गुरुवार, 21 मई 2015

रमते रहो, रमे रहो

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डॉ.  दीपक आचार्य

 

इंसान हमेशा सुकून पाने की फिराक में लगा रहता है। उसे हर पल तलाश बनी रहती है इसकी।

जहाँ उसका मन लग जाता है वहाँ वह रमने की कोशिश करता है, वहीं ठहराव ले आता है और चाहता है कि यह सुकून इसी प्रकार निरन्तर बना रहे।

फिर इससे अधिक सुकून पाने की उम्मीद जहाँ दिखने लगती है तब वह उधर दौड़ लगाता है लेकिन सुकून के पुराने स्रोत को भी आसानी से नहीं छोड़ना चाहता।

हर कहीं सुकून और शांति की तलाश में भटकाव के साथ दौड़ लगाता हुआ इंसान हर खुशी और शांति की तुलना करता रहता है और जहाँ पहले की अपेक्षा अधिक सुकून की प्राप्ति होने लगती है उस माँद में हमेशा रहने की कोशिश करता हुआ मौज-मस्ती के साथ समय गुजारने लगता है।

सुकून देने वाला स्रोत कोई सा व्यक्ति, वस्तु या विषय अथवा स्थान कुछ भी हो सकता है।

आत्मिक शांति और मस्ती पाने की इस अनवरत यात्रा में जब सब कुछ सहज भाव से बिना अधिक मेहनत किए मिल जाता है तब वह मुदित भाव में बना रहता है।

आदमी की यही इच्छा होती है कि उसके लिए सुकून पाने के लिए सारे विकल्प हमेशा खुले रहें ताकि एक जगह किसी तरह का उबाऊपन आ जाने पर वह इसकी भरपाई दूसरे विकल्प से आसानी से कर सके।

संसार की मोहमाया के झीने आवरणों से ढंका हुआ हर इंसान आजकल इसी फेर में रमा हुआ है।

इंसान अपने आपको अधूरा मानता है और अधूरेपन को दूर करने के लिए उसे किसी न किसी की तलाश हर पल बनी रहती है।

कोई अधूरेपन को दूर करने में कामयाब होकर जिन्दगी का सुख-सुकून और लक्ष्य पा लेता है और खूब सारे अपने अधूरेपन को दूर करने के लिए जिज्ञासा और आकर्षण संसार में भटकते हुए अपने आपकी पहचान तक मिटा देते हैं।

तभी महाठगिनी माया के जाल से कोई नहीं बच सका है। आप और हम किस खेत की मूली हैं।

पूरी की पूरी दुनिया माया के इन महा कड़ाहों में गुलाबजामुन या रसगुल्ले बनी हुई तैर रही है। कोई किसी शहद में डूबा हुआ है, कोई चाशनी के किसी महासागर में गोते लगा रहा है।

कईयों के भाग में खुरचन के सिवा कुछ नहीं लिखा है और बहुत सारे ऎसे हैं जिनके भाग्य में पकवानों की दुकानें मुफ्त बदी हुई हैं।

कुछ भौंरों की तरह तलाशिया दौड़ में भिड़े हुए गुंजन कर रहे हैं, कई सारी मक्खियां इधर-उधर भिनभिनाती हुई सुकून खोज रही हैं। यानि की हर कोई भिड़ा है सुकून पाने की दौड़ में।

कई सारे सुकून पाए लोग इतने एक्सपर्ट हो गए हैं कि हर नए मुकाम पर आकर पुरानों से तुलना करने लगते हैं और जीवन के अनुभवों का सार निचोड़ते हुए औरों को अपने परम ज्ञान से लाभान्वित कर रहे हैं।
       कई सारे सिर्फ सुकून की चर्चाओं में ही खोये हुए कल्पनाओं के जंगल में भटक गए हैं। कुछ को पता ही नहीं है कि जिसे पाने की चाह में निकले थे उसका क्या हुआ, और वे कहाँ आकर खो गए हैं। 

कुल मिलाकर सार यही है कि हर कोई भागा जा रहा है सुकून पाने, जिन्हें मिल गया है वे जाने किन-किन माँदों में मौज-मस्ती का आनंद पा रहे हैं।

हर कोई अपने अधूरेपन से व्यथित है और पूर्णता पाने की तरफ लपक रहा है। कोई ऎसा देखने में नहीं आ रहा जो स्थितप्रज्ञ ध्यानी-योगी की तरह निर्विकार शून्य पड़ा हो चाहे वह संसार छोड़ चुके वैरागी बाबा हों या परम ज्ञानी।

जो पा गए हैं वे और कुछ पाने को उतावले हैं, नया-नया कुछ पाना चाहते हैं। जो असफल रहे हैं वे सपनों और कल्पनाओं के संसार में खोये-खोये से हैं और पा जाने की चाहत में उद्विग्न होते जा रहे हैं।

जो पा जाने का अहसास कर चुके हैं वे सारे के सारे अपने-अपने इन्द्रधनुषों के बीच मदमस्त हैं। इनमें भी खूब सारे ऎसे हैं जो अपनी जिन्दगी में जाने कितने इन्द्रधनुषों को एक साथ बनाए रखते हैं और वह भी इस तिलस्म के साथ कि एक-दूसरे इन्द्रधनुष को इसकी भनक भी नहीं लगती।

जिनकी तलाश जारी है वे न इधर के रहे हैं न उधर के। इन लोगों की जिन्दगी में हर मोड़ पर उबाल ही उबाल दिख रहा है।

काम में मन दोनों ही प्रजातियों का नहीं लगता। एक किस्म है जो दूसरों में खोयी हुई है, जो समय मिला है, जितना मिला है उसमें प्राप्त सुकून को दो-दो हाथों से लूट लेने को व्यग्र है और दूसरी सुकून पा जाने के लिए बेचैन है।

चंद लोग ही होते हैं जो इन मायावी वैचित्र्य भरी अवस्थाओं में पूरा का पूरा विवेक बनाए रखते हुए जीवन के सारे फर्ज और धर्म पूरे करते रहते है। शेष से कर्मयोग के प्रति नैष्ठिक श्रद्धा की अपेक्षा रखना व्यर्थ ही है। 

इस स्थिति में एक ही चारा है। जो कहीं न कहीं रमे हुए हैं उन्हें रमने दो, जो नहीं रम पाए हैं उन्हें उनकी तलाश पूरी कर लेने दो। अन्यथा ये आधे-अधूरे लोग दुनिया के किसी काम के नहीं हैं।

ऎसे लोगों के साथ हम न्याय नहीं कर सकते। इस किस्म के लोगों का फैसला समय के साथ अपने आप हो जाया करता है क्योंकि हर संबंध समय सापेक्ष है और सबका अपना समय आता है, जाता भी है और हर संबंध का समय एक न एक दिन पूरा होना ही है, चाहे पूर्णता पा कर हो अथवा अधूरेपन का दंश पाकर।

यह समय ही है जो हम सभी का त्रिकालज्ञ महागुरु है जो कटु सत्य से भी परिचित कराता है और प्रेम, आसक्ति से लेकर वैराग्य और विरक्ति तक के सारे पुराणों का सार व्यवहारिक रूप से अनुभवित करा देता है।

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- डॉ.  दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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