों के रौशनदान हो , मोहब्बत की खिड़कियां हो ,त्याग की छत और शिक्षा और ज्ञान का मुख्य द्वार हो ।

पुरुष -- हूँ , यानि नक्शा तैयार है बस अच्छी सी ज़मीन मिल जाये ,ईमारत तनते देर नहीं लगेगी । ऐसा है माई ड़ियर वाईफ़ , आप पिछले कई सालों से लगातार लिख रही है और बहुत बेहतर लिख रही है । लगभग हर बड़ी पत्रिका में रिसालों में आप की चीज़ें छप चुकी है , आप की कलम को लोगों ने बहुत ईज़्ज़त दी है ।

महिला -- शुक्रिया शुक्रिया ........लेकिन इस बार -----

पुरुष -- इस बार भी वही होगा जो हर बार हुआ है ।

महिला -- लेकिन कैसे ?

पुरुष -- तुम्हारी कलम के कमाल से ।

महिला -- पर कहानी ----- ।

पुरुष -- कहानी ......... कहानी होती क्या है ?

महिला -- कोई झूठा किस्सा होता है जिसमें और बहुत सारे झूठ मिला कर उसे सच की शक्ल देने की कोशिश की जाती है । जिसके अंत में कोई मैसेज देने का रिवाज है ।

पुरुष -- किसी भी कहानी में पूरा का पूरा झूठ नहीं होता और पूरा का पूरा सच भी नहीं होता । साहित्य की लैब में थोड़ा सच और उसमें थोड़ा सा झूठ मिला कर एक घोल तैयार किया जाता है , इसी घोल से सादे कागज़ पर ईबारत रची जाती है जिसे कविता कहानी गीत ग़ज़ल कहते हैं ।

महिला -- अरे वाह मेरे मियॉ ,आखिर आपने आज तक कोई बुक क्यों नहीं लिखी ?

पुरुष -- वो तो ऐसा है जानूं कि हम पास बुक और चैक बुक के चक्रव्यूह में ऐसे फंसे कि फिर और कोई बुक का ध्यान ही नहीं आया ।

महिला -- वैसे आप मेरी मदद करने वाले थे , मुझे नई कहानी लिखने के लिये प्लॉट दे रहे थे ।

पुरुष -- मैं तुम को एक सत्य घटना सुनाता हूँ । मुझे पूरा यकीन है उस घटना को तुम कथा के धागे में इतने सलीके से पिरोओगी कि वह एक चर्चित कहानी बनेगी ,ज़रूर लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचेगी । क्योंकि इस कहानी में सस्पेंस है, कॉमेड़ी है ,रोमांस है ,रिश्ते निभाने का नया अंदाज़ है... कुल मिलाकर मैड़म ये सुपरहिट है ।

महिला -- बस मुझे ऐसे ही किसी प्लॉट की ज़रूरत है ,ताकि अपने आलोचकों का मुंह बंद कर सकूं ,ये ज़ालिम लोग इतनी कड़ी टिप्पणी कर देते हैं कि जान जल जाती है ।

पुरुष -- आलोचना कभी कोमल नहीं होती । याद रखना बेशरमी के लिबास में अस्तर और आलोचना की दीवार में पलस्तर नहीं होता ।

महिला -- प्लीज़ अब जल्दी से वो घटना सुना दो ।

पुरुष -- एक मिनट मैं ज़रा -----

महिला -- पैग बनाना है , लाओ मैं बना देती हूँ ,पानी के साथ लोगे या सोड़ा मिलाउं ?

पुरुष -- ओय ओय वाह रे तेरा अंदाज़ मस्ताना । अगर तुम इतनी मोहब्बत लुटाओ तो मैं तो आफिस जाना छोड़ यही तुम्हारे पास रह जाउं ।

महिला -- जी नहीं हुज़ूर , मेरे को चौबीस घंटे वाले पति की कतई ज़रूरत नहीं है । मैं चाहती हूं तुम मेरे लम्हों के पति और सदियों के दोस्त बन कर रहो ।

पुरुष -- वाह , बात कहने का खूबसूरत अंदाज़ है आपके पास । सच , अल्फाज़ों का इस्तेमाल तो आप लेखकों और शायरों के पास ही होता है । कुछ देर आप लोगों से गपिया लो तो कसम से दिन भर की थकान उतर जाती है ।

महिला -- अभी मैं ये सब सुनने के मूड में नहीं हूँ , मेरे को आप कुछ सुनाने वाले थे , उसे

सुनाईये ।

पुरुष -- ये एक सत्य घटना है ।

महिला -- एक मिनट , मैं ज़रा ढंग से बैठ जाउं । अगर सुनाना एक कला है तो सुनना भी किसी आर्ट से कम नहीं । फिर सुनाने वाले को सुनाने का मज़ा तभी है जब सुनने वाला मन से सुने , कान से नहीं ।

पुरुष -- तुम जिस अंदाज़ में सुनना चाहती हो क्या मैं उतने सलीके से सुना पाउंगा ?

महिला -- मैं जानती हूँ , होशियार के लिये बोलना उतना ही मुश्किल है जितना मूर्ख के लिये आसान । लेकिन तुम अपने अंदाज़ में बोलो मैं अपने अंदाज़ में सुन लूंगी ।

यानि न चित तेरा न पट मेरा ।

पुरुष -- मैं जो सुनांउगा उसे सिर्फ सुनना । बीच में सवाल मत खड़ा करना कि अगर वो तुम्हारी बुआ थी तो मेरे को क्यों नहीं मालूम , अगर वो तुम्हारे पापा थे तो मेरे को अब तक क्यों नहीं बताया गया । अगर बोलने वाले पर शंका हो तो उसे न सुनना ही अच्छा है ।

महिला -- श्रीमान , महोदय ,आदरणीय , अब आप बोलना शुरू भी करेंगे ?

पुरुष -- ये मेरे गांव की कहानी है । वैसे हर गांव की एक कहानी होती है , हर कहानी का एक गांव होता है । हर कहानी की एक शुरूआत होती है , हर कहानी का एक अंत होता है , लेकिन हर कहानी का अंत एक सा नहीं होता । हर कहानी शुरू से आरंभ नहीं होती । कुछ कहानी खत्म होने के बाद शुरू होती है तो कुछ कहानी बीच में ही खत्म हो जाती है ।

महिला -- ये किस गांव की कहानी है ? उस गांव का नाम क्या है , वहां कौन रहता था ?

पुरुष -- गांव सिर्फ गांव होता है , उसको कोई भी नाम दिया जा सकता है । गांव इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितनी महत्व पूर्ण वह घटना है जो उस गांव में घटी और फिर उस गांव का आस पास के ईलाके में नाम हो गया ।

महिला -- मैंने सुना है गांव की सुबह बहुत खूबसूरत होती है ?

पुरुष -- सिर्फ गांव की ही नहीं , हर सुबह खूबसूरत होती है , शर्त ये हैं कि आपके अंदर भी खूबसूरती होनी चाहिये । आंखों में नफरत होगी तो कश्मीर सुंदर नज़र नहीं आने का। दिल में क्रोध लिये शिमला नहीं घूमा जा सकता ।

महिला -- मेरे ख्याल से तुम्हारी कहानी में नरेशन कुछ ज़्यादा ही हो रहा है । क्यों न अपन मुख्य घटना पर आ जाये ?

