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आत्म आनंद चाहें तो स्पर्धाओं से पाएँ मुक्ति

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- डॉ. दीपक आचार्य

 

पूरी दुनिया का वैभव पा लें, संसार भर में लोकप्रियता का सर्वोच्च शिखर छू लें, वह सब कुछ कर लें जो एक महान से महान इंसान के बस में होता है, इसके बावजूद आत्म आनंद और शाश्वत शांति प्राप्त करना सहज नहीं है।

बड़े-बड़े सम्राटों और सत्ताधीशों द्वारा इसके लिए जी भर कर प्रयास किए जाते रहे हैं लेकिन विफल रहे।

वस्तुतः आत्म आनंद ही सच्चा और स्थायी आनंद है जिसे पा लेने के बाद किसी भी प्रकार के आनंद या ऎषणाओं के उपभोग की कोई इच्छा नहीं होती, न ही किसी भी प्रकार के मान-अपमान और भय की कोई आशंका रहती है।

आत्म आनंद अपने आपमें जीवन की पूर्णता का वह मुकाम है जहाँ आकर कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता। इस अवस्था को प्राप्त करने के बाद स्वतः सर्वत्र आनंद ही आनंद बरसता रहता है। इसी सच्चिदानंद स्थिति को पाने के लिए योगी अहर्निश प्रयास करते हैं और जन्म जन्मान्तरों के बाद कोई-कोई ही इसकी उपलब्धि कर पाते हैं।

इस परम और अखण्ड आनंद की प्राप्ति के लिए अपने जीवन को शुद्ध-बुद्ध बनाने की प्राथमिक आवश्यकता है। यह अवस्था अपने आपको सिर्फ द्रष्टा भाव में रखने से ही प्राप्त हो सकती है जहाँ केवल द्रष्टा ही द्रष्टा बने रहना है। जो हो रहा है वह सब स्रष्टा की इच्छा और नियति मानकर सहर्ष स्वीकार करना है।

जो कुछ करना है वह अनासक्त भाव से करना है जिसमें हमेशा यही भावना रहनी जरूरी है कि हम हमारा कत्र्तव्य कर्म पूर्ण निष्ठा और विश्वास के साथ कर रहे हैं, फल क्या सामने आएगा, क्या आना चाहिए यह सोचना हमारे अधिकार क्षेत्र में न रहा है, न रहेगा।

कर्म और जीवन व्यवहार से प्राप्त होने वाले फल की कामनाओं से परे रहकर स्थितप्रज्ञ होकर बुद्धत्व को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ना ही जीवन का ध्येय होना चाहिए।

इसके साथ ही संसार, सांसारिकों और संसार की प्रवृत्तियों या दिखावों के प्रति प्रतिस्पर्धात्मक भावों का पूर्ण त्याग भी जरूरी है। हमारा जीवन, कर्म और व्यवहार ऎसा होना चाहिए कि इसमें किसी से भी किसी भी अंश में स्पर्धा जैसा कोई भाव रहे ही नहीं।

स्पर्धाओं का त्याग उद्विग्नता, चंचलता, स्वार्थों, कुटिलताओं और खिन्नताओं से मुक्ति पाने का सर्वश्रेष्ठ और सर्वग्राह्य माध्यम है जिसमें आत्मानुशासन की बड़ी आवश्यकता होती है। यह सारे कार्य एक अकेला आदमी अपने स्तर पर कर सकता है, उसे इसके लिए किसी दूसरे व्यक्ति, व्यक्तियों या समूहों की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।

उद्विग्नता, विषमता और खिन्नता वहाँ होती है जहाँ किसी की किसी से कोई वैयक्ति स्पर्धा हो या सामुदायिक प्रतिस्पर्धा हो और कर्म का अपेक्षित परिणाम किन्हीं कारणों से सामने आए या न आ पाए। जीवन के प्रत्येक कर्म में प्रतिस्पर्धा ही सारी उद्विग्नताओं की जड़ है।

