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सप्ताह की कविताएँ - मुझे पिता बनना है

 

मधु संधु

मुझे पिता बनना है

बैक ग्राउंड म्यूजिक की तरह
मन की परतों में  निरंतर बजता है
एक उद्घोष 
कि  मुझे पिता बनाना है-
स्पष्टवादी, साहसी और निर्भीक
कर्त्ता होने का सुख भोगना है
अपना  साम्राज्य फैलाना है ।

माँ बहुत अच्छी है
उसका धैर्य
ज़्यादतियों को झेलने का सहज भाव
उसकी सहनशीलता, लगाव
असहाय मजबूरी में लिपटे त्याग
मेरा आदर्श नहीं बन सकते ।
पिता की गरिमा और आत्मगौरव
संचालन सुख और वीतराग
मुझे किसी विकल्प में नहीं डालते,
मैंने नंगी आँखों से जीवन देखा है
बिना किसी पूर्वाग्रह का चश्मा लगाए
मैं कहती हूँ मुझे पिता बनना है ।

परम्परा या आदर्शों का पालन
स्व अस्तित्व का जनाजा
स्वीकार नहीं मुझे
आरोपित उद्देश्यों और ठहराव की जड़ता घेरती है ।
अशान्त मानसिकता
रिक्तता , अंतहीन शून्य,
खोखलापन
आदर्श और बलिदान के अलौकिक कवच
से छुटकारा पाना है
नए संतुलन खोजने हैं
मुझे पिता बनना है ।

सम्बन्धों की मशीनी जिंदगी में
निरीह और हताश
सबको अपनापा देकर
अपने को भुलाने वाली
सजायाफ्ता औरत मुझे नहीं बनना
मुझे पत्नी नहीं
पति का पति बनाना है
भेड़ बकरी नहीं, सिंह बनना है ।

मुझे नहीं घुट-घुट के जीना
नहीं पालनी अन्तर्मन में गहरी दहशतें
नहीं झेलने सैलाब
मानसिक उलझनें, द्वंद्व
पिता मैं हूँ तुम्हारी आत्मजा
सिर्फ तुम्हारा प्रतिरूप बनना है
मुझे पिता बनना है ।

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सुनील संवेदी

न जाओ...
तुमने-
निश्चित कर ही लिया है
तो, कदम बढ़ा ही दो
दायां या बायां
जो चाहो, पहले।
परंतु-
इतना आगे निकल जाना
कि, चाहकर भी
लौट आना संभव न हो!
आज जब लगता है
कि, किसी भी कोण से निहार लो
ये जगह ठीक नहीं बन पा रही।
ये दीवारें मसलने लगी हैं।
यह छत कुचलने लगी है।
यह दरवाजा
सिर्फ बाहर निकालने भर को खुलता है।
ये बासी सूरतें
असहनीय बदबू फेंकने लगी हैं।
तब लगेगा
कि, सच में
दिशा बदल देने भर से
कोई जगह ठीक नहीं बन जाती
छत, दरवाजा और दीवारों सहित
सूरतें नहीं हो पातीं
ठीक चाहने जैसी।
हृदय के-
एक-एक कोने पर
नाखून गड़ायेगा ही
नितांत... निजी कुछ।
जाने-पहचाने निशान उछल कर
आने लग जायेंगे मुंह से बाहर
जुबान को खरोंचते हुए
आहों और सिसकियों के रूप में।
आहिस्ता से पलट जाना
स्थिर, स्थाई रहकर ही।
ताकते रहना बस्स...
अंगुलियां फड़फड़ाकर
कोण बदल बदलकर नेत्रों के।
राह बिछी ही होगी वैसे ही।
परंतु-
तुम्हें ज्ञात होगा
एकाएक
कुछ सूरतें तब्दील हो रही हैं
परछाई के रूप में।
-
suneelsamvedi@gmail.com
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कुबेर