पुरुष -- बिलकुल ठीक कहा तुमने । हां तो मैं क्या कह रहा था ?

महिला -- तुम कह रहे थे कि एक गांव था ।

पुरुष -- हां , उस गांव में सैकड़ों नफरत करने वाले लोग रहते थे , और उन सैकड़ों लोगों के बीच में रहते थे दो प्रेम करने वाले ।

महिला -- वाव , सैकड़ों नफरत करने वालों के बीच में दो प्यार करने वाले । यानि गहरे अंधकार में उम्मीद की किरण । वाह कहानी का क्या केनवास है । सैकड़ों की भीड़ में तनो तन्हा प्रेमी । मैं और इंतेज़ार नहीं कर सकती । मेरे को पहले संक्षेप में कहानी सुना दो , फिर बाद में उसको फैलाते रहना ।

पुरुष -- अभी तो कहानी शुरू नहीं हुई और तुम इतनी एक्साईट हो गई , जब इसका अंत सुनोगी तो न जाने क्या होगा ?

महिला -- अब आप और ज्यादा संस्पेंस मत पैदा करिये और पहले मेरे को संक्षेप में कहानी सुनाईये ।

पुरुष -- संक्षेप में ..... यानि आपको पहले कहानी का नैनो संस्करण चाहिये । उसको हम कुछ इस तरह बयान कर सकते हैं -

एक गांव था जहां दो प्यार करने वाले रहते थे । एक लड़का और एक लड़की ।

लड़की का नाम था खामोशी ।

लड़के का नाम था चुप ।

गांव का मुखिया था शोर ।

बस यही है उस गांव की कहानी ।

महिला -- कहानी का अंत ?

पुरुष -- बताने की ज़रूरत है क्या ? सब कुछ बता दो तो बताने का मज़ा खत्म हो जाता है ।

महिला -- अच्छा तो ये एक प्रेम कथा है ?

पुरुष -- किस्सा हो या हकीकत , प्रेम के बिना कुछ भी कम्पलीट नहीं हो सकता ।

महिला -- ये प्रेम भी अजीब है । सदियों सदियों से चला होता आ रहा है लेकिन अभी तक मान्यता प्राप्त नहीं कर सका । ये प्रेम की नाकामयाबी है ।

पुरुष -- नहीं, समाज की असफलता है । दरअसल समाज का दरवाजा छोटा है और प्रेम का कद बड़ा , सारी तकलीफ़ की जड़ इस साईज़ के फर्क में है । समाज अपना दरवाज़ा बड़ा नहीं करना चाहता और प्रेम झुकने को तैयार नहीं । वहां भी यही हुआ था ।

महिला -- कहा ?

पुरुष -- जहां की ये कहानी है।

महिला -- क्या हुआ था वहां ?

पुरुष -- टकराहट ।

महिला -- कैसी ?

पुरुष -- भयंकर ।

महिला -- किस में ?

पुरुष -- समाज और प्रेम में ।

महिला -- ये किस गांव की कहानी है ?

पुरुष -- हर गांव की कहानी है । हर समाज की कहानी है । हर प्रेम की कहानी है ।

महिला -- प्रेम की बात हो रही है या जंग की ?

पुरुष -- प्रेम जंग ही है ।

महिला -- कैसी जंग ?

पुरुष -- जिसमें दोनों पक्ष हारते हैं ।

महिला -- आपकी कहानी बड़ी रोचक मालूम होती है ।

पुरुष -- रोचक होना कहानी की पहली शर्त है, खास कर वो कहानी जिसके अंत से सैकड़ों कहानियों का जन्म होता है । कहानी के गर्भ से कहानी निकलती है । हर पुरानी कहानी नई कहानी की मां होती है । नई कहानी पुरानी कहानी की उुंगली पकड़ कर ही चला करती है ।

महिला -- क्या कहा आपने .................. वो कहानी जिसके अंत से सैकड़ों कहानियों का जन्म होती है ? ऐसा कैसा अंत है आपकी कहानी का ?

पुरुष -- ऐसी भी क्या बेसब्री ? अभी तो कहानी शुरू भी नहीं हुई है ।

महिला -- आप अंत बता दीजिये ,बाकी पूरी कहानी मैं लिख लूंगी ।

पूरूष मेरे को आपकी कलम पर पूरा यकीन है कि आपकी लिखी हुई कहानी मेरी बोली हुई कहानी से ज्यादा बेहतर होगी ।

महिला -- तो बताईये अंत ।

पुरुष -- हरगिज़ नहीं ।

महिला -- क्यो ?

पुरुष -- मेरी मर्ज़ी । कहानी मेरी है ।

महिला -- कहानी जितनी बोलने वाले की होती है उतनी ही सुनने वाले की भी होती है ।

पुरुष -- बिलकुल सही कहा , लेकिन कोई भी कहानी सुनने वाले की उतनी ही होती है जितनी बोलने वाले ने बोली है ।

महिला -- शायद आप को जानकारी नहीं है कि हम वह भी पढ़ते हैं जो लिखा ही नहीं गया और वह भी सुनते हैं जिसे अभी बोला जाना बाकी है ।

पुरुष -- तो फिर मेरी क्या ज़रूरत ? आप तो वह सब कुछ सुन सकती है जिसे अभी बोला जाना बाकी है ।

महिला -- अच्छा बाबा आप जीते मैं हारी । आप अपनी कहानी अपने तरीके से ही सुनाईये ।

पुरुष -- ये एक प्रेम कथा है ।

महिला -- प्रेम ............. कितना मीठा अल्फ़ाज़ है ।

पुरुष -- कितना गहरा अर्थ है ।

महिला -- कितना चमकीलापन है इसमें ।

पुरुष -- कितना रंगीलापन है इसमें ।

महिला -- मैंने प्रेम लिखा और कविता महकने लगी ।

पुरुष -- प्रेम वह शक्कर है जिससे जीवन नमकीन हो जाता है ।

महिला -- प्रेम के कुछ नियम होते हैं ।

पुरुष -- और सच्चा प्रेम सारे नियमों को तोड़ के किया जाता है ।

महिला -- ये कैसी प्रेम कथा है ?

पुरुष -- जैसी हर प्रेम कथा होती है । इसमें भी प्रेम करने वाले दो है और प्रेम से नफरत करने वाले सैकड़ों । अभी तो सिर्फ आंखें मिली थी , इज़हार भी नहीं हुआ था और लोगों ने किस्से सुनाना चालू कर दिये । जो हुआ वो तो कहा गया लेकिन जो नहीं हुआ उसे भी लोगों ने हुआ मान लिया । हर गली , हर चौराहे ,हर नुक्कड़ पर इन्ही की कहानियॉ हुआ करती थी । जहां भी चार औरतें मिलती बस यही कहती ..................... ।

( प्रकाश परिवर्तित )

महिला -- सुना है छोरी के पर निकल आये हैं । देखना खानदान की नाक कटा कर रहेगी । अरे मैंने तो उसकी ऐसी ऐसी बातें सुनी हूं कि सुनोगे तो पैर के नीचे से ज़मीन खिसक जायेगी । लेकिन एक बात तो मानना पड़ेगा लड़की ने छोकरा मालदार फंसाया है । मेरा आदमी तो कह रहा था ......................... ।