यह प्रतिस्पर्धाएं जिस अनुपात में सफलता का क्षणिक आनंद प्रदान करती हैं उससे कई गुना अधिक खिन्नता असफलता के दौर में प्रदान करती हैं। कर्म के प्रति नैष्ठिक समर्पण के साथ ही सफलता-असफलता दोनों ही स्थितियों में समत्व के भाव बिरले ही रख पाते हैं और इन लोगों को फिर किसी बाहरी आनंद की आवश्यकता नहीं हुआ करती। सामान्य लोगों के लिए ऎसा कर पाना संभव नहीं है।

जीवन में शाश्वत आत्म आनंद और आत्म तत्व को जानने की प्रबल इच्छा रखने वाले लोगों को चाहिए कि वे हर प्रकार की प्रतिस्पर्धाओं से अपने आपको दूर ही रखें क्योंकि यह संसार अपने आप में प्रतिस्पर्धा का दूसरा नाम ही है। किसी से अपनी तुलना करने की कोशिश न करें।

कोई अपने आपको महान, ज्ञानी, विद्वान और अन्यतम बताने की कोशिश करे तो उसकी महानता को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ लें। जो अपने आपको जैसा बताए, वैसा बिना किसी आपत्ति के स्वीकार कर लिए जाने में ही अपना भला है।

उन सभी प्रकार के कर्मों को त्याग दें जिन्हें दूसरे लोग बड़े चाव से पसंद करते हैं या जिसमें अपनी जीत, मान-बड़ाई और सफलता के लिए जी जान लड़ा देते हैं, सारे षड़यंत्रों, दबावों और प्रलोभनों का इस्तेमाल कर डालते हैं।

अधिकांश दुनियावी लोग मिथ्या मान-सम्मान और दिखावटी वैभव पाने के लिए दिन-रात उतावले बने रहते हैं। इन सभी प्रकार के प्रतियोगी कर्मों से अपने आपको दूर कर लेने की जरूरत है।

सामान्य जीवनचर्या को पूरी सादगी, पवित्रता और निष्ठा के साथ जियें, मंगलकारी सकारात्मक सोच रखें और स्पर्धा मुक्त रहकर शुचिता भरे कर्मयोग में रमे रहें।

लोक दिखाऊ और स्पर्धात्मक गतिविधियों से जो अपने आपको दूर कर लेते हैं वही बुद्धत्व पाने के अधिकारी होते हैं। सामान्य संसारी लोग हमसे ईष्र्या, द्वेष और विरोध इसलिए रखते हैं क्योंकि वे हमें किसी न किसी मामले में हमें अपना प्रतिस्पर्धी मानते हैं और इसीलिए हमसे आगे निकल जाने के फेर में वे नाना प्रकार के षड़यंत्रों और गोरखधंधों में लगे रहते हैं ताकि हमें पछाड़ कर आगे निकल सकें।

जब हम सभी प्रकार की प्रतिस्पर्धाओं से अपने आपको दूर कर लेते हैं तब वे हमारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते। न हमें उन लोगों से किसी भी प्रकार की कोई आशा या अपेक्षा ही रहती है।

यह अनासक्त योग के माध्यम से जीते जी मुक्ति पा लेने जैसा ही है जिसमें हम हर क्षण अपने ही आत्म आनंद में रमण करते हुए मौज-मस्ती का अहसास करते हुए बुद्धत्व की प्राप्ति कर लिया करते हैं।

इस अवस्था में हम ईश्वर और प्रकृति के सर्वाधिक करीब होते हैं और दूसरे लोगों के मुकाबले हजारों गुना दिव्य ऊर्जाओं और अनुभवों को सुकून पाते हैं। आत्म आनंद पाना ऎकान्तिक साधना से जुड़ा है और यह अपने आप में अवर्णनीय है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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