मो. 9407685557
कविता
अपनी वही तो दुनिया है।
ये सुख फुदकती चिड़िया है।
दुख तो उफनती दरिया है।
इनसे परे भी दुनिया है।
अपनी वही तो दुनिया है।
मजहब की अपनी दुनिया है।
यहाँ धर्म की भी दुनिया है।
इनसे परे जो दुनिया है।
अपनी वही तो दुनिया है।
यहाँ प्यार में तो बंधन है।
नफरत जलन है, उलझन है।
इनसे परे जो दुनिया है।
अपनी वही तो दुनिया है।
इतनी तो उनकी दुनिया है।
और वो तुम्हारी दुनिया है।
दुनिया, जो सबकी दुनिया है।
अपनी वही तो दुनिया है।
---
ऐसा क्यों है?
वह समय का पाबंद है
पल भर इधर न उधर
न वह किसी के लिए रुकता है,
और न ही वह किसी की प्रतीक्षा करता है।
और प्राच्य-क्षितिज के किसी उस सुनहरे गवाक्ष से
नियत समय पर उसके सुनहरे कदमों की आहट आने लगी
उसके खिलखिलाहट की मधुर रश्मि-ध्वनियाँ भी -
क्षितिज में बिखरने लगी
और गूँजने लगी उसकी मनुहार
प्यार और दुलार-भरी पुचकार,
एक आह्वान गीत की तरह।
अपने दोनों पंख फैला दिये,
आसमान की ओर स्वागत में
और समवेत् हर्ष-निनाद किया,
सुषुप्तावस्था त्याग, अभी-अभी उठे,
आँखें मलते, अलसाये, अंकुरित होते बीजों ने।
उसके स्वागत के लिए आतुर दरख्तों ने
झूम-झूमकर जीवन-गीत गाये
चंचल हवाओं ने साथ दिया,
और उन सुंदर गीतों को अपने
सुरभित-मधुर, शीतल-सुकोमल, संगीत से सजाये।
नन्हीं पक्षियों ने भी अपने पंख खोले
और खेलने लगे सुंदर जीवन-नृत्य का खेल
गाने लगे प्रेम के अमर गीत
निःसृत होता है जो
प्रेमियों के अनुराग भरे,
निःश्छल हृदय की, अनंत गहराइयों से;
और फिर उड़ चले वे
आसमान की ऊँचाइयों को नापने
संकल्प और सफलता का संदेश लेकर।
उसने हर्षित होते हुए कहा -
''ठहरो! साथियों, मैं भी आ रहा हूँ
बड़े प्यारे, और -
बहुत सुंदर लगते हो तुम लोग मुझे।
तुम्हीं हो, तुम्हीं तो हो 
जिनके बीच रहने की,
जिनके जीवन का संगीत सुनने की
अनंत अभिलाषा थी मेरी
जो जय-उद्घोष है, जीवन के पूर्णता की।
हाँ! तुम्हीं हो, तुम्हीं हो
जिनके जीवन-नृत्य देखने
कब से तरसती थीं मेरी आँखें
जिसे देख रुकते नहीं हैं मेरे पैर
झूम-झूम उठती है मेरी आत्मा
और तब!
सारी आकुलता और सारी व्याकुलता
हो जाती हैं तिरोहित,
जाने कहाँ, सदा-सदा के लिए।
हाँ! हाँ! तुम्हीं हो वे लोग
जिनके प्रेम-गीत सुनने के लिए
जाने कब से तरसता था मेरा हृदय
जो उतर जाती है,
शीतलता का स्पर्श देते हुए
हृदय की अतल गहराइयों में
अमरता का संदेश लेकर।''
पर जल्द ही वह चौक उठा
उसका उत्साह, उसकी खुशी, जाती रही
जब उसने आस-पास कहीं नहीं देखा, कोई मनुष्य।
उसने अपने दोनों हाथ ऊपर लहराते,
झूमते, मस्ती में गाते,
अंकुरित होते, बीजों से पूछा -
''हे! नन्हे प्यारे साथियों!
मनुष्य कहीं क्यों नहीं दिखता?''
नन्हें अंकुरों के खिले चेहरे मुरझा गये
उन्होंने खेत की ओर जाते -
किसी मुरझाये,
उदास-हताश-निराश किसान को देखा
देखा तो उनके पैरों ने थिरकना बंद कर दिया
कंठ ने गीत गाने से इंकार कर दिया
सब ने एक समवेत आह भरी,
और समवेत स्वर में ही उन्होंने कहा - ''मनुष्य?''
उसने भी देखा
उस उदास-हताश-निराश किसान को
उसे यह दृश्य बड़ा अजीब लगा
उसनें अंकुरों से पूछा -
''यह इतना उदास-हताश और निराश क्यों है?''
अंकुरों ने एक दूसरे को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा
और उन्होंने भी समवेत स्वर में प्रश्न किया -
''हाँ! हाँ! भला क्यों है यह
इतना उदास-हताश और निराश?''
उसने दरख्तों के साथ जीवन का गीत गाते
उन गीतों को मधुर संगीत से सजाते, हवाओं से पूछा -
''हे! जीवन-संगीत के सर्जकों
यह तो बताओ, मनुष्य कहीं क्यों नहीं दिखता?''
हवाओं ने कुछ दूर किसी कारखाने की
आसमान में काली लकीरें बनाती चिमनियों को देखा
और फिर वहाँ से निकलकर आते,
सड़क पर घसीटते-चलते,
मरियल-मटियल, मजदूरों के दल को देखा
और गहरी साँसे लेते हुए कहा - ''मनुष्य?''
उसने भी देखा
सड़क पर घसीट कर चलते,
मरियल-मटियल, मजदूरों के झुण्ड को
उसे आश्चर्य हुआ, यह दृश्य देखकर
उसने हवाओं से पूछा -
''जीवन-संगीत देने वाले साथियों, बताओगे? -
ये इतने अश्क्त, इतने मरियल, इतने मटियल क्यों है?''
जीवन-संगीत रचने वाले हवाओं ने भी कहा -
''हाँ! हाँ! ये इतने अशक्त,
इतने मरियल, इतने मटियल क्यों है?''
अंत में उसने हताश स्वरों में
जीवन गीत गाते,
मस्ती में झूमते दरख्तों से पूछा -
''जीवन-गीत गाने वाले मित्रों! आखिर बताओगे?
मनुष्य कहीं क्यों नहीं दिखता यहाँ?''
दरख्तों ने घाट पर एक दिव्य व्यक्तित्व की ओर देखा
दिव्य मंत्रोच्चार के साथ जो मस्त था, आरती करने में।
स्वर्ण आभूषणों से आभूषित
किसी दिव्य वाहन में सवार एक परिवार की ओर देखा।
और सहमते हुए कहा - ''मनुष्य,
मित्र! मनुष्य आते तो हैं यहाँ, पर कभी-कभी,
सदियों बाद।''
उसने कहा -
''मनुष्य क्या इतने दुर्लभ हो गये हैं?
दरख्तों ने निराश स्वरों में कहा -
''हाँ मित्र! मनुष्य इतने दुर्लभ हो गए हैं।''
नन्हीं-नन्हीं पक्षियाँ भी सुन रही थी,
समझ रही थी ओर गुन भी रही थी
उसके और दरख्तों की बातों को
सबने फुदकना बंद कर दिया
और अचानक सबने एक साथ कहा -
''हाँ, हाँ, मित्र! मनुष्य बड़े दुर्लभ हो गए हैं
सदियों बाद ही दिख पाता है कोई...''
और सबने अपने-अपने पंख खोले
हवा में लहराए,
आश्चर्य में अपने-अपने सिर हिलाए
और आसमान का सीना चीरने लगे
उड़ते हुए सबने फिर एक साथ कहा -
''पर, पता नहीं क्यों?''
कुबेर
मो.- 9407685557
00000000000
     

