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कहानी - एक बैल जिसे फूलों की खुशबू से प्यार था


अनुवाद - अरविन्द गुप्ता

 70 वर्ष पहले 1935 में मनरो लीफ ने एक अनूठी कहानी लिखी, जिससे कि उनके मित्र रार्बट लॉसन उसके चित्र बना कर कुछ कमाई कर सकें। एक घंटे में मनरो लीफ ने 800 शब्दों की यह अमर कहानी लिखी।

 1936 में छपी ‘द स्टोरी ऑफ फरडीनैंड’ तुरंत विवादों में फंस गयी। इस युद्ध-विरोधी पुस्तक पर हिटलर ने पाबंदी लगा दी। स्टालिन ने उसे पोलैंड में पहली गैर-कम्युनिस्ट बाल-पुस्तक के रूप में प्रसारित किया। बहुत कम लोग जानते हैं कि यह पुस्तक गांधीजी को बेहद प्रिय थी। नीचे इस नायाब कहानी का संक्षिप्त सार पढ़ें।

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 बहुत समय पहले की बात है। स्पेन में एक छोटा बैल रहता था। उसका नाम फरडीनैंड था।
 जिन बैलों के साथ वो रहता था वे सभी एक-दूसरे से लड़ते और सींग लड़ाते। परंतु फरडीनैंड ऐसा कभी नहीं करता था। उसे चुपचाप बैठकर फूलों की खुशबू सूंघना ही अच्छा लगता था।
 कार्क का पेड़ उसकी प्रिय जगह थी। उसकी मां कभी-कभी उसके बारे में चिंता करती थीं।
 वो सोचती, ‘अगर बैल ने लड़ना नहीं सीखा तो वो किस काम का? बड़ा होकर वो क्या करेगा?’ परंतु मां बहुत समझदार थी। उसने फरडीनैंड अपनी जिंदगी जीने की पूरी छूट दी।

 धीरे-धीरे साल गुजरे और फरडीनैंड बड़ा होकर एकदम ताकतवर बन गया। एक दिन बैलों की लड़ाई के लिये सबसे शक्तिशाली बैल को चुनने के लिये पांच लोग मैडरिड से आये।
 चयनकर्ताओं को देखते ही बाकी बैल पागल हो गये। अपनी ताकत और मर्दानगी दिखाने के लिये वो तुरंत एक-दूसरे के पेट में सींग घुसाने लगे।

 फरडीनैंड को लड़ाई में कोई रुचि नहीं थी। इसलिये वो पहाड़ी पर चढ़कर अपने प्रिय कार्क के पेड़ के नीचे सुस्ताने के लिये चला। घास पर बैठते हुये उसने नीचे नहीं देखा। गलती से वो एक ततैया के ऊपर बैठ गया। ततैया ने उसे जोर से डंक मारा। दर्द के मारे फरडीनैंड पागलों की तरह सींगों से जमीन को खोदता हुआ दौड़ा।

 पांचों चयनकर्ता फरडीनैंड को देखकर गद्गद् हो गये। ‘हमें बैल की लड़ाई के लिये सबसे ताकतवर बैल मिल गया है!’ वे खुशी से चिल्लाये। फिर फरडीनैंड को घोड़ा गाड़ी में लादकर मैडरिड ले जाया गया।

 उस दिन एक मेले का माहौल था। चारों ओर झंडे और तोरण लहरा रहे थे। हवा में संगीत की गूंज थी। बहुत सी महिलायें भी बैल की लड़ाई देखने के लिये आयीं थीं। कई महिलाओं के बालों में सुंदर, सुगंधित फूलों के गजरे सजे थे।

 उसके बाद एक बड़ी परेड निकली। सबसे पहले पिकाडोर निकले। उनके हाथों में भाले थे। उसके बाद मेटाडोर आया। उसे अपनी तलवार से बैल को मारना था।

 अंत में कौन आया? आप सब अच्छी तरह जानते ही हैं - फरडीनैंड! सब लोग ताकतवर फरडीनैंड को देखकर सहम गये।

 उन्होंने उसे नाम दिया, ‘खूंखार फरडीनैंड!’
 दर्शकों को लगा कि फरडीनैंड जोर से लड़ेगा और लड़ाई बहुत घमासान होगी।
 फरडीनैंड दौड़ कर लड़ाई के मैदान के बीच में पहुंचा।

 उसे देखकर लोगों ने तालियां बजायीं। उन्हें लगा कि फरडीनैंड पूरे जोर से लड़ेगा।
 परंतु फरडीनैंड के दिमाग में कुछ और ही घूम रहा था। मैदान के बीच में पहुंचते ही वो फूलों की मनमोहक खुशबू सूंघने लगा। फरडीनैंड ने पक्का निश्चय किया। वो न तो किसी से लड़ेगा और न ही किसी को मारेगा।

 पिकारोड और मैटाडोर ने उसे उकसाने का भरसक प्रयास किया। परंतु फरडीनैंड टस-से-मस नहीं हुआ। अंत में लोगों के पास कोई चारा नहीं बचा। उन्हें झक मार कर फरडीनैंड को वापिस घर भेजना पड़ा। मुझे लगता है कि फरडीनैंड अभी भी कार्क के पेड़ के नीचे बैठा फूलों की खुशबू सूंघ रहा है। वो वाकई में बड़ा खुश है।


(संग्रह हाथ के साथ से अनुमति से साभार प्रकाशित)
 
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