पुरुष -- चरकट है चरकट । वैश्या कही की । अपनी लड़की को संभाल , कही उसकी संगत में रह कर वह भी न बिगड़ जाये । लड़की तो खैर जैसी है , लेकिन उस लौन्ड़े के अकल तो देखो , करोड़पति बाप का बेटा कहा जाकर फंसा है ।

महिला -- चलो मान लिया लड़की नादान है लेकिन उसके मां बाप को भी नहीं समझता है क्या ? वो ऐसे कैसे आंख पर पटटी बांध कर बैठ सकते हैं ? अरे बैठेंगे क्यों नहीं , आखिर लड़की सोने का अंड़ा देने वाली मुर्गी फांस कर ला रही है तो उनको ये बना बनाया खेल बिगाड़ना थोड़ी है । मेरे को तो लगता है उसके बाप ने ही सारा प्लान बनाया होगा , लालची नम्बर वन है बुडढा ।

पुरुष -- ऐसे बिगड़ैलों को तो कोड़े मारने चाहिये , मुंह काला कर के पूरी बस्ती में घुमाना चाहिये , हुक्का पानी बंद कर देना चाहिये ।

( सामान्य प्रकाश )

महिला -- प्रेम की सूचना अफवाह की तरह फैलती है । जिसे देखो वही एक कहानी सुनाने लगता है । प्रेम करने वालों की बस्ती में जितने लब उतने अफ़साने सुनाई देते हैं । प्रेमवृक्ष की हर पत्ती पर एक कहानी लिखी होती है ।

पुरुष -- लेकिन प्रेम की कहानी लगभग हर बार एक जैसी होती है ।

महिला -- कैसे ?

पुरुष -- जैसे प्रेम कभी समान के बीच में नहीं होता । एक अमीर होगा तो दूसरा गरीब ,

एक पढ़ा लिखा होगा तो दूसरा अनपढ़ , एक सम्मानित परिवार का होगा तो दूसरा गुमनाम घर का , एक इस जाति का होगा तो दूसरा उस जाति का ।

महिला -- जानते हो ऐसा क्यों होता है ?

पुरुष -- क्यों ?

महिला -- क्योंकि प्रेम सोच समझ कर प्लानिंग के साथ नहीं किया जाता । अरे भई ये प्रेम है व्यापार नहीं कि ठोक बजा के किया जाये । ये तो बस हो जाता है , और करने वालों को भी तभी मालूम पड़ता है जब वो हो चुका होता है ।

पुरुष -- मेरी वाली कहानी भी ऐसी ही है ।

महिला -- हर प्रेम कहानी ऐसी ही होती है ।

पुरुष -- कैसी ?

महिला -- यही कि दो मोहब्बत करने वालों के पीछे सैकड़ों नफरत करने वाले पड़े रहते हैं ।

पुरुष -- लेकिन उन दो को उन सैकड़ों का कोई ड़र नहीं कोई खौफ़ नहीं होता ।

महिला -- ये प्यार करने वाले किसी से ड़रते क्यों नहीं ?

पुरुष -- जब कोई किसी से प्यार करता है तब उसमें अतिरिक्त बल आ जाता है , एक्स्ट्रृा ऐनेरजी । उसकी ताकत हज़ार गुना बढ़ जाती है ।

महिला -- उन्हें इस बात का होश ही नहीं रहता कि उनके बारे में कौन क्या बोल रहा है ।

पुरुष -- उस गांव में भी प्यार के दुश्मन हज़ार थे ? लेकिन दुनियॉ से बेखबर वो अपनी दुनियॉ में रहते थे , और अक्सर एक दूसरे से कहा करते थे .......

( प्रकाश परिवर्तित )

महिला -- मैंने सोचा भी नहीं था कि मैं कभी किसी के इतने भी करीब आ जाउंगी ।

पुरुष -- मेरे को तो इतने करीब आ जाने के बाद भी यकीन नहीं होता है कि मैं इतना खुशकिस्मत हूँ ।

महिला -- ये पहाड़ ये नदी और तुम्हारा साथ ज़िन्दगी को हसीन बना दिये हैं ।

पुरुष -- तुमको तैरना आता है ?

महिला -- नहीं सिर्फ डूबना आता है ।

पुरुष -- मेरे को भी तैरना नहीं आता । अपन तैरना सीखें ?

महिला -- उससे क्या होगा ?

पुरुष -- मैं तुम्हारे साथ तैरना चाहता हूँ ।

महिला -- लेकिन मैं तो तुम्हारे साथ डूब जाना चाहती हूँ ।

पुरुष -- तुम्हें डूबने का बहुत शौक है ।

महिला -- पहले नहीं था ।

पुरुष कब हुआ ?

महिला -- जब से तुम्हारी आंखों का समंदर देखी , उसकी गहराई देखी तो लगा बस डूब ही जाउं । अब मुझे साहिल पसंद ही नहीं ।

पुरुष -- तुम न मिलो तो मैं रोज़दार होता हूँ , तुम दिख जाओ तो आंखों की ईद होती है ।

तुम्हारे साथ बिताये गये लम्हे ज़िंदगी के सबसे हसीन लम्हे बन जाते हैं । दिन भर तुम्हारे बारे में तो सोचता ही हूँ , पर जब रात को सोता हूँ तो ख्वाब में भी तुम्हीं को ही देखता हूँ ।

महिला -- आप तो सो भी जाते हो , लेकिन यहां तो आप के ख्यालों में ही रात गुज़र जाती है ।

पुरुष -- तुमसे मिलने से पहले ये दुनियॉ ज़मीन लगती थी , तुमसे मिलने के बाद ये दुनियॉ जन्नत लगती है ।

महिला -- हमारे ख्वाब पूरे होंगे न ?

पुरुष -- ख्वाब कभी खुद से पूरे नहीं होते , उन्हें पूरा करना होता है ।

महिला -- कैसे ?

पुरुष -- प्यार की राह में चार कदम बढ़ा कर ।

महिला -- कदम तो बढ़ चुका है ।

पुरुष -- बढ़े कदम पीछे नहीं करना ।

महिला -- सवाल ही नहीं उठता ।

पुरुष -- वादा ?

महिला -- पक्का वादा ।

पुरुष -- साथ जियेंगे ।

महिला -- साथ मरेंगे ।

( सामान्य प्रकाश )

पुरुष -- यार तुमने कसम खा लिया है क्या कि घर में बर्फ रहेगा ही नहीं ।

बर्फ ही नहीं मिल रहा है तो नमकीन की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती ।

महिला -- अब ये पीना खाना बंद करो । क्यों अपनी जान के दुश्मन खुद बन रहे हो ।

पुरुष -- अब भई , अगर दिन भर की थकान और काम की टेंशन के बाद आदमी दो घूंट मार ले तो उसमें ऐसा क्या एतराज़ करना कि सारा नशा ही उतर जाये ।

महिला -- जो गलत है वो बस गलत है । मैं ये मंज़ूर कर ही नहीं सकती कि आप उसमें शामिल रहो जो गलत है ।

पुरुष -- गलत की परिभाषा क्या है ? क्या है इसका मापदंड़ ?