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा       

छणिकाएँ
घंटियाँ मंदिर में बजती रहीं
1.तेरे आने का अंदेशा था 
जलता रहा दिया रात भर ,
रोशनी के लिए
2.सुना है बारिश हुई रात भर
सुबह हुई तो प्यास
वैसे  ही  बरकरार थी
3.घंटियाँ मंदिर में बजती रहीं
पूजा की थाली  तो
कहीं और सजी थी
4.जुड़े हुए  थे हाथ
प्रार्थना  के लिए
प्रतीक्षा की घड़ियां रुकी रहीं
5.पाया  था उसे
पूजा  के प्रसाद  की तरह
उस प्रसाद में जहर किसने मिलाया 
17/05/2015
डी - 184 , श्याम पार्क एक्स्टेनशन  साहिबाबाद  - 201005 ( ऊ . प्र . )
मो. न.09911127277 (arorask1951@yahoo.com )
00000000000000

निशान्त यादव

" बावरे मन लौट आ "

बावरे मन लौट आ आवारगी के दिन गए ।                                             
देख लंबा रास्ता , अब मस्तियों के दिन गए ।।

राह पथरीली मिले या फ़ूल की चादर मिले ।
चल समय पर छोड़ दे , पर बावरे मन लौट आ ।।

चुन लिया है फूल को काँटों के संग इस राह में ।
कौन जाने छोड़ दे  ...  एक  साथी वास्ता ।।

राह फूलों की चुने सब , काँटों से किसका वास्ता ।
नींद सुख की सब जियें , दुःख से है किसका वास्ता ।।

