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भीषण गर्मी से बचें-बचाएँ



- डॉ. दीपक आचार्य


भयावह गर्मी का वर्तमान दौर किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं है। नवतपा का यही वह समय है जिसमें भीषण गर्मी से न सिर्फ अपने आपको बचाए रखना है बल्कि उन लोगों को भी बचाए रखने की जरूरत है जिनके पास न एसी रूम्स हैं, न एसी कारें हैं और न कूलरों की व्यवस्था है।

इस बारे में हम सभी एसी और कूलरधारियों को दूसरों की संवेदनाओं को अपने भीतर अनुभव करने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें भीषण गर्मी से खुद को बचाने के लिए कुछ दिन के लिए आत्मसंयम की आवश्यकता है। जहाँ तक हो सके हम अपनी दिनचर्या को संयमित रखें और कुछ दिन के लिए अपनी बहिर्मुखी गतिविधियों पर लगाम कसे रखें। ताकि हमारी वजह से उन आम लोगों को परेशानी न हो, जिनके पास आने-जाने के लिए न एयरकण्डीशण्ड वाहन हैं, न उसी घर या दफ्तर हैं।

कुछ दिन हम अपनी परिवेशीय गतिविधियों की रफ्तार धीमी कर देंगे तो हमारा कुछ भी नुकसान नहीं होने वाला। हमें लोगों की दुआएं ही मिलेंगी, बददुआएं नहीं। लोगों को अच्छी तरह पता होता है कि जिन लोगों के पास पहले से ही शक्तियों और अधिकारों की गर्मी होती है उनके लिए न सूरज की गर्मी का कोई महत्त्व है, न बाहर की भीषण और भयावह गर्मी, लू के थपेड़ों या आंधियों का कोई संकट।

उनके लिए तो हालात सदा-सर्वदा अनुकूल ही बने रहते हैं क्योंकि उनका विश्वास इसी में होता है कि गर्मी ही गर्मी को काटती है। फिर सारे के सारे महान और बड़े लोगों के पास समय बहुत कम होता है और इसी समय में उन्हें ढेर सारे काम करने होते हैं क्योंकि समय समाप्त हो जाने के बाद ये सारे लोग शक्तिहीन, प्राणहीन और चेतना शून्य हो ही जाते हैं।

भीषण गर्मी का यह संकट हम सभी के लिए है। हमें भी बचने के जतन करने चाहिएं और उन लोगों को भी गर्मी से बचाने के लिए प्रयास करने चाहिएं जो हमसे जुड़े हुए हैं या जिनके कंधों पर चढ़कर हम अपने आपको शिखर समझ बैठे हैं। वरना बददुआओं की गर्मी हमें खाक कर देने के लिए काफी है।

सूरज की तपन हम सभी को यह संदेश भी देती है कि खुद तो बचें ही, औरों को भी भीषण गर्मी से बचाए रखने के लिए आत्मसंयम बरतें, औरों को बेवजह तंग न करें। थोड़े दिन विश्राम के ही मान कर अपने कर्मयोग की गति को विराम देकर इस समय का उपयोग अन्तर्मुखी होकर आत्मचिन्तन में बिताएं ताकि आने वाले समय में और अधिक गति से काम कर सकें।

भीषण गर्मी का दौर यही सब कहने को आया है। चढ़ते हुए पारे का संकेत समझें और अपने आपको दूसरों के अनुकूल बनाएं, इसी में जीव मात्र और जगत का कल्याण है।

एयरकण्डीशण्ड वाहनों और कक्षों में रहने वालों लोगों के लिए यह भीषण गर्मी कुछ कहना चाहती है। इन लोगों को यों समझ में न आए तो कुछ समय खुली हवा में खुले स्थलों पर जाकर आम लोगों के बीच गुजारें और गर्मी के संकेतों का खुद अनुभव करें ताकि साफ-साफ पता चल सके कि यह भयावह नवतपा गर्मी और तमतमाए सूर्य भगवान क्या कुछ कहना चाहते हैं।

वर्तमान में महागर्मी का यह दौर किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं है।  औरों के अभावों, दर्दों और पीड़ाओं को समझें, संवेदनशील रहें और गर्मी से प्रभावित लोगों को तंग न करें, उन्हें गर्मी से बचाव के जतन करने दें।

आज इंसानों से लेकर पशुओं और पक्षियों तक के जीवन को बचाए रखना और उन्हें जीवनयापन का सुकून देना हम सभी का फर्ज है। जो बड़े लोग हैं वे कुछ दिन के लिए भीषण गर्मी में आम जनजीवन के बारे में गंभीर चिंतन करें और दूसरे लोग अपने-अपने स्तर पर गर्मी से बचने तथा औरों को बचाने के लिए प्रयत्न करें, इस भयावह दौर को आसानी से पार करने लायक माहौल का सृजन करें।

हम सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभाने की जरूरत है। यह आत्मज्ञान और फर्ज का भान एयरकण्डीशण्ड वाहनों और कक्षों में बैठकर प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए सूरज का सीधा सान्निध्य पाना जरूरी है।

यह भी समझना जरूरी है कि आखिर सूरज प्रचण्ड आगे क्यों बरसा रहा है। प्रकृति कुपित क्यों होती जा रही है। हरियाली कहाँ खो गई है। सब लोग ईमानदारी से अपने-अपने फर्ज निभाएं।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com
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