महिला -- वो हर बात गलत है जो मन को गवारा न हो ।

पुरुष -- जो गलत है वो पूरी दुनिया के लिये गलत नहीं है । जो ठीक है वो पूरी दुनिया के लिये ठीक नहीं है । सबके अपने नियम अपने तौर तरीके है । जो इसको पसंद है वो उसके लिये गुनाह है , जो इधर वालों के लिये गुनाह है वो उधर वालों के लिये नैमत है ।

महिला -- बाप रे, पीने से क्या रोका आप तो तिलमिला गये । इतना उपदेश सुना दिये ।

पुरुष -- सुनना ज़रा भी पसंद नहीं है न ? यही तो बात खतरनाक है कि हर आदमी सिर्फ बोलना चाहता है , सुनना नहीं । जिसे देखो वही बोल रहा है । इतना बोला जाना भी ठीक नहीं है । जब कोई आदमी बहुत ज्यादा बोलता है तब वो बोलने के नाम पर सिर्फ बकवास करता है , जैसे उस गांव के लोग बकवास किया करते थे ।

महिला -- उस गांव के लोग - -- - - आप उस प्रेम कहानी की बात कर रहे है ।

पुरुष -- वो प्रेम कथा नहीं है ।

महिला -- प्रेम कथा नहीं है ?

पुरुष -- उससे भी आगे की बात है । जहां कहानियां खत्म हो जाती है ये कहानी वहां से शुरू होती है ।

महिला -- तुम्हारी कहानी में पेंच कुछ ज्यादा ही है ।

पुरुष -- यही तो कहानी कहने की कला है । यूटर्न कहानी की ड़िमांड़ है , घुमाव कहानी में अतिरिक्त रोचकता पैदा करता है ।

महिला -- एक बात तो मानना पड़ेगा कि आप में कहानी सुनाने की गज़ब की टेकनीक है ।

पुरुष -- इसकी भी एक वजह है ।

महिला -- क्या ?

पुरुष -- जो मैं सुना रहा हूं वो मेरी पढ़ी गई कहानी नहीं बल्कि देखी हुई कहानी है , मेरी भोगी हुई कहानी है । मैं भी उस कहानी का एक पात्र हूं । वे दोनों प्रेम करने वाले इस कहानी के दृश्य है और मैं कहानी का नरेशन हूं ।

महिला -- आप कहानी आगे बढ़ाईये , मेरी बैचेनी बढ़ती जा रही है ।

पुरुष -- हां , तो अपन कहा पहुंचे थे ?

महिला -- उन्होंने वादा किया था साथ जीने का साथ मरने का ।

पुरुष -- वो दोनों तो अपने में मस्त थे , अपने भविष्य के सपने संजो रहे थे , लेकिन उनको मालूम नहीं था कि उनके पीछे सैकड़ों लोग षड़यंत्र रच रहे थे । उन्हें बेनकाब करने के लिये पूरी बस्ती उतावली हुई जा रही थी । कोई किसी से नफरत करे तो किसी को कोई परवाह नहीं , लेकिन कोई किसी से मोहब्बत करने लगे तो हर इंसान का पेट दुखने लगता है । अजीब समाज में हम जी रहे है ।

महिला -- जानती हूं पूरी बस्ती उनकी दुश्मन हो गई होगी ।

पुरुष -- बाहर वाले तो बाद में आयेंगे , सबसे बड़ी खिलाफ़त तो उनके घर में हो रही थी ,

लड़की की मां ने उसको साफ साफ कह दिया था -------------

( प्रकाश परिवर्तित )

महिला -- हे भगवान , क्या क्या सुनने को मिल रहा है इस लड़की के बारे में । कलमुंही तू पैदा होते ही क्यों नहीं मर गई , या मैं क्यों नहीं मर गई तेरी जैसी लड़की को जन्म देने के बाद । अरे ज़रा भी तेरे अंदर लाज शर्म हया नहीं है ? घर की इज्जत को उस लड़के की गोद में ड़ाल आई । हरामजादी इश्क कर रही है । तेरी ये हरकत बिलकुल बर्दाश्त नहीं की जायेगी । ज़िंदा गाड़ देंगे तेरे को , टुकड़े करके नदी में बहा देंगे । आखिरी बार तेरे को कह रही हूं उस लड़के से मेलजोल बंद कर दे वरना वरना वरना ------ मैं आत्महत्या कर लूंगी ।

(सामान्य प्रकाश )

पुरुष -- कहने वाले कहते रहे , मरने वाले मरते रहे । मोहब्बत करने वाले कभी किसी की परवाह करते हैं क्या ?

महिला -- अगर इसकी मां ने तो इधर तो उसके बाप ने भी उधर साफ़ साफ़ कह दिया होगा ----

( प्रकाश परिवर्तित )

पुरुष ये क्या सुनने में आ रहा है तुम्हारे बारे में । करोड़पति बाप का बेटा एक भिखारी की लड़की की कमर में हाथ ड़ालकर पहाड़ों की सैर पर निकलता है । शर्म नहीं आई तुम्हें , हमारी इज्ज़त का ज़रा भी ख्याल नहीं किया ? ये सब आगे भी जारी रहा तो याद रखना अपनी जायदाद में से एक पैसा नहीं दूंगा । भूल जाओ उसे ,उसके हाथ में पच्चीस पचास हज़ार रूपये दो और पीछा छुटाओ उससे । सुन रहे हो न क्या बोल रहा हूं मैं ? अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर जो होगा उसे दुनिया याद रखेगी । याद रहे मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं ।

(सामान्य प्रकाश )

महिला -- ड़ियर मेरे को तुम्हारी कहानी में न कोई नयापन नज़र नहीं आ रहा है । इस तरह की बाते तो हर लव स्टोरी में होती है ं। ये तो वही घिसी पिटी फिल्मी स्टोरी है । इसे लिख कर मुझे अपनी थू थू नहीं करानी है ।

पुरूष ऐसा है ड़ियर कि बनते हुए मकान को देखने में और बने हुए मकान को देखने में बहुत फर्क होता है । फिर मैं तुमको एक कहानी नहीं एक वाक्या सुना रहा हूं ,इसको कहानी की शक्ल तो तुम्हें देनी है । अभी हम मंज़िल पर नहीं पहुंचे बीच रास्ते में है ।

महिला -- रास्ता कुछ ज़्यादा लम्बा नहीं हो रहा है ?

पुरुष ये इश्क का रास्ता है दुश्वार तो होगा ही । कांटों के बीच में से ही गुलाब पाया जाता है ।

महिला -- ये तमाम प्यार के किस्से एक जैसे ही क्यों होते हैं ?

पुरुष -- क्योंकि बरसों बरसों से समाज एक जैसा है , और ये समाज के लिये बहुत खतरनाक है ।

महिला -- तो क्या हर पांच साल में समाज का नवीनीकरण होना चाहिये ? समाज न हुआ ड्रायव्हिंग लायसेंस हो गया ।

पुरुष -- समय के साथ सोच तो बदलना ही पड़ता है और कई मामलों में सोच बदलती भी है लेकिन प्रेम के मामले में समाज की सोच नहीं बदली । प्रेम को जितना उंचा मुकाम मिलना चाहिये था उसे उतना ही घटिया दर्जा दिया गया , कभी कभी तो लगता है समाज के नियम इंसानों ने नहीं राक्षसों ने बनाये हैं ।

महिला -- बाप रे इतनी कड़वी टिप्पणी , ऐसा भी क्या हो गया था ।

पुरुष -- जानते हो उनके साथ वहां के लोगों ने क्या किया ?

महिला -- क्या किया ?