आ अंधेरों से लड़े , अब रौशनी की लौ लिए ।
चल जला दें  राह में रौशन किये लाखों दीये ।।

छोड़ दे अब साथ उसका जिसने अँधेरे दिए ।
बावरे मन लौट आ आवारगी के दिन गए ।।

रौशनी की एक लौ है काफी ,  मन के अँधेरे तेरे लिए ।
देख फिर भी लाया हूँ मैं , आशा के लाखों दीये ।।

फिर से न बिखरेगा तू , आज ये वादा तो कर ।
देख ले आया हूँ मैं, निशाँ मंजिलों के ढूंढ कर ।।

लौट आ अब देख ले , जिंदगी दरवाजे खड़ी ।
बावरे मन लौट आ , आवारगी के दिन गए ।।
निशान्त यादव
8527556425
000000000000000

सुधा शर्मा


नारी, तुम सदा ठगी जाती!
कैशोर्य उमंग और तरंगें
एक ज्वाला पर सहस्र पतंगे।
तन के उभार और गहराई
नर दृष्टि उधर दौडी आई।।
        लक्ष अहेरियों में फँस जाती।
        नारी तुम ! सदा ठगी जाती।।
अश्लील फब्तियाँ सहे जवानी
तेरी कहानी वही पुरानी ।
देह की ओर बढ़ते हाथ
नीच या नंगी नर की जात।।
        तूफानों में तुम घिर जाती
        नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
आँखों के जंगल में अकेली,
हर निगाह से नजर बचाए।
किस निगाह पर विश्वास करें,
किस निगाह से नजर मिलाए।।
        हर निगाह तुम्हें भरमाती
        नारी तुम सदा ठगी जाती।।
गर्म सदा माँस का बाजार
तेरा सौदा तेरा व्यापार।
सदा चीर हरण को तैयार,
पापी नर के हाथ हजार।।
        नर का एक खिलौना रह जाती
        नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
तेरा प्रेम तेरा समर्पण,
मृत मनु को ममता का तर्पण।
अहं स्वार्थ 'मैं' की सत्ता से दूर
प्रेम, प्रेम बस प्रेम में चूर।।
        यद्यपि प्रेम सिंधु ही बन जाती।
        नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
विश्वास तेरा प्रेम तुम्हारा
अपना कुछ भी नहीं विचारा।
नर एक भँवरा तन का प्यासा,
तुमको उससे प्रेम की आसा?
        झूठे प्रेम में खो जाती
        नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
हाय! मीठी बातों में आकर ,
चल दी अपना सर्वस्व लुटाकर।
कण-कण बदली बनकर बरसी,
हाय! पर एक बूँद को तरसी।।
         एक मृगतृणा में फँस जाती
         नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
सकल अरण्य में वह एक भँवरा,
फूल का रक्षक वह एक भँवरा।
लूट ले जब वही विश्वास,
रूप तेरा कहाँ फिर सँवरा।।
          जब रक्षक से ही धोखा खाती।
          नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
हर आँख में एक चिंगारी है,
हर कोई यहाँ शिकारी है।
वो भी तुम्हें नोचना चाहता
वह भी तुम्हें लुटना चाहता।।
           जिनके लिए आँचल बनजाती।
           नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
जिस तन जिस मन में तुम रहती
जिसकी आक्राताएँ सहती।
उसकी भावनाएं अनन्त जब
काम विषयों में बहने लगती।।
            जब तुम खुद भोग्या बन जाती।
            नारी तुम! सदा ठगी जाती।।
                          ।।   इति।।
00000000

