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मंदिरों के सोने पर सरकार की नजर


प्रमोद भार्गव
    भारत प्राचीन समय से सोने के भंडारण में अग्रणी देश रहा है। इसलिए भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता है। इस समय भारतीय रिर्जव बैंक के पास करीब 18 हजार टन सोना है। इसके अलावा एक अनुमान के मुताबिक देश के मंदिरों में कुल मिलाकर करीब 3 हजार टन और भारतीय घरों में लगभग 17 हजार टन सोना है। केंद्र सरकार मंदिरों और घरों में पड़े सोने को बाजार में लाकर व्यापार की गतिशीलता बढ़ाने की फिराक में है,जिससे सोने का आयात कम करना पड़े, डॉलर बचाऐ जा सकें और व्यापार संतुलन बेहतर बनाया जा सके। सरकार कि कोशिश है कि मंदिर-न्यासों को इस बात के लिए राजी किया जाए कि वे तहखानों में बंद सोने को बैंकों से जमा करे और बदले में ब्याज लेकर मुनाफा कमाएं। ऐसे सोने को पिघलाकर सुनारों को दिया जाएगा,जिसका इस्तेमाल गहने बनाने में होगा। इसी तर्ज पर सरकार आम लोगों को भी घरों में पड़े सोने को भी बैंकों में जमा करने के लिए एक योजना पर काम कर रही है।


    दुनिया में भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहां सोने की सबसे ज्यादा खपत है। यहां के प्राचीन मंदिरों में सोने के बहुमूल्य गहने,सिक्के और ईंटों की शक्ल में बेशुमार दौलत तहखानों में सुरक्षित है। मंदिरों के पास कुल मिलाकर करीब 3 हजार टन सोना है। यह केंटकी के फोर्ट नॉक्स में सुरक्षित अमेरिकी सरकार के कुल सोना भंडार से दो-तिहाई गुना ज्यादा है। मुंबई के दौ सौ साल पुराने सिद्धिविनायक मंदिर के पास 158 किलो सोने के भंडार है। इसकी कीमत करीब 67 मिलियन डॉलर, यानी लगभग 417 करोड़ रूपये आंकी गई है। केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर के गुप्त खजाने में रखे सोने की कीमत 1200 अरब रुपए से ज्यादा आंकी गई है। इसी तरह तिरूपति बलाजी और शिरडी के साई मंदिर में अरबों रूपयों का सोना तिजोरियों में बंद है।


जाहिर है,इस सोने का कुछ ही हिस्सा बाजार में आ जाता है तो व्यापार में तो गति आएगी ही सोने का आयात भी थम जाएगा। क्योंकि हमारे सोने के प्राकृतिक भंडार न के बराबर हैं,इसलिए मांग के बराबर सोने का उत्पादन नहीं हो पाता। गोया पूर्ति के लिए बड़ी मात्रा में सोने का आयात करना होता है। फिलहाल सरकार को हर साल 800 से 1000 टन तक सोने का आयात करना पड़ता है। वित्तीय वर्ष 2012-13 में सोने का आयात 919.60 टन हुआ था,जो भारत के कुल व्यापार घाटे का 28 फीसदी रहा था। जबकि वित्तीय साल 2013-14 में 907.60 टन सोने का आयात किया गया था। हालांकि विश्व स्वर्ण परिषद् के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2014-15 के दौरान भारत में सोने का आयात पिछले वर्ष की तुलना में घट कर 652 टन रह गया है। जो पिछले वर्ष की तुलना में 28.12 प्रतिशत कम है। जाहिर है,प्रस्तावित योजना अमल में आ जाती है तो सोने का आयात लगभग एक तिहाई कम हो जाएगा।
    भारतीय रिजर्व बैंक में जो  18 हजार टन सोना सुरक्षित है,यही सोना दुनिया में उपलब्ध कुल वैध सोने का 32 प्रतिशत है। अंतरराट्रीय बाजार में इस सोने की कीमत करीब एक लाख करोड़ रुपए है। देश के मंदिरों और घरों में जो 20 हजार टन सोना जमा है,,उसकी कीमत भी लगभग एक लाख करोड़ रुपए बैठती है। रिजर्व बैंक के पास विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में भी अलग से 557.7 टन सोना जमा है। मसलन आज भी हम सोने के भंडारण में अग्रणी देश हैं। भारत के पास सोने का यह अकूत भंडार इसलिए है,क्योंकि भारतीय महिलाएं स्वर्ण,आभूषण प्रेमी हैं और हमारे देश के लोग धन-दौलत की बचत करने में दुनिया में सबसे आगे हैं। भारतीय अपनी कुल आमदनी का 30 प्रतिशत हिस्सा बचत खाते में डालते हैं। इसमें अकेले सोने में 10 फीसदी निवेश किया जाता है