पुरुष -- घर घर , नुक्कड़ नुक्कड़ ,गली गली , बैठकें होने लगी । फतवे जारी होने लगे । दो प्यार करने वाले नफ़रत के शिकंजे में कसने लगे । उन्हें पता ही नहीं था कि वो घिरते जा रहे है । वे तो आने वाले खतरे से अनजान थे । जब इंसान प्यार में होता है तब उसे पूरी दुनियां ही प्यारी लगने लगती है ।

महिला -- सही कहा , जिनके मन में प्रेम होता है उसे दुश्मन भी प्यारा लगने लगता है ,वो तो अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता कि उसके बारे में कहा जा रहा है -

पुरुष -- दोनों खुली नंगाई कर रहे है । ये सब नहीं चलेगा गांव में । दोनों पर नज़र रखो । मौका मिलते ही रंगे हाथों पकड़ो सालों को । एक बार रंगे हाथ धर लिये गये तो उनका मुंह काला करके पूरी बस्ती में घुमायेंगे , अंधी चपत करेंगे , उनका मज़ाक बनायेंगे , पत्थर मारेंगे , थूकेंगे उनके चेहरे पर ।

महिला -- ओह माई गॉड़ ........ इतनी भयंकर साजिश , बाप रे समाज का चेहरा इतना ड़रावना भी हो सकता है , फिर क्या हुआ ?

पुरुष -- एक दिन अच्छा मौका बुरे लोगों को मिल गया । दोनों बस्ती से दूर पहाड़ पर अपने में मगन प्रेम में डूबे , एक दूसरे का हाथ थामे टहल रहे थे , तभी उनको कुछ शंका हुई , मन में कुछ खटका सा हुआ , दोनों सहम गये , इधर उधर कुछ तांक झांक कर के देखने की कोशिश की तो देखा कि झाड़ियों और पत्थरों के पीछे से आदमियों का रैला निकल रहा है ,उनके हाथों में ड़ंड़े थे ,पत्थर थे ,वो लोग मारो सालो को जैसे आवाज़ें निकाल कर तेज़ी से उनके तरफ बढ़ रहे थे । उनकी बॉड़ी लैग्वेज संदिग्ध थी । वो दोनों आने वाले खतरे को भाप गये और उपर पहाड़ की तरफ भागने लगे ,भागने लगे ,भागने लगे ........... लेकिन ये क्या आगे अब रास्ता नहीं है , आगे बढ़ो तो नीचे बहुत गहराई है ,जहां नदी का तेज़ बहाव है , वे वहां रूक गये लेकिन भीड़ उनके तरफ बढ़ने लगी , बढ़ने लगी , बढ़ने लगी ............. ।

महिला -- चुप हो जाओ मैं इसके आगे नहीं सुन सकती ं।

पुरुष -- सुनना होगा ।

महिला -- ज़रूरी नहीं है ।

पुरुष -- बेहद ज़रूरी है ।

महिला -- ज़बरदस्ती नहीं सुना सकते ।

पुरुष -- सुनने का साहस नहीं है तो अंत का आरंभ ही क्यों किये । कहानी सूत्रधार के अनुसार चलती है दर्शकों के अनुसार नहीं ।

महिला -- कहानी पूरी सुननी ही पड़े ऐसा कोई कानून नहीं है ।

पुरुष -- लेकिन ऐसी मान्यता तो है ।

महिला -- मान्यताएं बदली जा सकती है ।

पुरुष -- ज़रूरत नहीं है ।

महिला -- लेकिन मांग है । अंत बदला जा सकता है , अच्छी कहानी वही है जिसका अंत सुखद हो ।

पुरुष -- थोपा हुआ अंत नहीं चलेगा। असली कहानी का नकली अंत ? , ऐसा करने से कहानी फ्लाप हो जायेगी ।

महिला -- अक्सर अच्छी कहानियॉ फ्लाप और बकवास स्टोरी सुपर डुपर हो जाती है ,तुम इसका टेंशन मत लो । मेरी तुमसे हाथ जोड़ कर विनती है प्लीज़ मेरे को आगे की दास्तान मत सुनाओ , मैं सुन नहीं सकती ।

पुरुष -- क्यों नहीं सुन सकती ।

महिला -- क्योंकि मैं एक औरत हूँ मर्द नहीं ।

पुरुष -- इस मुकाम पर पहुंचा कर कहानी से मुंह नहीं फेरा जा सकता । आखिर आगे तुम सुनना क्यों नहीं चाहती ?

महिला -- क्योंकि मेरे को मालूम है फिर क्या हुआ होगा ?

पुरुष -- क्या हुआ होगा ?

महिला -- भीड़ वहशी तरीके से उनकी तरफ बढ़ रही होगी , दोनों ने सहमें हुए एक दूसरे को देखा होगा , आंखों ही आंखों में बात हुई होगी , और उस खामोश चर्चा के बाद दोनों सहमत हो गये होगे , एक दूसरे का हाथ पकड़े होगे और ये देख वो भीड़ वो दरिन्दों का झुंड़ सकपका गया होगा , वही रूक गया होगा ,जब दोनों उस पहाड़ से नीचे नदी में कूद पड़े होगे ।

पुरुष -- काफी तलाशने के बाद लड़के की लाश तो मिल गई लेकिन बुआ की तो बॉड़ी भी नहीं मिली ।

महिला -- बुआ ?

पुरुष -- हां , वो मेरी बुआ थी । मेरे पापा की सगी बहन । पापा ने बुआ को बेटी की तरह पाला था , वो उनसे बहुत स्नेह करते थे । इस हादसे के बाद पापा एकदम टूट गये और जल्द ही उन्होंने वो गांव भी छोड़ दिया ।

महिला -- तुम्हारी बुआ भी थी ?

पुरुष -- बहुत प्यारी सी । पापा बताते थे वो मेरे को गोद में लेकर गली गली दौड़ा करती थी । मैं बुआ के हाथ से नहाता था , बुआ ही मेरे को कपड़े पहनाती थी , उसी के हाथ से खाता था । आज इतने साल गुज़र गये लेकिन मैं बुआ का वो भोला और मासूम सा चेहरा भूला नहीं हूँ । जानती हो आज भी अक्सर बुआ मेरे सपने में आकर मेरे को लाड़ करती है । मैं उसकी गोदी में सिर रख देता हूँ और वो मेरे बालों में अपनी उंगलियां फेरने लगती है । पापा को इस बात को लम्बे समय तक अफसोस रहा कि वो अपनी बहन का विधि विधान से अंतिम संस्कार भी नहीं कर सके ।

महिला -- लेकिन ये बात तुमने पहले कभी नहीं बताई ।

पुरुष -- हम ने तय किया था कि अब हम बुआ की कभी , कही ,कोई चर्चा नहीं करेंगे ।

बुआ को भूलने की कोशिश में पापा ने उस गांव को छोड़ दिया , अपना जमा जमाया कारोबार छोड़ कर एक अनजाने शहर में बस गये । ऐसे शहर में जहां हमें कोई नहीं जानता था , हम किसी को नहीं जानते थे ।

महिला -- तो क्या आप लोग उन्हें भूलने में कामयाब रहे ?

पुरुष -- नहीं मालूम । लेकिन हम ज़ाहिर ऐसा ही करते थे ।

महिला -- और वो छोड़ा हुआ गांव ?