मनीष सिंह


जो गीत लिखे थे तुम्हारे लिए
जो गीत लिखे थे तुम्हारे लिए,
जो एहसास पिरोए थे अल्फ़ाज़ों में।
आज दुनिया उसे पढ़ रही है ,
और कहती है क्या खूब लिखा है।
कितना प्यार भरा है इनमें ,
और कितना गहरा दर्द छुपा है।
होगी कितनी वो ख़ुशक़िस्मत ,
जिसके लिए ये तुमने लिखा है।
दिल में टीस सी उठती है ,
और मन में ख्याल ये आता है।
कि अनजान लोग ये समझ गए ,
फिर तुम ही क्यों ये ना समझे।
ज़िन्दगी से ज्यादा अज़ीज़ थी तुम ,
आज भी हो और हमेशा रहोगी।
दिल के हर कोने में झाँको ,
तो उसमें बस तुम ही तुम मिलोगी।
तुम हमेशा कहती थी ये ,
कि तुम्हारे बिन ज़िन्दगी न रुकेगी।
पर जान न सकी कि बाद तुम्हारे ,
खोने को मेरे पास कुछ न बचेगा।
साँसे अब भी लेता हूँ मैं ,
हर चीज अपनी जगह पर है।
एक मुस्कराहट के पीछे न जाने ,
दर्द छुपाकर रखती ये पगली आँखें।
निकला हूँ बेचने को बाज़ार में ,
यादों को तुम्हारी लफ़्ज़ों में लिखकर।
खरीदार भी कई हैं पर न जाने ,
यादें बिकती नहीं और न चैन मिला कहीं।
सन्देश अगर पहुँचे तुम तक ,
और समझ सको जज़्बातों को जो।
बस इतना ही कहना है मुझको।
कि ज़िन्दगी तुम ही थी , ज़िन्दगी तुम ही हो , और ज़िन्दगी तुम ही रहोगी।

मनीष सिंह
ईमेल : immanish4u@gmail.com
मोबाइल नंबर: +91 9986935513
वेबसाइट : http://www.immanish4u.com
वर्तमान पता: 017, प्रिस्टिन पैराडाइस अपार्टमेंट ,
शान्ति निकेतन स्कूल के पास ,
अनुग्रह लेआउट , बिलेकाहल्ली , बैंगलोर ( कर्नाटक ) – 560076

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कविराज आनन्द किरण

उर्फ करनसिंह राजपुरोहित


ताण्डव नृत्य
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
ऊँच नींच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
धर्म के ठेकेदारोँ से ,.,...
वेदोँ से शुद्र के कान सीसा तुमने ही डलवाया था।
धर्म के माथे पर यह कलंक तुमने ही लगवाया है॥
देवालय से दलित का प्रवेश निषेध तुमने ही करवाया था।
परम पिता पर प्रश्न चिन्ह तुमने ही लगवाया है॥
साहित्य से अस्पृश्यता का अध्याय तुमने ही लिखवाया था।
संस्कृती के आँचल पर तुमने ही यह काला धब्बा लगवाया है।
आज मैँ मनु स्मृति को खुले आम जलाऊंगा।
भेदभाव की दुनिया को छोड़ कर सत्य की शरणोँ जाऊँगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
समाज के दलालों से.,.,,
दलित का दुल्ला जब घोडी पर चढ़ता है तो नाक तुम्हारी कैसे कट जाती है।
जब गैरोँ को बहन बेटियाँ ब्याही तब शान भारत की कौन सी बढ जाती है॥
दलित के संग एक चौपाल पर बैठने मर्यादा तुम्हारी कैसे घट जाती है।
गोरोँ को सलामी भरकर भारतमाता के दूध का मान कौन सा बढाया था॥
अछूत के हाथोँ का अन्न जल लेने तुमारा पुण्य कैसे घट जाता है।
अफीम गांजा व भांग पी कर तुम धर्मात्मा कैसे रह सकते हो॥
मनुप्रदत्त की समाज व्यवस्था को मिटाऊँगा।
नूतन समाज व्यवस्था का सर्जन करुंगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
शिक्षित दलितोँ से ......
ऊँचा ओहदा पा कर तुम शहरोँ मेँ जा अपना मुकाम बनाने लगे हो।
गाँवोँ मेँ तुम्हारे परिजन नित अवहेलना शिकार होते है॥
शहर मेँ अपने ऐश्वर्योँ की चिन्ता नित तुम लगे हो।
गरीब दलित के रोटी के प्रबंध का भी फर्ज निभाना है॥
शहर मेँ रहकर आधुनिकता मेँ खो जाते हो।
दरिन्दों की क्रुद्ध निगाहों दलित को आजाद करवाने का धर्म निभाओ॥
आज मैँ क्रांति की आवश्यकता गाऊँगा।
एक अखण्ड मानव समाज बनाऊंगा॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
आरक्षण से .,,,.
आरक्षण के रथ अपने परिजनोँ को अधिकारी बनाने लगे हो।
अधिकारहीनोँ खातिर अपने स्वार्थ त्याग कर को सामान्य बन जाओ तुम॥
विधायक, सांसद व मंत्री बनकर भी दलित बने बैठे हो।
अब तुम सवर्ण बनकर मनु की स्मृति को गाड़ दो॥
ब्रह्मा के शीश पर बैठ विप्र अब ललकार दो।
सदविप्र बनकर सबके पूण्य कर्म कराना सिखा दो॥
ता ता धिन ता ता।
धिन धिन ता ता ता॥
मैँ आज जी भर कर ताण्डव नृत्य करुंगा।
जीवन व मृत्यु के बीच संधर्ष करुंगा॥
जातिवाद को मिटाने का एक प्रयत्न करुंगा।
ऊँच नीच की दीवार गिराने के सभी यत्न करुंगा॥
0000000000000