    बैंकों का ग्रामीण इलाकों में विस्तार के बावजूद तकरीबन 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी के लिए सोना निवेश और बचत का प्रमुख आधार है। बावजूद ग्रामीण सोना बैंको में जमा नहीं करते,घरों में ही रखते हैं। घरों में सोना रखना इसलिए बेहतर माना जाता है,जिससे विपरीत परिस्थिति,मसलन हारी-बीमारी अथवा खेती के लिए खाद-बीज की जरूरत पड़ने पर सोना गिरवी रखकर नकद राशि हासिल करके तात्कालिक जरूरतों की पूर्ति कि जा सके। सोने में निवेश इसलिए भी अच्छा माना जाता है,क्योंकि इसकी कीमतें कुछ समय के लिए भले ही कम हों जाएं,किंतु अंततः बढ़ती ही हैं। लिहाजा मनोवैज्ञानिक तौर पर सोने में निवेश आर्थिक सुरक्षा की गांरटी के साथ संकटमोचक के रूप में भी काम आता है। लिहाजा सरकार भारतीय घरों में जो अनुमानित 17 हजार टन सोना है,उसे बैंकों में जमा करने की जिस योजना पर काम कर रही है,उस मकसद पूर्ति के लिए ग्रामीणों को राजी करना मुश्किल है।
    मंदिरों और घरों से बैंकों में सोना जमा करने संबंधी योजना सरकार 1999 में भी लाई थी,लेकिन सफल नहीं हो पाई थी। दरअसल सरकार की तरफ से जिस ब्याज दर की पेशकश की गई थी,वह मंदिर न्यास प्रमुखों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी थी। इस योजना के तहत भारतीय स्टेट बैंक ने महज 0.75-1 प्रतिशत ब्याज दर देने की इच्छा जताई थी,जिसे न्यासियों ने ठुकरा दिया था। हालांकि नई योजना के तहत 5 प्रतिशत ब्याज दर रखी जाने की उम्मीद है। यदि यह दर निश्चित की जाती है तो मंदिरों का धन बैंको तक पहुंचाने का रास्ता खुल सकता है।


इस सोने के बैंकों में पहुंचने के बाद इसे सरकार पिघलाकर ईटों में बदलेगी और फिर सुनारों को गहने बनाने के लिए दे देगी,जिससे आयातित जो सोना आभूषणों में खर्च होता है,वह नहीं होगा। गोया सरकार विदेशी मुद्रा बचाए रखने में सफल हो जाएगी। लेकिन इस योजना का दूसरा पहलू संशय पैदा करने वाला है। दरअसल अर्से से विश्व स्वर्ण परिषद् की नजर भारत के सराफा बाजार पर टिकी है। विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां निर्मित स्वर्ण  आभूषण बाजार में पूंजी निवेश की सभांवनाएं तलाश रही हैं। इस बाबत परिषद् भारतीय सराफा बजार का पहले ही अनुसंधान कराकर यह आकलन कर चुकी हैं कि भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा बाजार है। इस आकलन के मद्देनजर अंतरराष्ट्रीय सराफा बाजार के बड़े खिलाड़ी इस आभूषण बाजार को हड़पने के लिए गिद्ध दृष्टि लगाए बैठे हैं। मोदी-सरकार जिस तरह से विदेशी पुंजी निवेश के लिए ललचा रही है,उस परिप्रेक्ष्य में यह आशंका स्वाभाविक है कि कहीं सरकार मंदिरों एवं घरों का सोना बैंकों में जमा कर इस सोने को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करके भारतीय सराफा बाजार को चौपट न कर दे ? ऐसा होता है तो उन करोड़ों सुनारों की भी आजीविका संकट में पड़ जाएगी,जो गांव-कस्बों में रहकर सोने के आभूषण गढ़ के अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं। बहरहाल मंदिरों के न्यासियों का यह कर्तव्य बनता है कि वे बैंकों में सोना जमा करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि यह धन स्वर्ण व्यापार के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के हवाले तो नहीं कर दिया जाएगा ?


प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
   
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।

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