पुरुष -- फिर उस गांव में हम कभी नहीं गये । वहां के लोगों को भी नहीं मालूम था कि हम कहां है ।

महिला -- इस दुनिया से कोई भी पूरा का पूरा नहीं जाता । वो अपने साथ थोड़ा सा हम को भी लेकर जाता है , और थोड़ा अपने को हमारे अंदर छोड़ कर जाता है । हम किसी अपने को पूरा का पूरा कैसे भूला सकते हैं ?

पुरुष -- लेकिन हमने उन्हें भूला ही दिया था । उनके जाने के दो तीन साल तक तो बुआ सभी के दिलो दिमाग में रही , लेकिन धीरे धीरे वो अतीत होती गई,उनकी तस्वीर हॉल से ड्राइंग रूम और फिर स्टोर रूम में चली गई । धीरे धीरे उस बात को बीस बाईस साल हो गये और हमारी यादों से बुआ पूरी तरह ओझल हो गई ।

महिला -- ये तो कुदरत का नियम है , अगर हर चले जाना वाला दिलो दिमाग में छाया ही रहेगा तो दुनियां चलेगी कैसे ?

पुरुष -- करेक्ट । अब हम बुआ को पूरी तरह भुला चुके थे । मैं बच्चे से जवान हो गया , पढ़ लिख कर एक बड़ा आफिसर हो गया । मां और पिताजी रिटायर्ड़ लाईफ बहुत अच्छे से एंजाय कर रहे थे । दोनों कभी गार्ड़न चले जाते कभी मंदिर - - - - मंदिर , मंदिर ------- ।

महिला -- क्या हुआ आप को ? तबीयत तो ठीक है न !

पुरुष -- हां उस दिन मां और पिताजी मंदिर ही गये थे ।

महिला -- किस दिन ?

पुरुष -- जिस दिन ज़िंदगी में तूफान आया था और इस कहानी ने ज़बरदस्त यू टर्न लिया था ।

महिला -- क्या हुआ था उस दिन ?

पुरुष -- मंदिर में भजन कीर्तन चल रहा था । मां और पिताजी भक्ति भाव से भजन सुन रहे थे । भजन के बाद प्रसाद लेकर जब सब जाने लगे तो तभी पिताजी जी चौक पड़े उन्होंने मां से कहा वो देखो ----- मां देख कर देखती ही रह गई , उस महिला को देखती ही रह गई जो एक पंद्रह सोलह साल की लड़की और एक व्यक्ति के साथ मंदिर की सीढियों से उतर रही थी , वह मेरी बुआ थी ।

महिला -- बुआ थी ? लेकिन बुआ तो '''''''''''''' ।

पुरुष -- बीस बाईस पहले मर चुकी थी '''''''''' ।

महिला -- हां , फिर वह महिला ''''''''''''' ?

पुरुष -- बुआ ही थी ।

महिला -- लेकिन बुआ तो अपने साथी के साथ पहाड़ पर से कूद कर आत्महत्या कर ली थी ।

पुरुष -- लेकिन लाश सिर्फ उस युवक की मिली थी ,बुआ की नहीं ।

महिला -- यानि ,

पुरुष -- पिताजी ने जिसे देखा था वो उनकी सगी बहन थी ।

महिला -- इसका मतलब उस समय पहाड़ से नीचे नदी में सिर्फ वह युवक कूदा था बुआ नहीं ।

पुरुष -- या तो बुआ वहां से कूदी ही नहीं या फिर कूदने के बाद भी बच गई होगी ।

महिला -- अगर बुआ नहीं कूदी तो क्यों नहीं कूदी होगी ?

पुरुष -- जीवन जीने का बुआ का अपना नज़रिया होगा । वह प्रेम में जीना चाहती होगी मरना नहीं ।

महिला -- फिर घर परिवार से नाराज़ वह युवक था बुआ नहीं ।

पुरुष -- अगर बुआ ने जीवन और मृत्यु में से जीवन को चुना तो इसमें गलत क्या था ?

महिला -- मरने के बाद तो सब कुछ खत्म हो जाता है , इच्छाओं की पूर्ति तो जीवित रहने पर ही संभव है ।

पुरुष -- हो सकता है बुआ मरने से ड़र गई होगी ?

महिला -- या वह युवक ड़रने के कारण मर गया होगा ।

पुरुष -- बाप रे , मैं तो टेंशन में आ गया हूं एक पेग लेना होगा ।

महिला -- आखिर घूम फिर कर बोतल की तरफ ही चले जाते हो , अभी नहीं पीने का पहले मेरे को बुआ की कहानी पूरी सुनाओ । इस पर धांसू फिल्म बन सकती है। एक हिट फिल्म के सभी मसाले इसमें मौजूद है ।

पुरुष -- क्या कहा तुमने ---- बुआ की कहानी , पहले तो मैं ये क्लीयर कर दूं कि ये कहानी नहीं बल्कि एक घटना है ं।

महिला -- कहानी बोलो या घटना एक ही मतलब है । हर कहानी में एक घटना होती है और हर घटना की एक कहानी होती है ।

पुरुष -- नहीं नहीं ड़ियर आप कनफ्सूज़ हो रही है । कहानी में कुछ भी सच नहीं होता और घटना में कुछ भी झूठ नहीं होता । घटना समाचार की तरह सुनाई जाती है और कहानी कला की तरह ।

महिला -- ये आप की सोच है । लेकिन मैं एक कहानीकार की तरह सोच रही हूँ , ये घटना मेरी कहानी का प्लॉट होगी । इसीलिये मेरा एंगल अलग है और आपका एंगल अलग । आप इसे सत्य घटना कहिये , लेकिन मेरे लिये तो ये बुआ की कहानी है ।

पुरुष -- कहानीकार को ये हक कतई नहीं है कि वो कहानी को अपनी मर्ज़ी से चलाये । कहानी किसी गृहणी की रसोई नहीं है कि वहां बस उसी की मर्ज़ी चलेगी ।

महिला -- अगर मंटो को पढ़े होते तो मालूम होता कि लेखक कहानी का खुदा होता है ।

पुरुष -- देखो अपनी ज्यादा खुदाई मत दिखाओ वरना मैं इस कहानी का अंत नहीं बताउंगा ।

महिला -- नहीं बताओगे तो कहानी खुद अपना अंत तलाश लेगी, और बताओगे तो ये ज़रा भी ज़रूरी नहीं है कि मैं उसका वही अंत रखू ।

पुरुष -- इस कहानी का जो अंत है इसके अलावा इसका कोई और अंत हो ही नहीं सकता ।

महिला -- वह अंत ठीक अंत है या नहीं इस पर भी तो विचारना होगा । ये लेखन है पान की दुकान नहीं कि ग्राहक ने बोला चूना तेज तो तेज कर दिये । एक वाजिब अंत हर कहानी का हक है , और एक कहानी से उसका हक छीना जाये ये अधिकार किसी को नहीं है । उस अंत तक कहानी अपनी लय से अपनी गति से पहुंचती है । कहानी की अपनी चाल होती है उसका अपना अंदाज़ होता है । कहानी अपने आरंभ से अंत तक बहुत टेढ़े मेंढ़े रास्तों से होकर पहुंचती है । उसमें चढ़ान भी आती है और ढ़लान भी , उसमें मैदान भी आते हैं और घाटी भी । कहानी कभी गाते हुए बढ़ती है तो कभी चीखते हुए ।

पुरुष -- अच्छा ये बताओ तुम कहानी गढ़ती कैसे हो ?