कुमार अनिल पारा,

(मोहताज हम रह जायेंगे)
----------------------------
तोड़ दोगे घर जो मेरा ,
हम कहां रह पायेंगे,
छोड़ दोगे साथ मेरा,
मोहताज हम रह जायेंगे,
बिन तेरे अब ये सनम,
हम गीत कैसे गायेंगे,
साथ चलने का बहाना,
हम कहां कर पायेंगे,
बिन तेरे अब ये सनम,
ये घोंसले भी प्‍यार के,
ताकते रह जायेंगे,
छोड़ दोगे साथ मेरा,
मोहताज हम रह जायेंगे,
मुस्‍काराते फूल हमकों,
देख अब मुरझायेंगे,
चहचहाते पक्षियों के,
रूप ना मिल पायेंगे,
जो छोड़ दोगे साथ मेरा,
मोहताज हम रह जायेंगे,
मज़नुओं के खेत बंजर,
देख सब घबरायेंगे,
देख लैला की कहानी,
पास भी ना आयेंगे,
पतझडों से फूल,
अब नहीं खिल पायेंगें,
पेड़ पत्‍तों के बिना,
फिर अकेले रह जायेंगें,
तोड़ दोगे घर जा मेरा,
हम कहां रह पायेंगे,
छोड़ दोगे साथ मेरा,
मोहताज हम रह जायेंगें,
मोहताज हम रह जायेंगें,
------------------------------
(गीत- बस करो अब ये खुदा)
---------------------------
बस करो अब ये खुदा,
तेरे रहम की आस है,
अब ना कोई जिंदगी लोगे,
हमें विश्‍वास,-2

भूकंप के कंपन से देखो,
दुनिया सारी उदास है,
बस करो अब ये खुदा,
तेरे रहम की आस है,
अब ना कोई जिंदगी लोगे,
हमें विश्‍वास है-2

बस करो अब ये खुदा,
तेरे रहम की आस है,
जान जोखिम में पढ़ी है,
अब जिंदगी भी उदास है,
अब ना कोई जिंदगी लोगे,
हमें विश्‍वास है-2

ढेर में मलबे हमको,
जिंदगी की तलाश है,
अब कोई वार करना,
अब हमें विश्‍वास है,
बस करो अब ये खुदा,
तेरे रहम की आस है,
अब ना कोई जिंदगी लोगे,
हमें विश्‍वास है,
--------------------------------


धूप की चिंगारियों से ,
हो गये पत्‍थर
धूप की चिंगारियों से ,
हो गये पत्‍थर गरम,
सनसनाहट गुम चुकी,
शीतल हवाओं की यहां,
भोर अच्‍छा लग रहा,
अब शाम की चाहत यहां,




दोस्‍ती के चॉद को दीदार हम करेंगें,
जब भी मुलाकात होगी आपसे,
बहुत प्‍यार हम करेंगें,


(में शराबी हो चुका हूं)
में शराबी हो चुका हूं
बेहोश होने के लिए,
ज्ञान अपना खो चुका हूं
मदहोश होने के लिए,

जी रहा हूं  जिंदगी,
अपने दोष धोने के लिए,
पी रहा में शराब,
खामोश होने के लिए,

अब जी चुका हूं जिंदगी,
मौत मेरे पास है,
पर पी रहा हूं में शराब,
अज्ञान होने के लिए,

में शराबी हो चुका हूं,
नाम खोने के लिए,
ज्ञान अपना खो चुका हूं,
मदहोश होने के लिए,


दूरियां जो बड़ चुकी हूं,
धर्म और ईमान में,
फर्क पैदा हो चुका हूं,
इंसान के सम्‍मान में,
पर जी रहा हूं जिंदगी,
सम्‍मान ढ़ोने के लिए,
में शराबी हो चुका हूं,
अज्ञान होने के लिए,

में शराबी हो चुका हूं,
शैतान होने के लिए,
पर पी रहा हूं में शराब,
अज्ञान होने के लिए,

पी चुका हूं रात को,
इंसान होने के लिए,
पर सुबह भी पी रहा हूं
शैतान होने के लिए,
में शराबी हो चुका हूं,
बेहोश होने के लिए,
ज्ञान अपना खो चुका हूं
मदहोश होने के लिए,
पर पी रहा हूं में शराब ,
अज्ञान होने के लिए,
----------------------


(धारणा तुम छोड़ दो)
---------------------------
इंसान से इंसान के विद्वेष,
को तुम छोड़ दो
नफरतों के तीर की
अवधारणा तुम छोड़ दो,

ज्ञान और सम्‍मान के विद्वेष,
को तुम छोड़ दो,
आफतों के बोल सी,
अवधारण तुम छोड़ दो,

बांटती जागीर की,
उस भावना को छोड़ दो,
मोह के जंजीर,
अब धारणा को तोड़ दो,
इंसान से इंसान के विद्वेष,
को तुम छोड़ दो,
नफरतों के तीर की,
अवधारणा तुम छोड़ दो,

गोलियों से भरी,
मीनार,को तुम छोड़ दो,
धार के श्रृंगार की,
तलवार को तुम छोड़ दो,
दीन हीन से गुरूर,
की भावना को छोड़ दो,
आफतों के बोल सी,
अवधारणा तुम छोड़ दो,

इंसान से इंसान के विद्वेष,
को तुम छोड़ दो
नफरतों के तीर की
अवधारणा तुम छोड़ दो,
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कविता-(मां तेरे नाम को )
मां तेरा नाम जगत की हर दीवारों पर मैं लिख दूंगा,
तेरे नाम पर दुनिया के हर चौराहे को भी कर दूंगा,
मां तेरे नाम जगत की हर जागीरों को मैं कर दूंगा,
तेरे नाम को दुनिया की हर सीमा पर भी लिख दूंगा,

तेरा नाम जमीनों की हर सीमा पर भी लिख दूंगा,
तेरे नाम हकीमों की उस बस्‍ती को भी कर  दूंगा,
मां तेरे नाम जगत के हर पथ को भी मैं कर दूंगा,
मां तेरा नाम जगत की हर दीवारों पर मैं लिख दूंगा,

मां तेरा नाम जगत की हर उस पूजा पर भी लिख दूंगा,
तेरे नाम जगत के सब मैं मंदिर मस्‍जिद कर दूंगा,
बाग,बगीचा, गुरूद्वारे की दीवारों पर भी लिख दूंगा,
तेरे नाम पर दुनिया के हर चौराहे को भी कर दूंगा,

मां तेरा नाम जगत की हर दीवारों पर मैं लिख दूंगा,
तेरे नाम पर दुनिया के हर चौराहे को भी कर दूंगा,
मां तेरे नाम जगत की हर जागीरों को मैं कर दूंगा,
तेरे नाम को दूनिया की हर सीमा पर भी लिख दूंगा,
कुमार अनिल पारा,
anilpara123@gmail.com

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अंजली अग्रवाल


अक्सर लोगों को कहते सुना है,
कि सपने सच होते है.......
पर कितनों के सपने सच्चे होते हैं......
यूँ तो फूल गुलाब का भी होता हैं ...
पर उसे काँटों संग रहना होता है....
अक्सर गमों को तराजू में तौलते देखा........
पर कितनों ने पला खुशी का देखा है....
बैठे रहते हैं लोग एक नयी सुबह के इंतजार में...
पर कितनों ने रात को काली होते देखा हैं....
ये जिन्दगी तो कठपुतलियों का खेल है...
इनको चलाना जिसने जान लिया..
वही सिकंदर होता हैं.....
अकसर लोगों को कहते सुना है...
कि सपने सच्च होते है.......
पर कितनों के सपने सच्चे होते हैं......
जो बैठा लिखने उसके बारे में .............
तो जिन्दगी मुस्कुराने लगी.........
गमों की परछाई दूर भागने लगी......
इतनी खुशी मिली उसके संग ये आज जाना.....
इस खूबसूरत दुनिया को आज पहचाना....
रोता रहा अपने गमों के लेकर.....
एक खुशी तो हमेशा से मेरे पास थी...
जीने के वजह हमेशा से मेरे पास थी...
ढूँढता रहा मैं मेहमानों को.....
गमों को भुलाने की सबब तो मेरे पास ही थी.......
इतना सुकून मिला इस दिल को कि आँखें खोलना ही भूल गया...
खोया कुछ इस कदर उसकी यादों में कि लिखना ही भूल गया।
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माँ
जब थक कर घर लौटा........
तो नजरों ने सबसे पहले तुझे खोजा.....
बैठा खाना खाने जब........
तो निवाला तेरे हाथ का याद आया.........
करवटें बदलता हूँ रात भर..........
सोया करता था तब, जब जब बालों को तुमने सहलाया.......
सुबह तैयार होकर जब घर से निकलता हूँ......
तो अचानक ही पीछे मुड़कर देखता हूँ......
जैसे आवाज तुमने हो लगाया..........
वो आँसू ही अच्छे थे जिनके कारण तुमने मुझे गले लगाया......
हर पल तुम मेरे साथ ऐसे रहती हो......
जैसे माथे पर हो टीका लगाया.........
जब जब इस दुनिया ने मुझे सताया.....
तब तब होठों पे तेरा नाम आया........
क्यों बड़ा हो गया मैं.....
क्यों तुझसे जुदा हो गया मैं.....
बस यही ख्याल आज मन में आया....
आज तेरी बाहों में.....मैं दौड़ा चला आया......
हैप्पी मदर्स डे...........