महिला -- ऐसा है मेरे प्यारे समीक्षक , कि कहानी रसोई में बनाये जाने वाली कोई ड़िश नहीं है कि उसकी अपनी कोई फिक्स रिसिपी हो । यहां ऐसा थोड़ी न होता है कि एक कढ़ाई में कुछ चार छै टुकड़े पनीर के ड़ाले , फिर उसमें एक चम्मत हल्दी और नमक ड़ाले , फिर एक मग पानी ड़ाल कर धीमी आंच पर रख दिये और दिये कूकर की दो सीटी और ये हो गई आपकी मनपसंद कहानी तैयार ।

पुरुष -- ठीक है यार ये तुम्हारा काम है तुम जानो तुम्हारा काम जाने । मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि ये बुआ की कहानी नहीं है , अगर तुम इसे बुआ की कहानी बना कर कहानी लिखोगी तो ये बेईंसाफी होगी ।

महिला -- ऐसा है कि मैंने जितनी बातें सुनी है उसमें तो बुआ एक सशक्त पात्र बन कर उभर रही है । एक औरत जिसे दुनियां ने मृत मान लिया है वह कुछ वर्षों बाद प्रगट हो जाती है । इस बार उसके साथ एक पुरुष और एक बेटी भी है । वह पुरुष यकीनन उसका पति होगा । वह मंदिर में दिखाई देती है यानि वह एक धार्मिक और सामाजिक मर्यादा में रहने वाली महिला है । इस पंद्रह बीस साल उसके जीवन में कितना तूफान आया होगा , कितना संघर्ष करना पड़ा होगा उसे । ये तो महिला सशक्तीकरण की एक शानदार कहानी बनेगी ।

पुरुष -- एक मिनट एक मिनट , कही तुम महिला सशक्तीकरण के नाम पर कोई पुरस्कार झटकने की प्लानिंग तो नहीं कर रही हो ।

महिला -- छि कितनी गंदी बात बोले , चलो सॉरी बोलो , पहले कान पकड़ कर सॉरी बोलो ।

पुरुष -- तू नाराज़ मत हो , एक बार नहीं बस दस बार कान पकड़ कर सॉरी बोलता हू।

महिला -- लिखे हुए को बेचती हूँ , बेचने के लिये नहीं लिखती । लेखन बिकता है लेखक नहीं ।

पुरुष -- ठीक है बाबा , बात क्लीयर हो गई , अब इस पर और हाय तौबा मचाने की ज़रूरत नहीं है । औरतों के साथ ये बड़ी मुसीबत है कि एक शब्द के पीछे पड़ गई तो उसे मिटा कर ही रहती है ।

महिला -- क्या ?

पुरुष -- कुछ नहीं, मैं ये बोल रहा था कि ये बुआ की कहानी नहीं है ।

महिला -- लेकिन एक कहानीकार की हैसियत से मैं इसे बुआ की कहानी की मानूंगी ,बाप रे कितना ज़बरदस्त चरित्र हाथ आया है और तुम इसे सिरे से ही खारिज कर रहे हो ।

पुरुष -- लेकिन ये अन्याय होगा उसके साथ जिसकी ये कहानी है ।

महिला -- तुम मेरे को पूरा वाक्या सुनाओ उसे मैं अपने अंदाज़ में रचूंगी । कहानी को अपने अंत तक किस प्रकार पहुंचाना , यह मेरा काम है ।

पुरुष -- लेकिन अंत तो वही होना चाहिये जो सही में हुआ , सही अंत और उचित अंत में अंतर है । अंत उचित नहीं है तो इसका यह अर्थ नहीं कि उसे बदल दिया जाये ।

महिला -- गलत अंत गलत संदेश दे देगा । हम गलत संदेश देने के लिये कहानी नहीं लिखते ।

पुरुष अच्छा ये बताओ अगर किसी कहानी का अंत गलत संदेश देता है तो तुम क्या उसका अंत बदल दोगी ।

महिला -- अंत बदलने की ज़रूरत ही नहीं आयेगी ।

पुरुष -- क्यों ?

महिला -- मैं ऐसी कोई कहानी लिखना ही नहीं चाहूंगी । अगर लिखने का मकसद ही पूरा न हो तो बेवजह वक्त क्यों ज़ाया करना ? खराब लिखने से न लिखना ज़्यादा बेहतर है । भूख बर्दाश्त नहीं हो रही हो तो इसका मतलब ये तो नहीं कि ज़हर ही खा कर पेट भर लिया जाये ।

पुरुष -- अच्छा ये बताओ एक बहुत अच्छी कहानी है ,उसका अंत भी बहुत सार्थक है ,और वह समाज में भी बहुत अच्छा मैसेज देती है , ऐसी कहानी की कीमत क्या होगी ?

महिला -- उसका क्या मूल्य आंका जाये वह तो अमूल्य है ।

पुरुष -- हमारी कहानी कहां तक पहुंची थी ? ऐसा तो नहीं कि हम पीछे रह जाये और कहानी आगे निकल जाये , या हम आगे निकल जाये और कहानी पीछे रह जाये ।

महिला -- एकदम सही बात कहे हो । कई बार ऐसा हुआ है कि लेखक तो वही का वही रह गया लेकिन उसकी रचनायें बहुत आगे निकल गई , और कुछ एक लेखक इतने आगे निकल गये कि उनका रचना संसार कहा छूट गया किसी को पता ही नहीं चला । कुछ छोटे राईटरों ने बहुत आला लिखा है , तो वही कुछ आला राईटरों ने बहुत छोटे लेवल का लिखा है । एकाध जगह आनंद बक्षी साहिर की तरह लगे हैं तो कही साहिर भी आनंद बक्षी की तरह महसूस किये गये हैं । मैं किसी को कमतर नहीं आंक रही लेकिन होता है , कभी कभी ऐसा हो जाता है ।

पुरुष -- शायद हमारी बात चीत अब उस मुकाम पर पहुंच गई है जहां इसे खत्म कर दिया जाये । क्लाईमेक्स का यही सबसे सही वक्त है । सही अंत के लिये सही समय भी ज़रूरी है । खराब समय का अंत सही समय पर नहीं हुआ तो वह सही समय का खराब अंत के नाम से जाना जायेगा ।

महिला -- तुम्हारी बात से मैं सौ प्रतिशत सहमत हूं । एक कहानी उसकी दो वजहों से अच्छी कहानी कहलाती है , एक उसकी शुरूआत और दूसरा उसका अंत । तुम अपनी कहानी के अंत का आरंभ करो । तुम्हारा आरंभ ही मेरा अंत होगा ।

पुरुष -- बातों बातों में शुरू हुआ ये किस्सा हम एकदम सादे सामान्य तरीके से खत्म करते हैं , वरना अगर इसे व्यवसायिक तरीके से भुनाना चाहे तो इसमें गुंजाईशें कम नहीं है ।

महिला -- आप अंत बताईये । मैं अपने शब्दों में आपकी बात लोगों के सामने रखूंगी ।

पुरुष -- ज़रा उस आदमी की हालत का अंदाज़ा लगाओ जिसने जिसे उंगली पकड़ कर चलना सिखाया , अपने हाथों से निवाला बनाकर उसे खिलाया , उसे अपनी बहन नहीं हमेशा अपनी बेटी समझा , वह एक हादसे में मारी जाती है । वह आदमी इतना टूट जाता है , इतना बिखर जाता है कि फिर वह जगह , वह गली , वह शहर तक छोड़ देता है जहां की चीज़ें उसे उसकी याद दिलाती है । वह कही और जाकर बस जाता है और सब कुछ भुलाने की कोशिश करता है । धीरे धीरे वह सब कुछ भूल भी जाता है । फिर एक दिन वह बच्ची , वह बहन एकाएक उसके सामने आकर खड़ी हो जाती है , लेकिन उसे पहचानती नहीं है । ज़रा उस आदमी की पीड़ा का अंदाज लगाओ । महसूस करो उसके अंदर कितना उथल पुथल मचा होगा ? यादों की सुनामी उमड़ आई होगी उसके अंदर । उसके सामने उसकी मर चुकी बहन खड़ी है जिसके साथ उसका पति और उसकी बेटी है , लेकिन वह उसे पहचान नहीं रही है ।

महिला -- फिर क्या हुआ ?