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जिन्दगी को संघर्ष का नाम तो देते है हम.....
पर लड़ने से पीछे हटते है हम..........
यूँ तो जिन्दगी एक दौड़ है कहते है हम.....
पर क्या सच में दौड़ते है हम...........
कभी तो जिन्दगी को खुली किताब बताते है हम....
पर क्या इस किताब के कुछ पन्ने भी लिखते हम.....
दुनिया से कहते है कि कोई समझ न पाया हमें....
पर क्या आज तक खुद को समझ पाये हैं हम....
शिकायतों का ढेर हैं हमारी जिन्दगी में....
जिसे कभी साफ नहीं करते हैं हम....
काश लेने से पहले देने का हुनर सीख लेते हम...
काश इस ढेर को साफ का लेते हम......
तो जिन्दगी को जिन्दगी कहते हम....
तो जिन्दगी को जिन्दगी कहते हम....
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बालकवि देवेन्द्र सुथार

स्कूल के वे दिन
जब होता था
कंधोँ पर बस्ता
नन्हीँ अंगुलियाँ
उखेरती थी अक्षर
स्कूल न जाने की
जब भी करता जिद
माँ मानती समझाती
स्कूल छोडने आती
घर पर मेरी ही चलती
एक अकेला बेटा था
हर जिद पूरी होती
ये आंखेँ कभी नहीँ रोती
लेकिन आज वो स्कूल
और स्कूल के वे दिन
दोनोँ बन गये है अतीत
समय के आगे हुये चीत
यादोँ के गुलदस्ते मेँ
यादोँ के फूल बनकर रह गये
अब माँ बूढी हो गयी
उनकी लाठी बन गया मैँ
जो कभी मेरी अंगुली
पकडती
आज मैँ उनकी अंगुली
पकडता हूँ
समय बदला लेकिन
दृश्य आज फिर दोहराया
फर्क इतना आ गया
माँ की जगह मैँ और
मेरी जगह माँ आ गयी।

अपने गांव में
अपने गांव में
कुछ भी नकली नहीं बिकता
सिर्फ कभी-कभी
नकलचियों को छोडकर।
सूरज, चांद, पानी, हवा,
सब मिलते है,
हंसते-खिलखिलाते ,
सबसे टकराते हुए।
सिर्फ बनावटियों को छोडकर ,
मां की लोरी, बाबा की डांट,
खेत-खलिहानों की सांधी महक,
गुड रोटी की ताजगी,
बस जाती हूं मन में,
सिर्फ बर्गर-पिज्जा को छोडकर।
गिल्ली-डंडे, कंच्चे-सितांलिया,
दोस्तों की हंसी में
मुस्करा देता हूं
बाहो में बाहें डालकर
सिर्फ छुटटी के पल छोडकर
पाठशाला में मास्टर जी की,
डांट और इमली के पेड  का भूत
भी अच्छे लगते है ,
जब शहर से आने के बाद
आती है गांव की याद
क्योंकि हम अपनापन भूल गये हैं।
सिर्फ स्वार्थ को छोड़कर।

- देवेन्द्र इन्द्रमल सुथार, गांधी चौक, बागरा, जालोर, राजस्थान। 343025 मो-8107177196
devendrasuthar196@gmail.com
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