पुरुष -- पिताजी ने कहा - अब वह जब भी दिखेगी , आगे बढ़ कर उसका हाथ पकड़ लूंगा , उसे सीने से लगा लूंगा , अपने साथ उन सब को घर ले आउंगा ।

महिला -- सही फैसला , कहानी का सुखद अंत ।

पुरुष -- लेकिन ऐसा हुआ नहीं ।

महिला -- क्यों ?

पुरुष -- क्योंकि तब अम्मा बोली ................... ।

महिला -- अम्मा ?

पुरुष -- हां ये बुआ की नहीं अम्मा की कहानी है । इसमें सबसे बड़ा यूटर्न अम्मा ने लाया था ।

महिला -- अम्मा बोली ?

पुरुष -- प्रायः अम्मायें सुना करती है , उन्हें बोलने का हक नहीं होता है । अक्सर अम्मायें हो चुके फैसलों का पालन किया करती है ,खुद कोई फैसला लेने का उन्हें कोई अधिकार नहीं होता । जब बच्चे को बोलना नहीं आता तब सृष्टि की तमाम अम्मायें समझ जाती है कि इसे नींद आ रही है , अम्मायें समझ जाती है इसे भूख लगी है , अम्मायें समझ जाती है इसका पेट दर्द कर रहा है , अम्मायें समझ जाती है इसे पॉटी आ रही है ,''''''''''' फिर बड़े होकर यही बच्चे कहते हैं अम्मा तुमको तो कुछ समझता ही नहीं है ।

महिला -- अम्मा बोली क्या ?

पुरुष -- मैंने हमेशा यही देखा था कि घर में पिताजी बोलते थे और अम्मा सुनती थी । पिताजी का अंदाज़ कुछ ऐसा होता था कि वो कुछ बताते नहीं थे , न ही उनकी बात में सलाह मशविरा की कोई गुंजाईश होती थी , वो तो बस आदेश सुना दिये करते थे ।

महिला -- वो सब छोड़ो मेरे को ये बताओ कि अम्मा ने क्या बोली ?

पुरुष -- लगता है तुम कथा को कथा के तरीके से नहीं सुन रही हो । तुम पात्रों के चरित्र के अंदर नहीं जा रही हो , केवल उनको बाहर से जान रही हो । उनके अतीत को उधेड़ नहीं रही हो । उनकी चरित्र की व्याख्या नहीं कर रही हो । कहानी को ऐसे नहीं जाना जाता ।

महिला -- फिर कैसे जाना जाता है ।

पुरुष -- तुम तो खुद एक कथाकार हो और इतनी महत्वपूर्ण बात तुमको ही नहीं मालूम ?

महिला -- तुम जो बोल रहे हो वह लिखने वाले की नहीं पढ़ने वालों की बात है । मैं लेखिका हूं पाठक नहीं ।

पुरुष -- लेखक कहाना है तो पाठक होना सीखो ।

महिला -- आखिर तुम कहना क्या चाहते हो ।

पुरुष -- अम्मा बहुत विद्वान नहीं थी , बहुत पढ़ी लिखी नहीं थी । उनके पास ज्ञान नहीं अनुभव था । रिश्तों को समझने की सलाहियत थी । अम्मा ने पूरे मामले को अपने अनुभव की नज़र से देखा और पिताजी को बोलना शुरू कर दिया , चुप रहने वाली अम्मा बोली तो सब चुप हो गये ।

महिला -- ऐसा क्या बोली अम्मा । ज़रूर कमाल की बात कही होगी , क्योंकि जो कभी नहीं बोलते वो जब बोलते हैं तो फिर खूब बोलते हैं ।

पुरुष -- अम्मा की बात में अनुभव का निचोड़ था । अम्मा ने आव्हान किया कि ज़रा उस पंद्रह बीस साल की कल्पना करो जो एक औरत ने कैसे बिताये होगे , कितना परेशान रही होगी , कैसे कैसे उतार चढ़ाव सहे होगे , सारी तकलीफें सही लेकिन तुम्हारे पास वापस नहीं आई , सिर्फ इसीलिये नहीं आई कि मेरे भाई को समाज के सामने शर्मिंदगी न हो । इतनी तकलीफें उठाने के बाद अब अगर उसको कोई सहारा मिल गया है तो तुम सामने आकर उसके बीते हुए समय को सामने मत लाओ वरना वो दोबारा लुट जायेगी , एक बार फिर से बर्बाद हो जायेगी । रिश्ते हर बार गले मिल कर नहीं निभाये जाते ,कभी कभी नज़रें फेर कर भी रिश्ता निभाया जाता है । अगर अपनी बहन से प्यार है तो उसको पहचानने से इंकार कर दो , अनजान बन जाओ , ऐसे देखो मानो देखा ही न हो । मन से दुआयें दो पर ज़ुबां में उसका नाम भी मत लो ।

अम्मा बोलती गई , पिताजी सुनते गये , और पूरी तरह अम्मा से सहमत हो गये । अंत में अम्मा ने जब आखिरी बात पूछा - क्या सोचा है अपनी बहन के बारे में ?

तब पिताजी ने कहा था -बहन ? कौन बहन , किसकी बहन ?

फिर कई बार पिताजी और बुआ का आमना सामना होता रहा लेकिन किसी ने किसी को नहीं पहचाना । यह थी मेरी कहानी जिसे अब तुम्हें लिखना है ।

महिला -- नहीं मैं इसे नहीं लिखूंगी । अगर मैं इसे लिख कर सार्वजनिक कर दूंगी तो अम्मा की सोच और पिताजी का त्याग तो व्यर्थ हो जायेगा , बुआ की ज़िंदगी में तो फिर से भूचाल आ जायेगा ।

पुरुष -- तुम लेखिका हो , तुम अपनी बात लिख कर ही बोल सकती हो ।

महिला -- हम लिखते क्यों है ? लेखन के क्या सामाजिक सारोकार होते हैं ? मैंने हर बार लिख कर अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी निभाई है ,इस बार नहीं लिख कर वो ज़िम्मेदारी निभाउंगी ।

पुरुष -- यानि मैंने जो बुआ की कहानी सुनाई - - - - ?

महिला -- बुआ ? कौन बुआ , किसकी बुआ ?

( दोनों एक दूसरे के करीब आते हैं ,प्रकाश सिमट कर दोनों पर केंद्रित होता है )

समाप्त

13 मई 2015

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